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24 सितंबर, 2018

दिनकर का राष्ट्रवाद क्या है:रामाज्ञा शशिधर

बुद्ध एक संदेश में कहते हैं कि चारों ओर बहुत अंधकार है।मेरे पास कुछ अंगार हैं।मैं उन्हें अंधकार पर फेंक रहा हूँ।दिनकर के साहित्य को इस रूप में भी देखा जाना चाहिए।कविता और वैचारिक गद्य में लगभग बराबर लेखनी चलाने वाले दिनकर का साहित्य उथल पुथल भरे भारत में
 रोशनी और ताप की तरह है।
      आजकल आइडिया ऑफ़ इंडिया की बहस फिर से चारों ओर है।पिछले सालों में अनेक भारतीय प्रतीकों की तरह दिनकर की छीना झपटी शुरू है।कुछ सत्ता संगठनों के लिए इसके राजनीतिक और भावनात्मक कारण ज्यादा हैं सांस्कृतिक और वैचारिक कम।एक कारण दिनकर के बहुआयामी वैचारिक स्तर और यात्राएं भी है।आखिर दिनकर के पास भविष्य के भारत का नक्शा कैसा था?आज यह एक जलता हुआ सवाल है।
      दिनकर अपने समस्त काव्य चिंतन और गद्य दर्शन में एक नए भारत की खोज में उलझे हुए दिखाई देते हैं।भारत एक राष्ट्र है की धारणा 19वीं सदी के सांस्कृतिक चिंतन की देन है।बंगाल, महाराष्ट्र और हिंदी प्रदेश ने उलझे हुए ढंग से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी कि भारत इंग्लैण्ड से भिन्न किस्म का सामासिक देश है।दिनकर पर रवीन्द्र,इकबाल और गांधी के राष्ट्रवादी चिंतन का गहरा प्रभाव है लेकिन उसकी भावी दिशा नेहरू के इतिहासबोध से जुडी है।दिनकर का भारत भारतीय नवजागरण के संकट से काफी कुछ मुक्त इसलिए  है कि उनके आइडिया ऑफ़ इंडिया पर भारतीय विविधता और आधुनिकता का सकारात्मक प्रभाव है।दिनकर नए भारत की खोज के लिए आख्यान को कई धरातलों और दिशाओं में ले जाते हैं।
       प्रस्थान उनके निजी और ग्रामीण परिवेश से होता है जो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिवेश से जुड़कर आकार ग्रहण करता है।दिनकर का भारत बोध जन गण और प्रभु वर्ग के तनाव से पैदा होता है।किसान और गाँव की लूट पर फिरंगी शासन का पूरा ताना बाना खड़ा था।इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति तक भारतीय खेती की लूट और पारंपरिक उद्योग की बर्बादी पर टिकी थी।दिनकर की बीस साल की उम्र में रचित किसान विद्रोह केंद्रित पहली काव्य पुस्तिका विजय संदेश उपनिवेश और उसके देसी आधार ज़मींदार विरोध का उदाहरण है।दिनकर के राष्ट्र चिंतन में यह तनाव आज़ाद भारत की रचनाशीलता में भी लगातार बना रहता है।राष्ट्र किसका होना चाहिए और कैसा होना चाहिए।यह तनाव उन्हें गांधी से मार्क्स तक की यात्रा कराता है।उनके लिए हाशिए की आर्थिक मुक्ति ही प्रथम राष्ट्रधर्म है।
       स्थानीयता और राष्ट्रीयता के बीच मूल्यों, संस्कृतियों और भाषाओं का जैसा अंतर्विरोध भारत में है यूरोप के लिए यह अकल्पनीय है।दिनकर की शुरूआती कविताओं में मिथिला और ग्रामीण लोक संस्कृति की अनोखी व्यंजना है।बाद की कविताओं में राष्ट्रीयता स्थानीयता पर हावी होती चली गई।दिल्ली पर लिखी कविताओं में गाँव फिर लौटता है।वस्तुतः राष्ट्रवाद स्थानिक राष्ट्रीयता का उत्पीड़क है लेकिन तत्कालीन परिवेश की शायद वह जरूरी मांग थी।किसान जीवन पर यदि दिनकर खण्डकाव्य लिखते तो आज वह करोड़ों किसानों की मुक्ति का लाइट हाउस बन सकती थी।फिर भी जनतंत्र का जन्म जैसी कविताएँ जन भारत की खोज है।
          दिनकर के सामने ही भारत की भारतीयता संकग्रस्त हो चुकी थी।संकीर्णता के विचारों ने अनेक स्तरों पर भारत को कब्जे में ले लिया था लेकिन अतीतबोध एक खतरनाक यात्रा पर था।एक ओर ब्रिटिश बौद्धिकता भारत को संपेरों और मनुस्मृति-पुराणों के देश के रूप में गढ़ रही थी दूसरी ओर पुनरुत्थानवादी विचारधारा भी कमोवेश इसकी पुष्टि दूसरे स्तरों पर कर रही है।राष्ट्र के एकल आख्यान और प्राधिकार को दिनकर ने कविता और गद्य में जितनी बड़ी चुनौती दी है हिंदी का कोई दूसरा उपनिवेशकालीन लेखक नहीं दे पाया।
        दिनकर की अतीत और वर्तमान के रिश्तों पर ये पक्तियां गौरतलब हैं-जब भी अतीत में जाता हूँ/मुदों को नहीं जिलाता हूँ/पीछे हटकर फेंकता वाण/जिससे कंपित हो वर्तमान।आजकल शव साधना की बहार है।दिनकर दो संस्कृत महाकाव्यों
में अधिक विविध,लोकतांत्रिक,रचनात्मक और राजनीतिक महाकाव्य महाभारत की कथा चुनते हैं और सिर्फ रूपक के माध्यम से वर्तमान भारत की समस्या का हल पेश करते हैं।कुरुक्षेत्र एक साथ भारतीय युद्ध की हिंसा की परंपरा और आधुनिकता से उपजे युद्ध की हिंसा दोनों को कटघरे में खड़ा कर देती है।रश्मिरथी सत्ता में बहिष्कृत को जगह दिलाने का आख्यान है।
            अतीत और वर्तमान के रिश्तों पर संस्कृति
के चार अध्याय को नए सिरे से देखा जाना चाहिए।यह भारतीयता की अवधारणा पर दिनकर के चिंतन का निचोड़ है।कट्टर हिन्दुत्वपंथी के लिए यह बेहद असुविधाजनक किताब है।दिनकर भारत की खोज करते हुए औपनिवेशिक ज्ञानकांड की राजनीति का गहरा खंडन करते हैं।दिनकर के भारत की निर्मिति में सिर्फ वेद और उपनिषद ही नहीं बल्कि बौद्ध,जैन,पारसी,इस्लाम का बराबर का योगदान है।वे  इस दर्शन को पलट देते हैं कि मुसलमान दसवीं सदी के बाद आक्रांता के तौर पर
आए।
     वे अपनी बात दक्षिण में मुहम्मद साहब के वक्त इस्लाम की खेप से शुरू करते हैं और भक्तिकाल के निर्माण में सूफी दर्शन के जबर्दस्त
योगदान की सामग्री पेश करते हैं।वे ईसाइयत का आगमन अंग्रेजी हुकूमत के साथ नहीं मानते बल्कि केरल के सागर तट  पहुंचे पहली सहस्राब्दी के चिह्नों में खोजते हैं।दिनकर भक्तिकाव्य को असाम्प्रदायिक और भारतीय कविता का रूहानी केंद्र मानते हैं।आज इस पर नए सिरे पर बहस कि जरूरत है।दिनकर खुसरो को हिंदी का आरंभिक बड़ा कवि मानते हैं और वली दकनी को आधुनिक हिंदी का शानदार उदाहरण।कोई बहस के लिए तैयार नहीं है कि दिनकर के वली का मजार बुलडोजर का शिकार कैसे हुआ है।
        दिनकर मुगल काल को भारतीय स्थापत्य,कला,साहित्य और संगीत का समृद्ध काल साबित करते हैं।इस मोटे लेकिन सुपाठ्य ग्रंथ की भूमिका नेहरू जैसे बहुपठित और आधुनिक चिंतक ने बड़ी मार्मिकता से लिखी है।नेहरू भी अपनी मशहूर इतिहास पुस्तक भारत :एक खोज में नए भारत की ही खोज करते हैं।
         दिनकर आजीवन एक बड़े लेखक की तरह भारतीय समाज की सामूहिक चेतना,मूल्यबोध और भौतिक समस्यायों पर एक साथ चिंतन सृजन करते हैं।गुलाम आधुनिकता ने जिन चीजों पर हमला किया था उनमें सिर्फ अतीत,गांव और पेशे ही नहीं थे बल्कि हमारी स्मृति,वाचिकता,भाषाएँ और संस्कृतिबोध भी थे।रामचन्द्र शुक्ल हिंदी कविता की परिभाषा देते हुए उसे वाचिक का विधान कहते हैं।दिनकर जन संवाद करने वाले वाचिक कवि ही नहीं हैं उनके गद्य के अनेक हिस्से बोलते हुए लगते हैं।
                आजकल हिंदुत्व को भारतीय बताने का फैशन और दर्शन हिलोर ले रहा है।ऐसे लोगों को चाहिए कि अपने ही समाज और संस्कृति में रचे बसे कवि चिंतक को एक बार पढ़ें।बुद्ध कहते हैं कि मैं तुम्हें एक नौका दे रहा हूँ।यह पार उतरने के लिए है रेत पर खींचने के लिए नहीं।दिनकर का विचार नए भारत की चढ़ी हुई नदी में तैयार नौका है।

        

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

आपका ब्लोग उबाउ लग रहा था, उपर -झापर पढ़ के आपकी वैचारिक दृष्टिकोण मालुम चल गई, हिन्दुत्व को किसी दूसरे देश export नहीं कर सकते जैसे दूसरे जगह से export -इंपोर्ट होके वाहियात वैचारिक प्रक्रिया यहाँ विश्फोतक हो रही है,दिन्कर सिमरिया में नहीं जग्नाथपुरी में अपने प्राण तय्जे, वैसे ताज महल आप भेज सकते हैं