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07 दिसंबर, 2010

करघे,शहनाई और धमाके

रामाज्ञा शशिधर 


काशी सिर्फ घंटों-घडियालों और मंदिरों का शहर नहीं है.यह करघों की खटर-पटर और शहनाई की राग-रागिनियों का भी शहर है.आधे चाँद,बल खाती कमर,फसल काटते हासिए की शक्ल वाली सांवली गंगा इसकी दिनचर्या,संवेदना,औघरपन और मस्ती को करीने से रचती है.यहाँ के घाट घातक और मोहक कविता हैं.घाट के पत्थर-पटिया,उससे लगायत असूर्यंपश्या गलियाँ संसार की सारी जगहों से अलग एक ऐसा सम्मोहन-लोक रचते हैं जिसकी तुलना में संसार का  कोई शहर नहीं ठहरता.इस शहर की गतिकी और जीवन को केवल महसूसकर समझा जा सकता है. और स्रोतों से नहीं.मेरी बदनसीबी है कि मैं इस महान शहर को दो धमाकों के बीच की यादों के सहारे महसूस करता हूँ.


बुद्ध,गुलमोहर और बारूद
   
पहला धमाका मेरे आने के तुरत बाद मार्च २००६ के बसंत में तब हुआ था जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के परिसर में गुलमोहर लाली से लबरेज हो चुके थे,आम पर बौर चढ चुका था,टेसू लहकने वाले थे और घाटों के पुरसुकून पत्थरों को नए भौरे और तितलियाँ प्यारगाह में बदल चुके थे.तभी शहर के शहनाई,ठुमरी,कजरी,मल्हार,भैरवी,निर्गुण सुनाने वाले कानों में परतों को फार देनेवाले कई धमाके सुनाई पड़े और कबीर की सफ़ेद चादर खून से भींग गई.दूसरी बार धमाका तब हुआ जब इस शहर में मेरे जन्म की चौथी सालगिरह तबाह बुनकरों के असफल मुर्री बंदी आंदोलन के साथ बीत चुकी थी और मल्लाहों ने अपनी बरसाती गंगा की क्रूरता के ठीक बाद सदियों पुरानी नाव से गुजारिश की थी कि हे तरनी,तू मुझे स्वर्ग नहीं रोटी का पता बता दे. हिंदुत्व की खोपड़ियों व दूसरे के घर में रामलला के जन्म के साठ साल के होने,दूसरे के घर को ध्वस्त करने व जबर्दस्ती कब्जा करने के मताधिकार की उम्र पाने और चेतना को शौर्य दिवस बनाम काला दिवस की छवियों में तब्दील करने के दूसरे दिन की पीली रोशनीवाली शाम खूनी शाम में बदल गई.धमाके की ताकत से मेरी चाय के पुरबे में ठंढक के कारण चिपकी उंगलियां थरथरा उठी.
  पुरबे को कसकर थामे मेरी निगाह मीर घाट से दशाश्वमेध घाट की ओर जाती है.रविदास घाट से राज घाट के बीच के चौरासी घाटों को अपनी आवाज से हिला देनेवाले धमाके में कई आवाजें और चुप्पियाँ  शामिल हैं-मठों,मंदिरों,किलों के परकोटे से आराम फरमा रहे कबूतरों के अचानक भागने से निकले उनके परों और कंठों की आवाजें;गंगा की गोद में अपने सर रख कर संध्या आरती में डूबे परदेशी और भारतीय मेहमानों की भाषा से परे आर्त चीख पुकार;गेंदे के मासूम फूल,मिट्टी के कच्चे दीये,कपास की बाती और तेल को सूखे पत्तल के दोनों में सजाकर रोटी के लिए बाजार का हिस्सा बने बचपन की घायल पुकारें;  मनुष्यता से लबालब मल्लाहों, जिनकी सरफ़रोश आशिकी और मस्तमौला जीवन लय पर फ़िदा यूरोपीय बालाएं भी होती हैं, के जान पर खेलकर जान बचाने की गूंजें;यात्रियों को लेकर भागती हुई नावों के चप्पुओं की पानी से टकराने की छपछ्पाहट.शांति और कोहरे की चादर में लिपटी नदी का पानी लहरों से भर गया.मछलियों,कछुओं और जलचिड़ियों के आशियाने में भूचाल आ गया.गंगापूजक का दीपदान चूर हो गया.तबले का चाम दरक गया.घड़ियाल मूक हो गया.चना,दाना,बादाम,गोलगप्पे,चाट,इडली ,दोसे,बड़े,सेवपूरी,पान,चाय,फूल की कंधों और बाँहों में टंगी सचल नन्हीं दुकानें बिखर गईं. किसी की हथेली जख्मी,किसी का चेहरा,किसी की टांग,किसी की छाती,किसी का माथा.कोहरे से लिपटी पीली रोशनी के खम्भे के नीचे एक विदेशी घायल जोड़े गले से लिपट कर विलखते हुए एक दूसरे को ऐसे चूम रहे थे मानो उन्हें दूसरा जन्म मिला हो. इस तरह शांति का यह बुद्ध क्षेत्र बारूद के गोदाम में बदलता हुआ दिखा.
    शहर के अस्पतालों में आपातकालीन बिस्तरों पर तमिलनाडु,आँध्रप्रदेश,बिहार,उत्तर प्रदेश,कोरिया,जापान,इटली,फ़्रांस,अमेरिका के जख्मी मेहमानों की पहली खेप प्रशासन की शुरूआती कोशिश से पहले ही अमनपसंद और समाजजीवी बनारसियों द्वारा पहुंचा दी गई. रक्तदान के लिए लंबी कतार लग गई.फिर शुरू हुआ प्रशासन,राजनीति और मीडिया का त्रिकोणीय संघर्ष.वह वैसा ही घिसा-पिटा था जैसा संसदीय इंतज़ार के बाद होता है.


उलझि पुलझ मरि जाना है      


संसार की सबसे पुरानी जीवित सभ्यता वाले इस 'महान' शहर के नीचे एक कब्र रहती है. उस कब्र का नाम खड्डी है.उसमें पांच लाख जीवित कलाकार अपने दोनों पांवों को डाले अहर्निश कबीर का  एक मुखडा जीते हैं-झीनी झीनी बीनी चदरिया.ताना उनका गम है,बाना उनका संघर्ष है,करघा ताबूत है,कतान रस्सी है,बुना गया कपड़ा उनके लिए कफ़न है. दुनिया कबीर के इन वारिसों के कपडे को बनारसी साडी के नाम से जानती और सेलिब्रेट करती है. तड़पकर भूख से मरते, खून बेचते और बच्चों सहित खुद की आत्महत्या करते बुनकरों के पिछले दिनों करघे तब ठहर गए जब भूमंडलीकरण की आंधी चलाती सत्ता ने चीनी रेशम पर ३० फीसदी आयात कर और बने कपड़ों पर केवल १० फीसदी कर लगाकर देश के लाखों शिल्पकारों को तबाही के जबड़े में डाल दिया. दिया नहीं,लिया.मनमोहनी अर्थ-चक्र के आरम्भ के साथ ही विनाश की राह पर चल पड़े बुनकर-शिल्पकारों ने पिछले दिनों बनारस और आसपास के इलाके के लाखों करघों को बंद करते हुए एक भारी आंदोलन किया जिसमे शहर  के हिन्दू मुस्लिम दोनों वस्त्र-व्यापारियों,गददीदारों और सूत दलालों को जनसभा के मंच पर ही कब्जे में ले लिया.मजदूरी बढाने की अधूरी घोषणा के बाद ही कार्यवाही आगे बढ़ी. बारूद के इस धमाके से सबसे ज्यादा और दर्दनाक असर कब्र और उसकी लड़ाई पर पड़ा है.और कबीर का सवाल हरा हो गया-काहे का ताना काहे की भरनी कौन तार से बीनी चदरिया.
   दूसरा धागा शहर की गरीब गर्दनों के लिए फांसी का फंदा बन गया है.हजारों मल्लाह परिवारों के चूल्हे जिस पानी की लय और जीवन के साथ बंधे हैं उनके चूल्हों का धुंआ लंबे समय के लिए खामोश हो गया.अब उनके बच्चों के हाथों के फूल-दिए गंगा के पानी की प्रार्थना में शामिल नहीं होंगे,उनकी रंगों से पोती हुई जर्जर-नवेली नाव प्रेम-पंछियों को लहरों का सफर नहीं करा पाएगी,उनके बच्चे चुम्बक की बंसी से मुद्रा-मछली नहीं टीप पाएँगे.सिर्फ रात भर के इंतज़ार के बाद कुछ मछलियां जाल में आएंगी जो हरिश्चंद और मणिकर्णिका के चिता-कोयलों के सहारे कंकाल को जीवित रखेगी. कछुए जंजीर पहना सकते हैं और जलपुलिस जेल-जाल में डाल सकती है.
  तीसरा धागा उन मजलूमों की फांस है जो रिक्शा,ठेला, तांगा,ऑटो से रोटी पैदा करते हैं,बनारसी पान से हवा में खुशबू भरते रहते हैं,कचौरी-जलेबी के वास और चाट पापरियों के खटास से माहौल जी जबान तार रखते हैं,ठंढई और मलैये से मिठास भरते हैं और जलते हुए भूरे नमक में बारह तरह के अनाजों को भूनकर ‘जिसकी चटनी उसका स्वाद’ के साथ जीभ को जलाने की कूबत रखते हैं. उन अड़ीबाजों की बकैती और चाय की मात्रा पर भी असर पडना लाजिमी है जिनके निठल्लेपन की बुनियाद मेहमानों के किराये की ईंट पर रहती है.असर तो लूटेरों के धागों पर भी पडना है जो रोज अपनी चादर गन्दी करते हैं और साफ़ बताने के लिए उसे रंगीन बनाये रखते हैं.कबीर की उदासी जिनको फटकारती रहती है-मन न रंगायो,रंगायो जोगी कपड़ा,दाढ़िया बढ़ाए जोगी होई गयो बकरा.
                                                       जारी ........................

 
  
  


2 टिप्‍पणियां:

Brajesh pandey ने कहा…

bnaras jaise jagte nagar me asthirta failane ki nakam koshishon ne hmesha bnaras ko aur majboot hi kiya hai. apke is behtarin post ke madhyam se bahut janne ko mila.shukriya.

Rajeev Ranjan Prasad ने कहा…

उम्मीद नाहक नहीं थी कि रामाज्ञा जी बीती रात को बनारस में धमाके के साथ जो कुछ घटित हुआ, उस के बारे में लिखेंगे। जो लिखा, काबिल-ए-साधुवाद है। जिस सांस्कृतिक नगरी में लोगों का रेला हिसाब में ‘गिनती-बाहर’ हर रोज आता है। वहाँ ऐसे दृश्य का साक्षी होना वाकई एक संवेदनशील लेखक के लिए किसी बदनसीबी से कम नहीं है। यों तो यह टीस और तकलीफ उन गुरुकुलवासियों के भी दिल में गहरे उतरा है जो लेखक की अंगुली पकड़कर जिंदगी को जीते-सीते, सहलाते और सवाँरते हैं। दरअसल, काशी के सम्मोहन-लोक का रसिक-मियाँ होना पहली बात तो यह कि इतना आसान नहीं है और यदि हो गए तो ‘पगहा’ तुड़ाकर निकल लेना तुरत-फुरत में संभव भी नहीं है। सचमुच लुभाता है काशी का घंट-घड़ियाल। घाटों पर मगन जिंदादिल जिंदगियों का बसेरा। कौन नहीं जानता है कि बनारस के घाट किनारे बसे मरघट भी बोलते पीर-पीठ हैं। तभी तो लोग खींचे चले आते हैं यहाँ अपना लोक और परलोक सुधारने वास्ते। रेशे-रेशे के सूत-डार में जो काश्तकारी यहाँ के बुनकर कर सकने में सक्षम हैं(बुर्जुआ सरकार भले ही उनकी आर्थिक-सहायता करने में अक्षम हो), उसका पासंग भर कारीगरी भी मशीन नहीं कर सकती। असल बनारसी-टच तो यहाँ के बुनकरों के हाथों से डाले उन गिरह-गाँठों में है जिसे पहनकर नई-नवेलियाँ इतराती-इठलाती हैं। उस अलमस्त काशी के ‘बम-बम’ माहौल में दहशतगर्दों ने विस्फोट का धुँआ और बारूद का गुब्बार भरा। इस शहर की अविछिन्न शांति में विघ्न डालने की कोशिश की। पर आखिरकार हुआ क्या? इससे काशी का अमरत्व और उसका सतीत्व बिखरने की बजाय पुनश्चः निखरकर सामने आया है। रामाज्ञा जी की दृष्टि की संवेदना उसी गंगा-जमुनी भाव को अपने शब्द-बिंब से पुष्ट करती है। हमें संकट के हर मुश्किल क्षण में साहसपूर्वक सांस लेने का संबल देती दिखती है।
-राजीव रंजन प्रसाद, शोध-छात्र, हिन्दी विभाग, बीएचयू, वाराणसी