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09 अक्तूबर, 2010

.साहित्य में करेला ज्यादा फाइदेमंद है या काशीफल


   
नामवर सिंह : नामी आलोचक और ईनामी आलोचक
आलोचना शिल्पी नामवर सिंह चुपचाप चौरासी के हुए. जाहिर है चौरासी में पचहत्तर और अस्सी जैसा शोर होने का कोई तत्व  भी नहीं है. चौरासी पर उन्हें इ एम् इ सी  ग्रुप की ओर से ५१ हजार का शब्द साधना शिखर सम्मान मिला. युवा रचनाकारों में रणेंद्र ,निशांत ,दिलीप कुमार  भी पुरस्कृत हुए. यह सम्मान नामवर सिंह को लेना भी चाहिए क्योंकि इसमें शिखर शब्द जुड़ा हुआ है. कायदे से उन्हें ऐसा कोई सम्मान नहीं लेना चाहिए जिसमे शिखर,चोटी,उत्तुंग,एवरेस्ट,कंचनजंघा आदि न जुड़ा हो.दूसरी बात ,कहा जाता है कि इस  पुरस्कार की शुरुआत की  बुनियाद में वे सुझावदाता थे  और बाद में परामर्शदाता भी. नामवर सिंह की रूचि से सम्मान समारोह उनकी जन्मभूमि बनारस में होना तय हुआ. जिस स्थल पर अस्सी हुआ था वहीँ हुआ. फिर,जो वे चाहते थे वही हुआ. आखिर क्या हुआ?
            कामन वेल्थ गेम में अक्टूबर से बनारसी फूल के निर्यात होने और  देवताओं के लिए फूल का टोटा पड़ने से पहले उन्हें खूब फूल मिले, हिंदी शिक्षक की ओर से दादा गुरू  की उपाधि मिली, प्रलेसिये की तालियाँ मिली,जसमिये का संयोजन-संचालन मिला,हिंदी की नयी पीढ़ी की खचाखच भीड़ मिली. बाकी को पुरस्कार सर्टिफिकेट के अंदाज में मिले ,नामवरजी को सम्मान की अदा में.
            नामवर सिंह का कहना है कि बनारस हिंदी साहित्य का पानीपत है. स्थापित होने के लिए इस मैदान में जीतना होता है.दरअसल रामलीला,हनुमान प्रचार और कुश्ती की परम्परा महाकवि तुलसीदास की देन है . संयोग से नामवर जी बनारस में  तुलसीदास के  बिलकुल पडोसी रहे हैं. वे साहित्यिक कुश्ती के पुराने उस्ताद हैं जिन्हें पहलवानों के मनोविज्ञान और बल विज्ञान की बारीक़ समझ है. हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.राधेश्याम दुबे द्वारा नामवर सिंह को दिया गया दादा गुरू का संबोधन इसलिए भी मौलिक और दिव्यर्थी है क्योंकि बनारस और  हिन्दी में दादाओं ओर गुरुओं की कमी नहीं है.एक साथ  दादा गुरू तो सिर्फ नामवर सिंह ही हो हो सकते हैं. वे ऐसे उस्ताद हैं जिन्हें  पता है कि जहाँ काम आवे सुई कहा करे तरवारि.
           इस बार का विचार- युद्ध शीर्षक था -परंपरा और रचनात्मकता. काशी के प्रकांड पंडितों को परंपरा के संस्कृत-कूप में डालकर नामवरजी ने  खुद रचनात्मकता की रस्सी बाल्टी हथिया ली. बनारसी बुद्धि का मंच करतब ऐसा हुआ कि दिल्ली से पधारे गोपेश्वर सिंह,रोहिणी अग्रवाल,राकेश बिहारी आदि को दर्शक दीर्घा में ही जमे रहना पड़ा. मजेदार यह था कि एक ओर नामवर सिंह विचारों के कनमा छटांक से काम चलाते रहे वहीँ पुरस्कारदाता का भाषण मुम्बइया हवाई मिठाई की  तरह लम्बा और सारहीन था. आत्ममुग्धता और निजगान के साथ पत्रिका का प्रचार मुख्य सार था. पाखी का नामवर विशेषांक विमोचित  हुआ जिसकी बासी सामग्री इस बात का प्रमाण है कि मालिक संपादक  की साहित्यिक निष्ठा कितनी क्रन्तिकारी है. पाखी के संपादक मालिक ने मंच से दहाड़ते हुए कहा कि वे नामवर जी से किसी भी तरह की बात करने की छूट लेते हैं और राजनीति में दिलचस्पी के कारण वे जबरदस्ती लम्बा बोलेंगे. श्रोताओं की चाह थी की नामवर जी अपने समय पर कुछ नया बोलेंगे. उनकी चुप्पी और आयोजक अपूर्व जोशी के बडबोलेपन के पीछे की माया का कारण मजेदार है.
              पिछले शिक्षक दिवस पर अमर उजाला में साहित्य के बुजुर्ग शिक्षक नामवर सिंह पर रवींद्र त्रिपाठी की एक टिपण्णी है- नामवर सिंह हिंदी में चुप्पी के सबसे बड़े मास्टर हैं. 
              इस चुप्पी का गहरा राजनीतिक निहितार्थ  है. बकैत बनारस से उन्होंने चुप्पी का रूप चुना है. इसलिए उनके पान घुलाने,१२० नंबर फांकने और मंद मंद मुस्काने की अपनी रणनीति है. पान नामवर सिंह के मुंह में चलने वाली राजनीति का  चलायमान जयगान है.
             यह चुप्पी उनके लिए जितनी  शुभ हो ,समाज और साहित्य के लिए घातक है. जैसे कुलपति वी एन राय के नया ज्ञानोदय  प्रकरण पर कुलाधिपति पद की चुप्पी, विष्णु खरे के हिदी विभागों को चकला घर कहने और उन्हें पुरुष वेश्या कहने पर चुप्पी, सलवा जुडूम और ग्रीन हंट के संचालक के किताब लोकार्पण को लेकर हुए विरोध पर चुप्पी, बिहार के बाहुबली नेता   के साथ मंच पर जाने के कलाकारों द्वारा विरोध पर चुप्पी,जसवंत सिंह की किताब  की आलोचना के विरोध पर चुप्पी, प्रलेस महासचिव कमला प्रसाद द्वारा फोर्ड फाउन्डेसन से  पैसा लेने लौटाने के प्रकरण पर चुप्पी, बनारस में प्रलेस सम्मलेन में विचारधारा के अंत की घोषणा की आलोचना पर चुप्पी आदि. उम्मीद है, कोई अंध भक्त टेपित लाभ के लिए नामवर सिंह को बोलवाए या भाषण अंकन के सिलसिले में वे  कुछ  बोलें तो बोलें वरना स्टैंड के नाम पर आई सी सी  का कार स्टैंड उनके लिए  सबसे सुविधाजनक स्टैंड  है.
          .पाखी इएमइसी ग्रुप की साहित्यिक पत्रिका है. आइये ,अगस्त में ग्रुप के मालिक का सम्पादकीय स्टैंड सुनिए. संपादक के लिए मध्य मार्ग उत्तम मार्ग है  यानी वर्त्तमान व्यवस्था सुमार्ग है.सम्पादकीय का कहना है कि अरुंधती रॉय अतिवादिता की  शिकार हैं. रूस वैचारिक स्वंत्रता का दुश्मन था.'' विचारधाराओं में बंधा मस्तिष्क अतिवादिता का शिकार हो जाता है.उसमे ठहरे हुए जल के समान दुर्गन्ध आने लगाती है.''  अमेरिकी साम्राज्यवादी नीति रूसी वामपंथ और भारतीय वाम विचारधारा  की जनविरोधी अतिवादिता एक जैसी है. आदिवासी किसानों की लडाई का मुद्दा केवल नक्सलपंथ का मुद्दा है.
        संपादक का कहना है कि कैसे कोई तय कर सकने की निर्णायक भूमिका में है कि विश्वरंजन के हाथ निर्दोषों के खून से रंगे हैं. सम्पादकीय के अनुसार मार्क्सवाद एक आयातित विचारधारा है. आदिवासी किसानों  को क्या पता है  कि मार्क्स-लेनिन 'किस चिड़िया  का नाम है. मालिक संपादक का कहना है" मैं किसी भी विचारधारा को अंतिम  सत्य नहीं मानता.' 
        विचारधारा  को अफीम मानने वाले संपादक क़ी मानवता का राज यहाँ है कि ''मैं एक ब्राहमण परिवार में जन्मा हूँ मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं है. लेकिन मैं इसके लिए शर्मिंदा भी नहीं हूँ.'' आगे ''अब देखिये विचारधाराओं का प्रदूषण.  जब नरेन्द्र मोदी को अपराधी कहता हूँ तो सराहना होती है. हुसैन के खिलाफ लिखता हूँ तो दक्षिण पंथी करार दे दिया जाता हूँ.''
        सितंबर के सम्पादकीय में मालिक का साफ़ कहना है कि मैं एक कपड़ा व्यापारी हूँ और रियल स्टेट का कारोबारी हूँ . भूमंडलीकरण  की  प्रक्रिया के साथ साहित्य में यह परिघटना बड़े पैमाने पर शुरू हुई है जिसमे पुरस्कार और पत्रिकाएं साख, शक्ति और प्रतिष्ठा संरचना के फ्रंट लाइन ट्रूप्स हैं.
      कार्ल-मार्क्स के करेले से ज्यादा कामू के काशीफल पर नजर गडाए रखनेवाली हथेलियों से नामवर सिंह ने सम्मानित होकर बाजार और सरोकार दोनों धर्मों  की सेवा अवश्य की. क्या उस वक्त  तालियों के शोर  में उन्हें याद आया होगा  क़ि  एक विचारधारा में उनकी इतनी आस्था थी कि कभी यहाँ से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को अपन जन्म दिवस मानते थे.
        बनारस में दो  दशक से  सैकड़ों  किसानों और बुनकरों की मौतों का सिलसिला जारी है और देश में लाखों किसानों की.  जनता और जनविचारधारा  को मनुष्यता का दुश्मन माननेवाली वैचारिकी से सम्मानित होते हुए चुप्पी का नहीं टूटना समय और हिंदी बौद्धिकता के सन्नाटे को और बढ़ाता है.भारतीय समाज में हिंदी बौद्धिकता सर्वाधिक सत्तामुखी, उत्सवधर्मी और जन  प्रश्न से कटी है. इसलिए वह सर्वाधिक संदेह के घेरे में है. सन्नाटे के कोहरे में जीवन मूल्य, विचारधारा और जन सरोकार लाश की तरह दबाकर रख दी गयी है. जनता का दुःख तिरस्कृत है और साहित्य में आया दुःख पुरस्कृत.अभी अँधेरा बहुत घना है.  धूप उगने से पहले बहस जारी रहेगी कि करेला ज्यादा फायदेमंद है या काशीफल.    

4 टिप्‍पणियां:

Rmanand ने कहा…

Bachpan me hum log apne gawan me nautanki dekhne jate the. Kisi nautanki kalakar ko thik aise hi "Inam" milta tha jaise Mahan aalochak Namwar ji ko mila bas thoda antar mudra ke aakar ko le ke hai, par sabse achi bat mujhe nautanki kalakaro ka "inam" milne ke bad sukriya bolne ke andaz acha lagta tha.Aise " jin babu ne diya rupaiyya mai unde tahe dil se sukriya ada karti hoon... karti hoon.. karti hoon . wah wah kya maza aata tha.
Mujhe us din aisa laga ki Namwar ji bhi kuch aisa karenge, isse kuch jyda hi acha karenge, aadmi bade hai rakam badi hai......
Koi unhe batayega kya is parampra ke bare me.

सहर् ने कहा…

umda lekhan bhaisahab..

Rajeev Ranjan ने कहा…

‘सन्नाटे के कोहरे में जीवन-मूल्य, विचारधारा और जन-सरोकार लाश की तरह दबाकर रख दी गई है’। कथन में लेखकीय वेदना की त्वरा मारक और हर किस्म की चुप्पी पर झन्नाटेदार विद्युत-झंकार की तरह है। चौराहा पढ़ने वाले समझ रहे हैं...चौरासी पढ़ने वाले समझेंगे। यह उम्मीद की जानी चाहिए। अपने चिर-परिचित भाषाई रंग-रोगन में करिश्माई हैं यह आलेख। दादा-गुरु के किसी आयोजन मंे सामने की प्रथम पंक्ति में बैठने वाले लेखक का इस तरह निमर्मता से लिखना....वैचारिक प्रतिबद्धता से पूर्ण कुहका देने लायक शब्दवाण है।
-राजीव रंजन प्रसाद, शोध-छात्र, प्रयोजनमूलक हिन्दी

Samar ने कहा…

बहुत मारक और फिर भी बहुत संतुलित..
इस लेख की बधाई लें शशिधर जी ..