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03 जून, 2020

मेरी साइकिल हाथी जैसी भारी और ऊंट जैसी ऊंची थी:रामाज्ञा शशिधर


          दुनिया में तीस फीसदी ज्यादा लोग अब साइकिलपसंद हैं।वे अंधाधुंध धरती के फेफड़े को जख्मी और घायल करते रहे।अब अपने जर्जर फेफड़े पर एक अदृश्य वायरस के कोरोड़ों रूप में हमला करते देख और प्राणवायु का हरण होते देख घबड़ा गए हैं।वे अब साइकिल से दौड़ना, हांफना और  खुद के फेफड़ों को मजबूत करना चाहते हैं।
     लेकिन धरतीपुत्रों के गुनाह और मूढ़ता की कहानी टेढ़ी मेढ़ी है।
     नकलचियों और फेंकुओं से पहली मुलाकात बेगूसराय या दिल्ली में नहीं बल्कि बनारस के बीएचयू में हुई।
      डॉ डींगडोंग मारुतिवाले! प्रो ज़िनजोंग हुंडईवाले!प्रो खेवालाल महेंद्रा वाले!प्रो ढेलालाल सुजुकी वाले!
      एक ऐसा कैम्पस जो हजारों वृक्षों,पौधों,जड़ी बूटियों,फूलों,फलों,चिड़ियों,तितलियों मोरों से एक सदी से जन्नत की तरह जीवनदायी है।जहां शुद्ध हवाएं और बादलों जैसी दिशाएं सबको स्तब्ध और मुग्ध कर देती हैं।जहां फलों के रस और फूलों की सुगंध की वर्षा बारहों महीने होती है।उस विशाल जंगल में यह मशीनी धुआं,शोर,वाहन प्रदर्शन और हिंसा,दिखावा,अमला फौज हुंकार और चार कदम भी जाने के लिए पेट्रोल डीजल का धुआं युद्ध क्यों?वास्तविक शिक्षा का यह स्वभाव हो ही नहीं सकता।
       मैं साइकिल सवार नवयुवा शिक्षक उदास हो गया।
      वे नई पुरानी कार से गैस छोड़ते हुए महामना की बगिया के पेड़ों फूलों पत्तियों तितलियों मोरों विद्यार्थियों और शिक्षकों पर जहर फेंकते! टाई और पेंट को बार बार किसी फिरंगी मैकॉले की तरह कसते! और हर साइकिल सवार को ओरांग ओटांग समझकर सेपियंस की तरह खी खी करते।
      जब मैं दिल्ली से बनारस आया तो धीमी रफ्तार देखकर मन संतुष्ट हुआ।लेकिन कैम्पस की गति देख मति चकरा गई।मैंने लंका पर से हीरो कम्पनी की एक नई साइकिल ली और सामने घाट से कैम्पस,लंका और अस्सी की तफरी में मजा लेने लगा।मेरे साथ आए रुद्र एकादश में कुछ के पास कारें थी और कुछ दोपाए तिलाश्व पर सवार होकर आते थे।तब कुछ पुराने शिक्षक साइकिल से आते और ज्यादातर कार से।
         नए नक्षत्र हीनताबोध और श्रेष्ठताबोध दोनों से ग्रस्त हो गए।उनमें से कुछ मेरा मजाक उड़ाकर हतोत्साहित करने लगे ।जैसे साइकिल की सवारी चोरों उचक्कों गरीबों ज्ञानहीनों और आवारा टाइप लोगों की पहचान हो।इस कार्य में अभिजातपसंद डॉ श्रीप्रकाश शुक्ल सबसे आगे थे।वे पढ़ाने नहीं बल्कि गाजीपुर से बनारस प्रदर्शन करने आए हों।खैर!बाद में मेरी कम्पनी हीरो से हीरो होंडा हो गई।तब विभाग धुआं छोड़ते आता और शहर में साइकिल का मजा लेता।उसका संस्मरण भी मजेदार है।
        बीएचयू में प्रदर्शन और पाखंड का साइकिल युग तब आया जब प्रो डीपी सिंह वीसी बनकर आए।पता नहीं कैसे,उन्होंने यूरोपीय यूनिवर्सिटी की नकल करते हुए कैम्पस को पर्यावरण जाग्रत बनाना चाहा।परिणामतः महीना में एक दिन साइकिल से ऑफिस जाने लगे।आगे आगे कुलपति।पीछे पीछे बंदूक वाले कुलानुशासक,उसके पीछे कुल रक्षक।
       तमाशा अब शुरू हुआ।29 दिन कैम्पस को धुआं,शोर और हेकड़ी से रौंदने वाले प्रोफेसरों की  एक शार्प इंटेलिजेंट फौज कुलपति महोदय पर सम्मोहन मंत्र मारने के लिए हर चौराहे पर लंकाप्राप्त नवसाइकिल से पीछा करने लगी-हे महाराज।देखिए!मैं गांधी का भतीजा,महामना की संतान पृथिवी को कितना प्यार करता हूँ।कैम्पस को जहरमुक्त तो सिर्फ मैं कर रहा हूँ।आप मेरे ह्वेनसांग।मैं आपका फाह्यान।
       अब क्या करोगे साइकिल सवार!तुम्हारी साइकिल साधना में साइकिल को सीढी बनाने का गुण नहीं है क्योंकि तुम्हारे लिए  जीवन एक शैली है,सीढ़ी नहीं।तब से साइकिल की ऑफिशियल सवारी बंद कर दी।
     उसी दौर में छात्रों में देखादेखी बाइक प्रदर्शन की लहर आई।हॉस्टल,विभाग,फेकल्टी बाइक से लद गए।तभी नगर भर के शोहदों के लिए कैम्पस बाइक रेस का कॉम्पिटिशन ग्राउंड हो गया।विश्वनाथ मंदिर वीटी में तब्दील हो गया।साइकिल वाले विद्यार्थी और बाइक वाले शिक्षक दोयम दर्जे के नागरिक महसूस करने लगे।विद्यार्थी शिक्षक के ज्ञान से ज्यादा उनकी कार के नए नए मॉडलों और उसकी कीमत पर अंतरराष्ट्रीय रिसर्च करने लगे।मोबाइल,सायबर और वाईफाई का सहयोग इसमें योगदान देने लगा।
     लवगिरी और भैयागिरी के लिए  बाइक मॉडलों में कम्पीटिशन गॉसिप का केंद्र बन गया।बाहरी और भीतरी पहियों की रफ्तार में दर्जनाधिक लोग मरे या घायल हुए।
     एक प्राकृतिक और पारम्परिक कैम्पस में  यह रफ्तार नुकसानदेह साबित हुई।इसलिए कि शिक्षक छात्र के बीच दूरी बढ़ने लगी।बहस,विमर्श,संवाद,केंटीन टॉक खत्म होने लगे।अब किसी के पास फुर्सत नहीं थी ।लेने और देने वाले दोनों व्यस्त थे।बिजी फ़ॉर नथिंग।हेल्थ पर बुरा प्रभाव पड़ा।अस्पताल की भीड़ में इजाफा हुआ।लिवर,गैस,कब्ज,हड्डी,सांस,फेफड़े और अवसाद के रोगी बढ़ने लगे।सेपियंस जंगल युग और कृषि युग के श्रम से आराम के भरम में फंस गए। 
       मेरे जैसे किसान पुत्र के स्वास्थ्य को कैम्पस ने बुरी तरह प्रभावित किया।मेरे अनेक सहकर्मी रोगों से भर गए।लेकिन आदत जब स्वभाव बन जाए तो जानलेवा होती है।
      मुझे याद है कि गांव में पहली साइकिल मुझे दसवीं में स्कूल टॉप और डिस्ट्रिक्ट थर्ड रैंकर होने पर मिली थी।आधा पैसा मां ने दिया और आधा खुद की ट्यूशन कमाई।बारो में कबाड़ मिस्त्री के लौह जंगल से एक सेकेंड हैंड हाथी जैसी साइकिल बनकर निकली जो मेरे लिए जान से ज्यादा प्यारी थी।वह इतनी भारी थी कि हाथी और इतनी ऊंची की ऊंट।क्या आनंद था।वे दिन ज्यादा मजे के थे।
      मैं 17 साल से साइकिल पर सवार था।सिमरिया गांव से बेगूसराय,पटना,समस्तीपुर,मुजफ्फरपुर आदि जनपदों को साइकिल से मापता रहता था।एक बार पुरानी साइकिल पर पेंट के लिए मामा के पास मुजफ्फरपुर चला गया।जब बिहार यूपी के मजूरों को साइकिल से देश मापते देखता हूँ तो लगता है कि पुराना समय जहरीली सभ्यता को चुनौती दे रहा है।
       मैं आज भी बे-कार हूँ।पैदल और साइकिल ही पसंद है।मुझे लगता है कि सभ्यता को उस तरफ लौटना चाहिए।आवश्यकता और विलासिता के फर्क का विवेक भी जरूरी है।
            उत्तर कोरोना समय के लिए कोरोना काल में एक सीख तो यही है कि हम साइकिल की दुनिया आसपास तैयार करें।कम से कम एक घण्टा साइकिल रोज चलाएं।पेड़ से पूछ कर साइलेंसर से न्यूनतम धुआं छोड़ें।
    भविष्य भयावह चुनौतियों से भरा है। शिक्षा कैम्पस को साइकिल फ्रेंडली बनाना अनिवार्य हो ।पेट्रोल डीजल और स्पीड को हतोत्साहित करने की मांग हमारा पारितन्त्र रो रोकर कर रहा है।कान लगाकर सुनिए।

01 मई, 2020

बेगूसराय के त्रिलोचन हैं मजदूर कवि अशांत भोला



//बेगूसराय के त्रिलोचन हैं अशांत भोला//
💐मजदूर दिवस पर जन्मदिन विशेष💐
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मेरे जैसा बनकर देख!जुल्म के आगे तनकर देख
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@रामाज्ञा शशिधर,बीएचयू,बनारस 
      मुक्तक के मास्टर त्रिलोचन रहे।त्रिलोचन जी शुरू और अंतिम दौर में दाढ़ीमुक्त हो गए थे।अशांत भोला बिना दाढ़ी के त्रिलोचन रहे हैं।आज फेसबुक पर पहली तस्वीर दाढ़ीवाली दिख रही है।शायद कोरोना काल का असर हो।
       लेखक तो बहुत हुए हैं लेकिन जनपद में त्रिलोचनी जीवन,यातना और साधना तो सिर्फ अशांत भोला की है। 
      अशांत भोला को मैंने अपने गांव रूपनगर(सिमरिया-2) में सबसे पहले देखा था। जब दसवीं के बाद शहर की डाल पर उतरा तो फिर पहली दोस्ती अशांत भोला से ही हुई।पड़ाव  तो पंछी ने कई पेड़ों पर डाले लेकिन एक पूरे रचनात्मक वृक्ष का सुकून यहीं मिलता था।
        जब पहली बार विष्णुपुर प्रेस में रतनपुर लॉज से मिलने गया तो अशांत भोला की आत्मीयता से विभोर हो उठा-पानी लोगे!प्लेट चढ़वाकर चाय पिलाता हूँ।
        मशीन के शोर के बीच यह अनौपचारिक बेबनावटी आवाज़ गरीबी और संघर्ष के दिनों में बेहद अपनी आवाज़ लगी- लंबा छरहरा बदन।तीखी नाक।गोरा चेहरा।शिशुवत मुस्कान।करीने से इस्तरी किए हुए कुर्ते की शानदार चेस्ट पाकेट में कई रंगों की पेनें।हाथ पांव कागज की ओर लपकते हुए। प्रेस की रोशनाई में लिपटी हुई उंगलियां।काम में मशगूल।समय का पाबंद। 
       किसी भी मिलने वाले के लिए इतनी आत्मीयता और ताजगी कि जो एक बार मिला ज़िंदगी भर का दोस्त हो गया।बीच बीच में चाय के बहाने चौराहे तक घुमाई और गप्प गठाई। पान मसाले की छौंक।शब्द शब्द और शब्द।
        त्रिलोचन तो बाद में मेरे प्रिय कवि बने,जनपद के त्रिलोचन से मुलाकात तो पहले ही गई।
      मुझे क्यों बार बार अशांत भोला त्रिलोचन के जनपदीय संस्करण लगते हैं?
       इसलिए कि त्रिलोचन की तरह जीवन भर प्रेस दर प्रेस अशांत भोला संघर्ष करते रहे।वह जमाना ट्रेडिल मशीन का था।हाथ और स्याही  से खबर और कविता गढ़ने का दौर।अशांत भोला का उस दौर के प्रेस ठेकेदारों ने खूब शोषण किया।आप देखिए, सबने नगर जमीन मकान का रकबा बढ़ाया।अशांत जी ने मुजफरा में बेटी के यहां से लम्बी दूरी बस में  धक्का खाते हुए  या किराए के लॉज में रोटी बेलते हुए जीवन गुजार दी।कुर्ता पाजामा की व्यवस्था भी खास तरह से होती थी।
     दूसरी चीज अशांत भोला की भी त्रिलोचन की तरह अनौपचारिक शिक्षा हुई।आशांत जी सम्भवतः दस की भी परीक्षा नहीं दे पाए।
     अशांत भोला का बचपन कलकत्ता ने गढ़ा था।शायद संस्कृति की बारीकी,ज़िंदगी जीने का सलीका,आवारागर्दी और शब्द से प्यार में कलकत्ते जैसे विरासतदार महानगर की भूमिका थी।अनायास नहीं है कि उनके प्यारे लेखकों में राजकमल सबसे ऊपर रहते हैं।
         अशांत जी की सबसे बड़ी साहित्यिक बात जो मुझे आकर्षित करती रही वह उनका भाषाबोध।वे नगर के अकेले लेखक मिले जो बातचीत का ज्यादा वक्त भाषा और भाषा पर बिताते थे।
      मैं लेखक संगठनों के लेखकों-फ्रस्टेटेड अलेखकों के हाइपर राजनीतिक वाग्विलास,पत्रकारों के चरित्र हनन उपहास,प्रोफेसरों के कुर्सीनिवास और छुटभैया नेताओं के क्रांतिभड़ास से जब अशांत भोला के शब्द अहसास की तुलना करता तो मुझे सृजन सुख का आकर्षण उधर ही खींचता।
         सृजन की उलझी पहेली तो त्रिलोचन और बनारस से सुलझी कि भाषा लेखक की पहली और अंतिम फसल है।बाकी चीजें तो आती जाती रहती हैं।भाव और विचार आदमी में इसलिए बड़ी मात्रा में बनते हैं क्योंकि उसके पास भाषा का संसार है।भाषा का रूपात्मक और बहुअर्थी संकेतक गुण के कारण संवाद से लेकर साहित्य तक भाषा एक केंद्रीय शक्ति है। प्रगतिवादी लेखक त्रिलोचन कहते हैं-
भाषा भाषा भाषा ,सब कुछ भाषा।
भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है।
ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है।।  
          अशांत जी जीवन भर शब्द के सायास साधक हैं।मुझमें तो प्रथम भाषा संस्कार उन्हीं से आया।बेगूसराय की कविता वामपंथ के भाषण की तरह स्थानीय और राष्ट्रीय होने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय होती रही।यही कारण है कि भूमंडलीकरण के बाद जहां नाटक संगीत मंचन ने स्थानीयता की शक्ति को केंद्र में लाने की कोशिश की वहीं बेगूसराय की कविता कहानी में जनपद के जन का जनपदीय रंग ढंग वाणी और भंगिमा बहुत कम है।अरुण प्रकाश के कथा साहित्य में दिल्ली जाकर भी बेगूसराय की ठाठ है।कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों पर भैया एक्सप्रेस से बड़ी हिंदी में शायद दूसरी कहानी नहीं है।कोंपल कथा से लेकर जल प्रान्तर तक।
 दूसरी ओर अशांत भोला भी कविता में जीवन का स्थानिक रंग उतारने से बहुत कुछ चूक गए।बेगूसराय के हमलावर कवियों को भाषा,जीवन और लोकरंग के जटिल रिश्तों पर सोचना जरूरी है।
         बेगूसराय में जरबर्दस्त कवि भी हुए,जबर्दस्ती के कवि भी हुए हैं।स्वयंभू जनकवियों की तो एक दौर में सांगठनिक ठेकेदारी चलने लगी।लेकिन पूरा जीवन शब्द के लिए देने और उसके लिए जीने मरने की जद्दोजहद करने वाले कवि अशांत भोला ही हैं।।   
       एक बात का जिक्र और। अशांत भोला केवल मंच के आकर्षण ही नहीं रहे बल्कि ग्राउंड जीरो की पत्रकारिता और समकालीन कविता के बड़े प्रशिक्षक भी रहे।बदलाव की पत्रकारिता के वे एक चलते फिरते ट्रेनिंग स्कूल बने जिसने देशभर में दर्जन भर पत्रकार दिए।वह जमाना धर्मयुग,दिनमान का था।
     खैर उनके जैसा मनुष्य होना तो दुर्लभ है।कभी महंत नहीं बने बल्कि सबके यार सदाबहार।यह सच है कि अपने जेबखर्च  के लिए पत्रिका,मंच और रेडियो स्टेशन से लगातार जुड़े रहे।बाद में स्थानिक साहित्य के जातिवाद,वामवाद और लाठीवाद ने भी उनका नुकसान किया।वे धीरे धीरे संकुचित होते गए।अपनी शर्त पर साहित्य और जीवन जीनेवाले को कीमत चुकानी होती है।साहित्य भड़ैती और लठैती कभी नहीं हो सकता।काल का प्रवाह इसका प्रमाण है।
      कुछ लोग संगठन के लेखक होते हैं लेकिन अशांत भोला इतने लेखक अपनी पत्रकारिता,सोहबत और हौसला अफजाई से निर्मित कर दिए कि खुद ही संगठन दिखते रहे।
       जब मैंने बेगूसराय छोड़ा तब बेगूसराय की स्थानिक साहित्यिक राजनीति लगभग अपराध की शक्ल में बदल गई थी।परिणाम हुआ कि सारे मंच मचान ढहते चले गए।आज दूर से चीजें ज्यादा साफ दिखती हैं। 
     आज अशांत भोला का जन्मदिन है।बनारस में अशांतजी की बेगूसरैया सोहबत की कमी खलती तो है लेकिन मालवीय के आंगन में जनपद के अधूरे कामों को बढ़ाते हुए संतोष भी मिलता है।
             जनपद में दो लोगों की जेब में मुझे अक्सर पोस्टकार्ड दिखते थे।गांधीवादी वैद्यनाथ चौधरी और्वअशांत भोला।अशांत जी डाक विभाग की रोज चक्कर लगाने वाले लेखक रहे हैं।उनकी लिखावट इतनी सुंदर और साफ होती है जैसे फर्श पर मक्के के दाने।हालचाल का जरिया भी तब पोस्टकार्ड भी था।आज भी मैं किसी पोस्ट ऑफिस के पास से गुजरता हूँ तो नास्टेल्जिक हो जाता हूँ।आजतक मेरे पास लिखे अनलिखे पोस्टकार्डों की गठरी है। 
       खोज तो आजकल वाली आपकी कविताएं रहा था लेकिन पत्रिका संघर्ष यात्रा में दिल्ली में ही कहीं खो गई।लोग छपास रोग से ग्रस्त और मंच शिरोमणि के लिए व्यस्त तो होते हैं लेकिन अशांत जी हमेशा शांत भाव से समकालीन राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं को प्राथमिकता देते रहे ताकि बेगूसराय की पहचान  जनपदीय कुर्सी पर ठेलाठेली से नहीं बल्कि राष्ट्रीय पहचान की हेला मेली से हो। 
      अशांत भोला की कविताओं की किताब जल्द आए तो हम लोग श्रवण सुख की जगह दृश्य वाचिक सुख भी लें।बादल जी,रामेश्वर प्रशांत और दीनानाथ सुमित्र की किताबें आईं लेकिन चंद्रशेखर भारद्वाज और अशांत भोला के संकलन का अभाव खलता है।
     यह  हिंदी की कितनी बड़ी विडंबना है कि जो लेखक जीवन भर प्रेस का मजदूर हो,जिसने अनेक लेखकों की किताबों के प्रूफ पढ़ते अपनी दसों उंगलियां स्याही से रंग ली हो उस रचनाकार की आंखों में कोई अपना छापा न हो।
       प्रदीप जी की वाल से कुछ मुक्तक पाठकों के लिए-
💐💐💐
मुक्तक 
घर बिना छत बनाए जाएंगे
लोग उसमें बसाए जाएंगे
राज आपका हो या उनका हो हुजुर
हम तो बस शूली चढ़ाए जायेंगे।

पीर पराई लिखते-लिखते
गजल-रूबाई लिखते-लिखते
अपनी सारी उमर गंवाई
भूख कमाई लिखते-लिखते

सूरज चांद सितारों में
महलों में नहीं मीनारों में
मुझे ढ़ूंढ़ना तुम्हें मिलूंगा
बासी-रद्दी अखबारों में 

छोड़ो अब सब रोना धोना
होगा वही जो होगा होना
आग में सबकुछ जल जाता है
खड़ा उतरता केवल सोना

गुमसुम गुमसुम है कचनार
जैसे पहला-पहला प्यार...

25 अप्रैल, 2020

कोरोना डायरी:रामाज्ञा शशिधर

COVID19 का जवाब VC 20हैं!
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-ये मिस्टर VC हैं यानी Vitamin C साहब!
-अमृत की खान,सर्वगुण महान उर्फ आंवला साहबान!
-देह और आत्मा की प्रतिरोधी क्षमता के उस्ताद!
-त्वचा की दरार हो या आत्मा दोफाड़।सब की मरम्मत करे चलते हैं।
-भारतीय लोक में जनाब का रुतबा इतना है कि संतरा,निम्बू,आम,टमाटर सब इनके गुण के आगे पानी भरते हैं।
-आजकल कोरोना काल में तो इनका नाम महाकाल हो गया है।
-ये भौकाल से अलग हैं।
-अनेक लोग अनेक किसिम से इनका उपयोग करते हैं।
-कोई मुरब्बा,कोई अचार,कोई चटनी,कोई दलघटनी, कोई खटाई,कोई मोदक।
-एक उत्तरआधुनिक बाबा तो इनको केन्डी में बदलकर डब्बा सहित बेच रहे हैं।
-युगों से वैद्यराज इन्हें आंवला,आमला, 
 अमलक,अमलकी,अमृतफल,अमृता आदि अनेक नामों से जानते हैं।
-उस्ताद अमल हैं यानी मल नाशक।मल चाहे त्वचा का हो,या रूह का,पेट का हो या सिर का,बाल का हो छाल का,दांत का हो या आंत का,रक्त का हो या पित्त का।
-अस्सी पर एक डॉक्टर गया सिंह हैं।किताब से लेकर फ़िल्म तक हर जगह होते हैं और जहां वे होते हैं बकौल वाचस्पति वे ही ज़िंदा होते हैं बाकी सब मुर्दा।वे सत्तर से ऊपर के जवान हैं।राज यह अमलकी ही है।
-कहते हैं बाबू गया सिंह बारहों मास आध सेर अमलकी भिंगोकर पानी पी जाते और आंवला खोपड़ी पर घण्टों रगगड़ते।उनके खल्वाट की चमक और ज्ञान की धमक में अमलकी का ही योगदान है।
- सौ से अधिक गुण हैं उस्ताद के।आप वेद,निघण्टू शास्त्र,पतंजलि दर्शन से लेकर  पतंजलि डब्बा पर लिखे इश्तेहार से इनके फायदे जान सकते हैं।
-आजकल कब्ज केवल बुद्धिजीवी को ही नहीं बल्कि पिज्जाबर्गरमैगीमेक्रोजीवी के लिए सबसे बड़ा रोग है।कहते हैं कब्ज से सृष्टि के सारे दैहिक दैविक भौतिक वैचारिक आत्मिक लौकिक पारलौकिक रोग पैदा होते हैं।
-कब्ज बवासीर का जनक है और अमृतफल नाशक।कृपया दोनों तरह के बवासीरी बौद्धिक ध्यान दें।
-त्रिगुण और त्रिदोष की तरह त्रिफला आज भी न्यू मेडिसिन का बाप है।वह हर्र बहेड़ा के कारण कम,अमलकी के कारण ज्यादा।
-जब सबके कलेजे पर मिस्टर कोरोना पालथी मारकर बैठ ही गया है और टेंटुआ ही दबा दे रहा है तब फेफड़े की मजबूती और उदर रक्त की तंदुरुस्ती के लिए यानी मिस्टर कोरोना का पसीना छुड़ाने के लिए आप भी Mr VC से जुडिए।
-ये रेसिस्टेन्स पावर के पावर हाउस हैं। 
-मेरे तो आंगन में ही हैं।यह तस्वीर आंगन की ही है।
-शाम सुबह मैंने इनका एक गुण और देखा है।सुबह में सारी पत्तियां पंखों की तरह खुल जाती हैं और दिन भर  खटने के बाद शाम को बंद हो जाती हैं।यह दूरदर्शन नहीं,निकट दर्शन है।
-आजकल तो बिना अनुभव के लेखक लेख और कवि कविता टीपते रहते हैं।चमगादड़ हो या आंवला फल विकिपीडिया पढ़कर ही गढ़ दे रहे हैं।सरौता और सोता,त्राटक और पाठक दस्त कर   मुक्त हो जाते हैं।कब्ज और दस्त ठीक रहे तो शब्द भाव का भी कल्याण हो सकता है।
-अगर प्रकृति से जुड़ें तो विकीकवि को विकिपीडिया रोग और वेबिबौद्धिक को वेबिनार सोग से मुक्ति मिल सकती है।इसे विचार क्षेत्र में आप अमलक गुण विस्तार कह सकते हैं।
-मेरे परिसर से अमलक साहब का  गहरा नाता है।इसीलिए इनकी छाया तले व्यायाम करना मुझे भाता है।
Ramagya Shashidhar

कोरोना काल में रामचन्द्र शुक्ल पर बवाल क्यों:रामाज्ञा शशिधर

//कोरोना काल में शुक्ल पर बवाल क्यों//
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 औपनिवेशिक काल का यह यह चित्र उस चित्र के ऊपरी हिस्से से मेल खाता है जिसमें आम्बेडकर शुक्ल की तरह फिरंगी टाई और कोट से लैस हैं।पहनावे का अंतर सिर्फ इतना है कि आंबेडकर नीचे फुलपेंट पहनते थे और शुक्ल धोती। इसलिए आंबेडकर और शुक्ल दोनों
पर औपनिवेशिक पाश्चात्य चेतना का  प्रभाव है।उपनिवेशवाद हमारी भलाई के लिए नहीं आया था,अब यह जगजाहिर है।कहना न होगा कि उपनिवेशवाद ने किस तरह भारतीय बौद्धिकता में एक ओर परंपरा विच्छेद का अभियान चलाया दूसरी ओर जातिवाद और साम्प्रदायिकता का विषवृक्ष भी तैयार किया।
      शुक्ल पर प्राच्य जातिवादी साम्प्रदायिक चेतना का प्रभाव है और आंबेडकर पर परंपरा से टूट का।लेकिन इस पर कमोवेश बहस लंबे समय से होती रही है।फिर इसमें नया क्या है?नया है देश काल और उसका प्रोडक्ट।।     

         कोरोना काल में बड़ी मानवता की हिफाजत के बजाए जात धरम पर बहस सत्ता और मीडिया कर रहे हैं और हम उसके असर के शिकार मनीषा हो चुके हैं।मुझे दुख है कि हिंदी के ढेर सारे पढ़े लिखे बौद्धिक हंसुआ के विवाह में खुरपी के गीत जैसी कहावत के ट्रैक में फंस गए हैं।यह अमानवीय कर्म भी है।
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      बात चली है तो ध्यान रखिए कि यह सनसनी साहित्य में सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारन्टीन की उपज है। एकेडमिक जगत पाखण्ड और अवसरवाद के लॉक डाउन का शिकार लंबे समय से है। इसलिए नियति के ये दिन आने ही थे।
         हिंदी के कुएं में पानी जैसे जैसे कम होता जाएगा,मेढ़क की टर्र टर्र बढ़ती जाएगी।सच तो यह है कि आलोचना और शोध से छत्तीस के आंकड़े रखनेवाले के एकेडमिक कुल का विस्तार लगातार होता रहा और उसको हमारे योग्य आचार्यों ने बेशर्म बढ़ावा दिया।आज उसकी कूट फसल यह पीढ़ी है।
        जब शोध और आलोचना के नाम पर घर धुलाई,कार पोछाई,ओझाई और  चेलाई ही करवानी है तो उसका सह उत्पाद ऐसा ही होगा।।     
         हिंदी के शीर्ष आलोचकों ने विश्व ज्ञान को साधा था,तब कुछ दे गए।जो दे गए चाहे शुक्ल-द्विवेदी हों या नामवर-मैनेजर उनकी जड़ें प्राच्य और पश्चिम की ज्ञान और साहित्य परम्परा में सतर्क ढंग से धंसी हुई है।
      दुनिया के दो समकालीन मार्क्सवादी  आलोचक टेरी ईगलटन और फ्रेडरिक जेमेसन को पढ़िए तो पता चलता है कि वे अपनी परंपरा से कितने जुड़े हैं।
         असहमति का साहस और सहमति का विवेक दोनों हमारे आसपास रणनीति के तहत नष्ट किए गए हैं। जातिवादी और कुलीन ब्राह्मण समुदाय को शुक्ल जी पसंद हैं तो यह दोनों का दुर्भाग्य है और इसी कारण दलित को शुक्ल जी से घृणा है तब भी दोनों की बदनसीबी है।
         वस्तुतः नवकुल नक्काल की भड़ैती ही उनका साहित्यिक शगल है।एक कहावत है यथा गुरु तथा चेला/मांगे गुड़ दे ढेला। 
     मुझे तो इस बहस में सनसनी,उत्तेजना,अनपढपन और तथ्यहीनता ही ज्यादा दिख रही है।जिस बहस का मूल ही अनपढपन और अवसरवादी सनसनाहट का शिकार हो उसके अतिरिक्त विस्तार का नतीजा रिक्त ही होगा।
         कोरोना महामारी की विकट घड़ी में जिस तरह सत्ता जात धरम की राजनीति से मानवता को घायल कर रही है,उसी का बाई प्रोडक्ट यह उथला एकालाप है।जहाँ देखिए हिंदी के मास्टर और एकेडमिक जगत से परमकुंठा पालने वाले कथित लेखक मच्छर गान गाए जा रहे हैं।न राग न लय, फिर भी प्रलय!!!

08 मार्च, 2020

बनारस में बसंत की खोज

🌻जेम्स प्रिंसेप के नक्शे में बचा है बनारस का बसंत🌻      📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚📚
@रामाज्ञा शशिधर,चबूतरा शिक्षक
मित्रो!
        -पतझर और बसंत पेड़ पौधों के जीवन और विराग-राग की अभिव्यक्तियाँ हैं।इसलिए वे मानव जीवन में भी  खेत,पेड़,बाग,जंगल से ही आते हैं।
        -मालवीय चबूतरा पर बासी हवा वाली कक्षा से पहले पतझर भी आता है और बसंत भी।
         -आज दोनों से मुलाकात हुई।दोनों के रूप और आत्म तक पहुंचने के लिए लगभग दस कविताओं का सस्वर वाचन भी हुआ और वाद विवाद संवाद भी।
          -पतझर की विदाई और बसंत की अगवानी में छात्र भी आए और शिक्षक भी।लेकिन वे शामिल थे जो स्वयं शब्द शिल्पी हैं।
          -जो जेआरएफ नेट के प्रेत को ही बसंत मान बैठे हैं,और साहित्य को सिर्फ करियर की बुलेट ट्रेन समझते हैं,वे शायद मोबोमेनिया की मार और झनकार में बेहोश होंगे और बाद में जागेंगे।
        -मौसम मानव जीवन में संवेदना के स्रोत,उत्थान पतन की लय,भाव अभाव के राग और स्मृति के हस्ताक्षर हैं।
       -पहले पतझर और बसंत कागजी हुए,अब मोबो वर्चुअल। कागज पर सच्चे और कृत्रिम रंग थे,स्पर्श था लेकिन गंध नहीं थी। मोबो इमेज तो पूर्ण आभासी है।न कोई ठोस रंग,न स्पर्श,न गंध।स्वाद और श्रव्य की तो बात ही दूर।
      -साहित्य सृजन और ग्रहण गहन ऐन्द्रिक आचरण है।लेकिन साइबर सभ्यता ने साहित्य को ऐन्द्रिकबोध से काफी
 दूर कर दिया है।इसलिए जीवन का बसंत भी बिना फूल उगाए,बिना रस,रंग,कूक,स्वाद और गंध के आता और चला जाता है।पता ही नहीं चलता कि आया भी कि नहीं।
       -बनारस का ही हाल देखिए।आनंद कानन और मृगदाव के नाम से चिरख्यात नगर में कहीं पेड़ पौधे दिख जाएं तो चमत्कार ही मानिए।कंक्रीट के कथित स्मार्ट जंगल की किसी किसी छत पर मरियल बोनसाई और पिंजरे में कैद गुलाम चिड़ियां आनंद कानन के तर्पण भाव की तरह कभी कभी दिख जाते हैं। मुट्ठी भर कटते हुए पेड़ और चीखते हुए पंछी महामना की बगिया और रेल बाग के मिटते हुए निशान हैं।
      -एक प्रकृति विहीन नगर में पतझर की आहट और बसंत की सुगबुगाहट सिर्फ बुलडोजरों की धूल और हूटरों के शोर में कोई स्मार्टजीवी हो ढूंढ सकता है।
      -हजारी प्रसाद द्विवेदी के 'अशोक के फूल' प्रचंड धूर्तता और मूढ़ता की भेंट चढ़ गए,केदारनाथ सिंह का बसंत खाली कटोरों से ही चुंगी उसूल रहा है,सर्वेश्वर का बसंत तो नगर में गुंडे और महंत की नई दबंगई से लैस है,राम दरश मिश्र की बसंती हवा इन दिनों जीवन भर के रस को बन्दबोतल में भर भरकर कुट्टनी बुढ़िया की तरह होलसेल सप्लाय स्टोर चला रही है।
       - बच गया शमशेर का एक पीला पत्ता जो पतझर की पीली शाम के गम को गाढ़ा कर दे रहा है।
       -क्या पता जब काशीनाथ अस्पताल में हैं तब ज्ञानेन्द्रपति प्लास्टिक के सुग्गे के पंख नोचकर बसंत की स्मृति का लेबोरेटरी टेस्ट कर रहे हों,श्रीप्रकाश नगर महंत की नाव में रेतीली हवा भरकर उसे बसंत बैलून बनाने में व्यस्त हों और सेवानिवृत प्रो बलिराज उर्फ बसंत पांडेय सिंगापुर की रोबोट सोफिया को भारतीय नागरिकता दिलाने के लिए बसंती गद्य रच रहे हों।
      -जो भी हो भारत कला भवन में अंग्रेज डिजाइनर जेम्स प्रिंसेप का बनारस नगर वाला एक विशाल नक्शा है जिसमें पेड़,बाग,जंगल,नदी,बावड़ी,कूप सब अपनी जगह पर मुस्तैद हैं।शायद पतझर और बसंत भी उसी नक्शे में बचा होगा।
     -चबूतरा तो मिटते बनते इतिहास के पैरों के निशान सँजोता है।कल यह भी नक्शा होगा।आज का।

10 नवंबर, 2019

उत्तर समय में साहित्य कैसे पढ़ें:मालवीय चबूतरा,बीएचयू

🌿'साहित्य कैसे पढ़ें' वाद संवाद सम्पन्न🌿
     📚आत्मक्षय का पुनर्निर्माण ही नया सौंदर्यशास्त्र है।📚            

     🎤चबूतरा उवाच:-
     *  साहित्य अध्ययन में हमें रूप से शुरू होकर अंतर्वस्तु, भाषिक संरचना और विचारधारा की यात्रा करनी चाहिए।
     * हिंदी का पाठ अध्ययन औपनिवेशिक ज्ञान रूप से इतना 
     बोधग्रस्त है कि ज्यादातर आलोचना पश्चिमी ज्ञान निर्मिति की पैरोडी है,स्थूल समाजशास्त्रीय है,संदर्भ केंद्रित है और पाठ के आत्म और मूल से भटकी हुई है।हिंदी के चंद आलोचक पाठ की आत्मा के सटीक  विश्लेषक हैं।
       *पाठ के दो तरह के पाठक होते हैं-सामान्य और विशेष।
 अकादेमिक दुनिया के पाठक(शिक्षक,छात्र,शोधार्थी) से विशिष्ट पाठालोचन की उम्मीद की जाती है।आजकल इस क्षेत्र का पाठ अध्ययन भी विश्वविद्यालयी शिक्षण पैटर्न की तरह सामान्य,सरलीकृत और उथला हो गया है।
     *पाठ में हमेशा दो स्तरों पर अर्थ विन्यस्त होते हैं-सतही अर्थबोध का स्तर,गहन अर्थबोध का स्तर।पाठ के विशेष अध्येता से गहन अर्थबोध की मांग होती है।
      *आनंद और ज्ञान साहित्य का मूल उद्देश्य है। इसलिए इनकी गहन प्यास की तृप्ति गहन अर्थबोध से सम्भव होती है।
आलोचना गहन अर्थबोध की गतिशील सौंदर्य प्रणाली है।
      * नया मानस आनंद और ज्ञान के पारंपरिक ढांचे से कट गया है।अब आत्म सजगता की जगह वस्तुग्रस्तता;जिज्ञासा,श्रद्धा और संशय की जगह स्वप्नहीनता;नास्टेल्जिया और यूटोपिया की जगह  अतिवर्तमानता; प्रक्रिया की जगह इवेंट, आस्था की जगह अनास्था, इतिहास की जगह मिथक,प्रतिरोध की जगह पेशेवराना प्रतिमत;सांस्कृतिक मिश्रण की जगह सांस्कृतिक
संकरता; अध्यात्म की जगह कर्मकांड;दर्शन की जगह प्रदर्शन 
का साम्राज्य है।
   *'नाना रूपात्मक जगत' पर चढ़े सभ्यता के नाना आवरण
से 'नाना भावात्मक जगत' क्षतिग्रस्त और धूमिल हो चुका है।
 इस सांस्कृतिक परिघटना को साहित्य के क्षेत्र में 'आत्मक्षय का युग' नाम से संबोधित किया जाना चाहिए।
  * आज साहित्यिक पाठ में आत्मक्षय के रूपों का अध्ययन किया जाना चाहिए। पाठ में आज के  मनुष्य के बिखराव और
अलगाव के रूपों,कारणों की खोज की ही जरूरत नहीं है बल्कि उसके स्वप्न निर्माण की दिशा के संकेत की भी मांग है।
   *उत्तर समय के साहित्य और आलोचना में मौजूद नैरेटर,चरित्र,परिवेश,भाव,यथार्थ गहरे कम और क्षैतिज ज्यादा हैं।व्यापकता और गहराई के असंतुलन से उपजा मनुष्य एक
मूलहीन और मूल्यहीन मनुष्य सभ्यता की दिशा में है। यह भरम भी अब दरक गया है कि बाजार और वस्तुएं नए आज़ाद मानव की पार्श्व सामग्री हैं।साइबर सभ्यता स्वाधीनता के विरुद्ध नई किस्म की परतंत्रता पर आधारित वस्तुतः निगरानी
और खुफिया सभ्यता है।साइबर टेक्नोलॉजी सिर्फ माध्यम ही नहीं पूंजीवाद का एक नवीन स्वरूप है।इसलिए आज के पाठ पर इस विभाजित मनोदशा की गहरी छाप है।
     *साहित्य में असुरक्षा,अविश्वास और आत्म ध्वंस के अनेक रूप उत्तर समय की उत्तर औपनिवेशिक आक्रमण की देन हैं। विभाजित मनस्कता,सिजोफ्रेनिया, उन्माद,अवसाद,एकालाप,चुप्पी,हैरतअंगेज गतिविधि और क्रूरतापूर्ण खेल इस वक्त के साहित्य में जमा होने लगे हैं जो भविष्य में घनीभूत होते जाएंगे।
    *उत्तर समय का सौंदर्यशास्त्र राजनीतिक सतहीपन से गहरे प्रभावित है।अस्मितामूलक विमर्श,मिथकीय विमर्श,बाजार विमर्श और नस्लीय राष्ट्रवादी विमर्श इसके उदाहरण हैं।आजकल अस्मिता विमर्श की दो धाराएं स्पष्ट हैं-प्रतिरोधी और प्रतिगामी।
   *उत्तर समय में साहित्य अध्ययन के लिए 'क्षतिग्रस्त आत्म और प्रतिरोध' की गहन परख और पड़ताल होनी चाहिए;उन्हें
एकत्रित और संगठित किया जाना चाहिए और नए मनुष्य,स्वप्न और साहित्य के लिए नवीन 'संगठित आत्म और
प्रतिरोध' के निर्माण का  मानचित्र पेश करना चाहिए।
 * नए ' संगठित आत्म और प्रतिरोध' के निर्माण के लिए ग्लोबल चिंतन और ग्लोकल एक्शन न केवल आर्थिक सामाजिक दायरे की जरूरत है बल्कि सांस्कृतिक साहित्यिक
क्षेत्र में इसकी फौरी आवश्यकता है।
            @रामाज्ञा शशिधर,चबूतरा शिक्षक
       ...जारी

27 फ़रवरी, 2019

नामवर तो नामवर थे:रामाज्ञा शशिधर

💐"मैंने उड़ाई हैं जीवन की  धज्जियां,सुखी मरूंगा मैं"💐
✒हमारे नामवरजी तो नहीं रहे!🎙
   रात भर नींद नहीं आई।सिर्फ बुरे सपने आते रहे।न जाने क्यों आदत के विरुद्ध 2 बजे फेसबुक खोला...कई पोस्ट...नामवरजी नहीं रहे।11.50 पर निधन हुआ।साढ़े बानवे की उम्र थी।जाने का बहाना कुछ ही दिन पहले मिला।
       नामवर जी को अज्ञेय की पंक्ति और मार्क्स की नास्तिकता इतनी पसंद थी कि वे अक्सर कहते-मैंने उड़ाई हैं
जीवन की धज्जियां /मैं मरूंगा सुखी।अच्छा हुआ कि शताब्दी छूने के करीब पहुंचकर वे किसी के सहारे के अहसान
से मुक्त रहे।जीवन भर शब्द दुनिया की तरह विचारों को धुनते
रहे और आखिरी सांस तक आलोचना की धुनकी का संगीत
उनके गिर्द फूटता बहता रहा।
            अब जब वे नहीं हैं हिंदी आलोचना को उनकी ताकत
और ग़ैरमजूदगी का पता ज्यादा रहेगा।हिंदी आलोचना के शिखर तो नामवरजी थे ही गहराई और विस्तार भी थे।बनारस के जीयनपुर जैसे गांव से चलकर किसान के एक बेटे ने अस्सी की गलियों को जीते हुए पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी
और त्रिलोचन जैसे दिग्गजों से साहित्य संस्कार लिया।तब भी
भी काशी में निठल्ले और शब्दहन्ता कम नहीं थे।आज भी केदार मंडल की अस्सीवाली चाय दूकान है जहां कामरेड
दोस्त केदार रोज एक सिक्का नामवर के जेबे में डाल देता था
और लंका पर त्रिलोकी जी का यूनिवर्सल बुक सेंटर जहां से
न जाने उधार की कितनी किताबें उन्होंने खरीदी थीं।नामवर जी जमीन से उठकर शिखर तक पहुंचने वाले विरल साहस के
विवादी आलोचक थे।
            नामवर जी के नहीं होने पर आज संस्मरण का झरना
खुल गया है।मेरे जैसा साहित्य का हलवाहा लगातार नामवरजी से डरता और सीखता रहा।जेएनयू जब मैं पहुंचा तब वे सेवानिवृत थे और बोर्ड पर अम्रेट्स प्रो की जगह उनका
नाम सफेद अक्षरों में उगा था।वे कक्षा तो नहीं लेते थे,शोध कराते थे और यदाकदा भाषण देने आते थे।लेकिन दिल्ली की
जिस गोष्ठी में नामवरजी न हो वह मरियल और ग़ैरउत्तेजक
सुनने में ही लगती थी।नामवरजी के डर से कई आलोचक आयोजक से समीकरण बैठाते थे और मैदान भी छोड़ देते थे।
तर्क और युक्ति से विचार के रेशे वे इतने सलीके से उतारते थे जैसे केले के पत्ते खुल रहे हों।और अंत में बनारसी दंगल की तरह चित्त कर पान का दोना खोलते और तिसपर 120 नम्बर
का जर्दा डालकर फीकी मुस्कान फेंकते।नामवरजी की वाचिक आलोचना का विरोध करनेवालों की कतार में मैं भी था लेकिन आज मेरा मानना है कि हिंदी आलोचना के वाचिक लोकवृत के वे सबसे बड़े निर्माता हुए।इस अर्थ में वे प्रिंट वाली
आधुनिकता को अपनी जातीय ज्ञान परंपरा से चुनौती देने वाले बौद्धिक हैं।जब 2005 में नामवरजी की पहली वाचिक
किताब आलोचक के मुख से आई तो हिंदी जगत में जबरदस्त
प्रतिक्रिया हुई।उसकी पहली कटु समीक्षा मैंने समयांतर में लिखी थी।मैनेजर पांडेय,विश्वनाथ त्रिपाठी,राजेन्द्र यादव सभी खुश हुए।साथ ही कहा कि नामवरजी के बोर्ड में मत जाना।धारणा साफ है कि बीएचयू में तीन महीने बाद ही उनकी कलम से मेरी नियुक्ति हुई।
        नामवर जी के पहले दर्शन अपनी जन्मभूमि में ही हुए।महाकवि दिनकर की प्रतिमा का लोकार्पण जीरोमाइल,बेगूसराय में होना था।राज्यपाल द्वारा लोकार्पण के बाद घोषणा हुई कि नामवर जी का संबोधन होगा-त्रिलोचनी सानेट की तरह एक विराट पुरुष!चौड़ी छाती,लंबी काया, सधे कदम,ऊंची नाक,तपते लोहे सा रंग।पहली ही आवाज़ ने बांध लिया-छह सौ साल तक विद्यापति की धरती एक महाकवि का इंतज़ार करती रही।वह हसरत तब पूरी हुई जब इस धरती को दिनकर जैसा महाकवि मिला।चारों ओर जन तालियों की गूंज।फिर तो दिनकर भवन में एक लंबा व्याख्यान हुआ।गर्जन
तर्जन वाले दिनकर और जनपद में उलझा मैंने जब दिनकर के विज्ञान दर्शन और कला पर सुना तो हैरान रह गया।नई लीक,नई भाषा,नई वाचिक भंगिमा।ये थे बेगूसराय में नामवर  सिंह।मैंने उस भाषण को हिंदुस्तान में छपवाया।बाद में नामवर जी के शिष्य और मेरे गुरु प्रो
चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने प्रलेस की स्मारिका में भी उस भाषण को छापा।दिनकर वाम खेमे में लंबे वक्त तक उपेक्षित थे।नामवर जी से सिलसिला शुरू हुआ सो आजतक जारी है।
               भारतीय भाषा केंद्र के आरम्भ और बौद्धिक यात्रा का श्रेय नामवरजी को जाता है।केदारनाथ सिंह,मैनेजर पांडेय,पुरुषोत्तम अग्रवाल और वीरभारत तलवार जैसे अकादेमिक आलोचकों के जुटान से हिंदी जगत के पठन पाठन को नई दिशा मिली है। हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं के सम्मिलित केंद्र का निर्माण जेएनयू के लिए ही नहीं बल्कि अन्य विश्वविद्यालयों की कार्य व सोच पद्धति के लिए भी चुनौती है।बात शोध निर्देशक एवम गुरु मैनेजर पांडेय के विदाई समारोह की है।नामवर जी की अध्यक्षता थी।मंच संचालन के लिए मित्रों और शिक्षकों ने मुझे चुना था।मंच से वाचिक नामवर जी ने कहा कि पांडेय जी की जगह को दिगंत भी नहीं भर सकता है।बाद के फोटो सेशन में मैंने अपने अंदाजे बयां में कहा कि मुझे मत काटना।नामवरजी की हाजिरजवाबी थी-तुम्हें कौन काट सकता है।उनकी उदात्तता,दृढ़ता और कठोरता दोनों जगत्प्रसिद्ध है।
          बनारस में जब नामवर जी को अपूर्व जोशी द्वारा सम्मान मिला तब मैंने समयांतर में एक टिप्पणी लिखी-करेला ज्यादा मजेदार है या काशीफल।इसमें नामवर जी के भाषण को भी रेखांकित किया था जब वे बच्चन सिंह के सम्मान में ऐसा बोले कि बेचारे बच्चन जी
अस्पताल पहुंच गए।नामवर जी ने 2011 में मेरे कविता संकलन बुरे समय नींद पर दूरदर्शन पर टिप्पणी कर अंतिम तौर से मेरे भीतर की शंका को निर्मूल कर दिया कि वे मुझे अदृश्य केटेगरी में रखते हैं।मेरी कविताओं पर काफी कुछ कहा लिखा गया उनकी परख दिल तक उतर गई। रचना की मार्मिक पड़ताल के वे रामचन्द्र शुक्ल के बाद सबसे बड़े आलोचक थे।
          नामवर जी को क्षमता की अचूक पहचान थी और रिश्ते की भी।जिन लोगों ने उनका माल लूटकर अपना घर भर लिया है,नामवर जी उनकी भी सीमा ठीक से समझते थे लेकिन
संगठन के व्यक्ति होने के कारण अपनी ऊंचाई को खोना उन्हें गंवारा नहीं था।उन्होंने कितनी पीढ़ियों का निर्माण किया।विश्वविद्यालय के भीतर और बाहर।दुख है कि अकादेमिक वृक्ष और आलोचना की धरती दोनों बंजर समय के शिकार हैं।नामवर जी जीवन भर जीवन की धज्जियां उड़ाते रहे इसीलिए सुखी मरे।जो जीवन को पाखंड की तरह ओढ़कर जी रहे हैं उन्हें नामवर जी से इत्ती सी प्रेरणा तो लेनी चाहिए।वे कबीर की तरह काशी और मगहर की अलग अलग अहमियत मापने वाले अक्खड़ आदमी थे।

13 जनवरी, 2019

मालवीय चबूतरा रिसर्च और नॉलेज की सेल्फी: रामाज्ञा शशिधर

//मालवीय चबूतरा:रिसर्च और नॉलेज की सेल्फी://
        ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
@रामाज्ञा शशिधर,संस्थापक,चबूतरा शिक्षक
😊
बहस जारी है...मेला गतिशील है...चिड़ियाँ परवाज पर हैं...पेड़ अपनी जगह तना है।बहस जारी है...
     अगर ज्ञान उधार का सुधार नहीं है;नकद की नीमकौड़ी है तो यह शोध पर भी लागू होगा।
     यूजीसी का नया नोटिफिकेशन ऑनलाइन कहता है...अच्छे शिक्षक और छात्र की कसौटी अच्छा शोधार्थी होना है।मौलिक और गुणवत्त्तापूर्ण शोध ही शिक्षक और छात्र का ज्ञान धर्म है। शोध की साहित्यिक चोरी बंद होनी चाहिए।
    शोध का अर्थ रेयर और अनछुआ विषय हो,नए नए और जरूरी सवाल हों,मूलगामी विचार(कॉग्निटिव आइडिया)हो,ताज़गी से भरे तथ्य स्रोत हों,वैचारिक यात्रा की सुलझी और भविष्यमुखी दिशा हो।
         यूजीसी की और शिक्षा संस्थानों की सेहत इन दिनों ज्यादा गड़बड़ है।शोध को हतोत्साहित करने वाले कारकों की
संख्या बढ़ती जा रही है।कट एन्ड पेस्ट की आंधी है।
     13 सालों के अध्यापन में 13 ऐसे शोधार्थी मेरे पास नहीं आए होंगे जिन्होंने रेयर शोध प्रारूप पर छह माह श्रम कर शोधार्थी होने और पंजीयन की इच्छा रखी हो।
      पांव लागी, आशीर्वाद चाहिए,जेआरएफ
खत्म हो रहा है,मैं  जेआरएफ हूँ इसलिए मेरा तो नामांकन पहले होना चाहिए,कृपा दृष्टि बनी रहे ये पॉपुलर शोध मुहावरे मिलते हैं।
     नौकरी दिलाने देने में कौन गुरु तेज है इसपर गहन शोध चलता रहता है।
        संकीर्ण सोच ने भारतीय शिक्षा संस्थानों में छात्रों का बड़ा नुकसान किया है।इस कारण अक्सर क्षमतावान शोधार्थी भी शोध की पटरी त्याग अर्थी
की पटरी पर चलने लगते हैं।
      आजकल दो तरह के शोधर्थियों की चर्चा चलती है-रेगुलरिया शोधकर्मी और पेंशनियाँ शोधकर्मी।जो  गाइड सेरेगुलर  जुड़े रहे वे रेगुलरिया और जो महीने में एक दिन फेलोशिप रजिस्टर पर कलम घुमाने का
कष्ट करें वे पेंशनियाँ।
       बातें और समस्याएं कई हैं जिनका समाधान बड़े अकेडमिक संवाद और श्रम के मुमकिन नहीं हैं।लेकिन यदि भारत को दुनिया के शिखर 200 विश्वविद्यालयों में शामिल
होना है तो केवल 'नेट/जेआरएफ फॉर असिस्टेंट प्रोफेसर'
जैसे दस्तावेजों से काम नहीं चलेगा।
      अंत मे!
...वे परेशान हैं...मनमाफिक सब कुछ नहीं हो पा रहा है...सिस्टम ढिलाई को कसना चाहता है...योग्य अध्यापक कड़ाई
से नीरक्षीर विवेक कर रहे हैं...
     वक्त आ गया है ज्ञान को मिशन और प्रोफेशन से जोड़ा जाए...क्लर्क और अकडेमिशियन, कटपेस्ट और गुणवत्तायुक्त,नकली और असली,साधो और साधक,साहित्य चोर और नीतिज्ञ के बीच लकीर खींची जाए।ज्ञान और शोध को समाज के लिए उपयोगी बनाया जाए।
       दीपक की लौ से सिर्फ रोशनी ही नहीं मिलती, सीलन भी सूखती है,कोने अतरे के अदृश्य सामान भी दिखते हैं,
और फतिंगे के पंख झड़ते हैं।

10 जनवरी, 2019

चबूतरे पर गिलहरी,शिशु और विमर्श का स्वागत है।

/मालवीय चबूतरा सत्रारंभ संवाद/
"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
☺️चबूतरे पर गिलहरी और शिशु का स्वागत है!😊
                        👍👍👍👍
धूप की तरह किलकते एक नन्हें शिशु ने साहस के साथ कहा-यहां क्या हो रहा है?
मैंने कहा-पढाई।
सवाल-पेड़ के नीचे पढाई?
जवाब-यहां धूप,ऑक्सीजन,आज़ादी और छाया सबकुछ मिलता है इसीलिए।
सवाल-सनडे को भी पढाई?
जवाब-बड़े बच्चे को सनडे को भी पढ़ना चाहिए।
सवाल-क्या फीस भी लगती है?
जवाब-बिल्कुल नहीं।हर रोज पैसे लेकर क्लास में पढ़ाता हूँ।यहां फ्री क्लास होती है।
जवाब-मैं तो खेलने आया हूँ।ग्राउंड खोज रहा हूँ।
सवाल-क्या आप भी पढ़ने आओगे?
जवाब-कभी कभी।
--और मैंने देखा,एक गिलहरी सुबह की खिली धूप में दोनों हाथों से कुछ कुतर रही थी।अचानक सरसराती हुई पेड़ में खो गई।
#########
अब शुरू होगी कक्षा!!!
#शोध का सबसे बड़ा वैरी कटपेस्ट धंधा है।#
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"-शोध तथ्य की पुनर्खोज और आइडिया का आविष्कार होने के कारण एक गम्भीर मौलिक कार्य है।
-चेतना और अस्तित्व के सरोकारी द्वंद्व के बिना ,सेल्फ और अन्य के द्वंद्व के बिना कोई बड़ा और महान शोध असंभव है।
-शोध को ग़ैरमौलिक और रद्दी प्रचार करने वाली चेतना वस्तुतः ज्ञानकाण्ड में खोखली और लूट झूठकांड में फरहर होती है।
-शोध की मौलिकता के अभाव का बड़ा कारण हमारे शिक्षक छात्र और विश्वविद्यालय की गैरजिम्मेदार भूमिका है वहीं शिक्षा का अनावश्यक राजनीतीकरण भी है।

-शोध की मौलिकता सतत आइडिया ऑब्जेक्ट सम्बन्ध और उसपर चिंतन है।
-आजकल पिछली खिड़की की छलांग से शोधकर्मी होने की कर्महीन उथल पुथल है जिसका परिणाम है कि चेतना विकसित होने के बदले कटपेस्ट मास्टर हो जाती है।
-आलोचना के ह्रास का एक बड़ा कारण शोध में घटती रुचि भी है।
- ज्ञान मंच के किसी स्तर पर मौलिकता और गुणवत्ता को उत्साह और मदद नहीं मिलने से जनता के टैक्स की बड़ी राशि रोजगार पेंशन भत्ता की शक्ल में बदल रही है।
-ज्ञान की बुनियादी निर्मिति मौलिक विचार से जुड़ी होने के कारण शोध एक मौलिक उद्यम है।
-जो शिक्षक छात्र शिक्षक मानवता  सेवा के इस जरूरी कर्म को ग़ैरमौलिक और गैरजरूरी बनाने की कोशिश करते हैं वे गर्दभ की तरह हैं जो पीठ पर लदी चन्दन की लकड़ी का केवल भार ढोते हैं लेकिन उसके गुण से महरूम रह जाते हैं।"
@वक्तव्य:रामाज्ञा शशिधर

02 जनवरी, 2019

मेरे बर्थडे में कन्फ्यूजन क्यों है:रामाज्ञा शशिधर,बनारस

🎂
दोस्तो!
चप्पू बंद हैं,डोंगी खामोश हैं,पतवार बीमार हैं,मांझी भूख की लकड़ी की आग हो बैठे हैं।31 और 1 को उछाली गई बोतलें सड़कों को गुलज़ार कर रही हैं,मशरूमियां रेस्टुरेंटों  से फेंके गए फूड्स अपनी बासी बू से शहर को तर किए हुए है।बीएचयू ब्वाय जोमैटो ब्वाय में बदल गया है और हर जगह स्विगी स्पाइस सांग हैंग स्लिप मोड में थिर है।
           ज़माना मेमोरी लॉस का ऐसा शिकार है और सोशल मीडिया इतना बड़ा आभासी परिवार है कि आदमी  फेसबुक को अपनी सौ ज़िम्मेदारियाँ सौंप अपना बर्थडेट तक भूला रहता है।
      तब अच्छा हुआ कि मेरा बर्थ डेट कंफ्यूजनग्रस्त हो गया।आंग्ल और संस्कृत,मुद्रित और मौखिक,पोथी और अच्छरहीनता के पाटन के बीच फंसकर मुझे
बर्थडे नाटक से राहत मिल गई है।या यूं कहिए कि बर्थडे
कन्फ्यूजन की भेंट चढ़ गया है।इसलिए 2019 मेरे जन्मदिन का लिप ईयर रहेगा।
      बाऊ रहे नहीं।रहते भी तो कोदो खर्च किया नहीं था पाठशाला में।पंडित को खदेड़ते थे और कुदाल को गंगा जल चढ़ाते थे।
     माई मौत के मुंह से लौटने के बाद बमबम है और उसकी स्मृति भरोसे की कहानी है।माई बताती रही है-तू
सबसे बड़ी गंगा बाढ़ के डेढ़ साल पहले पूस में पैदा हुआ।कृष्ण पच्छ की दुतिया थी।सांझ का वक्त था। तेरा बड़ा भाई मर गया था इसलिए तू बुआ के घर गढ़हरा में पैदा हुआ।सांझ का गोधूलि वेला था।सूरज ढल रहा था।
कड़ाके की ठंड थी।पता नहीं खड़मास का है कि नहीं।

      मेरी कोई वास्तविक जन्मतिथि अंग्रेजी और कुंडली फुंडली में नहीं है।
       बनारस आने से पहले ज्योतिषी मुझे देखकर भागते थे और बनारस आकर ज्योतिषियों से मैं भागता रहा हूँ।एक कारण तो मेरा नाशपंथी और विज्ञानपंथी होना है।दूसरे,नगर में मैं एक दर्जन नजूमियों को जानता हूँ जो पहले हलवाईगिरी करते थे या कट्टा चलाते थे या रगुल थे या गाउल थे या खोटर थे या भड्डर थे।जिनके जीवन मे खुद प्रेम नहीं वे दूसरे को लव मैरिज का ग्रह रत्न बांटते हैं।डेढ़ ज्योतिषी ऐसे हैं जो मुर्दे की भाग्य रेखा पढ़कर उन्हें ज़िंदा होने का उपाय बताते हैं।कुछ किताबी हिसाबी हैं लेकिन मुझे फलित में विश्वास नहीं।
     मेरा मसला गणित का है।सो खोज जारी है।
       मैं मौज मस्ती ज्ञान विज्ञान में सांस लुटा दूं लेकिन सौ
बार ठगों से ठगाकर भी न ठग हो पाया न ठगों को लाइक
करता हूँ।ज़माना तो वही है।गंगा में जल भले न हो काशी में आजकल ठगों और महाठगों की बाढ़ है।
       अब अड़ी के अडीबाजों ने मेरा बर्थ डेट ढूंढने के ठेका लिया है।
     मुझे भी सुअवसर मिल गया है कि नावबंदी की तरह
बर्थडेबन्दी कर दूं।अपनी चम्मचगिरी और नकली प्रशंसा से दूर होकर यह देखूँ कि कुछ याद के लायक हूँ भी या धरती का बोझ ही हूँ।विषधर ओझा देश का बोझा।
      सोचा था सेल्फी सेलिब्रशन करूं। दिल्ली से अस्सी कैम्पस तक ठेके प्रलोभन पर गतिशील सेल्फ़ी ईम्प्लॉयर्स और सेल्फ़ीमैनों की रौनक देखकर एक बार मन हुआ कि मैदान में उतर ही जाऊं लेकिन ऑक्सफ़ोर्ड के मनोवैज्ञानिक  प्रोफेसरों के साइको सर्वेक्षण की खबर ने हिला दिया-एक दिन में 6 और उससे ज्यादा सेल्फी लगाने वाला उच्च स्तरीय मनोविक्षिप्त रोगी होता है।
             सचाई तो यही है कि तरंग मीडिया की वर्चुअल
सोसाइटी में में रियल सोसाइटी सिकुड़ रही है।बधाईवालों को मिठाई नहीं मिलती और मिठाईवालों से बधाई नहीं मिलती।
    # 2019 में मेरे पास जन्म लेने के कई चांस हैं।
   # यह पोस्ट मॉडर्न कन्फ्यूजन ही मेरे जन्म लेने का सॉल्यूशन है।
  #  चाहे दुआ दें या बद्दुआ जवानी बनी रहेगी और मेरा X फैक्टर ज़माने पर बना रहेगा।आमीन💐