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22 फ़रवरी, 2021

सेल्फी शूटर वाली काशी में फ्रीडम फाइटर की खोज

©रामाज्ञा शशिधर
■【काशी के घाट आज़ादी के दीवानों के हैं!
                                  ...सेल्फी शूटरों के नहीं!】■
【तिरंगा बर्फी का बना रस】
 दिल्ली से दूर!
       बनारस का भदैनी घाट!भदैनी यानी भद्रवन।भद्र ही भद्र लेकिन पेड़ का नामोनिशान नहीं।    हर तरफ विंध्य की पुरानी गुलाबी चट्टान!चट्टान से बनी राजतंत्र की याद दिलाती विशाल हवेली।।मोक्ष की राह दिखाती चट्टान से बनी सीढियां।साधना प्रांगण का आभास कराता चट्टान का प्लेटफॉर्म।
       सामने गंगा के तट को चूमती गंगा की किशोर लहरें!बाएं अहिंसा के दिगम्बरों के ऊंचे खिले मंदिर गुम्बज!दाएं ब्रिटिशराज के जुल्म और शोषण की की दास्तां 'राम हल्ला' सुनाता इतिहासवाचक जलकल ! सम्मुख नदी की लहर पर खेलती आदिम डोंगियां,कटर,नाव,बोट,बजरा।पीछे की अछोर गलियों से निकले नन्हें धागों की अनगिन पतंगों की ओट में छुपता हुआ थका मांदा सांझ का सूरज!
       और अब शुरू होता है गणतंत्र का बना हुआ रस!
  सामंती हवेली के जर्जर सीने पर गणतंत्र की तीनों रंगीन उंगलियां धंस गई हैं।राजतंत्र की दीवार लोकतंत्र के विराट तिरंगे से ढंक दी गई है।उसके आगे का पहला प्लेटफॉर्म थियेटर में बदल गया है।अनेक सीढ़ियों के बाद दूसरा प्लेटफॉर्म दर्शक दीर्घा-1 है और गंगा का जल आंगन दर्शक दीर्घा-2।
        रंगमंच पर मुहल्ले की बाल छात्राओं का नृत्य राष्ट्रीय गीतों की धुन पर घण्टे पर चलता रहा।मैं मंत्रमुग्ध गहरे रोमांच और सोच से भरा हूँ।कौन हैं ये कलाकार लड़कियां?कहाँ से आती है इनके भीतर कला की बारीकियां?कितना जानती हैं यह लोकतंत्र को,आज़ादी को,अतीत और भविष्य को?
     

  बगल की आसमान छूती सीढ़ियों पर दर्शकों की गली वाली भीड़ है।
     किसी की माई जो दिनभर किसी तोंदू महंथ के घर में हाड़तोड़ बर्तन पोछा कर लौटी है।किसी की बहन जो अभी फूल दीप बेचना बंदकर देशभक्ति का दीया जला रही है।किसी का बाप जो पतंग,धागा,कचालू बेचना रोककर अपनी नन्हीं पतंग को दिल के आसमां में उड़ा रहा है।किसी का नशेड़ी दादा जो भंगियाई नेत्रों से त्रिलोक निहार रहा है।
     सामने नए लवर्स झुंड जो पाखंडी पंडों,जातिवादी गुंडों और नीरस महंतों को साइबेरियन बर्ड में संक्रमित बर्ड फ्लू के डर जैसा लग रहा है।
      हर कोई रुककर देख रहा है-बाल गणतंत्र का बनारस!लेमन वाला,चना वाला,लाय वाला,गुब्बारे वाला,फूल वाला,गमछा वाला,लंगोट वाला,जिंस वाला,कैप वाला,शूटिंग वाला,वोटिंग वाला,सेल्फी वाला,हेल्पी वाला,जनेऊ वाला,शंखवाला,चिलमवाला,कंठीवाला, गाउल, खोटर, जेबकतरा,कुत्ता और बकरा।हर कोई राष्ट्रगीतों की धुन पर गणतंत्र हो रहा है।
        मेरा गहरा मानस सोच रहा है।इन नन्हीं कलाकारों के लिए आज़ादी का क्या मतलब है?उनके लिए उड़ती हुई पतंग,निडर बहती हुई धारा, हवा से खेलती रोशनी,लहर से खेलती डोंगी,जाल से दूर नाचती मछली,रेत इतना बड़ा लाल सूरज,आसमान छूती हवेली की छत,सीढ़ियों पर मुहल्ले के खेल,लाखों टिमटिमाते मिट्टी के दीये।ये सब आज़ादी और उमंग हैं।नन्हीं जान में उगते नन्हें स्वप्न हैं।
        क्या खिलन और उड़न की उम्र में चूल्हे की आग से बहुत भारी जलते हुए मसान की आग नहीं होती है!क्या मोक्ष की आग बनारस के बचपन की कीमत पर खड़ी और बड़ी नहीं है!
     क्या कुछ दिनों में ये लड़कियां  बालपन की आज़ादी भूलकर मसानी लिबर्टी के बोझ तले नहीं दब जाएगी!मुझे लग रहा है कि बनारस का हल्का छोर पतंग और भारी छोर मसानी अग्नि है।
        इन दोनों के बीच बनारस रहस्य का पिटारा है,सच का फरेब है।
        

       इन लड़कियों के लिए अभी गणतंत्र पतंग में उलझी रोटी की तरह है जिसको किसी धारदार मंझे से काटना है और आपस में तोड़कर बांटना है।फिलहाल तो गणतंत्र का गीत बज रहा है।
        नाम राजकुमार!चेहरा प्रजापुत्र!बदन पर इतना मांस कि खुद का बोझ भी हल्का लगे।आत्मिक काम किसान के बीजों से बुद्ध से लेकर बुद्धिदेव तक के चित्र उकेरना;रामलीला से लेकर रासलीला तक के लिए उत्सवों का शिल्प गढ़ना।सांस्कृतिक काम सैकड़ों बाल कलाकारों को रंगमंच देना।
     राजकुमार जी को हमलोग प्यार से दिव्यांग रंगकर्मी कहते हैं।वे एक पांव से विकलांग हैं।यह सब उन्हीं का करिश्मा है।
         रंगकर्मी राजकुमार  सेल्फी दौर में हेल्पी जर्नी कर रहे हैं।
      काशी के घाट 2014 के बाद अध्यात्म,शांति,साधना,खोज,आत्मशोध,विरेचन को रौंदने के घाट होते जा रहे हैं।।  

          जितने बड़े बुलडोजर बनारस की देह पर चल रहे हैं उनसे ज्यादा बड़े उसकी आत्मा पर दौड़ाए जा रहे है।
        वॉकिंग,टूरिंग,पिकनिक,सेल्फी शूटिंग,हंटर्स हूटिंग, चेकिंग,सर्विलांस,एलीट अधिकारियों की बूस्टिंग,सेलिब्रटी लीडर्स की वोट बैंक एडवरटाइजिंग,नकली बाबाओं की जम्पिंग रैम्पिंग के बाजार हो रहे हैं।
     हर घाट एक भोंपू है और हर तथाकथित दबंग एक व्यास।
      बोट कम्पनी से लेकर आरती के इवेंट मैनेजर तक हर कोई हॉर्न से चीख रहा है।मानो मृत गंगा को सती की आग में डालने के पहले का नागड़ेदार उत्सव हो रहा हो।
     तब सोचता हूँ राजाओं,जमींदारों,बनियों और भिखारियों द्वारा सम्मिलित रूप से गढ़े हुए नगर की नन्हीं लड़कियां नगर की जंगे आज़ादी के बारे में कितना जानती होगी।
     

        क्या वे जानती हैं कि यह नगर वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ 1781 के चेत सिंह के संघर्ष का है;यह नगर 1857 में फांसी पर लटका दिए गए सैकड़ों किसानों और साधुओं का है;यह नगर बनारस षड्यंत्र केस के हीरो शचीन्द्रनाथ सांन्याल का है;यह नगर महात्मा गांधी के असहयोग प्रयोग का है;बालक चंद्रशेखर के आज़ाद बनने का है;गदरची रास बिहारी बोस और काकोरी कांड के शहीद हीरो राजेन्द्र लाहिरी का है ;यह नगर स्वतंत्रता के अगुआ मालवीय, विष्णुराव पराड़कर,शिव प्रसाद गुप्त,भगवान दास और राजनारायण का है!
    यह नगर  बेनी पैनी जैसे गद्दार बनियों पंडितों का ही नहीं बल्कि अनगिन देशभक्तों का है।कहानी लम्बी है...
     मैं इस आयोजन का मुख्य अतिथि हूँ।मुझे बाल कलाकारों को तिरंगा के तले पुरस्कार ही देने हैं।लेकिन मेरा दिल कह रहा है इस ठंड भरी शाम में जल्द से जल्द
मिठाई की राजधानी की फेमस नेशनल स्वीट्स तिरंगा बर्फी अपने हाथों से खिलाऊँ!
           दिल्ली में किसान लाठी,गोली,टीयर गैस खा पी रहे होंगे।बनारस में कम से कम बूढ़े गणतंत्र के नाम पर इन नन्हें मुन्ने अबोध कलाकारों को मिठाई खिला दूं।
     और मैंने ऐसा ही किया।

          दिल्ली से बनारस इसलिए अलग है कि दिल्ली में तिरंगा फहराया जाता है और बनारस में खाया जाता है।क्या पता किसी दिन तिरंगा मिठाई पर भी राष्ट्रद्रोह की छाया न आ धमके!

01 जनवरी, 2021

अस्सी ने पूछा कि काशीनाथ और ज्ञानेंद्रपति एक ही दिन क्यों पैदा हुए!


@रामाज्ञा शशिधर की कलम से
【बनारस में काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति का जन्मदिन】
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दोस्तो!
 यह अनोखा संयोग है कि काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति दोनों बनारसी तरावट के लेखक हैं और दोनों का  जन्मदिन नववर्ष के दिन ही है।यानी दोनों का जन्मदिन
'गरीबों का गोआ' बन चुके बनारसी घाटों की भीड़ की भेंट है।
        आज बनारस का गली कूचा सब सड़क पर है,घाट पर है,बोट पर है,रेत पर है।नगर के घर खाली और गंगा घाट छाली ताली।
       मैं घुमक्कड़ी और फक्कड़ी करता हुआ अस्सी पर हूँ।बाएं में दायां ऐसा घुसा है कि नगर का चक्का जाम।भीड़ से घबड़ाकर पोई की अड़ी पहुंचा।पोई की तनी छाती और फैली बांहें अड़ी के खोहनुमा दरबे के काफी भीतर दबी दबी सी हैं।काशीनाथ के सुपात्र और अड़ीवीर प्रो गया सिंह गायब हैं।पता चला इनदिनों में अर्धरात्रि में अपने मांद से हवाखोरी के लिए निकलते हैं जिन्हें सिर्फ पागल,नशेड़ी और बाबा ही देख पाते।
     चौराहे के जाम के धुएं से पीपल हांफ रहे हैं।
       पप्पू की अड़ी पर भी रंग तरंग का सांध्य मजमा है।घिसे पिटे गदरची और ढिंढोरची से मुक्त।
     नींबू की चाय की चुस्की लेते ही,अपने पुराने छात्र जो अब टीवी पत्रकार हैं,पर नजर पड़ी।हालचाल हुआ।
    तभी उधर से एक मद्धिम आवाज़ आई-आज 'काशी का अस्सी' के लेखक काशीनाथ का जन्मदिन है।चूरा मटर पोई के यहां होता था।
      दूसरी आवाज़ ने पहली को काटा-यह वर्षों पहले होता था जब काशीनाथ अस्सी के नागरिक थे।वे अब विदेश में रहते हैं बेटे के साथ।
          बहस शुरू हुई जिसका सारांश है कि 1ली जनवरी को जन्मदिन का चलन बहुत पहले से है।जिसके जन्मदिन का पता नहीं रहता वह 1ली जनवरी में ईस्वी
लगाकर रखवा लेता है।अधिकारी बर्थ सर्टिफिकेट,आधार कार्ड,वोटर कार्ड और प्रिंसिपल स्कूल में पहली तिथि आंख मूंदकर डालता है।यह माँ बाप और समाज के लिए सहूलियत भरा दिन है।देश की एक तिहाई आबादी फाइलों में पहली जनवरी को ही पैदा होती है। काशीनाथ के साथ हुए हादसे का पता बाबू गया सिंह को लग गया हो इसलिए पोस्टपोन कर दिया।
           मुझे राहत हुई कि ज्ञानेन्द्रपति ने अस्सी पर किसी को भले ही जन्मदिन नहीं बताया और सेलिब्रेट नहीं किया वरना ये संसदिए हमारे गंभीर और सत्याग्रही कवि पर जब धुआंधार शब्द फुहार फेंकते तो उनकी तरोताज़ा कल्पना वेबजह सीलन फील करती।
             दोनों लेखक मेरे अज़ीज हैं।दोनों के कारण बनारस में मुझे अपने होने का कारण दिखता है।
       दोनों को नगर ने अपनी तरह से ढाला है और दोनों ने नगर को अपनी तरह से रचा है।दोनों बनारस में चाहे जहां रहते हों जनगणमन  ने दोनों के लिविंग पॉइंट्स फिक्स कर दिए हैं।
       काशीनाथ डेढ़ दशक पूर्व अस्सी भदैनी से मंडुआडीह की ओर चले गए लेकिन वे आज भी पाठकों के लिए अस्सी की अड़ी पर हैं।
     ज्ञानेन्द्रपति अब कम ही केंट रेलवे  के 9 नम्बर प्लेटफॉर्म पुल पर खड़े रहते हैं लेकिन पाठक उन्हें पुल पर किसी का इंतज़ार करनेवाला लेखक ही महसूसते हैं।
      दोनों के सपने थे-नगर कबीर की मौज में चले।दोनों में कोई नहीं चाहता था कि नगर फौज में चले।
         हर हर मोदी ,घर घर मोदी और हर हर बुलडोजर,घर घर बुलडोजर के विकास अभियान में दोनों लेखक अदृश्य होते गए।बनारस की पुरानी गलियों और  डोंगियों की तरह।
        मैं दोनों फक्कड़ लेखकों के द्वारा उड़ाई गई भाषा की धूल में अपनी यादों और सपनों के निशान खोज रहा हूँ।
      दोनों मुझमें शामिल हो गए हैं और मैं दोनों की रूहों का पांव पैदल नगर होना चाहता हूँ।
        कितना इत्तिफाक है कि मेरे दोनों अज़ीज लेखक का जन्मदिन जिन कारणों से 1ली जनवरी है,उन्हीं कारणों का शिकार मेरा बर्थ डेट 2री जनवरी है।
    मतलब वे दोनों एक को जन्म लेकर एक नम्बरी हैं और मैं 2 को जन्म लेकर दो नम्बरी।
    यह मैं नहीं कहता हूँ,अस्सी के हाइपर बोलिक ढिंढोरची कहते हैं।
         नगर में किसको पता है कि काशीनाथ बीमार हुए तो ठीक भी हुए ।परिजन की बहार और दोस्त चौथीराम यादव जी के प्यार के मरहम से।
   ज्ञानेन्द्रपति के पास न कोई परिवार है और न कोई चौथीराम यादव।ज्ञानेंद्रपति के लिए यह नगर ही चौथीराम यादव है।वे इस्पाती मनुष्य हैं।सौ साल लोहा रहें।
           दोनों को जन्मदिन की अशेष शुभकानाएं!