राश की कलम से
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||थिएटर से लौटकर||
कला समीक्षा में भोथड़े दिमाग कम नहीं। उसकी एक मिसाल फ़िल्म शोले को लेकर 50 वर्षों से होती रही किसिम किसिम की कुचर्चा है। यह सही है कि वह एक मसाला पॉपुलरिटी से क्राफ्टेड मूवी है लेकिन शोले को मारधार, दोस्ती, रोमांस,कॉमेडी,ट्रेजडी, गीत संगीत,संपादन,निर्देशन,संवाद,पटकथा तक सीमित रखना भारतीय सिनेमा की उस जमीनी दृष्टि को खारिज करना है जो यहां के मूल सामाजिक राजनीतिक प्रश्न रहे हैं।
मैं जब कल बनारस के आईपी थियेटर में 4k dolby saund के साथ अपनी गोल्डन जुबली मना रही फिल्म शोले के फाइनल अनकट को शोले दर्शन की यात्रा में 11वीं बार देख रहा था तब मुझे पहली बार उसकी
दृष्टिसंपन्न पटकथा पर ध्यान गया जिसकी मूल समस्या चंबल इलाके के रामगढ़ गांव की किसान समस्या है। भारतीय हिंदी सिनेमा ने किसान प्रश्न को आरम्भ से मुख्य या गौण रूप में किसी न किसी तरह से जरूर उठाया है।मदर इंडिया से पिपली लाइव तक किसान
प्रश्न के अनेक सूत्र विन्यस्त दिखते हैं।
शोले की पटकथा के केंद्र में डाकू गिरोह के सरदार गब्बर सिंह द्वारा रामगढ़ गांव के किसानों से अनाज वसूली है। ठाकुर बलदेव सिंह बड़े किसान का
पुलिस पुत्र है जबकि छोटे बड़े किसान पात्रों से यह गांव जीवंत बना रहता है। दो निम्न मध्यवर्गीय शहरी शातिर चोरों धर्मेंद्र और अमिताभ को किसानों का नायक बनाए जाने की कहानी रामगढ़ के किसानों की
रक्षा की कहानी है।
सलीम जावेद की प्रगतिशील किसान मजूर और कौमी एकता की कलादृष्टि का कमाल है कि पटकथा
के संवादों में सीधे खेती से लगाव और ग्राम प्रेम के इंकलाबी डायलॉग रचे गए हैं। संजीव कुमार जिस तरह से कहते हैं कि किसान अपने हंसिए की दरांतियों से लोगों का जीवन पालते हैं या अब इस गांव से एक मुट्ठी अनाज
भी डाकुओं को नहीं मिलेगा तब यह उस दौर के चंबल की त्रासदी का ही नहीं बल्कि उत्तर भारतीय किसान के संघर्ष का प्रतिबिंब है। जय और वीरू गांव में खेती
बारी करने का स्वप्न देखने लगते हैं। एके हंगल का अपने कई बेटों को किसानों और गांव के लिए शहीद
करने की इच्छा किसान एकता की बुनियाद बनती है।प्रेम और पर्व किसानी भाषा,टोन, लय से विन्यस्त हैं।
मुझे लगता है कि सलीम जावेद की पटकथा में यह भारतीय किसानों के गल्प और हास्य व्यंग्यशिल्प का भी खूबसूरत इस्तेमाल है जिसमें कथा कथन से पटकथा में बार बार हुक पाइंट निर्मित होता है और त्रासदी व हिंसा की यात्रा को सहज बनाए रखने
का प्रयास जारी रहता है।
अमजद खान द्वारा गब्बर की भूमिका भारतीय
सिनेमा के खलनायकत्व की अदा की ऊंचाई है। मैं
एके हंगल से इप्टा के बिहार सम्मेलन में मिला था। इप्टा स्वर्ण जयंती के झंडा गीत के लिए मेरा गीत 'वे सारे हमारी कतारों में शामिल ' के कोरस गायन के वक्त एके हंगल और ओमपुरी जैसे वैकल्पिक सिने कलाकार शामिल हुए। तब शोले का डायलॉग बोलकर एके हंगल इप्टा का महत्व बताते रहे।मैं उनसे धीरे धीरे प्रभावित हुआ। इस फ़िल्म में आए अमजद खान उर्फ गब्बर के डायलॉग को क्लास 8 से बीए तक जन्मभूमि सिमरिया के अपने
टोल में घूम घूमकर बोलता था।तब मैं गब्बर ही हो
गया था।मेरा गांव किसानों और रंगबाजों की ज़ंग से
लाल बना रहता था।
अब भारतीय सिनेमा ने ग्रैंड बनाना लगभग बंद
कर दिया है तब इस फ़िल्म को हर पीढ़ी द्वारा देखना
चाहिए। संस्कृति से फ़िल्म पैदा होती है ,फिर वह फ़िल्म एक सामाजिक संस्कृति बना सकती है।शोले
ऐसी ही फ़िल्म है।