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30 जुलाई, 2015

प्रेमचंद के घर में होरी का भविष्य

                              
                          रामाज्ञा शशिधर


जेनयू और समयांतर से निकलकर बनारस आने पर ऐसा लगा कि इंडिया की आँखों से भारत नहीं,भारत की आँखों से भारत को देखना ज्यादा जरूरी है. प्रेमचंद के घर में मरते हुए लाखों होरिओं की अंतर्कथा से से महरूम बुद्धिजीवियों की लापरवाही और यथास्थितिवाद ने मुझे हिला दिया. परिणामतः यह रिपोर्ताज. पंकज  बिष्ट का समयांतर में न केवल इसे छापना, न सिर्फ आत्महत्या करते किसान-बुनकरों को गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता सम्मान की एक लाख राशि राहत-रोजगार के लिए देना बल्कि बनारस और सारनाथ पहुंचकर जनबुद्धिजीवी की सच्ची भूमिका निभाना एक सार्थक कदम था. होरिओं,गोबरों,धनियायों,मतीनों,घिसूओं,बुधियाओं की आत्महत्या व सत्ता प्रायोजित हत्या जारी है इसलिए यह रिपोर्ताज भी प्रासंगिक है.इसे रिप्रिंट करनेवाली पत्रकारिता के हम आभारी हैं.


9 अगस्त 2006।
छाही का काश्तकार छोटेलाल होरी की तरह महतो नहीं, यादव था। था, मतलब अब इस संसार मेें नहीं है। और कुछ खाने पीने को जब नहीं बचा तो करो या मरो की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपनी धनिया को छोड़कर पूरे परिवार के साथ कीटनाशक घोल पी आत्महत्या कर ली। सिर्फ साल भर पहले यहां इसी तरह एक और किसान परिवार ने सामूहिक खुदकुशी की थी। छाही के साथ पूरा पूर्वांचल मौत के मुहाने पर है।

दैनिक हिन्दुस्तान के पूर्वांचली संस्करण में अगस्त 1942 की उपलब्धियों पर अंग्रेज कलक्टर नेबलेट का
धारावाहिक छप रहा है। पुरबिया किसानों ने किस बहादुरी से फिरंगियों के छक्के छुड़ा दिए तथा गांधी टोपी की लाज रख ली। मंगल पांडेय बलिया के बहादुर किसान पुत्र थे, वारेन हेस्टिंग्स को बनारसी गुंडों ने पानी पिला दिया, सैकडों किसानों को ब्रिटिश फौज ने नीम के पेड़ों से झुला दिया था, अकाल सामा्रज्यवादियों की सौगात था-आदि मुहावरों से पचर्,े अखबार, चाय-पान दूकान भरे पड़े हैं।

अस्सी का स्टेटमेंट है-यादव के राज में यादव की मौत। कोला का एजेंट, किसान का हितैषी है। दादरी और ददुआ मुलायम के लिए दोनों कामधेनु हैं। अमरसिंह के राजनीति में आने का ही कमाल है कि मुलायम की पहली च्वाइस ज्योति बसु से विपासा बसु हो गई है। मनमोहन मिनिस्टर नहीं मार्केटर हैं। पूर्वांचल आज यूपी का विदर्भ है, कल तेलांगना होगा। समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई।
15 अगस्त 2006।
ही पंचायत की ओर बढ़ते हुए बनारस से सारनाथ के बीच स्वाधीनता के साठवें साल में प्रवेश का उछाह पूरी धूमधाम से दिख रहा था। कटी हुई रंग बिरंगी फन्नियों, प्लास्टिक, रेशम और काटन के झंडो,ं फूलों पत्तियों से सजे सरकारी गैरसरकारी संस्थानों पर उपकार का गीत मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती ऐसे फब रहा था मानो बनारसी साड़ी पर सोने के बेल बूटे मढे हों। आसमान में पूरब से आते छिटपुट सूखे बादल के टुकडे़ ऐसी मुद्राओं में मौजूद थे जैसे परेड करते स्कूली बच्चों, सलामी देती फौज, बूट की सामूहिक धमक या फिर नीलगायों से बचने के लिए भागते हुए धनखेतों के सैकड़ांे टुकड़े हों।

फिर फिर गोदान
छाही लमही से लगभग पांच मील दूर बेलारी जैसा गांव है। छोटेलाल होरी से चार साल छोटा। दुर्गा भवानी पांच हजार आबादी वाले छाही के आठ पुरों में से एक पुर है जिसमें पांच सौ लोग रहते हैैंं। घर एवं पुर के लोग छोटेलाल को प्यार से छोटू कहते थे। होरी की तरह ही हंसोड़, दूसरेां के दुख दर्द में सहयोगी, तमाम परेशानियांे के बावजूद खुशमिजाज। हीरा और शोभा की तरह छोटू के भी दो भाई थे। पहले संयुक्त परिवार बाद में एकल। नारायण यादव पहले साधु हो गए, फिर शादी की, अब घर के सम्मुख दुर्गा भवानी का मंदिर बनाकर गृहस्थ संन्यासी का जीवन जी रहे हैं। किसी बरगद से ज्यादा सघन एवं तेजस्वी जटाएं। सिरी यादव भी खेती से उबकर्र इंट-गारे की मजूरी में लग गए हैं। छोटू के होरी की तरह तीन बच्चे थे। होरी के बैल की तरह एक परिया है जिसे बनारस से अधिया यानी बटाई पर लाया गया था। छोटू को होरी की तरह पांच बीघे जमीन थी। खेती के बर्बाद होते जाने, बैंकों, महाजनों और बीमारी के व्यूह में फंसकर तीन बीघे निकल गए।

होरी और छोटू की मौत या आत्महत्या या हत्या की प्रक्र्रिया, दिशा और परिणति में बहुत मामूली अंतर है। होरी किसानी से टूटकर मजदूर बना। छोटू आधा होरी, आधा गोबर एक साथ था। दोपहर तक वह अपने खेतों में सपरिवार किसानी करता था और शाम से 10 बजे रात तक बनारस जाकर पावरलूम मंे बिनकारी का काम करता था। बाद में बनारसी साड़ी के लिए बिटाई का काम करने लगा। चार साल से उसे गठिया होने के कारण एलोपैथ से लेकर नीम हकीमों तक ने चूस लिया।

मरजाद की चपेट में छोटेलाल भी आया। बड़े भाई नारायण भगत सहित मित्रों परिजनों से यह झिड़की मिलती थी कि तीन बीघे खेत बेच डाले और आज तक वह एक कमरे की पुश्तैनी मि़ट्टी की झोपड़ी मंें है। वह झोपड़ी भी कब धंस जाए पता नहीं। छोटेलाल सूदखोरों के चंगुल में पहले ही थे, एक बार फिर मरजाद की फिक्र कर पचास हजार रुपए बनारस के कबीर चौरा स्थित भूमि विकास बैंक से ले लिया। तीन कमरों का मकान अधूरा रह गया क्यांेकि बैंक और कर्जदार के बीच बिचौलियों की अंतहीन जेबें थीं।पटिया और गार्टर का कर्ज सिर पर ऊपर से हो आया। इस तरह सरकारी एवं गैरसरकारी महाजनों के मूल-सूद के पहाड़ के नीचे वह दबता चला गया।

छोटेलाल किसान था, इसलिए कायर और काहिल नहीं था। उसने खेती में कई जोखिम उठाए जो उसकी मौत में सहायक बने। पिछली बार उसने पालक की फसल लगाई। सारनाथ और पांडेयपुर मंडी के होते हुए भी पालक दो रुपए पसेरी भाव छू पाया। मजबूर परिया को घास के तौर पर खिलाना पड़ा। अपने परिवार को भूख से उबारने के लिए इस खरीफ में छोटेलाल ने बैगन की खेती एक बीघे में की। मानसून की दगाबाजी, आठ महीने से टांªसफर्मर जला रहने के कारण बंद बोरिंग, शारदा सहायक नहर के जलहीन पेट ने भंटा बैगन के खेत को झुलसाना शुरु किया। छोटेलाल की किसान बुद्धि ने सोचा था कि बाटी चोखा के शौकीन पुरबिया बाजार इस बार उसे थोड़ा उबाड़ लेंगे। जब छोटेलाल के लिए भंटा के पौधों पर महंगे कीटनाशकों के कई छिड़काव करने का पैसा नहीं रहा तो उसने पहले पांच हजार का महाजन से कर्ज लिया, फिर एक बीघे वाले दूसरे खेत की मिट्टी बेचनी शुरु की। शहर की कालोनी भरने के लिए यहां 20रु ट्रैक्टर मिट्टी बिकती है। छोटेलाल का खेत कलेजे काढ़ लिए गए खरगोश की लाश की तरह आज भी पड़ा है जिससे दो हजार रुपए की मिट्टी काट ली गई।

कई दिनों की फाकाकशी के बाद छोटेलाल मौत से एक दिन पहले ईंट गारा का काम करने बनारस शहर गया। जर्जर कमजोर ठठरी,, कई दिनों की भूख, चिलचिलाती सावनी धूप और्र इंट गारा ढोने की आदत नहीं होने के कारण काम के वक्त ही वह मूर्च्छित हो गिर पड़ा। होरी ऐसी हालत में लू से मर गया था जबकि छोटेलाल ने दूसरी सुबह सोच विचारकर सामूहिक खुदकुशी को चुना।

छोटेलाल ने भंटा में देनेवाले कीटनाशक खुद पीकर फिर तीनांे बच्चों को जबरन क्यों पिलाया ? इस बावत सवाल करने पर उसके पुराने लंगोटिया मित्र उमाशंकर यादव कहते हैं-यह असंभव घटना लगती हैैै। वह ऐसी माटी का था कि यह सोच भी नहीं सकता था। सुबह मेरे पास चाय और खैनी लेकर घर आया और घर बंदकर जबरन अपने बच्चों कौशल्या (12),तुसली (8),एवं दयालु(4) को जहर पिला दिया। शायद उसे आगे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था।

किसान छोटेलाल की सपरिवार आत्महत्या से जुड़े कई सवाल हमें परेशान करते रहे। क्या होरी की तरह वह साहसी नहीं था ? क्या होरी लू से बच जाता तो आत्महत्या करता ? क्या महाजन और बैंक के आतंक से छोटू दो बीघा काश्त बेचकर उबड़ नहीं सकता था ? क्या उसे यह डर था कि इस खेत के बिकने के बाद उसे अपनी बेटी कौशल्या को होरी की तरह रामसेवक महतो जैसे अधेड़ के हाथों बेचना पडे़गा ? क्या धनिया की तरह अपनी पत्नी के साहसी होने के कारण उसे खुदकुशी में शामिल नहीं किया ?

साधु काका नारायण भगत ने जिस बच्चे का नाम तुलसीदास रखा था, वह जहर खाकर भी बच गया। शायद तुलसीदास के मरने का समय अभी नहीं आया है। लेकिन दो सबसे बड़े सवाल हैं जो ढूंढ़ने अभी बाकी हैं। पहला, यह आत्महत्या थी, मौत थी या सŸाा एवं व्यवस्था द्वारा निर्मित परिस्थितिजन्य हत्या थी ? दूसरा, किसान छोटेलाल द्वारा की गई आत्महत्या के मात्र इतने छोटे और सरल कारण हैं ? हमें इन प्रश्नों की व्यापकता, जटिलता और गहराई में उतरना चाहिए।

महाजनी सभ्यता का नया दौर
छाही के दुर्गा भवानी पुर में ही पिछले साल जयचंद नामक किसान ने कर्ज और भूख से तंग आकर गर्भवती पत्नी और बच्चे सहित खुदकुशी कर ली थी। अगस्त महीने की तीन तारीख को बनारस जिले के एक किसान ने ऊबकर धोती से फांसी लगा ली। सात तारीख को एक और किसान ने आत्महत्या कर ली। अंतहीन सिलसिले की फेहरिस्त में तेईस को बलिया के एक किसान ने परिवार के चार सदस्यों सहित खुदकुशी कर ली। पूर्वांचल के जिलों में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब भूख से मौत या आत्महत्या नहीं होती है। इसमें उन शहरी बुनकरों की विराट मौतंे शामिल नहीं हैं जिनके भविष्य का कोई खेवनहार नहीं हैै। पिछले पांच सालों में पूर्वांचल में भूख से पांच सौ अधिक मौत हुई हैं जिनकी एक चौथाई आत्महत्या की है। बगल के बंुदेलखंड में चार साल में हुई 600 आत्महत्या का यहां कोई जिक्र नहीं है।

छोटेलाल छाही का यादव था। उस पंचायत में चालीस फीसदी आबादी यादव काश्तकारों की है। दूसरे नम्बर पर कोयरी काश्तकार हैं। पंचायत की पचास फीसदी आबादी 2 बीघे से कम जोतदारों की है। इसका मतलब यह हुआ कि बाकी तीस फीसदी भूमिहीन मजदूरों के अतिरिक्त पचास फीसदी काश्तकार भी मजदूर ही हैं। पंचायत प्रधान गीता देवी यादव के पास सर्वाधिक काश्त जमीन 15 बीघे हैं। प्रधानी और खेती पति संभालते हैं जो नौकरी पेशे में हैं। पंचायत प्रधान के पति महोदय का मानना है कि नौकरी की कमाई भी खेत खा जाता है। पंचायत के काश्तकार एवं भूमिहीन मजदूर बनारस शहर की मंडियों में रोज श्रम बेचने जाते हैं। पंचायत की सारी खेती मजदूरी के पैसे से जिंदा है। दलित स्त्री मजदूर खेतों में काम करती हैं जिन्हंे न्यूनतम मजदूरी 30 से 40 रु से संतोष मिल जाता है।

केवल छोटेलाल के मुहल्ले से सौ से अधिक साइकिलें बनारस शहर की नाटी इमली, बड़ी बाजार ,चौकाघाट, छिŸानपुरा, लल्लापुरा, चानमारी आदि जगहों पर पावरलूम चलाने जाती हैं। मुहल्ले के सरयू यादव बताते हैं कि शहर में चार से पांच घंटे ही बिजली रह पाती है। परिणामतः दो दिनों की मेहनत से एक साड़ी बनती जिसकी मजदूरी पचास रुपए मिलती है। छाही पंचायत के चिरई प्रखंड और बनारस मुख्यालय से सटे प्रखंडों के बुनकरों की रोजाना कमाई पचीस रुपए है। किसान बुनकरों की रोज की कमाई का अधिकांश अगर उसके खेत के टुकडे़ निगल जाएं तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उनके परिवार भोजन के नाम पर क्या खाते पीते हांेगे। पूर्वांचल के अन्य जिलों से सटे प्रखंडों के मजदूरांे की हालत और ज्यादा त्रासद है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बाद पूरा बिनकारी उद्योग ध्वस्त हो चुका है जिसका विवेचन यहां संभव नहीं है।

छाही पंचायत की तरह पूरे चिरई प्रखंड के किसान महाजनों और सरकारी बैकों की पूरी गिरफ्त में आ चुके हैं। दरअसल सूदखोरी यहां एकमात्र फलने फूलने वाला उद्योग या व्यापार है। सूदखोरी एक ऐसी नेटवर्क्रिंग है जिसके वेव से पूर्वांचल का कोई घर, कोई किसान, अलग नहीं रह सकता है।

बनारस के कबीर चौरा स्थित भूमि विकास बैैंक इस पंचायत का इकलौता कर्जदाता बैंक है जो यहां से
दस किलोमीटर दूर है। छोटेलाल पर भी इसी बैंक का पचास हजार मूल है। बैंक और पंचायत के बीच की दूरी ही बिचौलियों, सूदखोरों, दलालों के लिए चारागाह तैयार करती है। अनपढ़,़ अल्पसाक्षर, जटिल सरकारी नियमतंत्र से अनभिज्ञ किसानों के लिए बैंक के मैनेजर तक पहुंचना स्वर्ग के राजा तक पहुंचने जैसा है। कृषि, कृषि रोजगार एवं पशुपालन के नाम पर मिलने वाले कर्ज का मतलब है कि सूदखोर हर हाल में किसान के खेतों पर गिद्ध झपट्टा लगा सके।

भूमि विकास बैंक दरअसल इस इलाके के लिए भूमि विनाश बैंक साबित हुआ है। पंचायत के किसानों की एक स्वर से मांग है कि दो किलोमीटर की दूरी पर मौजूद काशी ग्रामीण बैंक को उनका कर्जदाता बैंक बनाया जाए। ऐसा संभव नहीं है। तब किसानों से लिया जानेवाला कमीशन कम हो जाएगा। पूरे पूर्वांचल की बैंकिंग संरचना कमोवेश ऐसी ही है।
खेत अब किसानों की नहीं, सूदखोरों एवं बैंकों की अघोषित स्थाई संपŸिा है। इस इलाके में और पूरे पूर्वांचल में सूदखोरों ने अपने अनुभव से इस धंधे के प्रसार और टिकाऊपन की रूपरेखा बना ली है। यहां औसतन एक सौ बीस प्रतिशत सालाना ब्याज पर किसानों को कर्ज मिलता है अर्थात एक सौ रुपए के बदले साल भर में दो सौ बीस रुपए वापस करना होगा। किसान अकसर बीमारी, मरनी, शादी विवाह एवं मंदी के सीजन में सूदखोरों से कर्ज लेते हैं। कुछ वर्षांे बाद ब्याज की मोटी रकम होने पर सूदखोर जमीन गिरवी रखवाकर किसानों को बैंक से कर्ज लेने में मदद करते हैं। दोतरफा सूद से त्रस्त किसानों पर बैंकांे द्वारा माइक कराकर पुलिस-अमीन के माध्यम से जमीन जब्ती की धमकी दी जाती है। अंततः किसानों को जमीन के टुकड़े औने पौने भाव बेचने पड़ते हैं। लेकिन इससे उन्हंे मुक्ति नहीं मिल पाती। यह प्रक्रिया चक्रा्रकार और चक्रवृ़िद्ध के तौर पर पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है।

छाही पंचायत में पांच हजार किसान हैं जिनमें एक सौ सदस्यों को सहकारी बैंकों से कर्ज मिला है। दरअसल यूपी में सहकारी बैंक व्यवस्था इतनी ध्वस्त है कि पिछले साल पचास फीसदी सूद में छूट की घोषणा के बावजूद वह पूर्ण गतिशील नहीं हो सकी है। सरकार की किसान विरोधी चेतना का पता इस बात से लग सकता है कि छाही पंचायत में अधिकांश किसान दो एकड़ से कम जोत के हैं। इसलिए सहकारी बैंक की राजनीति है कि दो एकड़ से कम रकबा वाले किसानों को कर्ज नहीं दिया जाए।

किसानों द्वारा खेत जल्दी बेचने, मोटे सूद पर कर्ज उठाने या आत्महत्या कर लेने के लिए सबसे सरल उपाय यह है कि तहसील अमीन, दारोगा एवं मैनेजर द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर पूरा गांव घुमाया जाए ताकि उनकी इज्जत-आबरू की मड़िया हो सके। महाजनी तंत्र मड़िया करने में माहिर और सफल है तथा किसान आत्महत्या करने में।

ए मौला तू पानी दे उर्फ सूखे की राजनीति
छाही और पूर्वांंचल के किसानों के दो नकली दुश्मन हैं-मानसून और सूखा। इनके दो असली दुश्मन हैं-सरकार और महाजन। सरकार, मीडिया और महाजनी ताकतों ने हमारा सारा ध्यान मानसून की तरफ पूरी राजनीति के साथ मोड़ दिया है। इन जटिलाताओं की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी हुई है।

धान का कटोरा और पूरब का पंजाब माने जाने वाले इस इलाके के मानसून, बादल और धान पर साठ के दशक में चकिया के कवि केदारनाथ सिंह ने धानों का गीत और बादल ओ जैसी मर्मस्पर्शी कविताएं लिखीं जिनमें मानसून ही धान के मुक्तिदाता हैं। सोनभद्र के युवा कवि श्रीप्रकाश शुक्ल की हड़पड़ौली कविता है जो मानसून की अगवानी के लिए सदियों से आजतक अर्द्धरा़ि़त्र में नग्न होकर हल चलानेवाली स्त्रियों के समाज की त्रासद कथा कहती है। बस्ती के कवि अष्टभुजा शुक्ल की कविताएं पुरबिया किसानों के सतरंगे दुखों से रंगी हैं।

मानसून के लिए स्त्रियों का नग्न होकर इंद्र के सामने भोग के लिए प्रस्तुत होना, तेंतीस कोटि देवताओं की यज्ञाहुति देना, पूजा-पाठ, गीतनाद, जुलूस, धरना, प्रदर्शन सहज बातें हैं। जुलूस निकालने वाली किसान कतारों का एक कातर गीत है- काल कलौटी, उज्जर राटी/ ए मौला तू पानी दे/ भूखे बैल,प्यासी बकरी/ ए मौला तू पानी दे। चार सालों के सूखा-अभियान के बाद इस बार इन्द्र ने जुलाई में डेरा डाला, फिर तंबू उखाड़कर चले गए।

छाही पंचायत के खेतों में दरारें हैं, धान के बच्चे आसमान को निहारते हुए असमय दम तोड़ रहे हैं। पंचायत की नहर, कुएं, बोरिंग में कहीं पानी नहीं है। ग्रामीण वेदी यादव बताते हैं कि हमारी हालत छोटू से अच्छी नहीं है। यही हालत रही तो पूरे गांव को बहुत जल्दी खुदकुशी करनी पड़ेगी।

सरकारी तंत्र छाही में पूरी तरह ध्वस्त,गैरजवाबदेह और भ्रष्ट है। किसानों का कहना है कि नहर अधिकारी पानी का गेट खोलते ही नहीं हैं। नहर विभाग के तहसील अधिकारी घूमते रहते हैं तथा दो फीट बरसाती पानी से किसी ने दस डलिया खेत में डाल दिया तो सिंचाई कर लग जाता है। पूरी पंचायत में मात्र एक सरकारी बोंिरंग है जो 1970 के आसपास लगी थी। सिंचाई विभाग से सेवानिवृत किसान राजदेव यादव का कहना है कि एक बोरिंग की सिंचाई का कमांड एरिया सौ एकड़ होता है लेकिन व्याहारिक तौर पर वह पचीस एकड़ पटवन ही कर पाता है। छाही पंचायत मंे हजार एकड़ से ज्यादा जमीन है। बोरिंग भी इन दिनों इसलिए बंद है कि लंबे समय बाद जब जला टांसफर्मर बदला गया तब मोटर तक बिजली ले जाने वाले केबल तार की किल्लत हो गई।

प्राइवेट बोरिंग नाम मात्र के हैं जिनके पास दोहरे संकट हैं-बिजली मात्र चार पांच घंटे मिलना और नहर में पानी नहीं आने से जलस्तर का नीचे भाग जाना। छोटूलाल की आत्महत्या किसानों के लिए शुभ हुई कि गांव में जिलाधिकारी आए। परिणामतः महीनों से जले टाªंसफर्मर को बदला गया। ट्रांसफर्मर बदलने के लिए बिजली विभाग द्वारा मांगी जा रही घूस तो बच गई मगर अब किसान से केबल तार जोड़ने के लिए घूस मांगी जा रही है। मतलब कि बोरिंग बंद है। पंचायत में पचास कुएं हैं जो सूखे पड़े हैं। बनारस जिले को पिछले साल नौ करोड़ रुपए तालाब खुदाई के लिए मिले ताकि बरसाती जलसंग्रह से इलाके का जलस्तर ऊपर बना रहे। किसानों का कहना है कि जरूरी जमीन रहते हुए वह तालाब पंचायत तक नहीं पहुंचा है। डीजल महंगा होने से पम्पसेट चलाना बहुत मुश्किल है।

किसान ज्यादा पानी पीनेवाले बौनी मंसूरी और सरयू-52 से बचते हुए कम पानी की जरूरत वाले पंथ -चार किस्में लगाते हैं लेकिन यह कोई सामाधान नहीं है। धान की किस्में भूख से लड़ने मंे अक्षम हैं। शारदा सहायक नहर के खाली पेट में दो तीन फीट बरसाती पानी है जो सेर दो सेर मछलियां बच्चों के झोले में रोज डाल देता है। बारह साल के अनिल मोची ने बंसी मे नन्हीं पोठिया फंसाते हुए कहा कि जब पानी ज्यादा रहे तो नहर में टेंगरा, वामा, चिहलवा, रोहू, पैना, चिनगा सहरी, झिंगवा ,डिंडा ,लपचा आदि मछलियां खूब आती हैं। हमलोग बेचकर सौ पचास कमा लेते हैं। हम मछली ले जाएंगे तो मां को सब्जी नहीं खरीदनी पडे़गी।

नहर में सालों भर पानी रहे तो इलाके की आधी समस्या खत्म हो जाएगी। दरअसल केन, टांेस, मगई जैसी बरसाती नदियों के बदले गंगा, सरयू, घाघरा, गोमती से नहरों का जाल निकालकर बिछा दिया जाए तो एक ओर सिंचाई और पेयजल का संकट दूर हो जाएगा वहीं महाजन और चुनावी दलों का धंधा चौपट हो जाएगा। धंधा जारी रहे इसलिए नहर में पानी का मंदा रहना जरूरी है।

सूखे की राजनीति से सरकार और महाजन दोनों खुशहाल हैं। सरकारी बोरिंग आवंटित नहीं करने का तर्क है कि पूर्वांचल में जलस्तर तेजी से गिर रहा है। सिंचाई का पानी निकालने से दस साल बाद यहां की आबादी के सामने पेयजल संकट पैदा हो जाएगा। मानसून नहीं है तो नदी सूखी है, नदी के कारण नहर सूखी है, नहर के कारण जलस्तर गिर गया है, जलस्तर गिरने से कुएं बोरिंग सूखे हैं, इस कारण खेत सूखा है और किसान भूखे हैं। किसानों की भूख महाजनों, बैंकों के लिए लूट और शोषण की औजार है, राजनीति के लिए चुनावी हथकंडा है।

इन दिनों पूर्वांंचल में सूखा सत्ता  के लिए सबसे मालदार फसल है।

लोकतंत्र का चौथा शेर
छाही को छोड़ते हुए हम जब सारनाथ की तरफ बढ़ रहे थे तो गांव के निकट बाजार में पांच सौ का नोट रेजगारी के लिए निकला। परेशानी, तनाव और दवाब से घिरी हालत में देखता क्या हूं कि नोट से अशोक स्तम्भ का चौथा शेर गायब है। मुझे लगा कि शायद सारनाथ के अशोक स्तम्भ में वह सलामत मिले। हम सब सारनाथ के पुरातत्व म्यूजियम आए। झिलमिलाती आंखों ने वहां भी चौथा शेर नहीं देखा। हालांकि लोकतंत्र के तीनों शेर अभी विश्राम की मुद्रा में अघाए हुए पगुरा रहे थे ।

बनारस की तरफ भागते हुए हम इस नतीजे पर पहुंच चुके हैं कि अहिंसा  और समता की विशाल बुद्ध मूर्ति  की नाक के नीचे से गायब चौथा शेर पूर्वांचल के गांवों कस्बों में बेफिक्र दहाड़ता हुआ रोज शिकार कर रहा है। वह अहिंसक शेर मानसून की आंखों में, नहरों के पेट में, महाजनों, सूदाखोरों की चेतना में, सत्ता  और राजनीति की आत्मा में, कारगिल के बीजों में, बैंकों के लॉकरों में, सरकारी तंत्र की फाइलों में प्रवेशकर चुका है जिसकी हिंसा का आखेट छोटेलाल जैसे किसान, छाही जैसे गांव, बनारस जैसे जनपद पूर्वांचल जैसा इलाका, उत्तर प्रदेश जैसे प्रांत और पूरे लोकतंत्र के हाशिए के अदृश्य समाज हो रहे हैं।

बुद्ध  के ज्ञान और धर्म को मौर्य के सुशासक अशोक ने चार शेरों में ढालकर विजय स्तम्भ बनाया था। चारों शेर बुद्ध के ज्ञान और धर्म को चतुर्दिक दिशाओं में फैलाने वाले जाग्रत चेतना, जाग्रत शक्ति के विराट प्रतीक हैं। चारों शेर बुद्ध के चार आर्य सत्यों-दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण संभव है, दुख निवारण के उपाय हैं-के समर्थ नियंता थे। चौथा शेर के लापता होने का मतलब बुद्ध के चौथे आर्य सत्य का अपहरण होना है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह शेर हम बुद्धिजीवियों के नजरिए और कलम में आकर चुपचाप बैठा है। अगर नहीं तो हमें बताना होगा कि होरी का भविष्य क्या है।

13 जुलाई, 2015

बनारस:हिन्दू घर में झगड़ा भारी

रामाज्ञा शशिधर   



बनारस आजकल दो हिस्सों में बंट गया है- काशी और क्योटो। काशी बनारस का नस्टेल्जिया है तथा क्योटो यूटोपिया। बनारस ’भोग मोक्ष समभाव’ का क्षेत्र भी माना जाता है। एक साथ भोग और मोक्ष का आनंद अपने उद्भवकाल से यहाँ मिलता रहा है। इस कसौटी पर वह आज भी खड़ा है। आप क्योटो में भोग का आनंद लीजिए, फिर काशी में मोक्ष की आकांक्षा की पूर्ति कीजिए। इस तरह पूरा बनारस पाया जा सकता है।
बनारस भारतीय संस्कृति और राजनीति का मनोवैज्ञानिक ’युद्ध क्षेत्र’ बन गया है। भारतीय राष्ट्र, भारतीय लोकतंत्र और भारतीय जनता की भावी किस्मत बनारस के ’रूपक’ और ’मिथक’ के सहारे लिखने की नई कोशिश मंडल, कमंडल और भूमंडल की राजनीति के साथ ही आरंभ हो गई थी। हालाँकि भूमंडल के एलपीजी सिलेंडरों की किल्लत यहाँ हमेशा बनी रहती है लेकिन एलपीजी माडल (लिब्रेलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन एवं

ग्लोबलाइजेशन) का प्रभाव 20वीं सदी के नब्बे के दशक से ही पड़ना शुरू हो गया।
उदारीकरण के साथ बनारस में एक नारा उछला- अयोध्या तो झांकी है/काशी मथुरा बाकी है। राम जन्मभूमि आंदालन से हर हर मोदी अभियान तक बनारस पर बासंती रंग गाढ़ा ही होता जा रहा है। यह सच है कि दक्षिणपंथ की राजनीति के लिए ’कसम राम की खाते हैं/हम मंदिर वहीं बनाएंगे’ नारे में एक नया वाक्य जनता ने जोड़ दिया है- ’पर तारीख नहीं बताएंगे’। लगभग तीन दशक से बनारस की गली, घाट, गंगा, नगर, गांव पर भाजपा की राजनीति और संघ की संस्कृति का कब्जा बढ़ता ही गया है। अब तक उसके पास केवल नस्टेल्जिक काशी थी, ’अच्छे दिन’ की राजनीति ने उसके साथ यूटोपियन क्योटो भी जोड़ दिया है। बनारस का पांच हजार साल पुराना ’गरूड़’ काशी और क्योटो के दोनों पंखों से भारतीय समाज और राजनीति में ’उग्र हिन्दुत्व’ एवं ’उग्र विकास’ की परेड धुन भर रहा है। मीडिया उसके लिए अंतरिक्ष है, संसद भवन मैदान है, संघ आशियाना है तथा पूरी भारतीय जनता इस परेड गान का खेत है। इस तरह अयोध्या की झांकी के बाद बाकी का युद्ध बनारस के सहारे लड़ा जा रहा है और भविष्य के लिए आख्यान सृजन जारी है।
मिथक का यथार्थ
बनारस इतिहास से ज्यादा मिथक है। बनारस के कई नाम हैं- काशी, आनंदकानन, वाराणसी आदि। इन नामों का मिथकीय अर्थ वैदिक काल से अब तक इसके यथार्थ पर हावी है। काशी नाम कास्य यानी सिक्के के कारण व्यापारिक है जो बाद में धर्म की पपड़ियों के नीचे दबता चला गया (मोतीचंद, काशी का इतिहास)। वाराणसी वरूणा और असि नदियों के मध्य का परिक्षेत्र था। आज असि सिर्फ नगर का कचरा ढोने वाला नाला है तथा वरूणा भी लगभग नाले जैसी ही है। बनारस के परिक्षेत्र में विशाल जंगल होने के कारण वह आनंद कानन था। आज शहर में खोजने से ही पेड़ मिले और ग्रामीण इलाकों से वे भूमि अधिग्रहण के कारण गायब हो रहे हैं। बनारस अपनी जीवंतता के अक्खड़पन, फक्कड़पन, खान पान, रईसी, ठंढ़ई, साहित्य-संस्कृति के कारण बनारस था। परिपाक रस। अब बनारस की अंतड़ियों में पेप्सी कोला की बोतल ही नहीं प्लांट तक घँस चुका है। एक नया नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से उछला है- क्योटो। बनारस के अन्य नामों की तरह यह भी भविष्य का यथार्थ न होकर मिथक ही है।

24 दिसंबर, 2014

बनारसी बुनकर:मोदी,मौत और मुर्रीबंदी

समयांतर,मासिक के दिसंबर,२०१४ के अंक में प्रकाशित यह रिपोर्ताज बनारसी बुनकरों की तबाही की व्यथा कथा है.

रामाज्ञा शशिधर

बनारस प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। बनारस हिन्दुओं की आस्था और बुनकरों की आर्थिक गतिशीलता का भी शहर है। वह अपनी सांस्कृतिक संरचना में श्लघु भारत जैसा जनपद है और प्राचीनता में रोम या एथेन्स जैसा। इस नगर और जनपद का रेशम, करघा और कपड़े के कारोबार से रिश्ता महात्मा बुद्ध के समय से है। जातक कथाओं में काशी के चीनांशुक का जिक्र मिलता है। फिलहाल बनारस बुनकरों की वर्तमान तंगहाली,तबाही और मोदी.घोषणा से अखबारों की सुर्खियों में है।

राजू बुनकर की फांसी की रस्सी 


राजू बुनकर के पिता और पुत्र 


नवम्बर के पहले सप्ताह में सांसद एवं प्रधानमन्त्री मोदी बनारस आए। हिन्दुओं और पर्यटकों का केन्द्र अस्सी घाट पर कुदाल चला. जयापुर गांव को गोद लिया गया तथा बुनकर व्यापार सुविधा केन्द्र का प्रेमचन्द्र के गांव लमही से कुछ ही दूरी पर बड़ा लालपुर में उदघाटन हुआ। जयापुर को आदर्श ग्राम बनाने के लिए एनजीओ, प्रशासन, नेता, उद्योग जगत के लोगों ने ऐसा अभियान चलाया है कि हर ग्रामीण पर चार विकासकर्ता सवार हैं. वहीं अस्सी घाट पर मोदी की कुदाल वाली जगह से पचास फीट नीचे तक रेत-मिट्टी गायब है। अस्सी घाट की पाताली सीढ़ी का आखिरी प्लेटफार्म झांक रहा है तथा जिला प्रशासन ने सुबह-ए-बनारस का आगाज करते हुए वेद मंत्र, संगीत, आरती, योग और पूजा पाठ की धूम मचा दी है। इस तरह काशी को क्योटो बनाने की पहली पहल शुरू हो गर्इ है। क्योटो कथा की व्यथा छोडि़ए क्योंकि यह अभी सिर्फ कागजी बाघों का जिम कार्बेट बन पाया है।

07 अक्तूबर, 2014

Corporate Captalism and future of Indian Damocracy

सिद्धार्थ वरदराजन




मोदी के लगातार हो रहे उभार का उनकी हिंदुत्ववादी साख और अपील से कुछ खास लेना-देना नहीं है जैसा कि उनके धर्मनिरपेक्ष आलोचक बता रहे हैं। मोदी आज जहां हैं—सत्ता के शीर्ष पर, वह इसलिए नहीं कि आज देश और भी सांप्रदायिक हो गया है बल्कि इसलिए कि भारतीय कॉरपोरेट-जगत हर दिन अधीर होता जा रहा है। प्रत्येक चुनाव-सर्वेक्षण जो उन्हें सत्ता के और नजदीक पहुंचता दिखाता है, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को नई ऊंचाई पर ले जाता है।



नरेंद्र मोदी किसका प्रतिनिधित्व करते हैं और भारतीय राजनीति में उनका उभार क्या बतलाता है? 2002 के मुस्लिम-विरोधी नरसंहार के बोझ में दबे गुजरात के मुख्यमंत्री के राष्ट्रीय मंच पर आगमन को सांप्रदायिक राजनीति के उभार के चरम के रूप में देखना काफी लुभावना है। निश्चित ही, संघ परिवार के वफादार और हिंदू मध्यवर्ग के एक व्यापक हिस्से में उनके प्रति अंधभक्ति एक ऐसे नेता की छवि के रूप में है जो जानता है कि ‘‘मुसलमानों को उनकी जगह’’ कैसे बतायी जा सकती है। इन समर्थकों के लिए, उनका उन हत्याओं के लिए जो उनके शासन काल में हुईं—प्रतीक रूप में भी माफी मांगने जैसा सामान्य से काम को भी मना करना, उनकी कमजोरी के रूप में नहीं बल्कि ताकत और मजबूती के एक और साक्ष्य के बतौर देखा जाता है।



इस पर भी, मोदी के लगातार हो रहे उभार का उनकी हिंदुत्ववादी साख और अपील से कुछ खास लेना-देना नहीं है जैसा कि उनके धर्मनिरपेक्ष आलोचक बता रहे हैं। मोदी आज जहां हैं—सत्ता के शीर्ष पर, वह इसलिए नहीं कि आज देश और भी सांप्रदायिक हो गया है बल्कि इसलिए कि भारतीय कॉरपोरेट-जगत हर दिन अधीर होता जा रहा है। प्रत्येक चुनाव-सर्वेक्षण जो उन्हें सत्ता के और नजदीक पहुंचता दिखाता है, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को नई ऊंचाई पर ले जाता है। फाइनेंसियल टाइम्स के एक नए लेख में, जेम्स क्रैबट्री ने अडाणी इंटरप्राइजेज में अभूतपूर्व वृद्धि को चिन्हित किया है—पिछले महीने इस कंपनी के शेयर मूल्य में सेंसेक्स में सिर्फ 7 अंक की वृद्धि के मुकाबले 45 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इसका एक कारण -एक इक्वीटी विश्लेषक ने एफ.टी. (फाइनेंसियल टाइम्स) को यह बताया कि निवेशक मोदी के नेतृत्व में एक ऐसी सरकार की आशा करते हैं जो अडाणी को पर्यावरणीय आपत्तियों के बावजूद मुंद्रा बंदगाह विस्तार की अनुमति देगा। विश्लेषक के शब्दों में—‘‘अत: बाजार कह रहा है कि मोदी और अडाणी की सामान्य नजदीकियों के परे, भाजपा शासन में इसकी मंजूरी मिलना कठिन नहीं होगा।’’



विस्तार के आयाम

‘मंजूरी’ शब्द सौम्य लगता है, पर वास्तव में यह मोदी द्वारा पूंजी के विस्तार की उस इच्छा को समायोजित करने की मंशा को दर्शाता है जो किसी भी रूप में चाहे (विस्तार करे)—जमीन में और खेतों में, ऊर्ध्वाेधर रूप में—जमीन के ऊपर और नीचे, और पार्श्वक रूप में—रिटेल और बीमा क्षेत्र को विदेशी निवेशकों की मांग के अनुरूप खोलने में। और यदि पर्यावरणीय नियम, आजीविका, क्षेत्र या सामुदायिक हित आड़े आते हैं तो सरकार को अपने समर्थन और सहायता से इनका रास्ता बलपूर्वक साफ करना होगा। यह वह ‘निर्णयात्मक’ वादा है जिसने मोदी को भारतीय- और वैश्विक—बड़े व्यवसाय में इतना पसंदीदा व्यक्ति बना दिया है।



देश के शीर्ष व्यवसायियों की निर्णय लेने में ‘अनिर्णयात्मक’ कांग्रेस के प्रति निष्ठा बदल कर क्यों और कैसे नरेंद्र मोदी के पक्ष में हो गई यह ऐसी कहानी है जो भारतीय राजनीति के आंतरिक जीवन की गत्यात्मकता को प्रतिबिंबित करती है। लेकिन बिना कुछ करे लाभ कमाना (रेंट-सीकिंग) और क्रोनीइज्म ने भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसा गहरा संकट पैदा कर दिया है की उदारीकरण से होने वाले तत्काल लाभ अपनी स्वाभाविक सीमा पर पहुंच चुके हैं। नव उदारवादी नीतियों और ‘लाइसेंस परमिट राज’ के अंत की शुरुआत के साथ किए सभी परिवर्तनों का मतलब था कि सरकार के नजदीक रही कंपनियों द्वारा बिना कुछ करे लाभ अर्जित करने का स्तर आसमान छूने तक पहुंच गया है। मद्रास स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स के एन एस सिद्धार्थन के तर्क के अनुसार ‘‘मौजूदा कारोबारी माहौल के तहत, अकूत धन अर्जित करने का रास्ता उद्योग-निर्माण के माध्यम से नहीं बल्कि सरकार के स्वामित्व के तहत संसाधनों के दोहन के माध्यम से ही संभव है।’’ भले ही नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) द्वारा अपनी रिपोर्ट में 2 जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाला के अनुमान कुछ ज्यादा हों , यह स्पष्ट है कि संसाधनों का तरजीही आवंटन कंपनियों के लिए लाभ का एक बहुत बड़ा स्रोत बन गया है अन्यथा उनका उत्पादन के माध्यम से लाभ ‘सामान्य’ से अधिक नहीं होता। इन संसाधनों में सिर्फ कोयला या स्पेक्ट्रम या लौह अयस्क ही नहीं, सबसे निर्णायक तौर पर —भूमि और पानी भी शामिल हैं। और यहां, मोदी की उस नई खुशनुमा दुनिया के प्रतिनिधि नायक गौतम अडाणी हैं, जिनका एक प्रमुख व्यापारी के रूप में उदय, खुद गुजरात के मुख्यमंत्री के उदय का दर्पण है।



कॉरपोरेट प्रशंसा की शुरुआत

जनवरी 2009 में ‘वाइब्रेंट गुजरात समिट’ में भारत के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से दो- अनिल अंबानी, जो गैस मूल्य निर्धारण के मुद्दे पर मुकेश अंबानी के साथ लड़ रहे थे, और सुनील मित्तल ने प्रधानमंत्री के रूप में मोदी पर खुला दांव लगाया। अनिल अंबानी को यह कहते हुए उद्धरित किया गया कि ‘‘नरेंद्रभाई ने गुजरात के लिए अच्छा किया है और यदि वह देश को नेतृत्व दें तो [कल्पना करें ] क्या होगा।’’ ‘‘गुजरात ने उनके नेतृत्व में सभी क्षेत्रों में प्रगति की है। अब, कल्पना करें कि देश का क्या होगा अगर उन्हें यह नेतृत्व करने का मौका मिलता है, … उनके जैसा व्यक्ति ही देश का अगला नेता होना चाहिए।’’ भारती समूह के प्रमुख मित्तल, जिनकी दिलचस्पी टेलीकाम में थी, का कहना था : ‘‘मुख्यमंत्री मोदी को एक सीईओ के रूप में जाना जाता है, लेकिन वह एक सीईओ नहीं हैं, क्योंकि वह वास्तव में एक कंपनी या एक क्षेत्र नहीं चला रहे हैं बल्कि एक राज्य चला रहे हैं और देश भी चला सकते हैं। ‘‘उस आयोजन में मौजूद टाटा ने भी मोदी की प्रशंसा की ‘‘मुझे कहना है कि आज गुजरात जैसा कोई राज्य नहीं है। श्री मोदी के नेतृत्व में गुजरात किसी भी राज्य के ऊपर, सिर और कंधे की तरह है।’’ फिर, ‘मंजूरी’ का सवाल उभर कर सामने आया। इकानामिक टाइम्स ने रिपोर्ट किया : ‘‘श्री टाटा ने भावुक होकर कहा कोई राज्य सामान्य रूप से एक नए संयंत्र को मंजूरी देने में 90 से 180 दिन लेता है लेकिन ‘नैनो के मामले में, हमें सिर्फ दो दिनों में जमीन और मंजूरी मिल गई थी।’’



नीरा राडिया टेप, टाटा और बदलता यथार्थ

दो साल बाद, 2011 वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में लच्छेदार भाषण-बाजी का सेहरा मुकेश अंबानी के सर बंधा, ‘‘गुजरात स्वर्णिम चिराग की तरह चमक रहा है और इसका श्रेय नरेंद्र मोदी द्वारा दिए जा रहे प्रभावी, जोश से भरे और दूरदर्शी नेतृत्व को जाता है। इस दृष्टिकोण को हकीकत में बदलने के लिए संकल्प और दृष्टि के साथ एक नेता हमारे पास है।’’ 2013 में, उनके नाराज चल रहे भाई की बारी थी। इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘अनिल अंबानी ने राजाओं के राजा के रूप में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित किया–’’ उन्होंने दर्शकों से अनुरोध किया कि वे मुख्यमंत्री का खड़े होकर जयजयकार करें। ‘दर्शक तत्काल तैयार हो गए।’ अन्य वक्ता जो वहां बोले उनमें शीर्ष उद्योगपति का शायद ही कोई नाम बचा हो। इस बार ‘प्रधानमंत्री मोदी’ मंत्र इसलिए नहीं दोहराया गया क्योंकि तब तक भारतीय उद्योग जगत अपना मन बना चुका था।



मुड़कर देखें तो व्यापार और राजनीतिक हितों के इस उभरते ताने-बाने में 2010 का नीरा राडिया टेप ड्रामा निश्चित रूप से एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। सीएजी द्वारा 2 जी घोटाले को नाटकीय रूप से बेनकाब किए जाने के ऐन पीछे राडिया टेप ने बड़े व्यापार, राजनेताओं, नीति निर्माताओं और यहां तक कि मीडिया के बीच के आंतरिक संबंधों को सार्वजनिक कर दिया। अब सार्वजनिक संसाधनों की लूट को रोकने में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीएजी के साथ आ जाने से यह स्पष्ट हो गया कि आसान ‘मंजूरी’ का युग अब समाप्त होने जा रहा था। यह लगभग वह समय था जब कॉरपोरेट इंडिया ने भारतीय कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार, जिसका उन्होंने दृढ़ता से समर्थन किया था और अब तक लाभान्वित हुए थे, पर ‘नीतिविहीनता’, ‘अनिर्णय’ और ‘अस्थिरता’ का आरोप लगाना शुरू कर दिया।



क्योंकि राडिया टेप में उनका नाम आ चुका था, इसलिए स्वाभाविक था कि रतन टाटा इस आक्रमण का नेतृत्व करते नजर आए। देश के सबसे बड़े समूहों में से एक के प्रमुख ने चेतावनी दी कि भारत पर एक बनाना रिपब्लिक (केला गणतंत्र यानी अस्थिर देश) बनने का खतरा है और सरकार पर प्रहार किया कि वह उद्योग के लिए अनुकूल वातावरण बनाए रखने में नाकाम रही है। शीघ्र ही प्रभावशाली दीपक पारेख, जो एचडीएफसी बैंक से जुड़े हुए हैं, ने भूमि अधिग्रहण और खनन पट्टों की मंजूरी अधिक मुश्किल होते जाने के कारण पूंजी के पलायन का हव्वा खड़ा किया। ‘‘एक के बाद एक व्यापारी आप जिससे बात करें’’, टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट दी, ‘‘वह अनौपचारिक तौर पर बतलाता है कि पहली बात यह है कि ‘सरकार ठहर गई है।’ नौकरशाहों, बैंकरों और हर एक को फैसले लेने में डर लगता है।’ अगली बात वह यह बताता है कि : ‘अब हम भारत में नहीं बल्कि विदेशों में निवेश करने की सोच रहे हैं।’’ केंद्रीय कृषि मंत्री और व्यापार जगत के मित्र शरद पवार ने भी विरोध के इस हल्ले में अपना स्वर मिलाया।



यह एक तथ्य है कि वर्ष 2009-10 की मंदी के अपवाद वर्ष को छोड़कर, भारत से बाहर की ओर निवेश बढ़ रहा है। कंपनियां विभिन्न कारणों से विदेश में निवेश करती हैं। कुछ संसाधनों जैसे कोयला या तेल के लिए ताकि वे यहां अपने उद्योगों को चला सकें, कुछ प्रौद्योगिकी के लिए या कुछ अधिक आसानी से संरक्षित बाजार तक पहुंचने के एक साधन के लिए ऐसा करती हैं। घरेलू बाजार में मुनाफे पर पाबंदियां भी एक कारण हो सकता है। हारून आर खान, भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर, ने चिन्हित किया है कि ‘‘कुछ विचारकों का मत है कि भारतीय कंपनियों द्वारा किया जा रहा विदेशी निवेश स्थानीय निवेश की कीमत पर है। पर कंपनियों के घरेलू निवेश शुरू करने में आ रही रुकावटों के प्रत्यक्ष कारणों में से एक नीति और प्रक्रियात्मक बाधाओं का हो सकता है।’’ लेकिन घरेलू निवेश में, विशेषकर घरेलू मांग और बुनियादी ढांचे में अल्प आपूर्ति से रुकावट आती है, विशेषकर इंफ्रास्ट्रकचर और घरेलू मांग में जो मूलत: सार्वजनिक निवेश और खर्च, निवेशक के विश्वास और आय के असमान वितरण पर निर्भर करते हैं जो कि जनता की खर्च करने की शक्ति को प्रभावित करता है।



कांग्रेस से मोहभंग की शुरुआत

मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान जब तक भारतीय अर्थव्यवस्था विकास की उच्च दर बनाए हुए थी, सबसे बड़ी भारतीय कंपनियां ‘सामान्य’ लाभप्रदता और ‘क्रोनी प्रीमियम’ दोनों का आनंद ले रही थीं। लेकिन 2008 में दोहरे असर एक ओर वैश्विक मुद्रास्फीति पर मंदी और ब्याज दरों के प्रभाव तथा राडिया घोटाला, सीएजी, जनमत, और 2009 के बाद एक अधिक सतर्क न्यायपालिका के संयुक्त प्रभाव ने इस आरामदायक आय के मॉडल को घातक झटका दिया। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा सहारा समूह पर लगाए आरोप और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवमानना के आरोप में इसके मालिक सुब्रत रॉय को जेल भेजना शायद इसका सबसे नाटकीय उदाहरण है कि किस तरह बड़े व्यापार के लिए मैदान बदल रहा है। यह निश्चित है कि मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री पी. चिदंबरम कॉरपोरेट सेक्टर में फैली इस बेचैनी के बारे में जानते थे और उन्होंने इस समस्या से आसान तरीके से निपटने के लिए निवेश पर कैबिनेट समिति बनाने और प्रमुख मंत्रालयों में जैसे पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और पर्यावरण एवं वन में अनुकूल लाभ (रेंट फ्रेंडली) परिवर्तन करने की कोशिश की। लेकिन यह भारतीय उद्योग जगत का कांग्रेस पार्टी पर पूर्व की तरह यथास्थिति बहाल करने की क्षमता का यकीन दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं था।



सांप्रदायिक से विकास पुरुष बनने की कहानी

यह आश्चर्य की बात है कि यही समय है जब भारत के संभावित प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का नाम एक सुनियोजित तरीके से सार्वजनिक बहस में प्रवेश करता है। कॉरपोरेट प्रायोजकों और साथ ही अपने मालिकों की व्यक्तिगत वरीयताओं द्वारा उकसाया बड़ा मीडिया मोदी के ‘स्वीकार्य बनाने’ की प्रक्रिया और उसके तार्किक निष्कर्ष तक के लिए हरकत में आ गए। बमुश्किल नौ साल पहले 2004 में केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार की हार में अहम भूमिका निभाने के लिए मीडिया द्वारा सार्वभौमिक रूप से गुजरात के मुख्यमंत्री और उसके नरसंहार रोकने में विफल रहने को स्वीकार किया गया था। अब समस्या यह थी कि भारत के उसी शहरी मध्य वर्ग को जो सांप्रदायिकता हिंसा से विचलत था कैसे समझाएं कि भारत की समस्याओं का हल मोदी के नेतृत्व में निहित है। यही वह प्रक्रिया है जिसमें ‘विकास के गुजरात मॉडल’ का मिथक सामने आया है। ‘‘आज लोग गुजरात में विकास के चीन मॉडल के बारे में बात कर रहे हैं, ‘‘ महिंद्रा एंड महिंद्रा के आनंद महिंद्रा ने 2013 के वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन को बताया। ‘‘लेकिन वह दिन दूर नहीं है जब लोग चीन में विकास के गुजरात मॉडल के बारे में बात करेंगे।’’



गुजरात में आंकड़ों की चालबाजी के बारे में बहुत कहा और लिखा गया है जो एक प्रशासक के रूप में मोदी के लंबे-चौड़े दावों का आधार है कि जिसने गुजरात को बदल दिया है। लेकिन इस प्रकार से अपने नेता की तारीफ में, कॉरपोरेट भारत अनजाने एक स्वीकारोक्ति कर रहा है : कि वे मोदी के सबसे ज्यादा भक्त उनके ‘चीनी मॉडल’ के लिए हैं। आखिर यह मॉडल क्या है? यह वह मॉडल है जिसमें भूमि, खानों और पर्यावरण के लिए ‘मंजूरी’ का कोई अर्थ नहीं है। जिसमें गैस के मूल्य निर्धारण के बारे में असहज सवाल नहीं पूछे जाते। भ्रष्टाचार के खिलाफ मजबूत संस्थागत कार्रवाई के लिए बढ़ता जन समर्थन, जो कि कांग्रेस के प्रति जनता के मोहभंग की जड़ में है, उसके विपरीत कॉरपोरेट भारत की ‘भ्रष्टाचार’ के अंत में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमारी सबसे बड़ी कंपनियों के व्यापार का क्रोनीज्म और किराए की तलाश अभिन्न हिस्सा बन गए हैं—यह एक तरह का ‘भारतीय विशेषताओं वाला पूंजीवाद है’—और वे इस व्यवस्था को एक निर्णायक, स्थिर और उम्मीद के मुताबिक तरीके से चलाने के लिए मोदी की ओर देख रहे हैं। वे एक ऐसा नेतृत्व चाहते हैं जो जब भी विरोधाभास और संस्थागत बाधाएं आएं उनका समुचित प्रबंधन करे। सांप्रदायिक भीड़ जो मोदी की भक्त है, उनके कॉरपोरेट समर्थकों के लिए एक अतिरिक्त आकर्षण है, बशर्ते नेता अपने साथियों को नियंत्रित रखने में सक्षम हो। यह कुछ ऐसा है जो अटल बिहारी वाजपेयी और यहां तक कि लालकृष्ण आडवाणी भी हमेशा कर पाने में सक्षम नहीं थे। नरेंद्र मोदी और अधिक निर्णायक व मजबूत इरादों वाले आदमी हैं। उन पर विश्वास किया जा सकता है कि जब कभी भी किसी संकट को दूर करना होगा तो वह यह कर सकेंगे।



पुनश्च : इस बीच समाचार आया कि एन.के. सिंह, जो नौकरशाह से राजनेता बने, जिनको रिलायंस के विषय में संसदीय बहस के क्रम को प्रभावित करने की कोशिश करते हुए राडिया टेपों पर सुना गया है, वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं।



अनु.: प्रकाश चौधरी

04 सितंबर, 2014

मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' पर पुनर्विचार

रामाज्ञा शशिधर 

*सभ्यता का हर दस्तावेज बर्बरता का भी दस्तावेज होता है। -वाल्टर बेंजामिन

*अचेतन ‘अन्य’ का विमर्श क्षेत्र है। – लाकां

यह मुक्तिबोध की अंतिम कविता अंधेरे में का पचासवां साल है। अंधेरे में कविता 1957 से 1962 के बीच रची गई, जिसका अंतिम संशोधन 1962 में हुआ तथा प्रकाशन ‘आशंका के द्वीप: अंधेरे में’ शीर्षक से कल्पना में नवंबर 1964 में हुआ। यह मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब भारत: इतिहास और संस्कृति का भी पचासवां साल है। ग्वालियर से 1962 में प्रकाशित होने और मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद जबलपुर न्यायालय द्वारा 1963 में किताब के प्रतिबंधित अंश हटाकर अतिरिक्त छापने के फैसले का यह पचासवां साल आशंका के द्वीप भारत के अंधेरे को ज्यादा विचारणीय बना देता है। यह अनायास नहीं है कि अंधेरे में की जब पचासवीं सालगिरह मनायी जा रही है, तब मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब पर कहीं कोई बहस नहीं है। शायद इसका जवाब भी अंधेरे में कविता में मौजूद है।
अंधेरे में फैंटेसी में निर्मित कविता है। स्वाधीनता के छियासठ और भूमंडलीकरण के बाईस वर्षों बाद भारतीय समय, समाज, सत्ता और राष्ट्र का अंधेरा फैंटेसीमय हो गया है। मध्यवर्ग का चरित्र ज्यादा पतित हो गया है। आम जनता से उसका लगभग संबंध विच्छेद हो गया है। सत्ता के साथ वह ज्यादा नाभिनालबद्ध है। बौद्धिक वर्ग पूर्णत: रक्तपाई वर्ग का क्रीतदास हो गया है। राष्ट्रवाद, वर्गचेतना, सर्वहारा, जनक्रांति आदि शब्द मध्यवर्ग के शब्दकोश से गायब हो गए हैं। पश्चिमी आधुनिकता और कॉरपोरेट पूंजी राष्ट्रराज्य से गठबंधन कर जनता के सामने तानाशाह की भूमिका में है। शीतयुद्ध समाप्ति के बाद रहा-सहा मार्क्‍सवादी संस्कृति चिंतन बासी कढ़ी में उबाल की तरह दिखता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा सभ्यतागत विनाश के आखिरी कगार पर विस्थापन, आत्महत्या, दमन और संघर्ष में संलग्न है लेकिन मध्यवर्ग और क्रीतदास बौद्धिक वर्ग का उससे किसी तरह का सृजनशील जुड़ाव नहीं है। वैश्विक सत्ता प्राकृतिक संसाधन और गांव-खेत के साथ मानव अचेतन के तिलस्मी इलाके पर भी उच्च तकनीकी संस्कृति के माध्यम से कब्जा कर चुकी है। अस्तित्व और चेतना का पूरा इलाका राजनीति, बाजार और भाषा के पाखंड एवं झूठ से पटा हुआ है। ‘अंधेरे की’ फैंटेसी ने रहस्य और जादू के जटिल खेल में पूरी सभ्यता को उलझा दिया है।
सभ्यता संकट के इस सर्वग्रासी दौर में ‘अंधेरे में’ कविता पाठकों के लिए एक नई रोशनी का काम कर सकती है। लेकिन हिंदी आलोचना के मठवाद और गढ़वाद ने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का अंधेरा और बढ़ा दिया है। दिलचस्प है कि हिंदी आलोचना के फैंटेसी जैसे कला रूप से भले संबंध नहीं हो, लेकिन ‘अंधेरे में’ जैसी कविता की आलोचना के क्रम में उसका फैंटेसीमय गड्डमड स्वप्नचित्र देखने लायक है। क्लासिक मार्क्‍सवादी और यथार्थवादी आलोचक रामविलास शर्मा के लिए इस कविता पर एक ओर विकृत मनोचेतना के रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सात्र्र के खंडित व्यक्तित्व के अस्तित्ववाद का। आधुनिकताबोध और नई समीक्षा से प्रभावित नामवर सिंह के लिए वहां भाषिक एवं साहित्यवादी अस्मिता की खोज है, वहीं स्थूल मार्क्‍सवादी प्रभाकर माचवे के लिए वह ‘गुएरनिका इन वर्स’ है। शमशेर के लिए यह कविता देश के आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रतापूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है तो कलावादी अशोक वाजपेयी के लिए ‘खंडित रामायण’। एक आलोचक को इसमें लंदन की रात दिखती है तो दूसरे कवि को जापानी फिल्म का जंगल। बात यहीं ठहर जाये तो गनीमत है। तिलस्मी खोह में कुहासा बढ़ाने के लिए हिंदी आलोचना की हांफती हुई युवा पीढ़ी मुक्तिबोध पर किताब लिखती है तथा मार्शल लॉ लगाने वाली शक्ति से पुरस्कृत होती है। यहां गाइड छाप पदोन्नतिमूलक समीक्षा की चर्चा करना व्यर्थ है जिसे हिंदी आलोचना में ‘कूड़ावाद’ के प्रर्वतन का श्रेय दिया जाना चाहिए। जितनी चेतना मध्यवर्ग की तथा फैंटेसी की टूटी बिखरी हुई नहीं होती है, उससे ज्यादा कविता की आलोचना की है। विचारणीय है कि व्यक्तिपूजा और कर्मकांड से ग्रस्त हिंदी मनीषा पिछले समय में नदी के द्वीप के अज्ञेय की जिस तल्लीनता से पूजा-पाठ कर थी, इस वर्ष से आशंका के द्वीप: अंधेरे में के कवि मुक्तिबोध का उसी सम पर भजन-कीर्तन शुरू कर चुकी है। ऐसी परिस्थिति में मुक्तिबोध की इस कविता की आलोचना आग में पूरी हथेली डालने जैसा काम है।

03 सितंबर, 2014

कबीर से उत्तर कबीर काव्य संकलन (साम्प्रदायिकता के विरुद्ध बनारस की कविता ) संपादक :रामाज्ञा शशिधर pdf

बनारस से जुड़े हिंदी उर्दू के इकतालीस कवियों की साम्प्रदायिकता के विरुद्ध कविताओं का अनूठा संकलन जरूर पढ़िए.कबीर,रैदास,भारतेंदु,ग़ालिब,फाएज बनारसी,गनी बनारसी,प्रसाद,त्रिलोचन,बेताब बनारसी,आफ़ाक बनारसी,नज़ीर,केदारनाथ सिंह,धूमिल,राजशेखर,गोरख पाण्डेय,ज्ञानेंद्रपति,अब्दुल बिस्मिल्लाह,रोशन लाल रोशन,रामेश्वर,जवाहरलाल कॉल व्यग्र,मूलचंद सोनकर,वशिष्ठ अनूप,बेतुक लोह्तबी,दामन लोहतबी,सलीम शिवालवी,अल कबीर,रामप्रकाश कुशवाहा,रामाज्ञा शशिधर,नीरज खरे,व्योमेश शुक्ल,पराग,ललित शुक्ल,राकेश रंजन,नईम अख्तर,अरमान आनंद,उपेन्द्र यादव विनय मिश्र,अजय राय,डा सरोज,वली गुजराती आदि...

https://drive.google.com/file/d/0B4iwECfp_wFfbExMOUxpVHlFdEVHb0R6S2x6bzJpZl9xZlhR/edit?usp=sharing

02 सितंबर, 2014

कबीर से उत्तर कबीर(साम्प्रदायिकता के विरुद्ध बनारस की कविता) :रामाज्ञा शशिधर

हिंदी उर्दू के इकतालीस कवियों-शायरों का दस्तावेज.मूल्य:चालीस रूपए:पृष्ठ 80 ,तानाबाना प्रकाशन,वाराणसी
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12 अगस्त, 2014

पहचानिए:प्रेमचंद और भ्रष्टचंद

गांव की डायरी
प्रेमचंद और  भ्रष्टचंद


रामाज्ञा राय शशिधर


हल की मूठ पकड़े होरियों और फावड़े चलाते हल्कुओं को प्रेमचंद और भ्रष्टचंद में फर्क की गहरी समझ है। वे प्रेेमचंद पर हमले को आजादी पर हमला समझते है। यही कारण है कि प्रेमचंद के पात्र और पाठक निर्मला को अपमानित करने वाले सी¬.बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला हजारों की भीड़ में जला सकते हैं और मृदुला मुर्दाबाद/निर्मला जिंदाबाद’ के नारे लगा कर आईना दिखा सकते है। प्रेमचंद के ग्रामीण पात्रांे और पाठकों ने भाजपा नेता मृदुला सिन्हा के गृहराज्य बिहार में 2,700 सेकेंड तक राष्ट्रीय राजमार्ग-31 का चक्कर लगाकर सी.बी. एस. ई अध्यक्ष के पुतले को नारों, जनगीतों, पर्चो, भाषणों तख्तियों के बीच फूंक दिया तथा गगन भेदी स्वर में दुहराते रहे कि ‘हमें प्रेमचंद चाहिए भ्रष्टचंद नहीं। गांव के लोगें में ‘दो बैलों की कथा’ वाले प्रेमचंद कितने रचे बसे हैं यह इस बात से साबित होता है कि पांच किलोमीटर की जुलूस-यात्रा में होरी, हीरा, झूरी, हल्कू, गोबर, शंकर, घीसू, हामिद, वंशीधर, निर्मला, धनिया जैसे अनगिनत पात्रों के हाथों में तख्तियां और होठों पर नारे लहरा रहे थे-प्रेमचंद पर अत्याचार/नहीं सहेगा गांव-ज्वार, प्रेमचंद पर हमला यानी स्वतंत्रता पर हमला, हम हैं छात्र मजदूर, किसान/ हम बदलेंगे हिंदुस्तान, प्रेमचंद का यह अपमान। नहीं सहेगा हिंदुस्तान, सीबीएसई मुर्दाबाद, सांस्कृतिक क्रांति जिंदाबाद! यह सब दिल्ली के आईटीओ पुल पर में मिनरल वाटर पीकर पचास वर्षो से’ अबाध क्रांतिकारी स्पीच’ देने वाले बौद्धिकों द्वारा या जनता और जनकला की रोज हजार कसमें खाने वाले राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगठनों द्वारा नहीं बल्कि बेगूसराय जनपद के ठेठ गांव सिमरिया की छोटी-सी संस्था’ ‘प्रतिबिंब‘ के बैनर तले लगभग महीने भर के जन अभियान के बाद संभव हो पाया था तथा हिंदी पट्टी की संभवतः ऐसी पहली कोशिश थी। यह जानना दिलचस्प होगा कि गोदान, मैलाआंचल और रागदरबारी के बाद के गांव द्वारा यह सब हुआ कैस। जब गांव के कान मे यह हवा पहुंची कि प्रेमचंद के साथ केंद्र सरकार ने अन्याय किया है तो लोग थोड़ा हिले डुले, फिर सुस्त हुए। प्रतिबिंब के सांस्कृतिकर्मियों ने एक गोष्ठी की ‘प्रेमचद पर हमलाः दुश्मनों की खोज।’ इसके साथ ही जन आंदोलन की रूपरेखा बनाते हुए किसानों, मजदूरों, छात्रों के बीच एक सरल पर्चा जारी किया गया जिसमें लिखा कि ‘आज प्रेमचंद के पन्ने ही हमारे चौपाल हैं। प्रेमचंद के लिए लड़ने का मलतब है होरी जैसे उन करोड़ों किसानों के लिए लडना जिनकी दुश्मन सामंती ब्राहमणवादी व्यवस्था, सरकार और डंकन-अमरीका है। क्या अब प्रेमचंद का कद इस देश में मंत्री पत्नी जितना हुआ।’ पंचों में सांस्कृतिकर्मियों ने पांच कसमें खाईः ‘वर्ष 2003 को हम प्रेमचंद वर्ष के रूप में मनाएगें। सी.बी.एस. ई को निर्मला को पाठयक्रम में ससम्मान लगवाने की कोशिश करेंगे। हम सांस्कृतिकर्मी मानसरोवर की 300 कहानियों का एक साल में पाठ करेंगे। गांव गांव जाकर प्रेमचंद की कहानियों का सार्वजनिक पाठ करेगें। इन कामों की शुरूआत 30 जून, 2003 को राष्ट्रकवि‘ दिनकर की जन्मभूमि से सी. बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला दहन कर यथावत शुरू कर दी गयी है। पुतला दहन कार्यक्रम और जुलूस यात्रा के लिए जब डेढ. दर्जन किसानों के बेटों ने गांव-गांव घूमना शुरु किया तो सामान्य जनता बुद्धिजीवियों के बीच सबसे बड़ी दीवार भाषा की आई। हमने कहा कि प्रेमचंद पर हमला सी.बी.एस.ई ने किया। उन्होंने समझा सी.बी.एस. ई यानी सी.बी. आई। ’क’ ने कहाः हां भाई, सी. बी. आई भी भ्रष्ट हो चुकी है। ’ख’ ने पूछा सी.बी.एस. ई किस जानवर का नाम है ? पर सबने माना, अच्छा, बौआ! प््रेमचंद नामक लेखक पर हमला अन्याय है, पर हुआ कैसे ? और एक नई भाषा की खोज हुई। ‘आपके बाल-बच्चे स्कूलों में जो किताबें पढ़ते हैं उन्हें भारत सरकार का परीक्षा लेनेवाला विभाग बच्चों की जरूरत के मुताबिक बनाता है। पूरे देश की 12 वीं कक्षा से उस विभाग यानी सी.बी. एस.ई केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने महान कहानीकार प्रेमचंद की किताब हटाकर मुजफरपूर जिले की भाजपा नेता मृदुला सिन्हा की किताब लगाई है। देश के लेखकों द्वारा विरोध करने पर अब आपके बच्चों को दोनों में एक किताब पढ़नी होगंी। जरा सोचिए ! प्रेमचंद की जीवनी और कहानी की जगह आज की नेता की जीवनी और कहानी पढ़े ंतो आपके बच्चे क्या बनेंगे’। बस क्या था। गांव-गांव आग सुलग उठी। गले में नारों लिखी तख्तियां टांगे जिधर से अभियानी गुजरते छात्रांे, मजदूरों, किसानों, महिलाओं के चेहरे पर आक्रोश, असंतोष, बेचैनी, असुरक्षा। सीमाएं तोड़ देते एक स्वर से आवाज गोलबंद होती, प्रेमचंद पर अत्याचार/नहीं सहेगा गांव जवार। क्या कोई आंदोलन बिना विरोध-अंतर्विरोध के ही चरम पर पहुंचता है् ? नहीं! ‘च’ बाबू की मान्यता थी कि कोई चुनावी राजनीति है।‘छ’ साहब ने कहा क्या फर्क पड़ता है कि प्रेमचंद जगह नए लोग पढ़े जाएं। ‘ज’ ने कहा क्या डा. प्रेमचंद पर हमला हुआ ?‘ट’ का स्वर था-बड़ जुल्मी छै इ सरकार । मार-काट अ महंगाई एकर प्रान छीकै। ‘ठ’ का साफ कहना था-जब लालू की जीवनी पढ़ाई जा रही थी तब आप कहां थे ? ‘त’ ने कई स्कूलों को भड़काया-यह लाल झंडा वाला है। ’द’ ने दांत गड़ाया -भैया यह सब नाम कमाने का धंधा है। ‘प’ ने पटाखा छोड़ा-सिमरिया की आवाज आज तक दिल्ली नहीं पहुंची तो अब क्या पहुंचेगी ? ‘म’ ने मक्खन मारा-हां, यार! गंाव में चिल्लाने से सरकार क्या किताब बदल देगी ? यह सब बैठारी की दिहाड़ी हैं। दूसरी ओर सकारात्मक उफान भी था। ‘र’ किसान ने मूंछ हिलाई- एं, ऐसन बात! बाबू इ दिनकर की धरती है। एक फूंक मारों तो अंगंरेज को उखाड़ा। दूसरा फूंक मारा, इ सरकार को उखाड़ों।‘ल’ ने गीत गाया -मानव जब जोर लगाता है। पत्थर पानी बन जाता है। ‘स’ ने हंुकार- सच कहता हूं। ऐसा कुछ भी होता तो मेरा शरीर थरथराने लगता है। मुझे लगता है कि देश के लिए कुछ करना चाहिए। यह सिमरिया गांव का 32 वर्षीय किसान तरूण कुमार है। कसहा, बरियाही, अमरपुर, रुपनगर, गंगाप्रसाद, बारो, गढ़हरा, मल्हीपुर,बडहिया, चंदन टोला, चकिया, बीहट सहित अनेक गांवों मंे लंबे समय तक भूखे-प्यासे, धूप-बरसात से लड़ते किशोर साथी दौड़ते रहे। मुहाने पर पहुंची क्रांति को नेतृत्व नहीं जनता अंजाम देती है। 30 जून के 10 बजे जब पुतला दिनकर द्वार पर जुलूस यात्रा के साथ पहंुचा तो दूसरे अनेक गांवों की जनता हजारों की संख्या में जुटी थी। तय था कि राष्ट्रीय राजमार्ग  की बगल में  ‘सदगति’ का पाठ, भाषण एवं जनगीतों के बाद पुतला जलाया जाएगा। जनता का परावार उमड़ा और सैकड़ों लोगों ने नेतृत्व की उपेक्षा कर राष्ट्रीय राजमार्ग को जामकर पुतला स्थानांतरित कर दिया। फिर सारी गतिविधियां 2,700 सेकेंड तक वहीं चलती रहीं। अगले दिन हिंदुस्तान ने खबर लगाई  निर्मला को लेकर जलाया गया सी.बी.एस. ई का पुतला। दैैकिल जागरण का शीर्षक था सी.बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला फूंका। और आज ने लिखा ‘सी.बी. एस. ई के अध्यक्ष का पुतला दहन’। अनेक क्षेत्रीय पत्रों में भी खबरें आती रहीं। प्रतिदिन संस्कृतिकर्मी गांव-गांव जाकर प्रेमचंद की कहानियों का पाठ करते है। प्रेमचंद के पात्रों एवं पाठकों से इस पर राय ली जाती है। अब तक ‘सदगति’ ‘ठाकुर का कुआं’ ’सवा सेर गंेंहूं’ का पाठ हो चुका है। साथ ही जनपद के कवि दिनकर की क्रांतिकारी कविताओं का पाठ भी जारी है। लोग चौपाल में घेरकर अपने प्यारे-न्यारे कथाकार की कहानी चाव से सुनते हैं। हजार से अधिक हस्ताक्षर जमा हो चुके है। जानिए कि निर्मला के समर्थन एवं मृदुला के विरोध में अनेक ग्रामीण भाजपा कार्यकर्ताओं ने सहर्ष हस्ताक्षर किए क्योंकि प्रेमचंद उनकी आत्मा में रचे-बसे हैं।  ‘स’ को पता भीं है कि दिल्ली के राजेंद्र सभागार में आग और धुआं पर्चे के रूप में बंट चुका है। दिल्ली की दीवारों पर चिपक चुका है। उसे यह भी पता नहीं प्रेमचंद राष्ट्रीय संगोष्ठी में शेखर जोशी जैसे कथाकार ने चार मिनट तक उनके इस कार्य की सराहना की है।‘स’ नामक ग्रामीण किसान को कितना दुख होगा कि दिल्ली के बुद्धिजीवी जनता के ऐसे आंदोलन को ’स्पीच’ सुनने के दरम्यान चूतड़ों के नीचे दबा देने के कितने बड़े उस्ताद हैं। एक ही उम्मीद है कि होरी और हामिद एक