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01 जनवरी, 2021

अस्सी ने पूछा कि काशीनाथ और ज्ञानेंद्रपति एक ही दिन क्यों पैदा हुए!


@रामाज्ञा शशिधर की कलम से
【बनारस में काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति का जन्मदिन】
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दोस्तो!
 यह अनोखा संयोग है कि काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति दोनों बनारसी तरावट के लेखक हैं और दोनों का  जन्मदिन नववर्ष के दिन ही है।यानी दोनों का जन्मदिन
'गरीबों का गोआ' बन चुके बनारसी घाटों की भीड़ की भेंट है।
        आज बनारस का गली कूचा सब सड़क पर है,घाट पर है,बोट पर है,रेत पर है।नगर के घर खाली और गंगा घाट छाली ताली।
       मैं घुमक्कड़ी और फक्कड़ी करता हुआ अस्सी पर हूँ।बाएं में दायां ऐसा घुसा है कि नगर का चक्का जाम।भीड़ से घबड़ाकर पोई की अड़ी पहुंचा।पोई की तनी छाती और फैली बांहें अड़ी के खोहनुमा दरबे के काफी भीतर दबी दबी सी हैं।काशीनाथ के सुपात्र और अड़ीवीर प्रो गया सिंह गायब हैं।पता चला इनदिनों में अर्धरात्रि में अपने मांद से हवाखोरी के लिए निकलते हैं जिन्हें सिर्फ पागल,नशेड़ी और बाबा ही देख पाते।
     चौराहे के जाम के धुएं से पीपल हांफ रहे हैं।
       पप्पू की अड़ी पर भी रंग तरंग का सांध्य मजमा है।घिसे पिटे गदरची और ढिंढोरची से मुक्त।
     नींबू की चाय की चुस्की लेते ही,अपने पुराने छात्र जो अब टीवी पत्रकार हैं,पर नजर पड़ी।हालचाल हुआ।
    तभी उधर से एक मद्धिम आवाज़ आई-आज 'काशी का अस्सी' के लेखक काशीनाथ का जन्मदिन है।चूरा मटर पोई के यहां होता था।
      दूसरी आवाज़ ने पहली को काटा-यह वर्षों पहले होता था जब काशीनाथ अस्सी के नागरिक थे।वे अब विदेश में रहते हैं बेटे के साथ।
          बहस शुरू हुई जिसका सारांश है कि 1ली जनवरी को जन्मदिन का चलन बहुत पहले से है।जिसके जन्मदिन का पता नहीं रहता वह 1ली जनवरी में ईस्वी
लगाकर रखवा लेता है।अधिकारी बर्थ सर्टिफिकेट,आधार कार्ड,वोटर कार्ड और प्रिंसिपल स्कूल में पहली तिथि आंख मूंदकर डालता है।यह माँ बाप और समाज के लिए सहूलियत भरा दिन है।देश की एक तिहाई आबादी फाइलों में पहली जनवरी को ही पैदा होती है। काशीनाथ के साथ हुए हादसे का पता बाबू गया सिंह को लग गया हो इसलिए पोस्टपोन कर दिया।
           मुझे राहत हुई कि ज्ञानेन्द्रपति ने अस्सी पर किसी को भले ही जन्मदिन नहीं बताया और सेलिब्रेट नहीं किया वरना ये संसदिए हमारे गंभीर और सत्याग्रही कवि पर जब धुआंधार शब्द फुहार फेंकते तो उनकी तरोताज़ा कल्पना वेबजह सीलन फील करती।
             दोनों लेखक मेरे अज़ीज हैं।दोनों के कारण बनारस में मुझे अपने होने का कारण दिखता है।
       दोनों को नगर ने अपनी तरह से ढाला है और दोनों ने नगर को अपनी तरह से रचा है।दोनों बनारस में चाहे जहां रहते हों जनगणमन  ने दोनों के लिविंग पॉइंट्स फिक्स कर दिए हैं।
       काशीनाथ डेढ़ दशक पूर्व अस्सी भदैनी से मंडुआडीह की ओर चले गए लेकिन वे आज भी पाठकों के लिए अस्सी की अड़ी पर हैं।
     ज्ञानेन्द्रपति अब कम ही केंट रेलवे  के 9 नम्बर प्लेटफॉर्म पुल पर खड़े रहते हैं लेकिन पाठक उन्हें पुल पर किसी का इंतज़ार करनेवाला लेखक ही महसूसते हैं।
      दोनों के सपने थे-नगर कबीर की मौज में चले।दोनों में कोई नहीं चाहता था कि नगर फौज में चले।
         हर हर मोदी ,घर घर मोदी और हर हर बुलडोजर,घर घर बुलडोजर के विकास अभियान में दोनों लेखक अदृश्य होते गए।बनारस की पुरानी गलियों और  डोंगियों की तरह।
        मैं दोनों फक्कड़ लेखकों के द्वारा उड़ाई गई भाषा की धूल में अपनी यादों और सपनों के निशान खोज रहा हूँ।
      दोनों मुझमें शामिल हो गए हैं और मैं दोनों की रूहों का पांव पैदल नगर होना चाहता हूँ।
        कितना इत्तिफाक है कि मेरे दोनों अज़ीज लेखक का जन्मदिन जिन कारणों से 1ली जनवरी है,उन्हीं कारणों का शिकार मेरा बर्थ डेट 2री जनवरी है।
    मतलब वे दोनों एक को जन्म लेकर एक नम्बरी हैं और मैं 2 को जन्म लेकर दो नम्बरी।
    यह मैं नहीं कहता हूँ,अस्सी के हाइपर बोलिक ढिंढोरची कहते हैं।
         नगर में किसको पता है कि काशीनाथ बीमार हुए तो ठीक भी हुए ।परिजन की बहार और दोस्त चौथीराम यादव जी के प्यार के मरहम से।
   ज्ञानेन्द्रपति के पास न कोई परिवार है और न कोई चौथीराम यादव।ज्ञानेंद्रपति के लिए यह नगर ही चौथीराम यादव है।वे इस्पाती मनुष्य हैं।सौ साल लोहा रहें।
           दोनों को जन्मदिन की अशेष शुभकानाएं!

17 अगस्त, 2020

बनारस में अब जसराज सुर का रस नहीं घोलेंगे


@रामाज्ञा शशिधर
दिलों को जोड़ने वाली,आत्मा को उठाने वाली,अवसाद और विषाद को विरेचित करनी वाली लय टूट गई।नफरत से भरी चेतना पर खयाल की अमृत फुहार बरसानेवाला कंठ सदा के लिए खामोश हो गया।मैं सचमुच दुखी हूं।
      2005 से 2019 के बीच संकट मोचन संगीत घमासान के वे अक्सर संयोजक होते रहे।न जाने कितनी बार सैकड़ों कलाकारों के बीच उन्हें रात भर जगा देखा।कितनी बार गम और तनाव से भरी रूह को उनके स्वर तरल में डुबोया।ऐसा कभी नहीं लगा कि वे बनारसी नहीं हैं।ठेठ की ठनक और हनक।
       अस्सी की चाय अड़ी पर दो हफ्ता पहले बतकही शुरू-जस्सू मियां दिखे, जस्सू महाराज आ गए,जस्सू इसबार फलां को काटकर फलां को चांस देंगे।हमलोगों के बीच वे जसराज नहीं,जस्सू जनाब होते।इसका अर्थ है कि वे काशी के सुर रसिकों और सड़कों के दिल पर राज करते थे।
       बनारस आकर जाना कि पढ़लिख कर भी कोई संगीत के बोध में अनपढ़ हो सकता है और रिक्शावाला,ठेलावाला,सब्जीवाला कैसे क्लासिकल का माहिर समझदार होता है।बनारस ने और जस्सू महाराज ने मेरे जैसे संगीत गंवार  को संगीत के ककहरा का आधार दिया।
       जसराज मेवाती घराने के खयाल गायक रहे।बेगम अख्तर से शुरू में गहरे प्रभावित थे।कुमार गंधर्व की डांट से तबला छोड़ गायकी में रम गए।विलंबित, मध्यम और द्रुत तीनों सुरों में जसराज ने अनेक रागों को निबद्ध किया।कृष्ण के भजन रस  में जसराज का खास आकर्षण था।स्त्री और पुरुष के सम विषम राग संयोजन से जसराज ने राग जसरंगी को काफी लोकप्रिय किया।उनकी आवाज़ में एक खास खनक,टांस,खिंचाव,उठान और मिठास है।जसराज प्रयोगशील गायक हैं।
      जिस तरह वे भारत और अमेरिका के बीच सांस्कृतिक मिश्रण के सिंबल बने,ठीक उसी तरह मंगल और वृहस्पति के बीच आज ग्रह 'जसराज' के रूप में दमक रहे हैं।यह भारत के शास्त्रीय संगीत को कितना बड़ा आदर है कि अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ ने एक खोजे हुए नए ग्रह का नाम जसराज रखा।भारत की चंद महान खगोलीय उपलब्धियां हैं उनमें शास्त्रीय संगीत सौर आभा मंडल की तरह है।जसराज उसके एक अनोखे ग्रह हैं।90 की उम्र तक उनका रहना शानदार है।उनकी आवाज़ हमारी आत्मा के जख्मों पर मरहम की तरह पिघलकर फैलती रहेगी।