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12 अप्रैल, 2018

मालवीय चबूतरा विचारों की टाइम मशीन है :रामाज्ञा शशिधर

✒काल तुझसे होड़ है मेरी✒
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"विज्ञान और साहित्य में समय बोध"
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@रामाज्ञा शशिधर

😂क्या इस सदी में दर्शन शास्त्र के लिए एकमात्र शेष कार्य भाषा का विश्लेषण है!अरस्तू और कांट से शुरू तत्वमीमांसा की महान परंपरा का यह कैसा पतन!
            –स्टीफन हॉकिंग,समय का संक्षिप्त इतिहास,पृ 183
😂काल का कोई निश्चित मापक नहीं है बल्कि सभी प्रेक्षकों का अपना अपना निश्चित काल होता है जिसे उनकी निजी घड़ियाँ मापती हैं।अंतरिक्ष यात्रा से केवल कुछ सालों में बूढा होकर लौटने में आपको मजा नहीं आएगा जब आपकी पृथ्वी के साथी के मरे हजारों साल हो चुके हो।
            –स्टीफन हॉकिंग,समय का संक्षिप्त इतिहास,पृ 156
😂वाइट की एक युवा महिला थी
प्रकाश से भी जिसकी तीव्र गति थी
कर गई एक दिन वह आपेक्षिकता से प्रस्थान
और आ गई लौटकर जब
जाने से पहले के दिन का हुआ था अवसान
                 –एक कविता,समय का संक्षिप्त इतिहास,पृ 156
😂टाइम मशीन उपन्यास 1895 में आया और उसने सूर्य के प्रकाश में कुछ नया जोड़ दिया।एच जी वेल्स की कथा न तब कोरी थी न आज है।
                 –टाइम मशीन(काल की कल),अंतिम पन्ना
😂काल,
तुझसे होड़ है मेरी
अपराजित तू
तुझमें अपराजित मैं वास करूं
           –शमशेर बहादुर सिंह,काल तुझसे होड़ है मेरी
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स्टीफन सर!
    आप काल यात्री हैं और यात्रा में हैं।मैं साहित्य का अदना सा छात्र चूंकि बचपन से विज्ञान और ब्रह्मांड के रहस्य को जिज्ञासा और कौतूहल से पढ़ता रहा हूँ इसलिए आपसे दिली रिश्ता बनता गया है।बचपन की एक घटना आपको बताना जरूरी समझता हूँ जिस कारण मैं साहित्य की ओर मुड़ने पर मजबूर हो गया।
        मेरे ग्रामीण सरकारी स्कूल मध्य विद्यालय सिमरिया के कारू मास्टर साहब ने बेंत की छड़ी से बड़ी पिटाई कर दी।मेरा दोष था कि मैं कक्षा सात में प्रकाश के प्रावर्तन के नियम पर एक टूटे हुए शीशे से काम कर रहा था।खिड़की की प्रकाश किरण शीशे से टकराकर अचानक मेरी एक क्लास कन्या के सुमुख पर गिर पड़ी।उसने अपने सौंदर्य पर प्रहार समझ कर गणित शिक्षक से शिकायत कर दी।स्कूल के वे स्थाई दारोगा गुरु थे।उन्होंने ऐसी मरम्मत कि मैंने कविता लिखनी शुरू कर दी।क्या पता  आपकी तरह मैं भी तरंग और समय की व्याख्या में आज लगा होता।भारत को आज भी थेरेपी की जरूरत ज्यादा है आविष्कार खोज की कम।खैर😃
       जब आपकी कोशिकीय यात्रा खत्म हुई तब मालवीय चबूतरा ने आपकी स्मृति में संवाद किया।शिक्षक छात्र सभी दो सप्ताह तक शामिल हुए।पहले रविवार को विज्ञान और काल के रिश्तों पर श्रीप्रकाश शुक्ल और छात्रों का संवाद रहा।दूसरा रविवार साहित्य और समय के रिश्तों पर मेरे साथ विद्यार्थी उलझते सुलझते रहे।
       दो सप्ताह की चिंतन यात्रा तथ्यों से भरी थी लेकिन दर्शन और सत्य कभी कण की तरह और कभी तरंग की तरह पकड़ाते छूटते रहे।एक गहरी शांति और कम्प गूँज से घिर गया हूँ।चाहकर भी लिखना असंभव बना रहा।एक तरफ निश्चितता की शक्ति बिखर रही है दूसरी ओर अनिश्चितता की चेतन तरंगें एक दूसरे से टकराकर विलीन हो जा रही है।एक तरफ आपका ब्रह्मांडीय चिंतन और मानव जाति के भविष्य को लेकर व्यापक चिंता दूसरी ओर पूँजीवाद के द्वारा नियति की ओर बढ़ती विनाशलीला।
         ऐसा क्यों लगता है कि विज्ञान की विराटता और उदात्तता की कोख से टेक्नालॉजी और पूँजी की क्षुद्रता का जन्म होना कितना अनिश्चित भविष्य की दिशा बना रहा है।मानव जाति आपसे कुछ भी सीखने को तैयार नहीं।क्रिएटर पर कन्ज्यूमर राज कर रहा है।
         विज्ञान के विराट व संशयग्रस्त दिक् काल के सम्मुख दर्शन कितना बौना है और साहित्य हृदयहीन क्षुद्रता की डोर पकड़ने को बेचैन है।तब विज्ञान और साहित्य में समय की धारणा कैसी है-इस आइडिया को कल्पित करना मानव जाति के लिए पहले से ज्यादा दिलचस्प प्रश्न हो गया है।
–विज्ञान,दर्शन,धर्म और साहित्य शुरू से समय की अपनी युगीन व्याख्या में व्यस्त रहे हैं।समय की व्याख्या की यूनान और भारत की तो शानदार परंपरा है।
-विज्ञान समय का मस्तिष्क है तो दर्शन उसकी आँख और साहित्य उसका चित्त।बिना आँख के मस्तिष्क भटक सकता है और बिना हृदय के मानव विरोधी हो सकता है।समय का हाल इन दिनों ज्यादा बीमार है।उसकी आँख बंद है और हृदय सूख रहा है।इसलिए पृथ्वी का कम्पार्टमेंट जल्द खाली करने की चेतावनी आपकी ओर से भी है।
-समय की गणना एक कल्पित धारणा है।जैसे आजकल राष्ट्रवाद की धारणा।पृथ्वी पर ही अनेक हिस्सों में वैज्ञानिक समय में अंतर है।लंदन,पाकिस्तान और बांग्लादेश में ही काल की भिन्नता है। हर कल्पित अक्षांश देशान्तर में समय भिन्न है।यह भी सौर सापेक्ष है।पृथ्वी से अलग हटते ही पूरे ब्रह्माण्ड में समय पूर्ण कल्पित हो जाता है।
-जहां से विज्ञान का समय कल्पित होना शुरू होता है वहीँ से दर्शन और मिथक का जन्म होता है।साहित्य विज्ञान से ज्यादा दर्शन और मिथक का भोक्ता है इसलिए वहां इन दोनों का कल्पित समय अपने रचनात्मक रूप में गतिशील होता है।
-यह सच है कि विज्ञान की ऊंचाई के साथ पीसा मीनार और क़ुतुब मीनार की ऊंचाई वाला दर्शन बीसवीं इक्कीसवीं सदी में निरीह पिलपिला और बौना होता चला गया है।विज्ञान का क्या है के सामने दर्शन का क्यों है मरणासन्न है।इसीलिए विज्ञान भी पूरी मानवता के साथ ब्लैक होल के मुहाने पर पहुँच चूका है।
-आपका सारा चिंतन समय और ब्रह्मांड के रिश्तों की खोज पर है जिसके दो छोर हैं: महाविस्फोट से कृष्ण विवर की यात्रा।लेकिन इस बीच की चिंतन और खोज यात्रा में आप बार बार भाग कर दर्शन और साहित्य की शरण में क्यों आते हैं?यहां तक की कविता को आपकी आत्मा क्यों खोजती है।इसलिए कि आपके लिए मानवीय अस्तित्व और समान सुख वाली मानवता की हिफाजत जरूरी है।
-क्या यही कारण नहीं है कि वैज्ञानिक आपको वैज्ञानिक नहीं मानते,दर्शन के विद्यार्थी आपको दार्शनिक नहीं मानते और साहित्यकार आपको गल्पकार नहीं।शायद इसीलिए आप दो सदियों के  लोकप्रिय वैज्ञानिक हैं,दार्शनिक हैं और लेखक भी।समय का तकाजा है कि समय पर नई बहस शुरू हो।
-विज्ञान के लिए समय का प्रश्न जहां सृष्टि की रचना,जीवन और विनाश का प्रश्न है वहीं साहित्य के लिए समय का प्रश्न मानवीय नैतिकता और मूल्य का भी प्रश्न है।
-आधुनिक विज्ञान के जन्म ने अपने उपउत्पाद प्रौद्योगिकी के माध्यम से समय की परिभाषा को स्थूल से सूक्ष्म(वर्ष,महीना,रात दिन,घण्टा,मिनट,सेकेण्ड,क्वार्क,क्वांटा) और धीमी गति से तीव्र गति की दिशा दी है वहीं साहित्य के भीतर समय ज्यादा कल्पनाहीन,अनुदात्त,क्षुद्र,मिथकमुक्त,और बूढा होता गया है।साहित्य के समय को विज्ञान ने असमय इतना बूढा और बीमार कर दिया है कि शिशुता गायब हो गई है।अब हर बच्चा पा पैदा हो रहा है।
-न्यूटन के बल सिद्धान्त ने जहां  औपनिवेशिक आधुनिकता के समय की आधारशिला रखी जहां सब कुछ केंद्रीकृत, दिशायुक्त,सार्वभौमिक और अंतिम सत्य की तरह था।गैलेलियो और न्यूटन के समय के इस निश्चिततावादी सिद्धान्त ने जहां यूरोप को जहालत और गुरबत से मुक्ति दी वहीँ यह मुक्ति शेष दुनिया के शोषण और तबाही पर आधारित थी।यूरोपीय जहाज पर लगे फ्रांसीसी शब्द क्लॉक ने ऐसा कमाल किया कि
पूरी पृथ्वी आजतक साम्राज्यवादी पूंजीवाद के जबड़े में सिसक रही है।
-आधुनिकता के निश्चयवादी सिद्धान्त ने साहित्य की महाकाव्यात्मक और मिथिकीय कल्पनशीलता को स्थगित कर दिया जहां समय के तीनों काल अपनी कल्पित विराटता के साथ मौजूद होते थे।वे साहित्य के रूप अंतर्वस्तु और विचारधारा को उसकी विराटता और उदात्तता के लिए प्रेरित प्रभावित करते थे।
-आधुनिक विज्ञान से उपजी धारणा ने साहित्य में मिथक की धारणा को स्थगित करते हुए इतिहास बोध का आरम्भ किया।जहां मिथक में समय की धारणा व्यापक होती है वहीँ इतिहास में अपेक्षाकृत न्यून कल्पनाशील और संक्षिप्त। यथार्थवाद ने साहित्य के समय और उसकी मानवीय सम्भावना का बड़ा नुकसान किया जहां सब कुछ आँखन देखी हो गया।
-विज्ञान से उपजी समय की नई धारणा ने एक ओर मिथक साहित्य,लीजेंड,परिकथा लोक साहित्य को स्थगित किया वहीँ नव कपोल कल्पना पर आधारित विज्ञान गल्प और क्षुद्रता केंद्रित डिटेक्टिव ऐयारी साहित्य को जन्म दिया जहां समय के क्षण का ख्याल रखा जाता है।1895 की टाइम मशीन से आजतक साहित्य और हॉलीवुड की अधिकांश फिल्में इसके मजेदार उदाहरण है।
-साहित्य और दर्शन हमेशा से स्थूल और भौतिक समय से चेतनगत संघर्ष करते रहते हैं।साहित्य और दर्शन विज्ञान के विरुद्ध द्वन्द्वात्मक जंग है जहां हर फिजिकल को मेटाफिजिकल में तब्दील करने की क्रांतिकारी प्रक्रिया है।
-जो विज्ञान के ब्रह्माण्ड में है वह साहित्य और दर्शन के पिंड में है।जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे।साहित्य का अपना चन्दा अपना सूरज अपने ग्रह अपने नक्षत्र।अपनी घड़ी और अपनी सुई।अगस्टीन ने किताब रीडिंग से नगर और सूरज के समय को निर्धारित किया था।कवि के लिए मुर्गे की बांग में क्वार्क क्लॉक
होता है।लेखक चिंतक जल प्रकाश रेत बसंत पतझड़ और ब्रह्मा की नींद में समय खोजते हुए अपने अवचेतन को कल्पना
और स्वप्न के लायक बनाते रहते हैं।
-आधुनिक विज्ञान से पहले हिंदी का सिद्ध नाथ साहित्य,संत साहित्य,सूफी साहित्य,मिथकीय और लोक साहित्य समय की
विराट सम्भावना का उपयोग करता रहा है।शायद टाइम स्पेस
की धारणा ही है जो इस साहित्य को कालजयी कहने पर हम
मजबूर होते हैं।
-विज्ञान के निश्चिततावाद को चुनौती समाजवाद में विश्वास करने वाले वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने समय की सपेक्षतामूलक धारणा से दी।यह सच है कि हाइजनवर्ग ने इसकी बुनियाद बीसवीं सदी के तीसरे दशक में रख दी थी।अब संसार के लिए
बल की सत्ता ही महत्वपूर्ण नहीं रह गई।जहां ब्रह्माण्ड को
चुनौती दिक् काल के तीन आयाम से आइंस्टाइन दे रहे थे वहीँ यूरोपीय साम्राज्य को लोकतंत्र से धक्का मिल रहा था।अब निश्चित कुछ भी नहीं था।यदि किसी कण को प्रकाश की गति से दौरा दिया जाए तो वह द्रव्यमान ऊर्जा में बदल जाएगा।गुरुत्वाकर्षण बल ऊर्जा पर नहीं मास पर काम करता है।अब यह ब्रह्माण्ड स्वतन्त्र है,कण भी है और तरंग भी है,एक कण से की ऊर्जा से पैदा हुआ है और फिर एक कण में बदल जाएगा।बुद्ध की शून्यता का दर्शन हजारों साल से पुकार रहा है।
-उत्तर आधुनिकता अनिश्चितता का दर्शन है।पूँजीवाद कह रहा है वही आखिरी विकल्प है।दर्शन का अंत इतिहास का अंत महाख्यान का अंत लेखक की मृत्यु ज्ञान का अंत मनुष्य की मृत्यु।आप कह रहे हैं माव जाति अपनी प्रतिरोधी क्षमता और पृथ्वी का पर्यावरण खोती जा रही है।यदि मानव जाति कुछ सौ सालों में दूसरे ग्रह पर विस्थापित नहीं होती है तब उसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा।
-आपके समय की धारणा पूंजीवाद के विरुद्ध है और यह एक साथ आशा और निराशा के साहित्य और दर्शन को जन्म दे सकती है।
-हमारे विश्वविद्यालयों बौद्धिकों लेखकों के लिए चुनौती है कि
वे अपने विषय के पुनर्जन्म के साथ मानवता के हित में समय की नई व्याख्या का आरम्भ करें।
-दर्शन को अपनी आँख खोलनी होगी।यह पश्चिम से नहीं एशिया और भारत से सम्भव है।क्रूरता को करुणा से और तानाशाह विज्ञान को बुद्ध के दर्शन से चुनौती देनी होगी।एक बार फिर शून्यता और प्रतीत्य समुत्पवाद को विराट बनाना होगा।नालन्दा का प्रेत भटक रहा है।चबूतरा चबूतरा।सड़क गली।
-साहित्य में एक नए मानवतावादी यूटोपिया का सृजन।एक विराट बहस का निर्माण।यथार्थवाद की जगह उत्तर यथार्थवाद।स्थूल की जगह जादुई यथार्थवाद।नई फैंटेसी।नया स्वप्न।नई कल्पनाशीलता।मार्क्वेज़ के उपन्यास एकांत के सौ वर्ष से सीखें समय की नई धारणा।दुनिया को फिर से रचने की धारणा।
      स्टीफन सर हम आभारी हैं।मालवीय चबूतरा कण भी है और तरंग भी।चबूतरा ऐसा सिंगल कण है जो सभ्यता के ब्लैक
होल वाले मुहाने पर आकर नई सभ्यता के बिग बैंग की कल्पना कर रहा है।आप टाइम ट्रैवलर हैं तो चबूतरा टाइम मशीन है।दृश्य भी अदृश्य भी।हम प्रकाश की गति से चलकर ही ऊर्जा में बदल सकते हैं और आपसे मिलन भी हो सकता है।
आपका
रामा

30 मार्च, 2018

समकालीन हिंदी में मुसलमान लेखिकाएं कम क्यों हैं:रामाज्ञा शशिधर


'हिंदी उर्दू की साझी विरासत और स्त्री लेखन' पर बात करते हुए मुझे ध्यान आया कि हिंदी उर्दू स्त्रीलिंग होते हुए भी स्त्री मुक्ति की राह में बाधा बनकर शुरू से खड़ी हैं।खुद एक जबान होकर राजनीतिक और भौगोलिक बंटवारे से पहले ही सियासी फायदे के लिए बंट गई।समाज की सत्ता से बाजार की सत्ता तक की यात्रा में बहनें,माँ बेटी आदि टर्म
स्त्री को घूँघट और बुर्कादार बनाने के सतत् औजार हैं।क्या कारण है कि आज़ादी के बाद उँगलियों पर गिनी उर्दू और हिंदी की कथाकार और कवि हैं?समकालीन वक्त में  हमारी मुसलमान लेखिकाओं से ज्यादा रेडिकल लेखिकाएं पकिस्तान और बांग्लादेश में क्यों हैं?आज कल्चर,धर्म,रवायत,विरासत,नफासत को नए सिरे से रीविजिट करने की जरूरत है।पूरा माहौल धर्म और मजहब के सियासीकरण पर आश्रित होता जा रहा है।दोनों भाषाओं में धर्म के डिक्शन बढ़ते जा रहे हैं।पुरुष सत्ता दोनों भाषाओं की संचालिका हैं।हलाला और सामंती शादी प्रथा से बिना मुक्त हुए औरत के लिए आज़ादी ब्रांड नहीं बन सकती।औरतों को घर के भीतर ओवन स्लेव और बाहर मिलिटेंट बनाने की मुहिम जारी है।धर्म उस नाव की तरह है जिसे जबरन रस्सी और कंधों के सहारे रेत पर खींचा जा रहा है।ग्राममुक्त और इंस्टाग्राम से युक्त दुनिया में जब लेखक के मसीहा होने की सम्भावना मर चुकी है हर पाठक एक लेखक है।तब आज फिर हिंदी उर्दू की बंटवारे से पहलेवाली जमीन लौट आई है।आने वाले वक्त में दोनों समाज जितनी जल्दी एक होकर नए स्वप्न रचें मानवता और औरत के हक में है।दिलचस्प तो यह है कि हिंदी अब हिंग्लिश और उर्दू उग्लिश बनकर अपने बंटवारे की सियासी और अदबी विरासत से बदला ले रही है।

25 मार्च, 2018

केदारनाथ सिंह आधा बनारस हैं:मालवीय चबूतरा

💚काव्य पाठ 💛छवि प्रदर्शनी ❤चबूतरा चर्चा
✒मेरे लिए केदारजी आधा बनारस हैं-मालवीय चबूतरा
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"पत्तियां चुप हैं;पेड़ उदास हैं,सूरज बेस्वाद है;धूप फीकी है;हवा का फेफड़ा धीमा है;दूब कुचली हुई आत्मा की छाल सी चपटी है;टहनी पर बैठी बया के पंख पहाड़ हैं;कोयल खामोश है;कठफोरबा हिकारत से काठ को देख रहा है;चींटियाँ काम से महरूम हैं;दीमक जड़ों के बिस्तर पर सो रहे हैं;सांप मेढक से राम राम कह रहे हैं;मोर वंदे मातरम् भूल गया है;अशोक शोकग्रस्त,शिरीष क्रुद्ध,अमलतास म्लान,बबूल बदजुबान,गुलमोहर पत्रहीन और छतनार बेजार हैं।कुल मिलाकर बसंत उदास है।बगिया के एक कटे हुए सर वाले पेड़
के धड़ की जड़ में नगर के एक फोटोग्राफर द्वारा उतारी गई एक एक कवि की छवि है जो गा रही है-बनारस आधा है और आधा नहीं है।"
              आज मालवीय चबूतरे पर 'मेरे लिए केदारजी' चबूतरा चर्चा में ढाई घन्टे तक शब्द साहस के साथ ज़िंदा थे।
केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व और कविता की परतों को बनारस के छात्र शिक्षक,लेखक,पत्रकार खोलते रहे।अपनी कविता पर केदार प्रभाव को स्वीकारते हुए कवि  और प्राध्यापक श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि केदार जी की कविता में हजारों साल की परम्परा बोलती है इसलिए हिंदी काव्य पीढ़ियों पर आजादी के बाद सबसे ज्यादा
प्रभाव केदार की कविता का है।केदार जी में बुद्ध की करुणा कबीर का कौतूहल और निराला का कोलाहल एक साथ है।कवि और चबूतरा संस्थापक शिक्षक रामाज्ञा शशिधर ने कहा कि केदार जी की काव्य शक्ति की कुंजी चकिया गाँव और बनारस के पास है न कि दिल्ली या तीसरा सप्तक के पास।केदारजी लोकतंत्र के व्याख्याता कवि नहीं बल्कि देशज आधुनिकता और सभ्यता विमर्श के कवि हैं।केदारजी बिम्ब विधान के नहीं बल्कि बिम्बों की गहरी राजनीति के कवि हैं।केदारजी मानवीय आदिम वासना और प्रकृति के आपसी सहज रिश्तों के जिज्ञासु कवि हैं।केदारजी  आधुनिक मनुष्य की घिसी पिटी इन्द्रियों को नई धार देनेवाले माइक्रो बिम्ब के क्राफ्ट्समेन हैं।पुरस्कार और चेलावाद से मुक्ति के बाद केदारजी का
पुनर्मूल्यांकन जरूरी होगा।
फ़ोटो जर्नलिस्ट अनिरुद्ध
पांडेय ने कहा कि मालवीय चबूतरे जैसी लोक और ज्ञान की विरासत पर केदार जी पर जीवंत बहस से प्रमाणित है कि केदार जी हिंदी कविता के सायादार पेड़ हैं।नीलेश कुमार ने कहा कि केदारनाथ सिंह बेहद राजनीतिक कवि हैं जहां हॉकर भी वियतनाम वियतनाम चिल्लाता है।आशीष पांडेय ने कहा कि केदारजी बिम्ब के माध्यम से भाषा के मूल रचनात्मक स्वाभाव और शक्ति को वापस लाते हैं। केदार की बनारस कविता सुनकर एक अमेरिकी बुढ़िया इसलिए रोती है कि उम्र के उस पड़ाव पर वह कविता में चित्रित महान शहर की भव्यता नहीं देख पाएगी।शिवकुमार यादव ने कहा कि केदारजी लोक और किसान चेतना के कवि हैं।
               लगभग एक दर्जन पसंदीदा कविताओं का पाठ हिंदी विभाग के नवोन्मेषी छात्र छात्राओं ने किया।केदार की कविताओं की मानस पर पड़ी छाप की उन्मुक्त अभिव्यक्ति उपस्थित विद्यार्थियों ने की।केदार की कविता की लोकप्रियता है कि कई राहगीर पाठकों ने भी चबूतरे से जुड़ते हुए
शब्दांजलि दी।अरुण तिवारी का संचालन सराहनीय रहा।
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✒चबूतरे पर केदारनाथ सिंह की छवि प्रदर्शिनी✒
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...केदारजी आधा हैं और आधा नहीं हैं।बनारस की तरह!अमर उजाला के फोटो जर्नलिस्ट अनिरुद्ध पांडेय की कैमरे से उतारी गई केदारनाथ सिंह की तस्वीरों में से चुनी हुई  तस्वीरें आज ऐसा ही कह रही हैं।बलिया केदारजी की लोक चेतना  और बनारस साहित्य चेतना का घर रहा।अनिरुद्ध पांडेय अपनी संवेदनशील और मर्मी आँखों से बनारस की आर्काइव रोज समृद्ध करते हैं।आज सुबह नगर के घुमक्कड़ छविकार अनिरुद्ध पांडेय ने  मालवीय चबूतरे को केदारजी की छवियों से इतना आत्मीय बना दिया कि बरगद की हर पत्ती केदारमय हो गई।अनिरुद्ध जी को चबूतरे की ओर से आभार!

11 मार्च, 2018

मुक्तिबोध अतिरिक्त फैंटेसी के कवि हैं :रामाज्ञा शशिधर

📚पुरानी किताब:नई बात संवाद श्रृंखला📚
::फैंटेसी विमर्श::
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सहमतिपूर्ण यथार्थ से मुक्ति की यात्रा ही फैंटेसी है-मालवीय चबूतरा
@रामाज्ञा शशिधर
📚पुरानी किताब:नई बात📚 संवाद श्रृंखला के अंतर्गत आज मुक्तिबोध के बहाने फैंटेसी विमर्श लगभग डेढ़ घन्टे चला।सवाल जवाब सत्र में विज्ञान के छात्र प्रणव का प्रश्न फैंटेसी और  सभ्यता की मुक्ति से जुड़ा था-विज्ञान  किस तरह फैंटेसी का हत्यारा है?मिथक के रूप में फैंटेसी किस तरह सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है?
             इन प्रश्नों से पहले जानिए फैंटेसी क्या है?इसलिए भी कि पचीस से अधिक संख्या में आए ज्ञान पिपासुओं का कामन
सवाल था-फैंटेसी क्या है?क्या उसका उपयोग सिर्फ मुक्तिबोध के यहां मिलता है?क्या फैंटेसी हरेक चेतना की सामान्य विशेषता है या सिर्फ लेखक की पूँजी है?क्या फैंटेसी फॉर्म है या चेतना का सामान्य गुण?क्या और भी रचनाकारों की रचनाओं में भी फैंटेसी मिलती है?फैंटेसी का बोध एक पाठक या श्रोता दर्शक कैसे कर सकता है?आदि।
           बात परिचित कवि मुक्तिबोध के चित्र विधान से शुरू करता हूँ।गुफा में मशाल जलती है और उस रोशनी में दीवार की भीत से दूसरा चेहरा उभरता है।वह रक्तस्नात पुरुष कौन है?एक बच्चा फूल में बदल जाता है।फूल बन्दूक में भी बदल सकता है।मूर्ति के फ़टे सर से खून का फब्बारा गिरता है।कहीं टॉलस्टाय मिलते हैं तो कहीं मार्क्स।कहीं बुद्ध दिखते हैं तो कहीं गांधी।लकड़ी का रावण जीवित से अधिक घातक दीखता है।वह ब्राह्मण शिक्षक असमय मर गया था फिर कूप के अतल में उसकी रूह ब्रह्मराक्षस बनकर अट्टहास क्यों करती है!
            ये काव्य बिंब वस्तुतः फैंटेसी के प्रयोग से संभव काव्य रूप हैं।
        फैंटेसी प्रचलित और कंडीशंड यथार्थ से मुक्ति की मानसिक यात्रा है।फैंटेसी कल्पना प्रसूत स्वप्न चित्र की श्रृंखला है।फैंटेसी मानव चेतना की बुनियादी विशेषता है।यह मानव अचेतन की विशिष्ट क्षमता है।फैंटेसी सिर्फ किसी लेखक कलाकार की जागीर नहीं।फैंटेसी रचनकार के यहां आकर विशेष कला रूप की भूमिका अदा करती है लेकिन पाठक को भी लेखक के मानसिक धरातल पर गए बिना रचना का बोध असम्भव है।इसलिए फैंटेसी रूप की समझ और विकास पाठक की भी जरूरत है।हिंदी आलोचना और एकेडमिक बहस में मुक्तिबोध के अलावा सामान्य रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए जब फैंटेसी की चर्चा ही नहीं होती तो पाठक के अचेतन पर कौन सोचता है?यह हिंदी के सौंदर्य चिंतन की भयावह दरिद्रता है।दर्शन की कंगाली।
           फैंटेसी का सम्बन्ध मानव के अस्तित्व विकास से जुड़ा है।मानव मन अधूरी इच्छाओं की खोज है,पूर्ति की कोशिश है।आकांक्षा की यात्रा में अनेक बाधाएं हैं।मानव का चेतन उसके ही भीतर के संसार का दमन करता है।वह समाज और बाह्य जगत के शासन बन्धन से जकड़ा है।लेकिन एक और मन है जो भीतर भीतर यात्रा करता रहता है।फ्रायड उसे अनकंसस कहते हैं।लकां उसे इमेजनरी और सिम्बलिक में बांटते हैं।युंग के लिए वह मिथक और सिम्बल का स्टोर है।मानस के अचेतन क्षेत्र से व्यक्तित्व संचालित होता है।अचेतन इलाके में ही स्मृति कल्पना भाषा चित्र और स्वप्न की गतिविधि होती है। अधूरी इच्छाओं की पूर्ति की यात्रा स्वप्न है और उसकी चित्रावली फैंटेसी है।
               फैंटेसी चित्र श्रृंखला है और तरल यात्रा है।उसके भाषिक चिह्न में ढलने का द्वंद्वात्मक नियम है।इस सामग्री की खोज में मनोभाषा विज्ञान ऊंचाई छू चूका है।लेकिन हमारी ट्रेन मुक्तिबोध नामक प्लेटफार्म पर ही अटकी हुई है।मुक्तिबोध मनोविज्ञान के गहरे अध्येता थे।
एक साहित्यिक की डायरी और उनकी पूरी आलोचना में मनोचिन्तन बिखरा पड़ा है। हिंदी की स्थूल कथित प्रगतिशील आलोचना को जो बात समझ में न आए वह जनविरोधी स्टाइल है।आजकल इसीलिए वह खुद जन से दूर शूर गान करती दिखती है।
            फैंटेसी वस्तुतः केवल कला शिल्प ही नहीं मोड भी है।पारम्परिक,यथार्थवादी और आधुनिकतावादी साहित्य में फैंटेसी की उपस्थिति अनुपस्थिति से मानव सभ्यता के उठान ढलान को परखा जा सकता है।
        होमर,कालिदास,व्यास,बाल्मीकि से लेकर जातक,पंचतंत्र,पुराण,संत साहित्य तक फैंटेसी का साम्राज्य है।पराशक्ति,जादू,प्रकृति और मिथक फैंटेसी निर्माण की आधारभूमि है।इसलिए सामंती दौर की रचनाशीलता में यह कला रूप भरपूर है।आधुनिक विज्ञानवादी चेतना ने मानव नियति को ही नहीं उसके अचेतन को क्षतिग्रस्त कर दिया।बुद्धि और तर्क की प्रयोगशाला में आत्मा का पोस्टमार्टम शुरू हुआ।परिणाम सामने है।बाल्ज़ाक के किसान से प्रेमचंद के गोदान तक प्रत्यक्ष यथार्थ की ऐसी आंधी चली कि मानव मन का कोई सुधिवेत्ता नहीं रहा।संवेदना और चेतना को पुरातत्व का म्यूजियम बना दिया गया।मरी हुई मूर्तियां मुद्रा अपना सकतीं लेकिन नृत्य नहीं कर सकती।यथार्थवादी साहित्य में फैंटेसी न्यूनतम है।आधुनिकतावादी मनुष्य का संकट उसके मानस के अलगाव और विघटन का संकट है।अलगाव ही वह क्षेत्र है जो उसके मानस को एकालाप की फुर्सत देता है।दुर्भाग्य से आधुनिकताबोध अलगाव को काफ्का के मेटामोर्फोसिस के कीड़े में बदलने के बदले शेखर का ईगो खोजता रह गया।फलतः कला वीणा असाध्य हो गई।काफ्का अलगाव से फैंटेसी रचते हैं और मुक्तिबोध भी।मुक्तिबोध की फैंटेसी एक आधुनिक ट्रेजिक
मनुष्य के एकालाप और आत्म हाहाकार से उपजी हुई फैंटेसी है।वह तब कविता को ढाल रही है जब आधुनिक मन बहुत कुछ रियाज और मिजाज खो चूका है।इसलिए
सरल कवि मुक्तिबोध जटिल लगते हैं।मूढ़,पेशेवर और धंधेबाज विश्लेषक उस हथियार से पुरस्कार का शिकार और वेतन का रोजगार चलाते हैं।
         फैंटेसी केवल कविता की पूँजी नहीं बल्कि फिक्शन की भी सम्पदा है।जिसे जादुई यथार्थवाद कहते हैं उसने उपन्यास की रचनात्मक सम्भावना को वैश्विक ऊंचाई दी है।उपन्यास सृजन में भी  नए सिरे से महाकाव्य के दौर को दुहराया जा रहा है।दुर्भाग्य है कि हिंदी में देवकीनंदन खत्री की परंपरा का विकास नहीं हुआ।आज जब साइंस फिक्शन से हॉलीवुड फ़िल्म तक में फैंटेसी केंद्रीय कला फॉर्म है तब हिंदी सूखे तथ्य की लाठी से रचना की भैंस हांककर इतराती रहती है।यह सृजन मुक्ति
के पुनर्मूल्यांकन का दौर है।
          फैंटेसी दरअसल वह साहित्यिक डिवाइस है जो हमारे समय की विस्मृति की रिकवरी कर सकती है और खोई हुई सम्वेदना को रिस्टोर करने में अहम भूमिका निभा सकती है।मुक्तिबोध फैंटेसी के दम पर सभ्यता समीक्षा की बात करते हैं।मुक्तिबोध फैंटेसी के कवि नहीं बल्कि अतिरिक्त फैंटेसी के बड़े कवि हैं।
      यह सांस्कृतिक सिजोफ्रेनिया और मेनिया का दौर है।सत्ता मिथक का दुरूपयोग फैंटेसी के माध्यम से कर रही है।दरअसल फैंटेसी ऐसा मानस शिल्प है जो मिथक को पिघलाकर नया मूल्य गढ़ सकता है।आजकल फैंटेसी के माध्यम से पुराने मिथकों को सत्ता अपने शासन और दमन का औजार बना रही है।ऐसे वक्त में लेखकों कलाकारों को वैकल्पिक प्रतिरोध रचने में फैंटेसी मदद कर सकती है।मुक्तिबोध की इतिहास पर किताब आजाद में जब्त ही नहीं हुई थी बल्कि उनकी अँधेरे में कविता का पूर्व नाम आशंका के द्वीप अँधेरे में है।इस कविता के 50 साल होने पर हमने एक दिवसीय आयोजन किया था।संयोग से तब वह तल नहीं खुल पाया था जो अब खुलता जा रहा है।
       पाठक के नजरिए से हिंदी में कभी फैंटेसी पर बात नहीं होती है।पाठक गहरे अर्थों में आलोचक और रचनाकार दोनों होता है।उसके अचेतन धरातल को बिना फैंटेसाइज किए कोई रचना उसे आनंद और अस्वादबोध से नहीं भर सकती है।यह पाठकोन्मुख समय है।पाठकीय लोकतंत्र के उत्तर समय में पुराने ढंग की लेखकीय,आलोचकीय और गुरुडम वाली जमींदारी नहीं चल सकती है।कारपोरेट धमकी का भी यहां असर उतना नहीं हो पाएगा।इसलिए पाठक के नए लोकतंत्र के पुनर्जन्म की दिशा में हम सबको मिलकर प्रयास करना होगा।
       मुझे लगता है प्रणव के दोनों सवालों का जवाब ऊपर फैला हुआ है। कला के तीन क्षणों की समझ के लिए फैंटेसी की समझ प्राथमिक शर्त है।
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...जारी...

मालवीय चबूतरे से जानिए मुक्तिबोध और फैंटेसी विमर्श:रामाज्ञा शशिधर

📚पुरानी किताब:नई बात संवाद श्रृंखला📚
::फैंटेसी विमर्श::
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सहमतिपूर्ण यथार्थ से मुक्ति की यात्रा ही फैंटेसी है-मालवीय चबूतरा
@रामाज्ञा शशिधर
📚पुरानी किताब:नई बात📚 संवाद श्रृंखला के अंतर्गत आज मुक्तिबोध के बहाने फैंटेसी विमर्श लगभग डेढ़ घन्टे चला।सवाल जवाब सत्र में विज्ञान के छात्र प्रणव का प्रश्न फैंटेसी और  सभ्यता की मुक्ति से जुड़ा था-विज्ञान  किस तरह फैंटेसी का हत्यारा है?मिथक के रूप में फैंटेसी किस तरह सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है?
             इन प्रश्नों से पहले जानिए फैंटेसी क्या है?इसलिए भी कि पचीस से अधिक संख्या में आए ज्ञान पिपासुओं का कामन
सवाल था-फैंटेसी क्या है?क्या उसका उपयोग सिर्फ मुक्तिबोध के यहां मिलता है?क्या फैंटेसी हरेक चेतना की सामान्य विशेषता है या सिर्फ लेखक की पूँजी है?क्या फैंटेसी फॉर्म है या चेतना का सामान्य गुण?क्या और भी रचनाकारों की रचनाओं में भी फैंटेसी मिलती है?फैंटेसी का बोध एक पाठक या श्रोता दर्शक कैसे कर सकता है?आदि।
           बात परिचित कवि मुक्तिबोध के चित्र विधान से शुरू करता हूँ।गुफा में मशाल जलती है और उस रोशनी में दीवार की भीत से दूसरा चेहरा उभरता है।वह रक्तस्नात पुरुष कौन है?एक बच्चा फूल में बदल जाता है।फूल बन्दूक में भी बदल सकता है।मूर्ति के फ़टे सर से खून का फब्बारा गिरता है।कहीं टॉलस्टाय मिलते हैं तो कहीं मार्क्स।कहीं बुद्ध दिखते हैं तो कहीं गांधी।लकड़ी का रावण जीवित से अधिक घातक दीखता है।वह ब्राह्मण शिक्षक असमय मर गया था फिर कूप के अतल में उसकी रूह ब्रह्मराक्षस बनकर अट्टहास क्यों करती है!
            ये काव्य बिंब वस्तुतः फैंटेसी के प्रयोग से संभव काव्य रूप हैं।
        फैंटेसी प्रचलित और कंडीशंड यथार्थ से मुक्ति की मानसिक यात्रा है।फैंटेसी कल्पना प्रसूत स्वप्न चित्र की श्रृंखला है।फैंटेसी मानव चेतना की बुनियादी विशेषता है।यह मानव अचेतन की विशिष्ट क्षमता है।फैंटेसी सिर्फ किसी लेखक कलाकार की जागीर नहीं।फैंटेसी रचनकार के यहां आकर विशेष कला रूप की भूमिका अदा करती है लेकिन पाठक को भी लेखक के मानसिक धरातल पर गए बिना रचना का बोध असम्भव है।इसलिए फैंटेसी रूप की समझ और विकास पाठक की भी जरूरत है।हिंदी आलोचना और एकेडमिक बहस में मुक्तिबोध के अलावा सामान्य रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए जब फैंटेसी की चर्चा ही नहीं होती तो पाठक के अचेतन पर कौन सोचता है?यह हिंदी के सौंदर्य चिंतन की भयावह दरिद्रता है।दर्शन की कंगाली।
           फैंटेसी का सम्बन्ध मानव के अस्तित्व विकास से जुड़ा है।मानव मन अधूरी इच्छाओं की खोज है,पूर्ति की कोशिश है।आकांक्षा की यात्रा में अनेक बाधाएं हैं।मानव का चेतन उसके ही भीतर के संसार का दमन करता है।वह समाज और बाह्य जगत के शासन बन्धन से जकड़ा है।लेकिन एक और मन है जो भीतर भीतर यात्रा करता रहता है।फ्रायड उसे अनकंसस कहते हैं।लकां उसे इमेजनरी और सिम्बलिक में बांटते हैं।युंग के लिए वह मिथक और सिम्बल का स्टोर है।मानस के अचेतन क्षेत्र से व्यक्तित्व संचालित होता है।अचेतन इलाके में ही स्मृति कल्पना भाषा चित्र और स्वप्न की गतिविधि होती है। अधूरी इच्छाओं की पूर्ति की यात्रा स्वप्न है और उसकी चित्रावली फैंटेसी है।
               फैंटेसी चित्र श्रृंखला है और तरल यात्रा है।उसके भाषिक चिह्न में ढलने का द्वंद्वात्मक नियम है।इस सामग्री की खोज में मनोभाषा विज्ञान ऊंचाई छू चूका है।लेकिन हमारी ट्रेन मुक्तिबोध नामक प्लेटफार्म पर ही अटकी हुई है।मुक्तिबोध मनोविज्ञान के गहरे अध्येता थे।
एक साहित्यिक की डायरी और उनकी पूरी आलोचना में मनोचिन्तन बिखरा पड़ा है। हिंदी की स्थूल कथित प्रगतिशील आलोचना को जो बात समझ में न आए वह जनविरोधी स्टाइल है।आजकल इसीलिए वह खुद जन से दूर शूर गान करती दिखती है।
            फैंटेसी वस्तुतः केवल कला शिल्प ही नहीं मोड भी है।पारम्परिक,यथार्थवादी और आधुनिकतावादी साहित्य में फैंटेसी की उपस्थिति अनुपस्थिति से मानव सभ्यता के उठान ढलान को परखा जा सकता है।
        होमर,कालिदास,व्यास,बाल्मीकि से लेकर जातक,पंचतंत्र,पुराण,संत साहित्य तक फैंटेसी का साम्राज्य है।पराशक्ति,जादू,प्रकृति और मिथक फैंटेसी निर्माण की आधारभूमि है।इसलिए सामंती दौर की रचनाशीलता में यह कला रूप भरपूर है।आधुनिक विज्ञानवादी चेतना ने मानव नियति को ही नहीं उसके अचेतन को क्षतिग्रस्त कर दिया।बुद्धि और तर्क की प्रयोगशाला में आत्मा का पोस्टमार्टम शुरू हुआ।परिणाम सामने है।बाल्ज़ाक के किसान से प्रेमचंद के गोदान तक प्रत्यक्ष यथार्थ की ऐसी आंधी चली कि मानव मन का कोई सुधिवेत्ता नहीं रहा।संवेदना और चेतना को पुरातत्व का म्यूजियम बना दिया गया।मरी हुई मूर्तियां मुद्रा अपना सकतीं लेकिन नृत्य नहीं कर सकती।यथार्थवादी साहित्य में फैंटेसी न्यूनतम है।आधुनिकतावादी मनुष्य का संकट उसके मानस के अलगाव और विघटन का संकट है।अलगाव ही वह क्षेत्र है जो उसके मानस को एकालाप की फुर्सत देता है।दुर्भाग्य से आधुनिकताबोध अलगाव को काफ्का के मेटामोर्फोसिस के कीड़े में बदलने के बदले शेखर का ईगो खोजता रह गया।फलतः कला वीणा असाध्य हो गई।काफ्का अलगाव से फैंटेसी रचते हैं और मुक्तिबोध भी।मुक्तिबोध की फैंटेसी एक आधुनिक ट्रेजिक
मनुष्य के एकालाप और आत्म हाहाकार से उपजी हुई फैंटेसी है।वह तब कविता को ढाल रही है जब आधुनिक मन बहुत कुछ रियाज और मिजाज खो चूका है।इसलिए
सरल कवि मुक्तिबोध जटिल लगते हैं।मूढ़,पेशेवर और धंधेबाज विश्लेषक उस हथियार से पुरस्कार का शिकार और वेतन का रोजगार चलाते हैं।
         फैंटेसी केवल कविता की पूँजी नहीं बल्कि फिक्शन की भी सम्पदा है।जिसे जादुई यथार्थवाद कहते हैं उसने उपन्यास की रचनात्मक सम्भावना को वैश्विक ऊंचाई दी है।उपन्यास सृजन में भी  नए सिरे से महाकाव्य के दौर को दुहराया जा रहा है।दुर्भाग्य है कि हिंदी में देवकीनंदन खत्री की परंपरा का विकास नहीं हुआ।आज जब साइंस फिक्शन से हॉलीवुड फ़िल्म तक में फैंटेसी केंद्रीय कला फॉर्म है तब हिंदी सूखे तथ्य की लाठी से रचना की भैंस हांककर इतराती रहती है।यह सृजन मुक्ति
के पुनर्मूल्यांकन का दौर है।
          फैंटेसी दरअसल वह साहित्यिक डिवाइस है जो हमारे समय की विस्मृति की रिकवरी कर सकती है और खोई हुई सम्वेदना को रिस्टोर करने में अहम भूमिका निभा सकती है।मुक्तिबोध फैंटेसी के दम पर सभ्यता समीक्षा की बात करते हैं।मुक्तिबोध फैंटेसी के कवि नहीं बल्कि अतिरिक्त फैंटेसी के बड़े कवि हैं।
      यह सांस्कृतिक सिजोफ्रेनिया और मेनिया का दौर है।सत्ता मिथक का दुरूपयोग फैंटेसी के माध्यम से कर रही है।दरअसल फैंटेसी ऐसा मानस शिल्प है जो मिथक को पिघलाकर नया मूल्य गढ़ सकता है।आजकल फैंटेसी के माध्यम से पुराने मिथकों को सत्ता अपने शासन और दमन का औजार बना रही है।ऐसे वक्त में लेखकों कलाकारों को वैकल्पिक प्रतिरोध रचने में फैंटेसी मदद कर सकती है।मुक्तिबोध की इतिहास पर किताब आजाद में जब्त ही नहीं हुई थी बल्कि उनकी अँधेरे में कविता का पूर्व नाम आशंका के द्वीप अँधेरे में है।इस कविता के 50 साल होने पर हमने एक दिवसीय आयोजन किया था।संयोग से तब वह तल नहीं खुल पाया था जो अब खुलता जा रहा है।
       पाठक के नजरिए से हिंदी में कभी फैंटेसी पर बात नहीं होती है।पाठक गहरे अर्थों में आलोचक और रचनाकार दोनों होता है।उसके अचेतन धरातल को बिना फैंटेसाइज किए कोई रचना उसे आनंद और अस्वादबोध से नहीं भर सकती है।यह पाठकोन्मुख समय है।पाठकीय लोकतंत्र के उत्तर समय में पुराने ढंग की लेखकीय,आलोचकीय और गुरुडम वाली जमींदारी नहीं चल सकती है।कारपोरेट धमकी का भी यहां असर उतना नहीं हो पाएगा।इसलिए पाठक के नए लोकतंत्र के पुनर्जन्म की दिशा में हम सबको मिलकर प्रयास करना होगा।
       मुझे लगता है प्रणव के दोनों सवालों का जवाब ऊपर फैला हुआ है। कला के तीन क्षणों की समझ के लिए फैंटेसी की समझ प्राथमिक शर्त है।
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