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04 सितंबर, 2014

50 साल बाद मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' पर पुनर्विचार

रामाज्ञा शशिधर 

*सभ्यता का हर दस्तावेज बर्बरता का भी दस्तावेज होता है। -वाल्टर बेंजामिन

*अचेतन ‘अन्य’ का विमर्श क्षेत्र है। – लाकां

यह मुक्तिबोध की अंतिम कविता अंधेरे में का पचासवां साल है। अंधेरे में कविता 1957 से 1962 के बीच रची गई, जिसका अंतिम संशोधन 1962 में हुआ तथा प्रकाशन ‘आशंका के द्वीप: अंधेरे में’ शीर्षक से कल्पना में नवंबर 1964 में हुआ। यह मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब भारत: इतिहास और संस्कृति का भी पचासवां साल है। ग्वालियर से 1962 में प्रकाशित होने और मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद जबलपुर न्यायालय द्वारा 1963 में किताब के प्रतिबंधित अंश हटाकर अतिरिक्त छापने के फैसले का यह पचासवां साल आशंका के द्वीप भारत के अंधेरे को ज्यादा विचारणीय बना देता है। यह अनायास नहीं है कि अंधेरे में की जब पचासवीं सालगिरह मनायी जा रही है, तब मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब पर कहीं कोई बहस नहीं है। शायद इसका जवाब भी अंधेरे में कविता में मौजूद है।
अंधेरे में फैंटेसी में निर्मित कविता है। स्वाधीनता के छियासठ और भूमंडलीकरण के बाईस वर्षों बाद भारतीय समय, समाज, सत्ता और राष्ट्र का अंधेरा फैंटेसीमय हो गया है। मध्यवर्ग का चरित्र ज्यादा पतित हो गया है। आम जनता से उसका लगभग संबंध विच्छेद हो गया है। सत्ता के साथ वह ज्यादा नाभिनालबद्ध है। बौद्धिक वर्ग पूर्णत: रक्तपाई वर्ग का क्रीतदास हो गया है। राष्ट्रवाद, वर्गचेतना, सर्वहारा, जनक्रांति आदि शब्द मध्यवर्ग के शब्दकोश से गायब हो गए हैं। पश्चिमी आधुनिकता और कॉरपोरेट पूंजी राष्ट्रराज्य से गठबंधन कर जनता के सामने तानाशाह की भूमिका में है। शीतयुद्ध समाप्ति के बाद रहा-सहा मार्क्‍सवादी संस्कृति चिंतन बासी कढ़ी में उबाल की तरह दिखता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा सभ्यतागत विनाश के आखिरी कगार पर विस्थापन, आत्महत्या, दमन और संघर्ष में संलग्न है लेकिन मध्यवर्ग और क्रीतदास बौद्धिक वर्ग का उससे किसी तरह का सृजनशील जुड़ाव नहीं है। वैश्विक सत्ता प्राकृतिक संसाधन और गांव-खेत के साथ मानव अचेतन के तिलस्मी इलाके पर भी उच्च तकनीकी संस्कृति के माध्यम से कब्जा कर चुकी है। अस्तित्व और चेतना का पूरा इलाका राजनीति, बाजार और भाषा के पाखंड एवं झूठ से पटा हुआ है। ‘अंधेरे की’ फैंटेसी ने रहस्य और जादू के जटिल खेल में पूरी सभ्यता को उलझा दिया है।
सभ्यता संकट के इस सर्वग्रासी दौर में ‘अंधेरे में’ कविता पाठकों के लिए एक नई रोशनी का काम कर सकती है। लेकिन हिंदी आलोचना के मठवाद और गढ़वाद ने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का अंधेरा और बढ़ा दिया है। दिलचस्प है कि हिंदी आलोचना के फैंटेसी जैसे कला रूप से भले संबंध नहीं हो, लेकिन ‘अंधेरे में’ जैसी कविता की आलोचना के क्रम में उसका फैंटेसीमय गड्डमड स्वप्नचित्र देखने लायक है। क्लासिक मार्क्‍सवादी और यथार्थवादी आलोचक रामविलास शर्मा के लिए इस कविता पर एक ओर विकृत मनोचेतना के रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सात्र्र के खंडित व्यक्तित्व के अस्तित्ववाद का। आधुनिकताबोध और नई समीक्षा से प्रभावित नामवर सिंह के लिए वहां भाषिक एवं साहित्यवादी अस्मिता की खोज है, वहीं स्थूल मार्क्‍सवादी प्रभाकर माचवे के लिए वह ‘गुएरनिका इन वर्स’ है। शमशेर के लिए यह कविता देश के आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रतापूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है तो कलावादी अशोक वाजपेयी के लिए ‘खंडित रामायण’। एक आलोचक को इसमें लंदन की रात दिखती है तो दूसरे कवि को जापानी फिल्म का जंगल। बात यहीं ठहर जाये तो गनीमत है। तिलस्मी खोह में कुहासा बढ़ाने के लिए हिंदी आलोचना की हांफती हुई युवा पीढ़ी मुक्तिबोध पर किताब लिखती है तथा मार्शल लॉ लगाने वाली शक्ति से पुरस्कृत होती है। यहां गाइड छाप पदोन्नतिमूलक समीक्षा की चर्चा करना व्यर्थ है जिसे हिंदी आलोचना में ‘कूड़ावाद’ के प्रर्वतन का श्रेय दिया जाना चाहिए। जितनी चेतना मध्यवर्ग की तथा फैंटेसी की टूटी बिखरी हुई नहीं होती है, उससे ज्यादा कविता की आलोचना की है। विचारणीय है कि व्यक्तिपूजा और कर्मकांड से ग्रस्त हिंदी मनीषा पिछले समय में नदी के द्वीप के अज्ञेय की जिस तल्लीनता से पूजा-पाठ कर थी, इस वर्ष से आशंका के द्वीप: अंधेरे में के कवि मुक्तिबोध का उसी सम पर भजन-कीर्तन शुरू कर चुकी है। ऐसी परिस्थिति में मुक्तिबोध की इस कविता की आलोचना आग में पूरी हथेली डालने जैसा काम है।

03 सितंबर, 2014

कबीर से उत्तर कबीर काव्य संकलन (साम्प्रदायिकता के विरुद्ध बनारस की कविता ) संपादक :रामाज्ञा शशिधर pdf

बनारस से जुड़े हिंदी उर्दू के इकतालीस कवियों की साम्प्रदायिकता के विरुद्ध कविताओं का अनूठा संकलन जरूर पढ़िए.कबीर,रैदास,भारतेंदु,ग़ालिब,फाएज बनारसी,गनी बनारसी,प्रसाद,त्रिलोचन,बेताब बनारसी,आफ़ाक बनारसी,नज़ीर,केदारनाथ सिंह,धूमिल,राजशेखर,गोरख पाण्डेय,ज्ञानेंद्रपति,अब्दुल बिस्मिल्लाह,रोशन लाल रोशन,रामेश्वर,जवाहरलाल कॉल व्यग्र,मूलचंद सोनकर,वशिष्ठ अनूप,बेतुक लोह्तबी,दामन लोहतबी,सलीम शिवालवी,अल कबीर,रामप्रकाश कुशवाहा,रामाज्ञा शशिधर,नीरज खरे,व्योमेश शुक्ल,पराग,ललित शुक्ल,राकेश रंजन,नईम अख्तर,अरमान आनंद,उपेन्द्र यादव विनय मिश्र,अजय राय,डा सरोज,वली गुजराती आदि...

https://drive.google.com/file/d/0B4iwECfp_wFfbExMOUxpVHlFdEVHb0R6S2x6bzJpZl9xZlhR/edit?usp=sharing

02 सितंबर, 2014

कबीर से उत्तर कबीर(साम्प्रदायिकता के विरुद्ध बनारस की कविता) :रामाज्ञा शशिधर

हिंदी उर्दू के इकतालीस कवियों-शायरों का दस्तावेज.मूल्य:चालीस रूपए:पृष्ठ 80 ,तानाबाना प्रकाशन,वाराणसी
https://drive.google.com/file/d/0B4iwECfp_wFfbExMOUxpVHlFdEVHb0R6S2x6bzJpZl9xZlhR/edit?usp=sharing