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06 दिसंबर, 2017

पप्पू की चाय अड़ी से चाय की राजनीति सीखिए

यह अस्सी पर खास तरह से बनती हुई चाय
है। पहले भट्ठी दूध पानी को खूब खौलाती
है।फिर वह गिलास में कूद पड़ता है। फिर छन्नी
में काले दाने बिछ जाते हैं।फिर केतली से
बूँद बूँद बौखलाया हुआ जल टहलने लगता है।काला रस तबतक टपकता है जबतक
गिलास का चेहरा गुस्सैल न हो जाए। अंत
में दिमाग ठंडा और जीभ मीठी करने के
लिए चीनी पेंदी में चुपचाप बैठ जाती है।
उधर एक घंटे से इंतज़ार में बैचेन दिल दिमाग आँख कान हाथ मुंह गिलास पर
झपट पड़ते हैं। फिर शुरू होती संसद
से सड़क तक पर बहस...उसे छोडिये।
फिलहाल अपनी धारा के हिसाब से भाजपाई
सपाई कांग्रेसी कम्युनिष्टि बसपाई गिलास
थाम लीजिये। इससे बाहर हैं तो बाहर
रहिये।संसद जारी है...

03 दिसंबर, 2017

पद्मावती 'मानुस प्रेम'की फैंटेसीयुक्त यात्रा है-मालवीय चबूतरा


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जाड़े की खिली धूप और मिट्टी के पुरबे में टॉपअप वाली चाय।बहस दर बहस।पद्मिनी,पद्मावत से पद्मावती तक। रेशा रेशा खुलता हुआ।वैचारिक ताप से भरा सूफ़(चबूतरा)।उसपर जमे हुए प्रेम और ज्ञान के दर्जन से अधिक सूफी।बहस का विषय-   
            "पद्मावती की कहानी
             चबूतरे की जुबानी"
      यह विमर्श शुरू होता है रम्या श्रीनिवासन की 2007 में प्रकाशित किताब 'द मेनी लाइव्स ऑफ़ अ राजपूत क्वीन'।पद्मावती एक भारतीय स्त्री के अनेक अफ़साने हैं।ज्यादातर अफ़साने मर्द ही गढ़ते रहे।इतिहास और मिथक,रियलिटी और फैंटेसी,मध्यकालीनता और उत्तर आधुनिकता,युद्ध और प्रेम,कला और राजनीति,करणी सेना और परशुराम सेना,बॉक्स ऑफिस और टेलीविजन चैनल,वाद और विवाद,मुनाफा और वर्चस्व।हर कुछ एक प्योर,वर्जिन,नस्ली और कंडीशंड स्त्री निर्मित करने की कल्पना और स्वतन्त्रता विरोधी ऐतिहासिक यात्रा।और जिस मोड़ पर भारतीय सभ्यता और लोकतंत्र खड़ा है,अब पुरानी भाषा में पुरानी किस्म के समधानपूर्ण विमर्श चल नहीं सकते।
         जायसी के महाकाव्य पद्मावत से लेकर संजय लीला भंसाली की सेंसरबोर्ड के रील बक्से में बंद विवादित फ़िल्म पद्मावती के मध्य सबसे बड़ा प्रश्न है-कला और राजनीति के वर्चस्वशील  शोर में दबी हुई स्त्री की आकांक्षा। शोर कितना जेनुइन है और कितना वर्चुअल।आइए मालवीय चबूतरे के नवाचार और पॉलिमिक्स से मुक्त ज्ञान विमर्श से इस 'शोर' को समझने की कोशिश कीजिए~
कर्मकाण्डमुक्त बहस का आरंभ डा आशीष पांडेय के तीखे सवालों से होता है-क्या सोशल मीडिया और गूगल का बड़ा हिस्सा पद्मावती के नाम फासिस्ट कंटेंट से नहीं भर दिया गया है?वे लेखक कौन हैं?क्या भीड़ की चेतना ऐसे तर्कहीन और आक्रामक विचारों से उन्मादी नहीं होती जाएगी?भंसाली की फ़िल्म का आधार भले जायसी की कविता हो लेकिन क्या हमें प्योर आर्ट और अप्लाइड आर्ट में सृजन,व्यापार और राजनीति की दृष्टि से फर्क नहीं करना चाहिए।इतिहास और फैंटेसी के गडमड से हमारा समय उलझा दिया गया है।
          गौरव त्रिपाठी सूफ़ विमर्श का अनौपचारिक विकास करते हैं-पद्मावती इतिहास की ठोस सच्चाई नहीं है।इतिहासकार टाड भी एक नए तथ्य वाली पद्मिनी की खोज चारण नैरेटिव से प्राप्त करते हैं।जायसी की पद्मावती भारतीय स्त्री सौंदर्य परंपरा से ली गई स्त्री है।पद्मनी स्त्री सौंदर्य का एक प्रकार है।जायसी की पद्मावती इतिहास और कल्पना का मिश्रण है जो कला माध्यम का जरूरी गुण है।लोकतंत्र में सेना की धारणा ही संविधान की अवज्ञा है।कमजोर समाज की भावनाएं सबसे पहले और ज्यादा आहत होती हैं।आस्था कल्पना की दुश्मन हैं।
         सुनील कुमार सवर्ण और क्षत्रिय पुरुष सत्ता को चुनौती देते हुए विचार को नया आकार देते हैं-दरअसल यह सवर्णों द्वारा स्त्री सत्ता को नियंत्रित करने वाली कठोर विचारधारा का विकास है।लोकतंत्र कला और समाज की विविधता और स्वतन्त्रता को स्वीकारता है।वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इन मूल्यों का दमन कर रहा है। बैंडिट क्वीन फ़िल्म की फूलन देवी के समय करणी सेना का विरोध आंदोलन कहां था?यह जातिवादी और धार्मिक वोट की राजनीति की डिजाइन है।
           रवि घूमर नृत्य और ख़िलजी पद्मावती स्वप्न सम्बन्ध को विवाद के केंद्र में लाने को ख़ारिज करते हैं-घूमर नृत्य राजस्थान के लोक समाज का पुराना उत्सव नृत्य है।क्या बॉलीबुड की फ़िल्म और भारत का समाज बिना गीत नृत्य के सम्भव है?हमारे यहां देव देवी,राजा कलाकार,समुदाय सम्प्रदाय सभी गीत नृत्य के संचालक हैं।फिर गीत पर बहस क्यों?कला और फैंटसी का रिश्ता बहुत पुराना है।ख़िलजी का पद्मावती स्वप्न आकर्षण उसकी दमित इच्छा की मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति है।आजकल फ़िल्म में मनोविज्ञान का बड़ा प्रयोग हो रहा है।यह विरोध क्रूरता का शक्ति प्रदर्शन है।
        अरुण तिवारी पौराणिकता और मिथक की युंगीय यात्रा की बात करते हैं कि मिथक हमेशा गतिशील मूल्यों का वाहक होता है और मानव मस्तिष्क के रथ पर सवार होकर भविष्य की यात्रा करता है।
         प्रो सत्यदेव त्रिपाठी का सद्यः प्रकाशित आलेख का पाठ फ़िल्म उद्योग की व्यापारिक राजनीति की कलई खोलती है और कई बार कला के प्लेटो मॉडल का समर्थन करती हुई प्रतीत होती है।
           मुंबई से आए लेखक शाश्वत रतन का सुचिंतित और दोटूक वक्तव्य गौरतलब है कि कट्टर समाज और सरकार फ़तवा जारी करते हैं।आजकल यह विचार तेज़ी से फ़ैल रहा है। जौहर और सती की प्रथा कभी भी स्त्री और मानवता के गुणगान का विषय नहीं हो सकती।इतिहास का डॉक्यूमेंटेशन हो सकता है।फ़िल्म हमेशा रूपक और  फैंटेसी की कला होती है।पद्मावती इतिहास के गर्भ से नहीं मुसलमान सूफी कवि जायसी की कल्पना की उपज है।उसे उसी रूप में ग्रहण करना चाहिए।
        भोजपुरी अध्ययन केंद्र के नवनियुक्त समन्वयक प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल जायसी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हवाले से जरूरी सवाल उठाते हैं कि युद्ध और उन्माद के विरुद्ध प्रेम का आख्यान जायसी की अनूठी देन है।यह फ़िल्म जायसी को पाठ्यक्रम से बाहर निकालती है।ख़िलजी की तुलना रावण से करना बेमानी है।
        डा दीनबंधु तिवारी फ़िल्म को मनोरंजन और प्रायोगिक कला मानते हुए उसके रिलीज होने का समर्थन करते हैं-700 साल पुरानी एक कल्पित स्त्री के लिए एक जीवित स्त्री कलाकार की नाक काटने और उसपर ईनाम देने वाली विचारधारा और लोग किसी आधुनिक लोकतान्त्रिक समाज के प्रतिनधि कैसे हो सकते हैं?
         बुजुर्ग वाचस्पति को आज नहीं बोलना है क्योंकि उन्हें बिसेसरगंज गल्ला खरीदने जाना है।
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                             मध्यांतर
          
       
    

26 नवंबर, 2017

मालवीय चबूतरे के लिए नजीर बनारसी अपने हैं

::मालवीय चबूतरे पर नजीर की यादें::
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नजीर के गुजरे 21 साल हो गए।अब तो गंगा का पानी वजू के काबिल भी नहीं।लेकिन लँगड़ा आम और गंगा के साथ नगर बनारस और वतन भारत को बेइंतहां मुहब्बत करने वाले बनारसी गली के जीवंत शायर नजीर को जिस तरह बनारस भूलता जा रहा वह इस शहर की सेहत और रवायत के लिए ठीक नहीं।उन तरक्कीपसंद लेखक संगठनों और लेखकों को
दुःख के साथ कहना पड़ता है-
"कबीर को भूल जाइए
  नजीर को भूल जाइए
  याद रखिए शिवाला को
  फ़क़ीर को भूल जाइए--(उत्तर कबीर कोश से)
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पेश है नजीर बनारसी की बनारस की गलियों और गाउलों को शिनाख्त करती यह चर्चित ग़ज़ल:-
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बनारस की गली
!!!

हर गाम पे हुशियार बनारस की गली में
फ़ितने भी हैं बेदार बनारस की गली में

ऐसा भी है बाज़ार बनारस की गली में
बिक जाएँ ख़रीदार बनारस की गली में

हुशियारी से रहना नहीं आता जिन्हें इस पार
हो जाते हैं उस पार बनारस की गली में

सड़कों पर दिखाओगे अगर अपनी रईसी
लुट जाओगे सरकार, बनारस की गली में

दुकान पे रुकिएगा तो फिर आपके पीछे
लग जाएँगे दो-चार बनारस की गली में

हैरत का यह आलम है कि हर देखने वाला
है नक़्श ब दीवार बनारस की गली में

मिलता है निगाहों को सुकूँ हृदय को आराम
क्या प्रेम है क्या प्यार बनारस की गली में

हर सन्त के, साधु के, ऋषि और मुनि के
सपने हुए साकार बनारस की गली में

शंकर की जटाओं की तरह साया फ़िगन है
हर साया-ए-दीवार बनारस की गली में

गर स्वर्ग में जाना हो तो जी खोल के ख़रचो
मुक्ति का है व्योपार बनारस की गली में।

17 नवंबर, 2017

सिमरिया में बादल एक कवि का नाम है:शशिधर

::निधन स्मरण::
#दिनकर की धरती पर अब बादल नहीं गरजे-बरसेंगे!
(तस्वीर:1991,बाएं बादलजी,मध्य में बिहार विध्न परिषद अध्यक्ष उमेश्वर प वर्मा और दाएं मैं:
,सिमरिया,आंसू के अंगारे का दिनकर जयंती में विमोचन)
दिनकर आज रो रहे होंगे।उनकी संतान बादल खो गए।वे सिमरिया के खेत खलिहान मंच पर न तो कभी गरजेंगे और न ही बरसेंगे। दिनकर को अपने ही गाँव में लगातार 30 साल तक किसान और किशोर से जोड़ने वाले बादल की छाया का अभाव भरा नहीं जा सकता।
    इसबार ग्रीष्म में जब बादलजी बीमार पड़े तो रेलवे क्वार्टर प्रवीण,मोनू,फ़िरोज़ के साथ मैं पहुंचा।काफी खोजने के बाद मुलाक़ात हुई।बेड पर थे पर आवाज़ में वही मेघमन्द्र कड़क।बोले-"कुछ लोग मेरे बारे में अफवाह उड़ा रहे हैं।सिमरिया और दिनकर की मिटटी का हूँ।अभी छाती पर मूंग उगाता रहूंगा।"बहुत जल्दी हम नई फसलों को उदास छोड़कर चले गए।

चन्द्रकुमार शर्मा बादल दिनकर की मिट्टी के सच्चे समर्पित साहित्यकार थे।समकालीन कविता का एक ताकतवर कवि।दोमट मिट्टी की ऊर्जा से भरे।वे जीवन भर दिनकर और सिमरिया के लिए साहित्यिक सांस्कृतिक कार्य करते रहे।आदर्श ग्राम सिमरिया और दिनकर पर्व आज जिस भव्य महल  के रूप में प्रसिद्ध हैं उनमें सबसे मजबूत और पहली बुनियाद बादल जी ने डाली थी।बादल जी अतिसाधारण परिवार के होते हुए भी कभी स्वाभिमान,साहित्य और संस्कृति विरोधी मूल्यों से समझौते नहीं किए।सिमरिया को आदर्श बनाने के समर्पित जुनून में  उन्हें एक ओर गाँव के अपराधियों ने उत्पीड़ित किया दूसरी ओर दिनकर मंच के नए रण बांकुरों ने भी बाद में उनका दिनकर मंचीय सम्मान नहीं किया।उनकी आवाज़ दिनकर मंच पर सावन के बादल की तरह गरजती थी मानो वह दिनकर का ही स्वर हो।वे लंबे समय तक प्रलेस में रहे और वहां भी कुछ राजनीतिक जुगाडिए से उनकी अक्कड़ मुठभेड़ होती थी।
       बादलजी और दिनेश दा की जोड़ी अनूठीथी।दिनेश सिंह को ठीकेदार से दिनकर रसिक और अंतर्मुखी से जीभमुखी बनाने में बादल जी का अभूतपूर्व योगदान था।बादल जी गंगा किनारे मेरे पडोसी थे।वे गंगा के पानी से बने बादल थे इसलिए एक दियर के किसान समाज के सारे गुण उनमें रहे।सिमरिया में जब मैंने आँखें खोली तो दो आवाज़ों से घिरा पाया।एक तो गोलियों की गड़गड़ाहट और दूसरी दिनकर काव्य की ठनक।दिनकर को मैंने बादल के कंठ से पहली बार जाना। बादल जी का सिमरिया के विकास,सांस्कृतिक निर्माण,शिक्षा सुधार,अपराध मुक्ति,आदर्श ग्राम निर्माण और दिनकर पर्व निर्माण में नींव के पत्थर जैसा महत्व है।यह स्मृति ध्वंस और बाजारू वर्चस्व का बेहद क्रूर समय है।फिर भी उम्मीद करता हूँ कि सिमरिया दिनकर की भूमि होने के नाते बादल जी के सारे योगदान को स्मृति के खज़ाने से निकाल कर समय देवता की छाती पर लिख देगा।सिमरिया आज भी किसानों का गाँव है।किसान और खेत को जितना दिनकर चाहिए उतना ही बादल भी। अपने मंच उस्ताद को भींगी आँखों और मर्मी मन से श्रद्धांजलि देता हूँ।गाँव वाले बड़ी संख्या में बादल जी का मृत्यु उत्सव मनाए क्योंकि वे मरेंगे नहीं।काश मैं उनकी अर्थी को कन्धा देने गाँव में रहता!

13 नवंबर, 2017

खांसी वाली हिंदी बनाम काशीवाली हिंदी

::तुम खांसीवाली हिंदी,हम काशीवाली हिंदी!::
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5वां दिन:हिंदी अड़ी अस्सी पर धूमिल(और मुक्तिबोध भी?)
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हिंदी अड़ी पर  हमने मुक्तिबोध की अँधेरे में और धूमिल की पटकथा पर लंबी बहस क्यों की?इसलिए कि देश  की तरह मुक्तिबोध और धूमिल की कविता में भी काफी अँधेरा है।
        तुलसी से लेकर धूमिल तक को भाषा और लोक का आधार देने वाली यह अस्सी की हिंदी अड़ी है !आप पूछिए यह हिंदी अड़ी क्यों है और सर्वविद्या की राजधानी का मुझ जैसा मास्टर यहाँ का चायेड़ी क्यों है?
       आप उत्तर कबीर से  उत्तर लीजिए कि यह चाय वाला कोई नकली साक्षर चायवाला भाषणबाज नहीं बल्कि चालीस पार का शख्स हिंदी आंदोलन वाले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का पास आउट पुरातन छात्र है।
       जी हाँ।खानदानी गोल्ड मेडल और नौकरी लुटाने वाले हिंदी के अंतरराष्ट्रीय सरदार प्रो विजयपाल सिंह के विभाग का बेरोजगार नौजवान वीरेंद्र सरदार।
      कहते हैं हिंदी डिग्रीधारी वीरेंद्र सरदार-गुरूजी।जब काशीनाथ सिंह के चेले ही नालायक निकल गए तो मेरी क्या औकात! देखिए डा गया सिंह के भाई डा गिरिधर सिंह को!हिंदी विभाग से पीएचडी करने के बाद बेरोजगारी का ऐसा सदमा लगा कि ये हिन्दीदाँ साहब या तो पेड़ पर घोंसला बनाकर साधना करते हैं या हरश्चंद्र घाट पर आत्मा बैंक का बही खाता चलाते हुए प्रबन्धक की नौकरी करते हैं।
      मानना है हिंदी सरदार का कि अस्सी से काशीनाथ और चौथीराम मुंह छुपाकर इसलिए नहीं भागे कि अड़ी उनके लायक नहीं रही थी बल्कि इसलिए गुजर गए कि वे हिंदी के सदाबहार छात्र वीरेंद्र को चाय बेचते देखकर ग्लानि और अपराध से भर उठते थे।
     गुरूजी!मैं जब क्लास में जाता था तो तब काठ वाली कुर्सी होती थी।क्लास में गुरूजी लोग नाऊ अधिक दिखते  और पंडित कम।पता नहींक्यों उन्हें चेले के दिमाग से ज्यादा जुल्फ सजी खोपड़ी से  प्यार था! मैं हिंदी की क्लास करने से ज्यादा पहलवानी करने लगा।मैंने हिंदी विभाग को पहलवानी में डिस्ट्रिक्ट और प्रोविन्स लेवल के कई गोल्ड मेडल दिलाए और हिंदी का नाम रोशन किया।    
       गुरूजी!दुःख क्या उघारूं!ये प्रो काशीनाथ मेरे लिए काशी ही साबित हुए और चौथीराम तो मेरे लिए  चौथी ही रहे।जिस हिंदी विभाग में   नकली गोल्ड मेडल को सैलुनिया सिंहासन प्राप्त है वहां के कुर्सी वाले विद्वान् मेरे जैसे ऑरिजिनल गोल्ड मेडिलिस्ट हिंदी पहलवान को क्यों पूछें।
       गुरूजी!जातिवाद और स्वार्थ का साँढ़ हिंदी के खेत को ऐसा चर गया कि वहां खूँटी ही खूँटी बची है।पानी दीजिए पर तलवा बचाकर।
             कहना है हिंदी अड़ी के चायवाला वीरेंद्र सरदार का कि अब के
लड़के पीएचडी कर रहे हैं और धृतराष्ट्र का उच्चारण नहीं लिख सकते।
            "मैं तो विद्योत्तमा नामक प्रोफेसरनी का चेला हूँ जो एकमात्र क्लासमुखी विदुषी थी।आज के लौंडे अस्सी के महान हिंदी डिग्रीधारी बेेरोजगार  सुश्रुत आचार्य से मिल लें तो उनकी हिंदी का इलाज स्वतः
हो जाएगा।"
          "परिसर की मरियल हिंदी है और अस्सी की हिंदी अड़ियल हिंदी।"
         गुरूजी!आज भी मैं तुलसी का नाम लेकर कोयला जलाता हूँ और धूमिल का नाम लेकर चूल्हा ठंढाता हूँ।बीच में कबीर रैदास कीनाराम भारतेंदु प्रसाद त्रिलोचन काशीनाथ गया सिंह आते जाते रहते हैं।
           गुरूजी!आज आपने धूमिल को यादकर इसलिए अच्छा किया कि काशी के नक्शे पर पहले गाय दूध  फैलाती थी और आजकल गोबर लीपती है।
          गुरूजी!नहीं समझे?गोष्ठीबाज हैं न!मने कि पहले मसक में दूध भरकर नाली धोई जाती थी और आजकल मुखमसक
में शब्द और पीक भरकर।
          गुरूजी...हिंदी सरदार सुनाते रहे!सुनाते रहते हैं।।   
        जानिए!अड़ी पर मंच माला स्वागत चादर आदर फादर गिव एंड टेक बटर शटर की कोई गुंजाइश नहीं।यहां सत्तर साल पुराना गटर है। गटर के ऊपर तीस साल पुरानी सड़क है।,सड़क के ऊपर दो करोड़ साल पुराना लौह चूल्हा है।चूल्हे में पचास लाख साल पुराना कोयला है।कोयले में सूर्य इतनी पुरानी आग है।आग पर अंग्रेजीराज इतनी पुरानी चाय पत्ती है।उसपर मुगल सम्राट अकबर की दान दी हुई एक केतली है।...और उस केतली से खेलती हुई खड़ी बोली हिंदी इतने ही पुराने हिंदी चायवाले वीरेंद्र सरदार की उँगलियाँ हैं।
         चाय खौलती रहती है,शब्द पककर झरते रहते हैं।
        यहां अडीबाज नहीं बोलते हैं ।वे मिट्टी के पुरबे में चाय लिये मिट्टी की मूरत सरीखे सुनते रहते हैं।बोलता है सिर्फ हिंदी का सरदार।अस्सी अड़ियों का हाइएस्ट क्वालिफाइड चायवाला।
         कहना है हिंदी सरदार का कि गुरूजी!जितने देसी विदेसी को आप लोगों ने लाख टका तनख्वाह लेकर हिंदी नहीं सिखाई होगी उससे दस गुना ज्यादा तो मैंने फ्री जोन हिंदी फैला दी।वीरेंद्र सरदार के हिंदी सीखे चेले दुनिया के हर कंट्री में हैं।चाहे जापान हो कि उज़्बेकिस्तान।हिंदी सरदार के यहां विदेशी लाइन में खड़े होकर चायेड़ी हिंदी सीखते हैं।
       हिंदी अड़ी पर मेरा जापानी चेला मानस चाय पीने कम हिंदी सीखने ज्यादा जाता है।
         वीरेंद्र सरदार खांसी वाली हिंदी नहीं,काशी वाली हिंदी सिखाते हैं...भोंसरो के अमीर खुसरो के...का रजा मजा बा..का गुरु शुरू हौ..
        यह हिंदी अड़ी है,समीक्षा अड़ी है,गाउल अड़ी है,यह फाउल अड़ी है,रोमांस अड़ी है,यह कत्थक डांस अड़ी है,यह नेमी अड़ी है,यह प्रेमी अड़ी है,यह फोसला अड़ी है,यह घोंसला अड़ी है,धुनिया अड़ी है,हरमुनिया अड़ी है,यह अचल अड़ी है,यह सचल अड़ी है,यह बाप अड़ी है बेटा अड़ी है।कहते हैं प्राइमरी शिक्षक हिन्दीदाँ डा आशीष पांडेय कि जब से काशी से पेड़ गायब होकर एक जगह केंद्रित हो गए हैं तबसे हर अड़ी इंटेलेक्चुअल से महरूम एजेंट के साथ खड़ी है।
     "नहीं समझे।समझेगें भी नहीं आप।ऐसा इसलिए कि ये इंटेलेक्चुअल नामक जीव यूनिभरसिटी में पाये जाते हैं।"
      कहना है ह्मबोट गुरु का...।
       ह्मबोट का मतलब?...
      फिर नहीं समझे आप...
          एक बोतल सीरप खरीदिए...काशी की दक्षिण दिशा में कॅफेश्वर महादेव का पिंडा है...उन्हें तन मन धन से साधना कर उस पर बूँद बूँद गिराइए...हिंदी का ऐसा विद्वान् बनेंगे कि गणेश और सरस्वती आपके मुंशी हो जाएंगे...
        अब मुक्तिबोध और धूमिल पर अड़ी की बहस शुरू होती है..सुनाइए एसएस तिवारी जी।विचार प्रगट कीजिए कन्हैया पांडेय जी।
      अभिव्यक्त कीजिए शुक्ला जी मिस्र जी अध्याय जी उपाध्याय जी पांडेय जी शर्मा जी द्विवेदी जी दूबे जी त्रिवेदी जी त्रिपाठी जी तिवारी जी चतुर्वेदी जी चौबे पंजे जी छब्बे जी छक्के जी सत्ते जी सट्टे जी अठे जी....
      "मैं सुन रहा हूँ वीरेंदर सरदार
       हिंदी का गोल्ड मेडलिस्ट बेरोजगार!"

10 नवंबर, 2017

मालवीय चबूतरे पर गिरिजा देवी की याद में संगीत विमर्श

आज ठुमरी की मल्लिका अप्पा जी को  बीएचयू  के मालवीय चबूतरे पर अनोखे रंग और ढंग से याद किया गया।गिरिजा देवी की याद में 'संगीत और शब्द' विषय पर आयोजित चबूतरा चर्चा में कैम्पस,नगर और देश के
संगीत रसिकों और विमर्शकारों ने हिस्सा लिया।
    सुबह 8.20 पर गिरिजा देवी के फेन जुट चुके थे।बारी बारी से संगीत प्रेमी आते गए और मालवीय चबूतरे का विमर्श कारवां बढ़ता गया।जहाँ कैम्पस भर के विभिन्न विषयों के छात्र छात्राएं संगीत विमर्श के लिए  आए वहीं स्थानिक गुरुओं के अतिरिक्त मुंबई से मनोज भावुक,देवरिया से जनार्दन सिंह तथा नगर से प्रो सत्यदेव त्रिपाठी,वाचस्पति और आशीष पांडेय को संगीत विमर्श खींच लाया।
     
          संगीत परिचर्चा की अध्यक्षता वाचस्पति ने की तथा परिचर्चा संचालन चबूतरा संस्थापक डा रामाज्ञा शशिधर ने किया।
        बनारस घराने की शान और पूरब अंग की गायकी की पहचान गिरिजा देवी के गायन का गंभीर विश्लेषण
करते हुए संगीत समीक्षक डा आशीष पांडेय ने कहा कि
गिरिजा देवी ने ठुमरी को श्रृंगार और मनुहार से निकालकर विश्व भर में रूहानी दर्जा दिलाया।संगीत जगत में गिरिजा देवी संगीत का पर्याय हैं।गिरिजा देवी ने काशी की गलियों की क्रियोल भाषा में ठुमरी के बोल दिए वहीँ आम जीवन से लोकधुनों को चुनकर उन्हें राग
के रथ पर सवार किया।गिरिजा देवी ने ठुमरी को रागों का गुलदस्ता बना दिया।गिरिजा देवी के कंठ में अनूठी मिठास और खनक के मेल ने साहित्यिक अन्योक्ति के सहारे ठुमरी को अभूतपूर्व ऊंचाई दी।
      नाट्य समीक्षक प्रो सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि गिरिजा देवी ने ठुमरी में प्रेम,स्वप्न और भक्ति की ऐसी
त्रिवेणी बहाई जिसका दीवाना सदियों तक ज़माना रहेगा।गीतकार मनोज भावुक ने कहा कि गिरिजा देवी पूरबिया सेमिक्लासिकल की जड़ हैं जिनके बिना संगीत की नई पीढ़ी प्लास्टिक का फूल साबित होगी।भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि गिरिजा देवी में संगीतकार के भीतर
गुरू शिष्य परंपरा का एक आदर्श शिक्षक था।उन्होंने ठुमरी को भोजपुरी गीतों की अश्लीलता के बरक्स अध्यात्म का मार्ग दिया।जनार्दन सिंह ने कहा कि भोजपुरी की हाइटेक और अश्लील संगीत पीढ़ी को गिरिजा देवी से सच्चे संगीत और लोक की नई नई प्रयोगशीलता सीखनी चाहिए।
       अरुण तिवारी ने कहा कि जिस समाज में संगीत का विकास होता है वह संवेदनशील और लोकतांत्रिक
समाज बनता है।एथेंस से भारत तक इसके उदाहरण हैं।नेहा ने कहा कि गिरिजा देवी ने गुलाम देश में सामंती
परिवार से बाहर निकलकर स्त्री मुक्ति
की राह दिखाई।सम्भवतः गिरिजा देवी संकट मोचन के संगीत मंच पर क्लासिकल गायन करने वाली प्रथम स्त्री
कलाकार थी।पंकज कुमार ने कहा कि गिरिजा देवी चलती फिरती संगीत सभा थी।वे जितनी बड़ी गायिका थीं उससे बड़ी सम्बंधजीवी बनारसी संस्कृति थी।
      

09 नवंबर, 2017

सिमरिया घाट को धाम नहीं, गंगा ग्राम कहिए


जिस मिट्टी और माँ के आँचल में मैं पैदा और बड़ा हुआ देखते देखते वह लालचियों के अभिनय का केंद्र हो गई।मैंने अपने बचपन में नानी और माँ के सहारे कल्पवास और जीवन का शुद्ध आध्यत्मिक रूप देखा था।किसानी,किंवदन्तियों,साहित्य कलाओं और लोक की यह धरती  धीरे धीरे बाबाओं और उनके लालची भक्तों के जबड़े में आती गई।खेत पहले कल्पवास में बदले और अब बिना सिमरिया से पूछे उसे सिमरिया धाम में बदल दिया गया।हर बात के लिए मिथक गढ़ा गया और मीडिया का दुरूपयोग हुआ।   सिमरिया और उसकी गंगा को आध्यत्म से चुनावी राजनीति और  बाजार का केंद्र बनाने वाले दिमाग हमारे समाज और संस्कृति के दुश्मन ही माने जाएंगे।वे ही आस्था को भीड़ में बदलने और उसकी मौत के जिम्मेदार हैं।दुर्भाग्य है कि वे कहीं शुद्ध बाबा बनकर खड़े हैं और अनेक बार नेता समाजसेवी पत्रकार एनजीओ संस्कृति रक्षक बनकर सक्रिय होते रहे हैं।हजारों साल से सीने पर एक किसानी सभ्यता और सरल शांत जीवन को पालती हुई एक नदी,खेत और गाँव को रौंदने की यह कहानी किसान,नदी और गाँव की हत्या करने वाले परजीवी वर्ग को दोषी करार देने वाले अफ़साने के रूप में लिखी जानी चाहिए।मैं व्यक्तिगत रूप से भीड़ में हुई मौतों से दुखी हूँ लेकिन उस आडम्बर और नियति  का क्या करूँ जो नदी की लाश पर ढोल इस लिए पीट रहे हैं कि कोई कोमल और प्रकृति प्रेमी उसकी कराह न सुन ले।आप सब से अपील है कि फौरी सतही शब्द कारोबार को गहरे सरोकार में बदलते हुए शोर के भीतर की कराह और आह को सुने गुने और आगे बढ़कर हस्तक्षेप करें।@आग्रही गंगा व् सिमरिया पुत्र रामाज्ञा शशिधर

धूमिल की कविता केतली में खौलती चाय है

धूमिल जन्म सप्ताह आरम्भ
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पोई की अड़ी-1
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...यादों का एलबम का पहला पन्ना खुल गया...चौड़ी छाती,घनी मूँछ,ठहाकेदार चेहरा,गुस्सैल शब्द,होठ पर पुरबा,हाथ में साइकिल,डायल टायर,सौ जगह से फटे ट्यूब की चकती,सुलेसन और लंका से खेवली तक की फटी एड़ियों सी सड़कें...
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पीपुल्स हाउस,लंका!विश्व साहित्य की किताबों की कतार।एक रैक पर रखी रूसी किताब-मैक्सिम गोर्की और प्रेमचंद।जेब में पैसे नहीं।ललचाई आँखों से एक नौजवान घन्टे पर से देख रहा है।वह कौन है? धूमिल!
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2 घन्टे तक पोई की अड़ी पर शब्द और यादें बरसते रहे।
~~~~और फिर...
मालवीय चबूतरा और अस्सी चौराहा ब्लॉग की संयुक्त पहल द्वारा आयोजित धूमिल जन्म सप्ताह का आरम्भ पोई की चाय अड़ी अस्सी पर हुआ।'चाय,कविता और लोकतंत्र' बहस श्रृंखला हजारी की अड़ी,पप्पू की अड़ी,कल्लू की अड़ी,वीरेंद्र की अड़ी,संजू की अड़ी से होते हुए लंका की टण्डन चाय अड़ी पर समाप्त होगी।
      अड़ी के अक्खड़ कवि धूमिल पर बहस शुरू करते हुए डा दीनबंधु तिवारी ने कहा कि धूमिल बनारस की चाय की केतली से पैदा हुए कवि हैं। धूमिल की कविता का पानी हमेशा खौलता रहता है।उसमें कोयला जलता है,चीनी और चाय घुलती है,होठ पर फड़फड़ाते हुए हर्फ़ फैलते हैं।
      डा आशीष पांडेय ने कहा कि धूमिल अड़ी से मुहावरे उठाते थे और हर शब्द से संसद को कठघरे में डाल देते हैं।
       पत्रकार जय नारायण ने कहा कि धूमिल की कविता में अस्सी और बनारस की बोली बानी का लोक ठनकता है।
   बीएचयू के पूर्व छात्र नेता अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि धूमिल देहात को कंधे पर उठाए बनारस नगर के पॉलिटिकल टिपण्णीकार थे।
        प्रमोद राजर्षि ने कहा कि धूमिल की कविता के किसान से लेकर मोचीराम तक गुरुधाम की मजूर मंडी के कंकाल हो गए हैं।
      प्रो कन्हैया पांडेय ने कहा कि चायवाला देश का राजा नहीं अस्सी अड़ी का पोई ही हो सकता है।
       जन साहित्य प्रचारक प्रभुनाथ सिंह ने कहा कि धूमिल बनारस की सड़क नापने वाले संसद समीक्षक कवि थे।आजकल कमरे में बंद लेखकों को सड़क और जनता से जुड़ने का नुक्स धूमिल से लेना चाहिए।
     कार्यक्रम की अध्यक्षता धूमिल के मित्र वाचस्पति ने की और अड़ी संचालन आयोजन समन्वयक डा रामाज्ञा शशिधर ने किया।अंत में बनारस के प्रसिद्ध कथाकार मनु शर्मा को श्रद्धांजलि दी गई।

25 अक्तूबर, 2017

ठुमरी गायिका गिरिजा देवी बनारस संगीत घराने की आत्मा हैं


पूरब अंग की अप्रतिम आवाज़ कल खामोश हो गई।बनारस की गलियों घाटों से लेकर संकट मोचन संगीत समारोह तक ठुमरी कजरी चैती की ऐसी उपशास्त्रीय आवाज़ जिसे सुनने के लिए
एक पनेरी से लेकर पंडित तक बेकरार रहता था।8 मई 1929 को गुलाम बनारस में जन्मी गिरिजा देवी को हारमोनियम बचपन में ही मिल गया था।ज़मींदार रामानंद राय की यह संगीत
और स्त्री के संबंधों के प्रति बनारसी प्रगतिशीलता ही होगी कि 9 साल की नन्हीं बेटी के हाथों वाद्ययंत्र और होठों पर लोकगीत भरना शुरू कर दिया जो 24 अक्टूबर 2017 को अंतिम साँस के साथ ही छूट पाए।
         गिरिजा देवी बनारस के उपशास्त्रीय संगीत घराने की चलती फिरती प्रयोगशाला थीं।पुरबिया मिट्टी से लोकधुन और लोकगीत को चुनकर शास्त्रीय भट्ठी में तरासने का और उसे विश्व के संगीत पटल पर फ़ैलाने का उनका कार्य अनवरत चलता रहा।वे बनारसी ज़िंदादिली और सामाजिक कला की अनूठी मिसाल थीं।ठुमरी साम्राज्ञी के नाम से सुचर्चित अप्पा जी का गायन आगे आगे स्पेस बनाता था और पुरस्कार सम्मान पीछे पीछे लटककर अपनी विश्वसनीयता अर्जित करते थे।गिरिजा जी ने बीएचयू और आइटीसी रिसर्च अकादेमी कोलकाता में संगीत फेकल्टी के रूप में जितना बड़ा योगदान दिया उससे बड़ा योगदान भोजपुरिया लोकधुनों और लोकशब्दों को अनेक महान संगीत साधकों के सहयोग से राष्ट्रीय वैश्विक श्रोता वर्ग तैयार कर किया।बनारस घराने की कई पीढ़ियों का निर्माण गिरिजा देवी के हाथों हुआ है।    
            संगीत और शब्द के साधकों से अपेक्षा है कि वे गिरिजा जी के अनेक गीतों को फिर से सुनकर आएं और चबूतरा चर्चा में बनारस घराने की महान गायिका को अनूठी लोक श्रद्धांजलि दें।

17 अक्तूबर, 2017

अस्सी के चाय घर में इज्जत घर पर बहस


का गुरू?
हाँ गुरू!
कहाँ हउअन?
नजरबंद!
देश में या विदेश में?
हुकुलगंज की जेल में।
मुचलका के देहलस?
नेशनल पांडेय।
जमानत के लिहलस?
सेकुलर तिवारी
कौने ज्वाइन करोगे?लाल सफ़ेद या नारंगी?
भार में जाए दुनिया हम बजाइब हरमुनिया।चाय पार्टी ही ठीक हौ।
---और जोर के ठहाके से पहले छत हिलती है,फिर बेंच हिलती है,फिर गिलास हिलता है,फिर चीनी हिलती है,फिर होठ हिलते हैं,फिर जुबान हिलती है।अंत में दरबे के भीतर पूरा जहान हिलता है।
       पूरे तीन साल चार महीने सोलह दिन के बाद एक होनी घटना घटित हुई।ठीक 2 अक्टूबर के दिन मैं पप्पू चाय की दूकान पर पप्पू,मनोज और डब्बी के सैकड़ों ओरहन और आदेश के बाद गांधी बाबा को सुमरिते हुए पहुंचा। उम्मीद थी कि वे भूल गए होंगे।नजारा था कि वे इंतज़ार ही कर रहे थे।उन्होंने मुझे कोरियन बम की तरह या चीनी झालर की तरह या पाकिस्तानी आतंकी की तरह या जेनयू के कन्हैया कुमार की तरह घूरा और दाएं से बाएं की ओर ईशारा करते हुए बैठ जाने का निर्देश दिया।
कहाँ थे?
बीमार था।
कौन सा रोग हुआ था।
नमोफोबिआ!
ई कोई नया रोग बा?
जाँच में कुछ नहीं आया।
तो?
डॉक्टर ने कहा-कोई पुरानी जगह और साथी को लैक कर रहे हो।फिर से पकड़ लो।
आगे?
मैंने जवाब दिया-क्या पप्पू की चाय दूकान और नेशनल पांडेय
से वाद विवाद हो सकता है?
फिर डॉक्टर ने क्या कहा?
कहा-तुम तो खुद डॉक्टर हो।अंग्रेजी के चक्कर से बचो।हिंदी वाली ही चलाओ।
-अब समझ में आइल गुरु ई दरबा के महत्व।हर जगह मुह पे ताला लागल हौ,कैम्पस के महटर केवल पीएम के क्षेत्र  डेबिट क्रेडिट एटीएम से अकेले में एकालाप करत हौ।बाकी इहै दरबा
बचल बा जेकर कोई झाँट नहीं उखाड़ पैलन।
-लेकिन इहाँ तो कीर्तनिया ही बचे हैं।
-गुरू।उधर देख।सेकुलर तिवारी आ रहे हैं।
        हाथ में छड़ी।नाक पर चश्मा।पेंट पर थ्री पीस।धीरे धीरे शनिचरी चाल।जैसे 1942 में बलिया से चले और 2017 में बनारस पहुंचे हो।नजदीक आने पर पता चला कि बनारस में घूम रहे इनदिनों मुखौटा मोदी की तरह ई कोई सेकुलर उपाध्याय हैं।नए ही जमे हैं।किसी पुराने को उखाड़कर।
-मेरा जवाब-सेकुलर तिवारी की खोज में आया हूँ।बहुत सारे मुखौटेबाज सेकुलरों की तरह प्रो सेकुलर तिवारी भी मालवीय
चबूतरे से फरार हैं।टेंस के माहौल में कैम्पस की ऑक्सीजन तक छोड़ दी है।सुना है जब से राज्य का लॉ एन्ड ऑर्डर हिंदुत्व के हाथ में गया है उन्होंने गांधी से कम्प्लीट पल्ला झाड़ लिया है।
-हाँ।जब से पता चला है कि चाय में गाय का दूध ही पड़ता है बकरी का नहीं।सेकुलर तिवारी नेशनल पांडेय से बिदक गए हैं।
       बहस से इलाज जारी है।पहली चाय गांधीवादी।दूध वाली।सबने पी।दूसरी चाय दक्षिणपंथी।निम्बूवाली।सबने पी।तीसरी चाय वामपंथी।प्योर लिकर।ढाई ने पी।अंतिम दौर में कॉफी।पूंजीवादी।एक ने पी।
        एक ज़माना था जब कहवाघर मशहूर होता होगा।उन्हें सरकारों और बुद्धिजीवियों ने बारी से खत्म कर दिया।आजकल दो ही घर देश में मशहूर हैं।निकम्मे गपोड़ियों और बकैतों का पप्पू चायघर और नमो नमो का इज्जत घर।बाकी देश का बड़ा हिस्सा तिब्बती लामा या बर्मी रोहिंग्या के हाल में पहुँचाया जा रहा है।मैं कन्फ्यूज हूँ कि यहां मैं ईलाज कराने आया हूँ या लाईलाज होने।इसे चार्वाक पर छोड़िए।