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17 नवंबर, 2017

सिमरिया में बादल एक कवि का नाम है:शशिधर

::निधन स्मरण::
#दिनकर की धरती पर अब बादल नहीं गरजे-बरसेंगे!
(तस्वीर:1991,बाएं बादलजी,मध्य में बिहार विध्न परिषद अध्यक्ष उमेश्वर प वर्मा और दाएं मैं:
,सिमरिया,आंसू के अंगारे का दिनकर जयंती में विमोचन)
दिनकर आज रो रहे होंगे।उनकी संतान बादल खो गए।वे सिमरिया के खेत खलिहान मंच पर न तो कभी गरजेंगे और न ही बरसेंगे। दिनकर को अपने ही गाँव में लगातार 30 साल तक किसान और किशोर से जोड़ने वाले बादल की छाया का अभाव भरा नहीं जा सकता।
    इसबार ग्रीष्म में जब बादलजी बीमार पड़े तो रेलवे क्वार्टर प्रवीण,मोनू,फ़िरोज़ के साथ मैं पहुंचा।काफी खोजने के बाद मुलाक़ात हुई।बेड पर थे पर आवाज़ में वही मेघमन्द्र कड़क।बोले-"कुछ लोग मेरे बारे में अफवाह उड़ा रहे हैं।सिमरिया और दिनकर की मिटटी का हूँ।अभी छाती पर मूंग उगाता रहूंगा।"बहुत जल्दी हम नई फसलों को उदास छोड़कर चले गए।

चन्द्रकुमार शर्मा बादल दिनकर की मिट्टी के सच्चे समर्पित साहित्यकार थे।समकालीन कविता का एक ताकतवर कवि।दोमट मिट्टी की ऊर्जा से भरे।वे जीवन भर दिनकर और सिमरिया के लिए साहित्यिक सांस्कृतिक कार्य करते रहे।आदर्श ग्राम सिमरिया और दिनकर पर्व आज जिस भव्य महल  के रूप में प्रसिद्ध हैं उनमें सबसे मजबूत और पहली बुनियाद बादल जी ने डाली थी।बादल जी अतिसाधारण परिवार के होते हुए भी कभी स्वाभिमान,साहित्य और संस्कृति विरोधी मूल्यों से समझौते नहीं किए।सिमरिया को आदर्श बनाने के समर्पित जुनून में  उन्हें एक ओर गाँव के अपराधियों ने उत्पीड़ित किया दूसरी ओर दिनकर मंच के नए रण बांकुरों ने भी बाद में उनका दिनकर मंचीय सम्मान नहीं किया।उनकी आवाज़ दिनकर मंच पर सावन के बादल की तरह गरजती थी मानो वह दिनकर का ही स्वर हो।वे लंबे समय तक प्रलेस में रहे और वहां भी कुछ राजनीतिक जुगाडिए से उनकी अक्कड़ मुठभेड़ होती थी।
       बादलजी और दिनेश दा की जोड़ी अनूठीथी।दिनेश सिंह को ठीकेदार से दिनकर रसिक और अंतर्मुखी से जीभमुखी बनाने में बादल जी का अभूतपूर्व योगदान था।बादल जी गंगा किनारे मेरे पडोसी थे।वे गंगा के पानी से बने बादल थे इसलिए एक दियर के किसान समाज के सारे गुण उनमें रहे।सिमरिया में जब मैंने आँखें खोली तो दो आवाज़ों से घिरा पाया।एक तो गोलियों की गड़गड़ाहट और दूसरी दिनकर काव्य की ठनक।दिनकर को मैंने बादल के कंठ से पहली बार जाना। बादल जी का सिमरिया के विकास,सांस्कृतिक निर्माण,शिक्षा सुधार,अपराध मुक्ति,आदर्श ग्राम निर्माण और दिनकर पर्व निर्माण में नींव के पत्थर जैसा महत्व है।यह स्मृति ध्वंस और बाजारू वर्चस्व का बेहद क्रूर समय है।फिर भी उम्मीद करता हूँ कि सिमरिया दिनकर की भूमि होने के नाते बादल जी के सारे योगदान को स्मृति के खज़ाने से निकाल कर समय देवता की छाती पर लिख देगा।सिमरिया आज भी किसानों का गाँव है।किसान और खेत को जितना दिनकर चाहिए उतना ही बादल भी। अपने मंच उस्ताद को भींगी आँखों और मर्मी मन से श्रद्धांजलि देता हूँ।गाँव वाले बड़ी संख्या में बादल जी का मृत्यु उत्सव मनाए क्योंकि वे मरेंगे नहीं।काश मैं उनकी अर्थी को कन्धा देने गाँव में रहता!

13 नवंबर, 2017

खांसी वाली हिंदी बनाम काशीवाली हिंदी

::तुम खांसीवाली हिंदी,हम काशीवाली हिंदी!::
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5वां दिन:हिंदी अड़ी अस्सी पर धूमिल(और मुक्तिबोध भी?)
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हिंदी अड़ी पर  हमने मुक्तिबोध की अँधेरे में और धूमिल की पटकथा पर लंबी बहस क्यों की?इसलिए कि देश  की तरह मुक्तिबोध और धूमिल की कविता में भी काफी अँधेरा है।
        तुलसी से लेकर धूमिल तक को भाषा और लोक का आधार देने वाली यह अस्सी की हिंदी अड़ी है !आप पूछिए यह हिंदी अड़ी क्यों है और सर्वविद्या की राजधानी का मुझ जैसा मास्टर यहाँ का चायेड़ी क्यों है?
       आप उत्तर कबीर से  उत्तर लीजिए कि यह चाय वाला कोई नकली साक्षर चायवाला भाषणबाज नहीं बल्कि चालीस पार का शख्स हिंदी आंदोलन वाले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग का पास आउट पुरातन छात्र है।
       जी हाँ।खानदानी गोल्ड मेडल और नौकरी लुटाने वाले हिंदी के अंतरराष्ट्रीय सरदार प्रो विजयपाल सिंह के विभाग का बेरोजगार नौजवान वीरेंद्र सरदार।
      कहते हैं हिंदी डिग्रीधारी वीरेंद्र सरदार-गुरूजी।जब काशीनाथ सिंह के चेले ही नालायक निकल गए तो मेरी क्या औकात! देखिए डा गया सिंह के भाई डा गिरिधर सिंह को!हिंदी विभाग से पीएचडी करने के बाद बेरोजगारी का ऐसा सदमा लगा कि ये हिन्दीदाँ साहब या तो पेड़ पर घोंसला बनाकर साधना करते हैं या हरश्चंद्र घाट पर आत्मा बैंक का बही खाता चलाते हुए प्रबन्धक की नौकरी करते हैं।
      मानना है हिंदी सरदार का कि अस्सी से काशीनाथ और चौथीराम मुंह छुपाकर इसलिए नहीं भागे कि अड़ी उनके लायक नहीं रही थी बल्कि इसलिए गुजर गए कि वे हिंदी के सदाबहार छात्र वीरेंद्र को चाय बेचते देखकर ग्लानि और अपराध से भर उठते थे।
     गुरूजी!मैं जब क्लास में जाता था तो तब काठ वाली कुर्सी होती थी।क्लास में गुरूजी लोग नाऊ अधिक दिखते  और पंडित कम।पता नहींक्यों उन्हें चेले के दिमाग से ज्यादा जुल्फ सजी खोपड़ी से  प्यार था! मैं हिंदी की क्लास करने से ज्यादा पहलवानी करने लगा।मैंने हिंदी विभाग को पहलवानी में डिस्ट्रिक्ट और प्रोविन्स लेवल के कई गोल्ड मेडल दिलाए और हिंदी का नाम रोशन किया।    
       गुरूजी!दुःख क्या उघारूं!ये प्रो काशीनाथ मेरे लिए काशी ही साबित हुए और चौथीराम तो मेरे लिए  चौथी ही रहे।जिस हिंदी विभाग में   नकली गोल्ड मेडल को सैलुनिया सिंहासन प्राप्त है वहां के कुर्सी वाले विद्वान् मेरे जैसे ऑरिजिनल गोल्ड मेडिलिस्ट हिंदी पहलवान को क्यों पूछें।
       गुरूजी!जातिवाद और स्वार्थ का साँढ़ हिंदी के खेत को ऐसा चर गया कि वहां खूँटी ही खूँटी बची है।पानी दीजिए पर तलवा बचाकर।
             कहना है हिंदी अड़ी के चायवाला वीरेंद्र सरदार का कि अब के
लड़के पीएचडी कर रहे हैं और धृतराष्ट्र का उच्चारण नहीं लिख सकते।
            "मैं तो विद्योत्तमा नामक प्रोफेसरनी का चेला हूँ जो एकमात्र क्लासमुखी विदुषी थी।आज के लौंडे अस्सी के महान हिंदी डिग्रीधारी बेेरोजगार  सुश्रुत आचार्य से मिल लें तो उनकी हिंदी का इलाज स्वतः
हो जाएगा।"
          "परिसर की मरियल हिंदी है और अस्सी की हिंदी अड़ियल हिंदी।"
         गुरूजी!आज भी मैं तुलसी का नाम लेकर कोयला जलाता हूँ और धूमिल का नाम लेकर चूल्हा ठंढाता हूँ।बीच में कबीर रैदास कीनाराम भारतेंदु प्रसाद त्रिलोचन काशीनाथ गया सिंह आते जाते रहते हैं।
           गुरूजी!आज आपने धूमिल को यादकर इसलिए अच्छा किया कि काशी के नक्शे पर पहले गाय दूध  फैलाती थी और आजकल गोबर लीपती है।
          गुरूजी!नहीं समझे?गोष्ठीबाज हैं न!मने कि पहले मसक में दूध भरकर नाली धोई जाती थी और आजकल मुखमसक
में शब्द और पीक भरकर।
          गुरूजी...हिंदी सरदार सुनाते रहे!सुनाते रहते हैं।।   
        जानिए!अड़ी पर मंच माला स्वागत चादर आदर फादर गिव एंड टेक बटर शटर की कोई गुंजाइश नहीं।यहां सत्तर साल पुराना गटर है। गटर के ऊपर तीस साल पुरानी सड़क है।,सड़क के ऊपर दो करोड़ साल पुराना लौह चूल्हा है।चूल्हे में पचास लाख साल पुराना कोयला है।कोयले में सूर्य इतनी पुरानी आग है।आग पर अंग्रेजीराज इतनी पुरानी चाय पत्ती है।उसपर मुगल सम्राट अकबर की दान दी हुई एक केतली है।...और उस केतली से खेलती हुई खड़ी बोली हिंदी इतने ही पुराने हिंदी चायवाले वीरेंद्र सरदार की उँगलियाँ हैं।
         चाय खौलती रहती है,शब्द पककर झरते रहते हैं।
        यहां अडीबाज नहीं बोलते हैं ।वे मिट्टी के पुरबे में चाय लिये मिट्टी की मूरत सरीखे सुनते रहते हैं।बोलता है सिर्फ हिंदी का सरदार।अस्सी अड़ियों का हाइएस्ट क्वालिफाइड चायवाला।
         कहना है हिंदी सरदार का कि गुरूजी!जितने देसी विदेसी को आप लोगों ने लाख टका तनख्वाह लेकर हिंदी नहीं सिखाई होगी उससे दस गुना ज्यादा तो मैंने फ्री जोन हिंदी फैला दी।वीरेंद्र सरदार के हिंदी सीखे चेले दुनिया के हर कंट्री में हैं।चाहे जापान हो कि उज़्बेकिस्तान।हिंदी सरदार के यहां विदेशी लाइन में खड़े होकर चायेड़ी हिंदी सीखते हैं।
       हिंदी अड़ी पर मेरा जापानी चेला मानस चाय पीने कम हिंदी सीखने ज्यादा जाता है।
         वीरेंद्र सरदार खांसी वाली हिंदी नहीं,काशी वाली हिंदी सिखाते हैं...भोंसरो के अमीर खुसरो के...का रजा मजा बा..का गुरु शुरू हौ..
        यह हिंदी अड़ी है,समीक्षा अड़ी है,गाउल अड़ी है,यह फाउल अड़ी है,रोमांस अड़ी है,यह कत्थक डांस अड़ी है,यह नेमी अड़ी है,यह प्रेमी अड़ी है,यह फोसला अड़ी है,यह घोंसला अड़ी है,धुनिया अड़ी है,हरमुनिया अड़ी है,यह अचल अड़ी है,यह सचल अड़ी है,यह बाप अड़ी है बेटा अड़ी है।कहते हैं प्राइमरी शिक्षक हिन्दीदाँ डा आशीष पांडेय कि जब से काशी से पेड़ गायब होकर एक जगह केंद्रित हो गए हैं तबसे हर अड़ी इंटेलेक्चुअल से महरूम एजेंट के साथ खड़ी है।
     "नहीं समझे।समझेगें भी नहीं आप।ऐसा इसलिए कि ये इंटेलेक्चुअल नामक जीव यूनिभरसिटी में पाये जाते हैं।"
      कहना है ह्मबोट गुरु का...।
       ह्मबोट का मतलब?...
      फिर नहीं समझे आप...
          एक बोतल सीरप खरीदिए...काशी की दक्षिण दिशा में कॅफेश्वर महादेव का पिंडा है...उन्हें तन मन धन से साधना कर उस पर बूँद बूँद गिराइए...हिंदी का ऐसा विद्वान् बनेंगे कि गणेश और सरस्वती आपके मुंशी हो जाएंगे...
        अब मुक्तिबोध और धूमिल पर अड़ी की बहस शुरू होती है..सुनाइए एसएस तिवारी जी।विचार प्रगट कीजिए कन्हैया पांडेय जी।
      अभिव्यक्त कीजिए शुक्ला जी मिस्र जी अध्याय जी उपाध्याय जी पांडेय जी शर्मा जी द्विवेदी जी दूबे जी त्रिवेदी जी त्रिपाठी जी तिवारी जी चतुर्वेदी जी चौबे पंजे जी छब्बे जी छक्के जी सत्ते जी सट्टे जी अठे जी....
      "मैं सुन रहा हूँ वीरेंदर सरदार
       हिंदी का गोल्ड मेडलिस्ट बेरोजगार!"

10 नवंबर, 2017

मालवीय चबूतरे पर गिरिजा देवी की याद में संगीत विमर्श

आज ठुमरी की मल्लिका अप्पा जी को  बीएचयू  के मालवीय चबूतरे पर अनोखे रंग और ढंग से याद किया गया।गिरिजा देवी की याद में 'संगीत और शब्द' विषय पर आयोजित चबूतरा चर्चा में कैम्पस,नगर और देश के
संगीत रसिकों और विमर्शकारों ने हिस्सा लिया।
    सुबह 8.20 पर गिरिजा देवी के फेन जुट चुके थे।बारी बारी से संगीत प्रेमी आते गए और मालवीय चबूतरे का विमर्श कारवां बढ़ता गया।जहाँ कैम्पस भर के विभिन्न विषयों के छात्र छात्राएं संगीत विमर्श के लिए  आए वहीं स्थानिक गुरुओं के अतिरिक्त मुंबई से मनोज भावुक,देवरिया से जनार्दन सिंह तथा नगर से प्रो सत्यदेव त्रिपाठी,वाचस्पति और आशीष पांडेय को संगीत विमर्श खींच लाया।
     
          संगीत परिचर्चा की अध्यक्षता वाचस्पति ने की तथा परिचर्चा संचालन चबूतरा संस्थापक डा रामाज्ञा शशिधर ने किया।
        बनारस घराने की शान और पूरब अंग की गायकी की पहचान गिरिजा देवी के गायन का गंभीर विश्लेषण
करते हुए संगीत समीक्षक डा आशीष पांडेय ने कहा कि
गिरिजा देवी ने ठुमरी को श्रृंगार और मनुहार से निकालकर विश्व भर में रूहानी दर्जा दिलाया।संगीत जगत में गिरिजा देवी संगीत का पर्याय हैं।गिरिजा देवी ने काशी की गलियों की क्रियोल भाषा में ठुमरी के बोल दिए वहीँ आम जीवन से लोकधुनों को चुनकर उन्हें राग
के रथ पर सवार किया।गिरिजा देवी ने ठुमरी को रागों का गुलदस्ता बना दिया।गिरिजा देवी के कंठ में अनूठी मिठास और खनक के मेल ने साहित्यिक अन्योक्ति के सहारे ठुमरी को अभूतपूर्व ऊंचाई दी।
      नाट्य समीक्षक प्रो सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि गिरिजा देवी ने ठुमरी में प्रेम,स्वप्न और भक्ति की ऐसी
त्रिवेणी बहाई जिसका दीवाना सदियों तक ज़माना रहेगा।गीतकार मनोज भावुक ने कहा कि गिरिजा देवी पूरबिया सेमिक्लासिकल की जड़ हैं जिनके बिना संगीत की नई पीढ़ी प्लास्टिक का फूल साबित होगी।भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि गिरिजा देवी में संगीतकार के भीतर
गुरू शिष्य परंपरा का एक आदर्श शिक्षक था।उन्होंने ठुमरी को भोजपुरी गीतों की अश्लीलता के बरक्स अध्यात्म का मार्ग दिया।जनार्दन सिंह ने कहा कि भोजपुरी की हाइटेक और अश्लील संगीत पीढ़ी को गिरिजा देवी से सच्चे संगीत और लोक की नई नई प्रयोगशीलता सीखनी चाहिए।
       अरुण तिवारी ने कहा कि जिस समाज में संगीत का विकास होता है वह संवेदनशील और लोकतांत्रिक
समाज बनता है।एथेंस से भारत तक इसके उदाहरण हैं।नेहा ने कहा कि गिरिजा देवी ने गुलाम देश में सामंती
परिवार से बाहर निकलकर स्त्री मुक्ति
की राह दिखाई।सम्भवतः गिरिजा देवी संकट मोचन के संगीत मंच पर क्लासिकल गायन करने वाली प्रथम स्त्री
कलाकार थी।पंकज कुमार ने कहा कि गिरिजा देवी चलती फिरती संगीत सभा थी।वे जितनी बड़ी गायिका थीं उससे बड़ी सम्बंधजीवी बनारसी संस्कृति थी।
      

09 नवंबर, 2017

सिमरिया घाट को धाम नहीं, गंगा ग्राम कहिए


जिस मिट्टी और माँ के आँचल में मैं पैदा और बड़ा हुआ देखते देखते वह लालचियों के अभिनय का केंद्र हो गई।मैंने अपने बचपन में नानी और माँ के सहारे कल्पवास और जीवन का शुद्ध आध्यत्मिक रूप देखा था।किसानी,किंवदन्तियों,साहित्य कलाओं और लोक की यह धरती  धीरे धीरे बाबाओं और उनके लालची भक्तों के जबड़े में आती गई।खेत पहले कल्पवास में बदले और अब बिना सिमरिया से पूछे उसे सिमरिया धाम में बदल दिया गया।हर बात के लिए मिथक गढ़ा गया और मीडिया का दुरूपयोग हुआ।   सिमरिया और उसकी गंगा को आध्यत्म से चुनावी राजनीति और  बाजार का केंद्र बनाने वाले दिमाग हमारे समाज और संस्कृति के दुश्मन ही माने जाएंगे।वे ही आस्था को भीड़ में बदलने और उसकी मौत के जिम्मेदार हैं।दुर्भाग्य है कि वे कहीं शुद्ध बाबा बनकर खड़े हैं और अनेक बार नेता समाजसेवी पत्रकार एनजीओ संस्कृति रक्षक बनकर सक्रिय होते रहे हैं।हजारों साल से सीने पर एक किसानी सभ्यता और सरल शांत जीवन को पालती हुई एक नदी,खेत और गाँव को रौंदने की यह कहानी किसान,नदी और गाँव की हत्या करने वाले परजीवी वर्ग को दोषी करार देने वाले अफ़साने के रूप में लिखी जानी चाहिए।मैं व्यक्तिगत रूप से भीड़ में हुई मौतों से दुखी हूँ लेकिन उस आडम्बर और नियति  का क्या करूँ जो नदी की लाश पर ढोल इस लिए पीट रहे हैं कि कोई कोमल और प्रकृति प्रेमी उसकी कराह न सुन ले।आप सब से अपील है कि फौरी सतही शब्द कारोबार को गहरे सरोकार में बदलते हुए शोर के भीतर की कराह और आह को सुने गुने और आगे बढ़कर हस्तक्षेप करें।@आग्रही गंगा व् सिमरिया पुत्र रामाज्ञा शशिधर

धूमिल की कविता केतली में खौलती चाय है

धूमिल जन्म सप्ताह आरम्भ
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पोई की अड़ी-1
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...यादों का एलबम का पहला पन्ना खुल गया...चौड़ी छाती,घनी मूँछ,ठहाकेदार चेहरा,गुस्सैल शब्द,होठ पर पुरबा,हाथ में साइकिल,डायल टायर,सौ जगह से फटे ट्यूब की चकती,सुलेसन और लंका से खेवली तक की फटी एड़ियों सी सड़कें...
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पीपुल्स हाउस,लंका!विश्व साहित्य की किताबों की कतार।एक रैक पर रखी रूसी किताब-मैक्सिम गोर्की और प्रेमचंद।जेब में पैसे नहीं।ललचाई आँखों से एक नौजवान घन्टे पर से देख रहा है।वह कौन है? धूमिल!
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2 घन्टे तक पोई की अड़ी पर शब्द और यादें बरसते रहे।
~~~~और फिर...
मालवीय चबूतरा और अस्सी चौराहा ब्लॉग की संयुक्त पहल द्वारा आयोजित धूमिल जन्म सप्ताह का आरम्भ पोई की चाय अड़ी अस्सी पर हुआ।'चाय,कविता और लोकतंत्र' बहस श्रृंखला हजारी की अड़ी,पप्पू की अड़ी,कल्लू की अड़ी,वीरेंद्र की अड़ी,संजू की अड़ी से होते हुए लंका की टण्डन चाय अड़ी पर समाप्त होगी।
      अड़ी के अक्खड़ कवि धूमिल पर बहस शुरू करते हुए डा दीनबंधु तिवारी ने कहा कि धूमिल बनारस की चाय की केतली से पैदा हुए कवि हैं। धूमिल की कविता का पानी हमेशा खौलता रहता है।उसमें कोयला जलता है,चीनी और चाय घुलती है,होठ पर फड़फड़ाते हुए हर्फ़ फैलते हैं।
      डा आशीष पांडेय ने कहा कि धूमिल अड़ी से मुहावरे उठाते थे और हर शब्द से संसद को कठघरे में डाल देते हैं।
       पत्रकार जय नारायण ने कहा कि धूमिल की कविता में अस्सी और बनारस की बोली बानी का लोक ठनकता है।
   बीएचयू के पूर्व छात्र नेता अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि धूमिल देहात को कंधे पर उठाए बनारस नगर के पॉलिटिकल टिपण्णीकार थे।
        प्रमोद राजर्षि ने कहा कि धूमिल की कविता के किसान से लेकर मोचीराम तक गुरुधाम की मजूर मंडी के कंकाल हो गए हैं।
      प्रो कन्हैया पांडेय ने कहा कि चायवाला देश का राजा नहीं अस्सी अड़ी का पोई ही हो सकता है।
       जन साहित्य प्रचारक प्रभुनाथ सिंह ने कहा कि धूमिल बनारस की सड़क नापने वाले संसद समीक्षक कवि थे।आजकल कमरे में बंद लेखकों को सड़क और जनता से जुड़ने का नुक्स धूमिल से लेना चाहिए।
     कार्यक्रम की अध्यक्षता धूमिल के मित्र वाचस्पति ने की और अड़ी संचालन आयोजन समन्वयक डा रामाज्ञा शशिधर ने किया।अंत में बनारस के प्रसिद्ध कथाकार मनु शर्मा को श्रद्धांजलि दी गई।

25 अक्तूबर, 2017

ठुमरी गायिका गिरिजा देवी बनारस संगीत घराने की आत्मा हैं


पूरब अंग की अप्रतिम आवाज़ कल खामोश हो गई।बनारस की गलियों घाटों से लेकर संकट मोचन संगीत समारोह तक ठुमरी कजरी चैती की ऐसी उपशास्त्रीय आवाज़ जिसे सुनने के लिए
एक पनेरी से लेकर पंडित तक बेकरार रहता था।8 मई 1929 को गुलाम बनारस में जन्मी गिरिजा देवी को हारमोनियम बचपन में ही मिल गया था।ज़मींदार रामानंद राय की यह संगीत
और स्त्री के संबंधों के प्रति बनारसी प्रगतिशीलता ही होगी कि 9 साल की नन्हीं बेटी के हाथों वाद्ययंत्र और होठों पर लोकगीत भरना शुरू कर दिया जो 24 अक्टूबर 2017 को अंतिम साँस के साथ ही छूट पाए।
         गिरिजा देवी बनारस के उपशास्त्रीय संगीत घराने की चलती फिरती प्रयोगशाला थीं।पुरबिया मिट्टी से लोकधुन और लोकगीत को चुनकर शास्त्रीय भट्ठी में तरासने का और उसे विश्व के संगीत पटल पर फ़ैलाने का उनका कार्य अनवरत चलता रहा।वे बनारसी ज़िंदादिली और सामाजिक कला की अनूठी मिसाल थीं।ठुमरी साम्राज्ञी के नाम से सुचर्चित अप्पा जी का गायन आगे आगे स्पेस बनाता था और पुरस्कार सम्मान पीछे पीछे लटककर अपनी विश्वसनीयता अर्जित करते थे।गिरिजा जी ने बीएचयू और आइटीसी रिसर्च अकादेमी कोलकाता में संगीत फेकल्टी के रूप में जितना बड़ा योगदान दिया उससे बड़ा योगदान भोजपुरिया लोकधुनों और लोकशब्दों को अनेक महान संगीत साधकों के सहयोग से राष्ट्रीय वैश्विक श्रोता वर्ग तैयार कर किया।बनारस घराने की कई पीढ़ियों का निर्माण गिरिजा देवी के हाथों हुआ है।    
            संगीत और शब्द के साधकों से अपेक्षा है कि वे गिरिजा जी के अनेक गीतों को फिर से सुनकर आएं और चबूतरा चर्चा में बनारस घराने की महान गायिका को अनूठी लोक श्रद्धांजलि दें।

17 अक्तूबर, 2017

अस्सी के चाय घर में इज्जत घर पर बहस


का गुरू?
हाँ गुरू!
कहाँ हउअन?
नजरबंद!
देश में या विदेश में?
हुकुलगंज की जेल में।
मुचलका के देहलस?
नेशनल पांडेय।
जमानत के लिहलस?
सेकुलर तिवारी
कौने ज्वाइन करोगे?लाल सफ़ेद या नारंगी?
भार में जाए दुनिया हम बजाइब हरमुनिया।चाय पार्टी ही ठीक हौ।
---और जोर के ठहाके से पहले छत हिलती है,फिर बेंच हिलती है,फिर गिलास हिलता है,फिर चीनी हिलती है,फिर होठ हिलते हैं,फिर जुबान हिलती है।अंत में दरबे के भीतर पूरा जहान हिलता है।
       पूरे तीन साल चार महीने सोलह दिन के बाद एक होनी घटना घटित हुई।ठीक 2 अक्टूबर के दिन मैं पप्पू चाय की दूकान पर पप्पू,मनोज और डब्बी के सैकड़ों ओरहन और आदेश के बाद गांधी बाबा को सुमरिते हुए पहुंचा। उम्मीद थी कि वे भूल गए होंगे।नजारा था कि वे इंतज़ार ही कर रहे थे।उन्होंने मुझे कोरियन बम की तरह या चीनी झालर की तरह या पाकिस्तानी आतंकी की तरह या जेनयू के कन्हैया कुमार की तरह घूरा और दाएं से बाएं की ओर ईशारा करते हुए बैठ जाने का निर्देश दिया।
कहाँ थे?
बीमार था।
कौन सा रोग हुआ था।
नमोफोबिआ!
ई कोई नया रोग बा?
जाँच में कुछ नहीं आया।
तो?
डॉक्टर ने कहा-कोई पुरानी जगह और साथी को लैक कर रहे हो।फिर से पकड़ लो।
आगे?
मैंने जवाब दिया-क्या पप्पू की चाय दूकान और नेशनल पांडेय
से वाद विवाद हो सकता है?
फिर डॉक्टर ने क्या कहा?
कहा-तुम तो खुद डॉक्टर हो।अंग्रेजी के चक्कर से बचो।हिंदी वाली ही चलाओ।
-अब समझ में आइल गुरु ई दरबा के महत्व।हर जगह मुह पे ताला लागल हौ,कैम्पस के महटर केवल पीएम के क्षेत्र  डेबिट क्रेडिट एटीएम से अकेले में एकालाप करत हौ।बाकी इहै दरबा
बचल बा जेकर कोई झाँट नहीं उखाड़ पैलन।
-लेकिन इहाँ तो कीर्तनिया ही बचे हैं।
-गुरू।उधर देख।सेकुलर तिवारी आ रहे हैं।
        हाथ में छड़ी।नाक पर चश्मा।पेंट पर थ्री पीस।धीरे धीरे शनिचरी चाल।जैसे 1942 में बलिया से चले और 2017 में बनारस पहुंचे हो।नजदीक आने पर पता चला कि बनारस में घूम रहे इनदिनों मुखौटा मोदी की तरह ई कोई सेकुलर उपाध्याय हैं।नए ही जमे हैं।किसी पुराने को उखाड़कर।
-मेरा जवाब-सेकुलर तिवारी की खोज में आया हूँ।बहुत सारे मुखौटेबाज सेकुलरों की तरह प्रो सेकुलर तिवारी भी मालवीय
चबूतरे से फरार हैं।टेंस के माहौल में कैम्पस की ऑक्सीजन तक छोड़ दी है।सुना है जब से राज्य का लॉ एन्ड ऑर्डर हिंदुत्व के हाथ में गया है उन्होंने गांधी से कम्प्लीट पल्ला झाड़ लिया है।
-हाँ।जब से पता चला है कि चाय में गाय का दूध ही पड़ता है बकरी का नहीं।सेकुलर तिवारी नेशनल पांडेय से बिदक गए हैं।
       बहस से इलाज जारी है।पहली चाय गांधीवादी।दूध वाली।सबने पी।दूसरी चाय दक्षिणपंथी।निम्बूवाली।सबने पी।तीसरी चाय वामपंथी।प्योर लिकर।ढाई ने पी।अंतिम दौर में कॉफी।पूंजीवादी।एक ने पी।
        एक ज़माना था जब कहवाघर मशहूर होता होगा।उन्हें सरकारों और बुद्धिजीवियों ने बारी से खत्म कर दिया।आजकल दो ही घर देश में मशहूर हैं।निकम्मे गपोड़ियों और बकैतों का पप्पू चायघर और नमो नमो का इज्जत घर।बाकी देश का बड़ा हिस्सा तिब्बती लामा या बर्मी रोहिंग्या के हाल में पहुँचाया जा रहा है।मैं कन्फ्यूज हूँ कि यहां मैं ईलाज कराने आया हूँ या लाईलाज होने।इसे चार्वाक पर छोड़िए।

08 अक्तूबर, 2017

मालवीय चबूतरे पर 'साम्प्रदायिकता और संस्कृति' निबंध का जन पाठ

प्रेमचंद की निधन तिथि पर विशेष प्रस्तुति-
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यह सत्ता के वर्चस्व और दमन का समय है।यह विचारों की हत्या और आत्महत्या का भी समय है।इसलिए किस्सा कहानी से ज्यादा माकूल कार्य है विचार को साहस के साथ विमर्श के केंद्र में लाना।चबूतरा भले गोल हो लेकिन ज्ञान को चौकोर होना चाहिए।चबूतरा चर्चा की कड़ी में आज प्रेमचंद की निधन तिथि
पर उनके ज्वलन्त निबंध 'साम्प्रदायिकता और संस्कृति' का लोक पाठ हुआ।विद्यार्थी-शिक्षकों ने निबंध पर स्वस्थ वाद विवाद संवाद किया।
           साम्प्रदायिकता और संस्कृति निबंध औपनिवेशिक भारत में 1934 में लिखा गया।2017 में उसके सौ साल पूरे होने में 17 साल हैं।निबंध की हर पंक्ति आज के भारत को समझने और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की मशाल थमाती है।
         निबंध का पाठ मैंने(रामाज्ञा शशिधर) किया।उसके बाद शुरू हुआ वाद विवाद संवाद का सिलसिला।आडंबर और आत्ममुग्धता से मुक्त
ज्ञानमय वातावरण में 12 तर्कशील विद्यार्थियों ने न केवल सारगर्भित और सरोकारी वक्तव्य दिए बल्कि चबूतरे के साल भर के इतिहास में पहली बार शिक्षकों के सामने सवालों और जिज्ञासाओं की झड़ी लगा दी।नेहा,अरुण वर्मा,आदित्य तिवारी,सुनील,पंकज कुमार,राघवेंद्र पांडेय,मनीष यादव,किशन,विमल,विवेक मिश्र आदि के सक्रिय वैचारिक बहस से चबूतरा जीवंत और ज्ञान दीप्त हो उठा।
        मुख्य वक्तव्य देते हुए प्रो सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि प्रेमचंद आर्थिक संस्कृति के व्याख्याता लेखक हैं।संसार में आज सिर्फ आर्थिक संस्कृति का बोलबाला है। सत्ता हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का विभेद दिखाकर समाज में विभाजन और तनाव पैदा करती है।राजनीति अपने वर्चस्व के लिए खानपान,पहनावे,भाषा,कला संगीत को हिन्दू मुस्लिम के नाम पर बाँटना चाहती है। प्रेमचंद इस विभाजन को ख़ारिज करते हैं।संस्कृति समुदाय और भूगोल की उपज है।उन्होंने कहा कि बंगाल,दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत के हिन्दू मुस्लिम की जीवन पद्धति स्थानिक विशेषताओं से बनती है न कि धर्म से।प्रेमचंद संस्कृति को धर्म से अलग कर देखते हैं।
       प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि प्रेमचंद हिंदुत्ववादी गठबंधन के विरुद्ध हैं।साम्प्रदायिकता को सीधे रूप में आने में लज्जा आती है।प्रेमचंद साहित्य को दर्शन,आनंद और उपयोगिता से जोड़ते हुए भी साहित्य के केंद्र में आनंद को रखते हैं।आज के लेखकों का साहित्यिक उद्द्येश्य उपयोगितावादी हो चला है।प्रेमचंद के मूल्यबोध की रक्षा के लिए हमें हर तरह की क़ुरबानी देनी चाहिए।
         नेहा कुमारी ने कहा कि प्रेमचंद अपने निबंध में सत्ताधारी इतिहास के खात्मे की वकालत करते हैं।उन्होंने सवाल किया कि इतिहास और मिथक पर नए सिरे से बहस की जरूरत आ गई है।
        राघवेंद्र पांडेय ने कहा कि विभाजनकारी और सांप्रदायिक चेतना सत्ता के मूल में होती है। इसलिए वह समाज को बांटकर शासन करती है।
         पंकज कुमार ने कहा कि समाज जीवित संस्कृति का निर्माता होता है। सत्ताएं साम्प्रदायिकता को मेनुपुलेट कर अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं।संस्कृति और परंपरा के भेद को समझना भी जरूरी है।आज संस्कृति की नई परिभाषा की जरूरत है।हम एक ओर फेसबुक और मास मीडिया को भी तात्कालिक संस्कृति के भीतर रखते हैं, वहीँ संस्कृति के नाम पर लम्बे अतीत का बोझ ढोने के लिए जनता को मजबूर
किया जाता है।
         अरुण वर्मा ने कहा प्रेमचंद हिन्दू मुसलमान की सारी कमियों और खूबियों को निर्मम ढंग से रखते हैं।दोनों क्षेत्रीय संस्कृति के वाहक हैं न कि अन्य चीजों के।
          आदित्य तिवारी ने वीएस नॉयपाल के संस्कृति चिंतन को प्रेमचंद के निबंध से जोड़ते हुए कहा कि संस्कृति किसी भी समाज की आत्मा होती है। राजनीतिक फायदे के लिए उसका दुरूपयोग मानवता विरोधी कार्य है।
          मनीष यादव ने कहा कि प्रेमचंद सत्ता द्वारा संस्कृति के विभेदीकरण और सतहीकरण के खिलाफ हैं।
           विवेक मिश्र ने कहा कि जब सबका खून लाल है,भूख प्यास,जीव मृत्यु का नियम एक है,तब साम्प्रदायिकता का जन्म आदमी के हित में किस तरह हो सकता है।
          विमल कुमार ने कहा कि प्रेमचंद का यह कथन प्रासंगिक है कि संस्कृति अमीरों का,पेटभरों का,बेफ़िक्रों का व्यसन है।दरिद्रों के लिए प्राणरक्षा ही सबसे बड़ी समस्या है।
         किशन ने कहा कि समाज को पंडे,पुरोहित,मौलवी बाँट रहे हैं।अर्थ से मारी गई जनता सांप्रदायिक अनर्थ का शिकार होती है।भारी जनसमुदाय को इस विभाजन का खामियाज़ा भुगतना पड़ता है।
      ज्ञान विमर्श की यह कड़ी ऐतहासिक और बदलावकारी है।
    मालवीय चबूतरे के शिक्षा विमर्श में साझेदार बुद्धिजीवियों के प्रति आभार।
             -रामाज्ञा शशिधर,संस्थापक,मालवीय चबूतरा
               # 009454820750

03 अक्तूबर, 2017

भारत राष्ट्रवाद से छद्म राष्ट्रवाद की ओर


आज चबूतरा वाले गांधी जी का जन्मदिन है।संयोग से बनारस और बीएचयू में भी गांधी चबूतरा है।सबसे पहले उन्हें प्रणाम।
          आजकल गांधी जी की सेहत ठीक नहीं।स्वराज्य,सत्य,अहिंसा,चरखा, सत्याग्रह सब बीमार हैं।यह भारत के लिए शुभ संकेत नहीं है।
         यह कौन सा मानवीय मूल्य है?यह कौन सी देशभक्ति है?यह कौन सा सुरक्षातन्त्र है?यह किस तरह से भारत माता की पूजा है?
         हर तरफ हिंसा,दमन,डंडा,धमकी,जूनून,उन्माद,अभियक्ति पर रोक,हत्या,जेल,धाराएं,मुकदमे,उत्पीड़न,अवसाद,निराशा,मंदी।हर तरफ एक तरह की भाषा,एक तरह का जुमला,एक तरह से जीने सोचने खाने पीने हंसने बोलने जीने मरने का आतंक।
        19वीं और 20वीं सदी का भारतीय राष्ट्रवाद डंडा और गुंडा विरोधी था।वह मानवमुक्ति का इंद्रधनुषी राष्ट्रवाद था।
सभ्यता के इतिहास में आदमी के लिए जानवर मारा गया लेकिन अब जानवर के लिए आदमी मारा जा रहा है।
       आधुनिक युग में लेखक और नेता के रिश्तों के तीन मॉडल को देखिए।एक माडल टैगोर और गांधी का था।हर मुद्दे पर टकराव लेकिन बराबर की स्वीकृति।दिनकर और नेहरू का सम्बन्ध जहां समर्थन और विरोध साथ साथ।इन सबके विपरीत आजकल 21 वीं सदी में मार दिए गए लेखक कलबुरगी और वर्तमान सत्ता का सम्बन्ध।
         इस व्यवस्था में मुसलमान,लेखक,स्त्री,छात्र शिक्षक कोई भी तर्कशील दिमाग और स्वतन्त्र हृदय सुरक्षित नहीं दिख रहा है।
         इसलिए हमें अपनी विरासत की बहुलतावादी चेतना की वापसी जल्द करनी होगी।

01 अक्तूबर, 2017

बीएचयू में छात्राओं पर लाठीचार्ज से दुखी हैं प्रोफेसर

चबूतरे पर संवाद जारी: "पहले सत्य फिर आत्मरक्षा"
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पाठक मित्रो!
                  मालवीय चबूतरे ने एक दिन पहले ही 'गुरुदेव' रवीन्द्रनाथ टैगोर के 'महात्मा' को याद किया है।कल  सत्य ,अहिंसा और सभ्यता के समीक्षक महात्मा गांधी की जयंती है।गांधी ने हमें सत्याग्रह की महान शिक्षा दी थी।यह अनायास नहीं है कि बीएचयू के कुलगीत को वैज्ञानिक शांति स्वरूप भटनागर ने सर्वप्रथम न केवल उर्दू में लिखा बल्कि 'पहले सत्य फिर आत्मरक्षा' का गांधीवादी पाठ पढ़ाया।।    आजकल चारों ओर झूठ और आत्मरक्षा का बोलबाला है।झूठ ताल ठोंक कर सत्य का पहरेदार होने का दावा कर रहा है,स्वार्थ अपनी कुर्सी,पद,पदोन्नति,यश,सुविधा और भोग के लिए करुणा का गला घोंट रहा है,अँधेरा डिटर्जेंट का विज्ञापन
करते हुए उजाला उजाला चिल्ला रहा है।
       आजकल सत्य को प्रायोजित और झूठ को सत्यापित बताया जा रहा है।विचार धुंध का शिकार है।ज्ञान ने कायरता का कोट पहन लिया है।सिर्फ तालों और फाटकों में बंद आवाज़ें हैं जो खुले आकाश और बहती हवाओं में फैलना चाहती हैं।वे आवाज़ें हरे पत्तोंवाली टहनियां  और नीले
पंखों वाली चिड़ियाँ होकर 'फ्री विल' को विस्तार देना चाहती हैं।
            आज इतवार है।लेकिन मालवीय चबूतरा पहले की तरह गुलजार नहीं।अधिकांश विद्यार्थी दुर्गा को पूजने और रावण को जलाने अपने घर जा चुके हैं।चाय दूकानदार ने बिक्री का रोना रोते हुए चूल्हा ठंडा कर लिया है।बाहरी तत्वों का भी कम ही भीतर आना हुआ है।सिर्फ नगर के व्यापारियों और प्रायवेट अस्पतालों के सैकडों बाहरी कर्मचारियों ने मालवीय बगिया की भरपूर ऑक्सीजन पी और घर से लाये हुए चाय का वीटी भोज किया।
            मैं जब पहुंचा तो नगर के सेवानिवृत शिक्षकों और कैम्पस के सेवामुखी शिक्षकों का टोटा था।मोबाइल लगाया तो प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल का मोबाइल नॉट रिचेबल था।गांधीवादी डा दीनबंधु तिवारी ने पहले ही गांधी चर्चा से मना कर दिया था।बूढ़े वाचस्पति बेटे के साथ कुल्लू की कूल कूल फ़िज़ा का आनंद ले रहे हैं।सेवामुक्त बंबइया प्रो सत्यदेव त्रिपाठी ने सत्य का इज़हार किया कि सर्दी जुकाम और गाँव ने जकड़ लिया है।गतिशील प्रो वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी कहीं नारायण यात्रा पर होंगे और प्रगतिशील प्रोफ़ेसर लोग लेट से सोकर उठते हैं।एक दो शोधार्थी दिखे और एक दो जासूस जो कुछ और ही मूल्य की खोज में होंगे।
           इस बीच अनेक तरह की
मनोयात्राओं से गुज़र रहा था कि प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल आधे घन्टे लेट से प्रकट भए।...फिर शुरू हुआ इतवारी चबूतरा संवाद...
       
         ...एक शिक्षक होने के नाते हम दोनों ने शिक्षा और परिवेश से जुडी ढेर सारी घटनाओं को शेयर किया।हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि मालवीय चबूतरा 'पहले सत्य फिर आत्मरक्षा' के प्रेरक गांधी और मालवीय के विचार को ज़िंदा रखेगा।
           एक शिक्षक का प्रथम कार्य ज्ञान उत्पादन और छात्र हित के बारे में सोचना है।हमारे लिए जितना महत्वपूर्ण किसी एकलव्य का प्रश्न है उतना ही अहम किसी गार्गी का सवाल।शिक्षक किसी खूंटे में बंधा बैल या थाने का सिपाही नहीं जो लाठी की भाषा बोलने के लिए मजबूर हो।किसी भी शिक्षा संस्थान का एक शिक्षक और छात्र से ज्यादा बड़ा शुभचिंतक कोई नहीं हो सकता।
           कभी कभी सत्ता से चाटूकारिता और अनैतिक लाभ के लिए कुछ शिक्षक पथभ्रष्ट होते रहे हैं जिसकी परम्परा द्रोणाचार्य से आजतक जारी है।ऐसे शिक्षक सुकरात याज्ञवल्क्य बुद्ध और मालवीय की परम्परा के विरुद्ध शिक्षा के चेहरे पर कलंक की तरह हैं।वे वेतनजीवी हो सकते हैं बुद्धिजीवी नहीं।
     
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पाठक मित्रो!
            पिछले सप्ताह दो दुःखद घटनाएं कैम्पस में घटी।पहली यह कि एक छात्रा के साथ छेड़खानी हुई।दूसरी यह कि कैम्पस में जेंडर भेदभाव के प्रश्न पर जब छात्राएं 22 और 23 सितम्बर को गांधीवादी तरीके से विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष सत्याग्रह कर रही थीं, जो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है,तब 23 की आधी रात को जिस तरह से प्रशासन ने उनपर लाठीचार्ज किया वह बेहद गैरमानवीय,गैरलोकतंत्रिक और मालवीयजी  की 'मधुर मनोहर अतीव सुंदर यह सर्व विद्या की राजधानी' के संस्थानिक मूल्य के विपरीत है। लोकतंत्र और मानवाधिकार विरोधी  इस अमानवीय कार्य पर मालवीय चबूतरे ने 24 को अपनी असहमति जताई और न्याय व सुविधा संसाधन का आग्रह भी किया।
            एक शिक्षक का बुनियादी धर्म है कि वे कक्षा में दिए जाने वाले ज्ञान के अनुरूप आचरण करे।सा विद्या या विमुक्तये।विद्या स्वयं और अन्य दोनों की पूर्ण मुक्ति का नाम है।आजकल यह तोतारटंत है।सत्य न्याय और ज्ञान की पूर्णता और पक्षधरता ही शिक्षक धर्म है न कि क्लर्की और अधिकारियों के तलवे चाटते हुए सफलता की सीढियां गिनना।
         हमारे देश की शिक्षा को क्लर्की और पराधीनता का दीमक चाट रहा है उससे मुक्ति की जल्द जरूरत है।केवल बड़बोलेपन और जेनुइन शिक्षकों विद्यार्थियों पर दमन उत्पीड़न करने से हमारी  यूनिवर्सिटीज दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में नहीं आएगी।विश्वविद्यालय में बाहरी भीतरी और मान अपमान की राजनीति ज्ञानविरोधी मूल्य और प्रोपगेंडा है।हमें ऐसे दिमाग पर तरस आता है जो विश्वविद्यालय में शामिल 'विश्व' शब्द की व्याख्या में असक्षम होते हैं या जानबूझ कर इस पर ध्यान नहीं देते।यूनिवर्सिटी शब्द यूनिवर्स से बना है।वह जो अखिल ब्रह्माण्ड के ज्ञान और भाव का प्लेटफॉर्म हो।यह एक मॉडर्न धारणा है मनुस्मृति का परिनियम नहीं।
            आजकल हमारे देश में विश्वविद्यालयों को जातिवाद,क्षेत्रवाद,जेंडर भेदभाव,छद्म राष्ट्रवाद और मैकालेवाद का मुफीद अड्डा बना दिया गया है।विभिन्न तरह की स्वतन्त्र बहसों विचारों और ज्ञान उत्पादन के विरुद्ध सर्टिफिकेट वितरण और सत्र निष्पादन का यांत्रिक स्थल
होने के कारण देश के ऊर्जावान दिमाग गैर उत्पादक गतिविधियों में खप जा रहे हैं।
        दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि मालवीय चबूतरे के
व्यापक ज्ञान संवाद के लघु प्रयास से कुछ निजी स्वार्थ की गाजर घास की खेती करने वाले अमेरिकन दिमागों ने हमारी शैक्षिक और वैचारिक भूमिका को नज़र अंदाज करते हुए व्यक्तिगत राग अलापना शुरू किया और प्रोपगैंडा अभियान चलाया।यह सच है कि हमारी भूमिकाएं अनंत हैं लेकिन यह भी सच है कि हमारी भूमिकाओं का एक सरोकारी इतिहास है।यह स्मृति ध्वंस का समय है और
चुनी हुई स्मृतियों से अपने फायदे की राजनीति का भी।अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे कथित बुद्धिजीवी कारपोरेटी मीडिया के एजेंडे पर हर दिन सुर बदल देनेवाले बेसुरा बैंडबाजा के 'होल्डर' नहीं होते।क्या होल्डर दल को जानते हैं?जो केवल बेसुरा फूंकता हो।
            एक शिक्षक का कार्य मुक्ति की शिक्षा प्रदान करना है।मालवीय चबूतरा यह संवाद जारी रखेगा।हमारा कार्य समानता स्वतन्त्रता और सृजन की किसानी करना है और हम अपने पौधों को सींचते रहेंगे।