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17 अगस्त, 2020

बनारस में अब जसराज सुर का रस नहीं घोलेंगे


@रामाज्ञा शशिधर
दिलों को जोड़ने वाली,आत्मा को उठाने वाली,अवसाद और विषाद को विरेचित करनी वाली लय टूट गई।नफरत से भरी चेतना पर खयाल की अमृत फुहार बरसानेवाला कंठ सदा के लिए खामोश हो गया।मैं सचमुच दुखी हूं।
      2005 से 2019 के बीच संकट मोचन संगीत घमासान के वे अक्सर संयोजक होते रहे।न जाने कितनी बार सैकड़ों कलाकारों के बीच उन्हें रात भर जगा देखा।कितनी बार गम और तनाव से भरी रूह को उनके स्वर तरल में डुबोया।ऐसा कभी नहीं लगा कि वे बनारसी नहीं हैं।ठेठ की ठनक और हनक।
       अस्सी की चाय अड़ी पर दो हफ्ता पहले बतकही शुरू-जस्सू मियां दिखे, जस्सू महाराज आ गए,जस्सू इसबार फलां को काटकर फलां को चांस देंगे।हमलोगों के बीच वे जसराज नहीं,जस्सू जनाब होते।इसका अर्थ है कि वे काशी के सुर रसिकों और सड़कों के दिल पर राज करते थे।
       बनारस आकर जाना कि पढ़लिख कर भी कोई संगीत के बोध में अनपढ़ हो सकता है और रिक्शावाला,ठेलावाला,सब्जीवाला कैसे क्लासिकल का माहिर समझदार होता है।बनारस ने और जस्सू महाराज ने मेरे जैसे संगीत गंवार  को संगीत के ककहरा का आधार दिया।
       जसराज मेवाती घराने के खयाल गायक रहे।बेगम अख्तर से शुरू में गहरे प्रभावित थे।कुमार गंधर्व की डांट से तबला छोड़ गायकी में रम गए।विलंबित, मध्यम और द्रुत तीनों सुरों में जसराज ने अनेक रागों को निबद्ध किया।कृष्ण के भजन रस  में जसराज का खास आकर्षण था।स्त्री और पुरुष के सम विषम राग संयोजन से जसराज ने राग जसरंगी को काफी लोकप्रिय किया।उनकी आवाज़ में एक खास खनक,टांस,खिंचाव,उठान और मिठास है।जसराज प्रयोगशील गायक हैं।
      जिस तरह वे भारत और अमेरिका के बीच सांस्कृतिक मिश्रण के सिंबल बने,ठीक उसी तरह मंगल और वृहस्पति के बीच आज ग्रह 'जसराज' के रूप में दमक रहे हैं।यह भारत के शास्त्रीय संगीत को कितना बड़ा आदर है कि अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ ने एक खोजे हुए नए ग्रह का नाम जसराज रखा।भारत की चंद महान खगोलीय उपलब्धियां हैं उनमें शास्त्रीय संगीत सौर आभा मंडल की तरह है।जसराज उसके एक अनोखे ग्रह हैं।90 की उम्र तक उनका रहना शानदार है।उनकी आवाज़ हमारी आत्मा के जख्मों पर मरहम की तरह पिघलकर फैलती रहेगी।

03 जून, 2020

मेरी साइकिल हाथी जैसी भारी और ऊंट जैसी ऊंची थी:रामाज्ञा शशिधर


          दुनिया में तीस फीसदी ज्यादा लोग अब साइकिलपसंद हैं।वे अंधाधुंध धरती के फेफड़े को जख्मी और घायल करते रहे।अब अपने जर्जर फेफड़े पर एक अदृश्य वायरस के कोरोड़ों रूप में हमला करते देख और प्राणवायु का हरण होते देख घबड़ा गए हैं।वे अब साइकिल से दौड़ना, हांफना और  खुद के फेफड़ों को मजबूत करना चाहते हैं।
     लेकिन धरतीपुत्रों के गुनाह और मूढ़ता की कहानी टेढ़ी मेढ़ी है।
     नकलचियों और फेंकुओं से पहली मुलाकात बेगूसराय या दिल्ली में नहीं बल्कि बनारस के बीएचयू में हुई।
      डॉ डींगडोंग मारुतिवाले! प्रो ज़िनजोंग हुंडईवाले!प्रो खेवालाल महेंद्रा वाले!प्रो ढेलालाल सुजुकी वाले!
      एक ऐसा कैम्पस जो हजारों वृक्षों,पौधों,जड़ी बूटियों,फूलों,फलों,चिड़ियों,तितलियों मोरों से एक सदी से जन्नत की तरह जीवनदायी है।जहां शुद्ध हवाएं और बादलों जैसी दिशाएं सबको स्तब्ध और मुग्ध कर देती हैं।जहां फलों के रस और फूलों की सुगंध की वर्षा बारहों महीने होती है।उस विशाल जंगल में यह मशीनी धुआं,शोर,वाहन प्रदर्शन और हिंसा,दिखावा,अमला फौज हुंकार और चार कदम भी जाने के लिए पेट्रोल डीजल का धुआं युद्ध क्यों?वास्तविक शिक्षा का यह स्वभाव हो ही नहीं सकता।
       मैं साइकिल सवार नवयुवा शिक्षक उदास हो गया।
      वे नई पुरानी कार से गैस छोड़ते हुए महामना की बगिया के पेड़ों फूलों पत्तियों तितलियों मोरों विद्यार्थियों और शिक्षकों पर जहर फेंकते! टाई और पेंट को बार बार किसी फिरंगी मैकॉले की तरह कसते! और हर साइकिल सवार को ओरांग ओटांग समझकर सेपियंस की तरह खी खी करते।
      जब मैं दिल्ली से बनारस आया तो धीमी रफ्तार देखकर मन संतुष्ट हुआ।लेकिन कैम्पस की गति देख मति चकरा गई।मैंने लंका पर से हीरो कम्पनी की एक नई साइकिल ली और सामने घाट से कैम्पस,लंका और अस्सी की तफरी में मजा लेने लगा।मेरे साथ आए रुद्र एकादश में कुछ के पास कारें थी और कुछ दोपाए तिलाश्व पर सवार होकर आते थे।तब कुछ पुराने शिक्षक साइकिल से आते और ज्यादातर कार से।
         नए नक्षत्र हीनताबोध और श्रेष्ठताबोध दोनों से ग्रस्त हो गए।उनमें से कुछ मेरा मजाक उड़ाकर हतोत्साहित करने लगे ।जैसे साइकिल की सवारी चोरों उचक्कों गरीबों ज्ञानहीनों और आवारा टाइप लोगों की पहचान हो।इस कार्य में अभिजातपसंद डॉ श्रीप्रकाश शुक्ल सबसे आगे थे।वे पढ़ाने नहीं बल्कि गाजीपुर से बनारस प्रदर्शन करने आए हों।खैर!बाद में मेरी कम्पनी हीरो से हीरो होंडा हो गई।तब विभाग धुआं छोड़ते आता और शहर में साइकिल का मजा लेता।उसका संस्मरण भी मजेदार है।
        बीएचयू में प्रदर्शन और पाखंड का साइकिल युग तब आया जब प्रो डीपी सिंह वीसी बनकर आए।पता नहीं कैसे,उन्होंने यूरोपीय यूनिवर्सिटी की नकल करते हुए कैम्पस को पर्यावरण जाग्रत बनाना चाहा।परिणामतः महीना में एक दिन साइकिल से ऑफिस जाने लगे।आगे आगे कुलपति।पीछे पीछे बंदूक वाले कुलानुशासक,उसके पीछे कुल रक्षक।
       तमाशा अब शुरू हुआ।29 दिन कैम्पस को धुआं,शोर और हेकड़ी से रौंदने वाले प्रोफेसरों की  एक शार्प इंटेलिजेंट फौज कुलपति महोदय पर सम्मोहन मंत्र मारने के लिए हर चौराहे पर लंकाप्राप्त नवसाइकिल से पीछा करने लगी-हे महाराज।देखिए!मैं गांधी का भतीजा,महामना की संतान पृथिवी को कितना प्यार करता हूँ।कैम्पस को जहरमुक्त तो सिर्फ मैं कर रहा हूँ।आप मेरे ह्वेनसांग।मैं आपका फाह्यान।
       अब क्या करोगे साइकिल सवार!तुम्हारी साइकिल साधना में साइकिल को सीढी बनाने का गुण नहीं है क्योंकि तुम्हारे लिए  जीवन एक शैली है,सीढ़ी नहीं।तब से साइकिल की ऑफिशियल सवारी बंद कर दी।
     उसी दौर में छात्रों में देखादेखी बाइक प्रदर्शन की लहर आई।हॉस्टल,विभाग,फेकल्टी बाइक से लद गए।तभी नगर भर के शोहदों के लिए कैम्पस बाइक रेस का कॉम्पिटिशन ग्राउंड हो गया।विश्वनाथ मंदिर वीटी में तब्दील हो गया।साइकिल वाले विद्यार्थी और बाइक वाले शिक्षक दोयम दर्जे के नागरिक महसूस करने लगे।विद्यार्थी शिक्षक के ज्ञान से ज्यादा उनकी कार के नए नए मॉडलों और उसकी कीमत पर अंतरराष्ट्रीय रिसर्च करने लगे।मोबाइल,सायबर और वाईफाई का सहयोग इसमें योगदान देने लगा।
     लवगिरी और भैयागिरी के लिए  बाइक मॉडलों में कम्पीटिशन गॉसिप का केंद्र बन गया।बाहरी और भीतरी पहियों की रफ्तार में दर्जनाधिक लोग मरे या घायल हुए।
     एक प्राकृतिक और पारम्परिक कैम्पस में  यह रफ्तार नुकसानदेह साबित हुई।इसलिए कि शिक्षक छात्र के बीच दूरी बढ़ने लगी।बहस,विमर्श,संवाद,केंटीन टॉक खत्म होने लगे।अब किसी के पास फुर्सत नहीं थी ।लेने और देने वाले दोनों व्यस्त थे।बिजी फ़ॉर नथिंग।हेल्थ पर बुरा प्रभाव पड़ा।अस्पताल की भीड़ में इजाफा हुआ।लिवर,गैस,कब्ज,हड्डी,सांस,फेफड़े और अवसाद के रोगी बढ़ने लगे।सेपियंस जंगल युग और कृषि युग के श्रम से आराम के भरम में फंस गए। 
       मेरे जैसे किसान पुत्र के स्वास्थ्य को कैम्पस ने बुरी तरह प्रभावित किया।मेरे अनेक सहकर्मी रोगों से भर गए।लेकिन आदत जब स्वभाव बन जाए तो जानलेवा होती है।
      मुझे याद है कि गांव में पहली साइकिल मुझे दसवीं में स्कूल टॉप और डिस्ट्रिक्ट थर्ड रैंकर होने पर मिली थी।आधा पैसा मां ने दिया और आधा खुद की ट्यूशन कमाई।बारो में कबाड़ मिस्त्री के लौह जंगल से एक सेकेंड हैंड हाथी जैसी साइकिल बनकर निकली जो मेरे लिए जान से ज्यादा प्यारी थी।वह इतनी भारी थी कि हाथी और इतनी ऊंची की ऊंट।क्या आनंद था।वे दिन ज्यादा मजे के थे।
      मैं 17 साल से साइकिल पर सवार था।सिमरिया गांव से बेगूसराय,पटना,समस्तीपुर,मुजफ्फरपुर आदि जनपदों को साइकिल से मापता रहता था।एक बार पुरानी साइकिल पर पेंट के लिए मामा के पास मुजफ्फरपुर चला गया।जब बिहार यूपी के मजूरों को साइकिल से देश मापते देखता हूँ तो लगता है कि पुराना समय जहरीली सभ्यता को चुनौती दे रहा है।
       मैं आज भी बे-कार हूँ।पैदल और साइकिल ही पसंद है।मुझे लगता है कि सभ्यता को उस तरफ लौटना चाहिए।आवश्यकता और विलासिता के फर्क का विवेक भी जरूरी है।
            उत्तर कोरोना समय के लिए कोरोना काल में एक सीख तो यही है कि हम साइकिल की दुनिया आसपास तैयार करें।कम से कम एक घण्टा साइकिल रोज चलाएं।पेड़ से पूछ कर साइलेंसर से न्यूनतम धुआं छोड़ें।
    भविष्य भयावह चुनौतियों से भरा है। शिक्षा कैम्पस को साइकिल फ्रेंडली बनाना अनिवार्य हो ।पेट्रोल डीजल और स्पीड को हतोत्साहित करने की मांग हमारा पारितन्त्र रो रोकर कर रहा है।कान लगाकर सुनिए।