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29 अगस्त, 2018

दिल्ली का कॉफी हाउस एक बौद्धिक अड्डा :रामाज्ञा शशिधर

📗दिल्ली फ़ाइल-4📗
✒युवा लेखक कॉफी हाउस नहीं आते!✒
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सुनील का मैसेज आया।वे कॉफी हाउस 4.30 पर पहुँच गए।मैं मेट्रो से उतरकर कनाट प्लेस में फेब इंडिया का शर्ट देख रहा था।दो लिये और 5 तक पहुंचा।
            कुछ युवक युवतियां दिखे।कुछ किशोर भी।कुछ कॉफी में और कुछ सेल्फ़ी में मस्त।लगा कि दिल्ली का दिल अब भी धड़क रहा है।
             कॉपरेटिव कल्चर के पागवाले वेटर ने दोनों को पहले पानी से वेलकम किया।फिर हमने पंकज बिष्ट और रामानंद राय का इंतज़ार करते हुए कॉफी का ऑर्डर दिया।कॉफी पीते हुए देश और दिल्ली की राजनीति पर बहस शुरू हुई।किसान के मसले पर छपी किताबों पर खूब बातचीत हुई।
              कुछ उदास माहौल लगा तो हमने चारों नजर दौड़ाई।दिल्ली के युवा लेखक कॉफी हाउस क्यों नहीं आते?
        दो हज़ार पांच तक मैंने राजेंद्र यादव,पंकज बिष्ट,अजय सिंह,पंकज सिंह,आनंद प्रकाश,कांतिमोहन,हरदयाल,बटरोही,गोबिंद प्रसाद,भूपेन सिंह,रमण सिंह,श्रीधरम,कमाल अहमद,प्रमोद तिवारी,रामजी यादव जैसे अनेक  बौद्धिकों के साथ बौद्धिक बहसों में भाग लिया।लेखक पत्रकार एक्टविस्ट के कई मंडल थे।
         मुलाकात की सर्व सुलभ जगह।बिन कॉफी पिये भी आप घन्टों बैठ सकते हैं।शेयर कर सकते हैं।जेब वाले साथी की पी सकते हैं।
        तब मेरी जेब में पैसा कहाँ होता था!
      एकबार विष्णु प्रभाकर आए।गुलाल,पकौड़ी और कॉफी के साथ लंबे समय तक होली मिलन हुआ था।साहित्य के डॉन राजेंद्र यादव का संस्मरण भरा वक्तव्य हुआ।खैर।
             बहुत देर तक यह सवाल मथता रहा कि आजकल के युवा लेखक बहुत जगहें जाते हैं जिनमें एक रजा फाउंडेशन वाला मजा सेंटर भी है।लेकिन वे आज़ादी के बाद कॉपरेटिव मजूरों को पनाह देनेवाले स्थान से संघर्षशील होते हुए भी क्यों नहीं जुड़ते!
     इसके कारण तो अनेक होंगे।
        कनाट प्लेस में कई देशी मल्टीनेशनल ही नहीं खुल गए बल्कि सोशल मीडिया वर्चुअल कॉफी मीडिया हो गया है।लेकिन युवा ही कैसा जिसमें कुछ रिस्की आदर्श न हो।
           तबतक बिष्ट जी आ गए।पंकज बिष्ट और अनेक बहसकर्मियों के साथ लगभग 6 साल के वे दिल्ली के दिन तैर गए।शाम को कुर्सियां टेबल खुले आकाश के नीचे छत पर पसर जाते।खचाखच भीड़ होती। बहसों की धूल उड़ती रहती।टेबल से टेबल नहीं बल्कि बहसों से बहसें टकराकर एक सार्वजनिक और लोकतांत्रिक गूँज पैदा करतीं।
          पंकज जी ने  बातचीत में बताया कि सरकार इसे बंद कर देना चाहती थी।बड़ी लड़ाई लड़ी गई तब जाकर आज यह चालू है।बनारस की चाय अड़ी से अलग यहाँ की बहसों की दिशा गति और विस्तार होती रही है।
            इंडियन कॉफी हाउस में बैठकर समयांतर के कई विशेषांक तय हुए हैं। धरने प्रदर्शन और आयोजन पर बहसें हुई हैं।
         दिल्ली के साहित्य,विश्वविद्यालय,प्रकाशन,अखबार,राजनीति,संस्कृति,हैरिटेज,लेखक संगठन,भोजन,ठेले पटरी के लोग से लेकर देश दुनिया की हर तरह की बात बहस का हिस्सा होती रही है।
          सोशल मीडिया कभी भी इतना सोशल नहीं हो सकता कि साँस में भरती हुई कॉफी की खुशबू के साथ दोस्तों की आँखों की ऊष्मा को लाइव महसूस करा सके।
          लगभग 9 बजे तक हमारी बहसें होती रहीं।बनारस से भारत तक।फिर हम लोग एक साथ सीढियां  नापते हुए उतरे।
         रीगल के आगे हम सबने सड़क पार की।फिर मेट्रो पर चढ़कर बिछुड़ गए।
       इंडियन कॉफी हाउस कभी जरूर जाइए।कनाट प्लेस के बाबा खड़क सिंह मार्ग पर यह जगह आज भी आपको शुकून देगी।कॉफी कैफे डे की हाइ फाइ से अलग देशी स्वाद और स्वभाव मिलेगा।ग्लोबल समय में ग्लोकल स्वाद।
        कॉफी हाउस जाने से पहले अगर पंकज बिष्ट का इंडियन कॉफी हाउस केंद्रित उपन्यास लेकिन दरवाजा से गुजर लीजिए तब जगह का मज़ा दुगुना हो जाएगा।
    मतलब दिल का दरबाजा खुल जाएगा।❤😃

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