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15 जून, 2011

समयांतर,जून ,२०११: अनुज लुगुन की पाण्डुलिपि में पलाश

यह लेख जून ,२०११ के समयांतर में  छप  चुका है .मुझे अनुज ने अपनी 7-8 रचनाओं  की पाण्डुलिपि तब दी थी जब वे हमारे छात्र  थे और मैंने  उनकी  कविता पर लिखना जरूरी समझा.अनुज  लुगुन की कविता 'यह पलाश फूलने का समय है' भी साथ में छपी है. यहाँ साभार  पुन: प्रकाशित  किया जा रहा है.भारत  भूषण  अग्रवाल  पुरस्कार  मिलने पर  अस्सी चौराहा परिवार  एवं  हिंदी  विभाग ,बी.एच.यू. की और से प्रिय  कवि  एवं छात्र  अनुज लुगुन को बधाई!-रामाज्ञा शशिधर


सिमडेगा में जलडेगा है। देश के अन्य हिस्सों की तरह सिमडेगा और जलडेगा में उलगुलान जारी है। उलगुलान यानी राज्य और देश के बीच युद्ध। सत्ता और जनता के बीच संघर्ष। यह उलगुलान लगभग डेढ़ सौ सालों से चल रहा है। लेकिन शायद सभ्यता के इतिहास में इस बार अस्मिता और अस्तित्व दोनों पूर्णतः सर्वनाश के कगार पर हैं।
जलडेगा का एक युवतर आदिवासी कवि है अनुज लुगुन। मुण्डारी भाषा का यह नागरिक देश की बड़ी और ताकतवर भाषा का भी नागरिक होना चाहता है। इसलिए वह हिन्दी पढ़ता है और हिन्दी में कविताएं लिखता है। वह अपनी जनता का दुभाषिया है, अपनी जनता के दुख, सुख, संघर्ष, संस्कृति, स्वतन्त्रता, इच्छा, यातना का दुभाषिया है। वह अपनी कविता के माध्यम से अपनी नदी, अपने जंगल, अपने पहाड़, अपने खेत, अपने पशु-पक्षी की यातना, स्वप्न और संघर्ष का अविकल अनुवाद भारतीय राज्य और राष्ट्र को सुनाना चाहता है।
तरुण कवि अनुज लुगुन अपनी कविता के द्वारा बीसवीं सदी के सबसे बड़े भारतीय जनकवि बाबा नागार्जुन के अधूरे एजेंडे को पूरा करना चाहता है। चर्चा है कि नागार्जुन का काव्य पात्र फूल बाबू आज भी सलाखों के पीछे कैद है। नागार्जुन की 1973 में लिखी एक कविता है शालवनों के निविड़ टापू में। नागार्जुन दंतेवाड़ा से पचपन किलोमीटर आगे हलबी और हिन्दी के दुभाषिए से फूल बाबू का जवाब जानना चाहते हैं कि जब फूल बाबू साठ के दशक में आदिवासी लोकनृत्य वाली पार्टी के साथ दिल्ली पहुंचा था तब देश का राजा कौन था। दियासलाई के साथ फूलबाबू बिना जवाब दिए शालवनों की पगडंडी में खो गया। जेल में बंद फूल बाबू का हालचाल लेना अब हिन्दी कविता की आदत नहीं है। शायद इसलिए भी यह आदिवासी कवि हिन्दी को संबोधित करना चाहता है।
मेरे सामने तीन पांडुलिपियाँ मौजूद हैं। पहली पाण्डुलिपि सलावा जुडुम और ग्रीन हांट के नायक छत्तीसगढ़ के पुलिस मुखिया की तीस रूपये कीमत वाली है जिसके चार सौ पचास पृष्ठों में मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ के सारे पात्र अपनी पूरी रवानी के साथ मार्शल लॉ का बैंडबाजा बजा रहे हैं। इसमें कवि हैं लेखक हैं, आलोचक हैं, पत्रकार हैं, शिक्षक हैं और डोमाजी उस्ताद भी। मैं अभी इस पाण्डुलिपि पर बात करना नहीं चाहता।
दूसरी पाण्डुलिपि के तौर पर हमारे समय के अतिमहत्वपूर्ण लोकधर्मी कवि एवं पाण्डुलिपि के संरक्षक केदारनाथ सिंह की छपित कवित ‘पाण्डुलिपियाँ’ है। उसकी कुछ पंक्तियों पर गैर फरमाइए-पाण्डुलिपियाँ/कहीं आज भी पड़ी हैं/किसी पेड़ की छाल/किसी नदी के कंठ/किसी जेल की दीवार/या किसी पत्थर की स्मृति में। मेरे सामने मौजूद तीसरी पांडुलिपि की कविताएं केदारनाथ सिंह के काव्य स्वप्न का वास्तविक विस्फोट हैं। यहाँ पेड़ की छाल को खरोंचने, छीलने, चूसने, जलाने और बेचने वाली कथित बर्बर आधुनिकता की शिनाख्त है; नदी के पानी को बोतलों में बंदकर रेत को रक्त में डुबो देने वाली कारपोरेट पूंजी के बड़े नाखूनवाले पंजों की पहचान है; अपने ही घर और देश में दुश्मन, द्रोही और पराए बना दिए गए लाखों फूल बाबुओं की जेल जैसी जिन्दगी की दीवारों की दरकन है और है पत्थर के नीचे से करोड़ों साल में निर्मित चीजों की लूट का जरूरी प्रतिरोध। भारतीय समाज और हिन्दी कविता का भविष्य तीसरी पाण्डुलिपि की पगडंडी से तय होगा। इसलिए तीसरी पांडुलिपि की छानबीन और पड़ताल जरूरी है।



अनुज लुगुन की एक कविता है- अघोषित उलगुलान। अर्थात अघोषित आंदोलन। औपनिवेशिक आधुनिकता पूंजी के रथ पर सवार होकर जिस तरह हाशिए का विनाश कर रही है, यह कविता उसकी सूक्ष्म जांच करती है। यह प्रकृति के राजनीतीकरण का दौर है। तरंगों पर सवार आधुनिकता मुट्ठी भर समाज के लिए शेष पृथ्वी को निचोड़ने का अभियान चला रही है। कविता इस राजनीति का पोल खोलती है- अघोषित उलगुलान में/लड़ रहे हैं जंगल/लड़ रहे हैं ये/ नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ। कविता को मालूम है कि आदिवासी किसानों के नाम पर सियासत की गलियों में आरक्षण और धर्मांतरण की बहस चल रही है लेकिन वहाँ कटते हुए पेड़ों की चीख, बिकती हुई नदियों की तड़प, बारूद से ध्वस्त होती हुई झरनों की झंकृति, गोश्त में बदलते चिड़ियों और जानवरों का हाहाकार और प्रकृति के समुद्र में जी रही आदिम मानव मछलियों सेे रत्तीभर रहमदिली नहीं है। कविता के सामने सवाल विकास और लोकतंत्र का नहीं, सम्पूर्ण मानवीय अस्तित्व का है।
एक कविता है लालगढ़। कवि कहता है- कुछ तो है जरूर साहब/जो वातानुकूलित कमरे में/रहते हुए महसूते नहीं/कुछ तो जरूर है साहब/जो रोबड़ा सोरेन/पिछले कई सालों से/ नाम बदलकर घूमता है/वरना कोई गढ़/यूं ही लाल नहीं होता। कविता राज्य की संरचनात्मक हिंसा और विषमता पर आधारित दमन कानून का प्रतिरोध करती है। नागार्जुन और गोरख पांडेय की परम्परा में वह राज्य हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा की वकालत करती है। वह युद्ध और गृहयुद्ध के वास्तविक कारणों की खोज करती है जिसकी जड़ें जनता में नहीं राज्यसत्ता में हैं।
अनुज लुगुन की कविता का एक ‘देश’ है। यह ‘देश’ ग्लोबल के खिलाफ लोकल, देशद्रोह के खिलाफ देशभक्ति राजपरस्ती के खिलाफ जनपरस्ती, मध्यवर्गीय बहुरूपियेपन के बरक्स निम्नवर्गीय वैचारिक ठोसपन का समर्थन करते हुए सत्ता के इस दर्शन को ध्वस्त कर देता है कि राज्यभक्ति ही देशभक्ति है। देश, देशभक्ति और देशान्तरण नामक तीन खण्डों में बंटी ‘गंगाराम कलुण्डिया’ कविता आदिवासी जनता के देशद्रोही होने के मिथ को ध्वस्त कर देती है। कहना न होगा कि 1857 से पहले संथाल विद्रोह और बाद में बिरसा मुंडा, ताना भगत, गोविन्द गिरि, प्रेमचन्द भील जैसे सैकड़ों आदिवासी नायक औपनिवेशिक और सामंती सत्ता के सामने अपनी कुर्बानियों का इतिहास रच चुके हैं। गंगाराम कलुण्डिया एक ऐतिहासिक व्यक्ति और घटना है। 1972 के भारत-पाक युद्ध में लड़ाई लड़ने के कारण राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से सम्मानित गंगाराम सेवानिवृत्ति के बाद जब ईचा बाँध से विस्थापित आदिवासियों के आन्दोलन का नेतृत्व करता है तब उसके ही देश की पुलिस 3 अप्रैल 1982 को उसकी हत्या कर देती है। कविता देश को कटघरे में खड़ा कर देती है- गंगाराम/तुम देश के लिए हो या/देश तुम्हारे लिए है/संसदीय बहसों और/अदालती फैसलों में नहीं हुआ है निर्णय/जबकि तुमने तय कर लिया था/तुम लड़ोगे अपने देश के लिए। समय के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश जनता से बनता है या जनता देश बनती है। यह ऐसा वक्त है जिसमें देशभक्ति भी अन्य चीजों की तरह बाजार का एक खूबसूरत बिकाऊ उत्पाद है अथवा फासीवाद की हिंसक कार्रवाई है, वहाँ आदिवासी मासूम संवेदना गंगाराम के लिए एक मार्मिक इच्छा रखती है- तुम्हारे मरने पर/नहीं झुकाया गया तिरंगा/नहीं हुए सरकारी अवकाश और न ही बजाई गई/शोक गीत की धुन। ऐसे दौर में जब नवसाम्राज्य ने देश और राष्ट्र की अवधारणा ही खत्म कर दी है, आदिवासी कविता में देशभक्ति की यह मिसाल सत्ता और उपभोक्ता वर्ग के सामने शर्मसार करने वाला आईना रखती है।
हिन्दी कविता में मिथक का जनतंत्रीकरण बहुत हुआ है। एकलव्य से संवाद एक लम्बी कविता है जो एक ओर अब तक प्रचलित एकलव्य की धारणा को ध्वस्त कर देती है वहीं गुरू द्रोण के बहाने पूरी मध्यवर्गीय बौद्धिकता को प्रश्नांकित करती है। कवि का कथन है- ‘रगों में संचरित कला किसी दुर्घटना के बाद एकबारगी समाप्त नहीं हो जाती।’ कवि उड़ीसा के सीमावर्ती झारखण्ड के सिमडेगा जिले के मुण्डा आदिवासी समाज से आता है जहाँ अंगूठे का प्रयोग किये बिना तर्जनी और मध्यमा अंगुली के बीच तीर को कमान में फंसाकर तीरंदाजी करने की परम्परा है। कवि अनुज लुगुन स्वयं इसका प्रमाण है। इस अग्निधर्मी और आख्यानमूलक कविता में कवि सत्ता से अनैतिक और फायदे का संबंध रखने वाली छद्म हिन्दी बौद्धिकता पर सन्देहनिशानी करते हुए आदिवासी किसानों को सचेत करती है कि उनका गुरू बाघ, शेर, हिरन, वृक्ष की छाल तो हो सकते हैं लेकिन भाषायी छद्म से लदी वर्चस्वशाली बौद्धिकता नहीं। वस्तुतः व अंगूठे के विरूद्ध मध्यमा और तर्जनी की खोज वैकल्पिक व्यवस्था की खोज है।
कवि को पता है कि अब हत्यारा भी कविता लिख सकता है। कवि हैरान है कि यह कैसा खतरनाक समय है जब शिकारी का शिकार हो रहा है। जिस शिकारी के तीर से बाघ थर्रा उठता था और परम्परा शाबाशी देती थी- जोवार सिकारी बोंगा जोवार अर्थात शिकारी युवा तुम बहुत खूबसूरत हो- उसका हाँका लग रहा है। आदिवासी एक ऐसी चिड़िया की तरह है जिसे शिकारी दायीं अंगुलियों से गोली मारता है और बायीं अंगुलियों से कविता लिखता है। तड़पती हुई चिड़िया और हड़िया से मस्ती लेने के लिए बौद्धिक मेहमान विचार कोलाहल करते है, भोज सम्मान के बाद पुरस्कार, वातानुकूलित यात्रा भत्ता और ढेर सारे सुमनाक्षर समर्पित किए जाते हैं। हिन्दी की ऐसी द्रोणमार्गी बौद्धिकता के पास स्टैण्ड के नाम पर यदि केवल इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर स्टैण्ड ही शेष है तो कोई हैरानी की बात नहीं है। कवि को जब पता है कि भारतीय कविता का जन्म आदिकवि द्वारा सुनी घायल चिड़िया की चीख से हुआ था तब उसका अविश्वास उन बौद्धिकों पर लाजिमी है जो चिड़िया का पंख मोंच कर उसके आर्तनाद को शब्द में बाँधना चाहते हैं। कवि कहता है- एकलव्य/अब जब भी तुम आना/तीर धनुष के साथ ही आना/हाँ किसी द्रोण को अपना गुरु न मानना/ वह सिर्फ छल करता है।
लुगुन की कविता सत्ता विमर्श की नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की कविता है। वह राजनीतिक चेतना से सम्पन्न ऐसी कविता है जिसे संसदीय वामपंथ के सिलसिलेवार पाखण्ड, सत्तापरस्ती, समझौता परस्ती, अप्रांसगिकता, और निरर्थकता का गहरा बोध है। लिंकन का भूत कविता पूंजीवादी जनतंत्र और संसदीय वामपंथ के बहरूपिएपन का शिनाख्त करते हुए उससे उबरने की राह खोजती है। कविता शुरू होती है- लिंकन की परिभाषा सुनकर/मैं शहर से दूर भागा/जंगलों में छुपने के लिए/मुझे डर था कि/ वे लोग मेरा शिकार करंेगे। एकालाप और आत्मालाप से ग्रस्त हिन्दी कविता के बीच यह संवादधर्मी कविता बातचीत की शैली में रचित है जिसमें सखुआ की ओट लिए बैठे आदमखोर अभिजात की बारीक पहचान है। विदर्भ, नन्दीग्राम, सिंगूर, ददरी, बलिया, भट्ठा पारसौल जैसे देश के सैकड़ों इलाकों की धरती बहुराष्ट्रीय बुलडोजर और बाडे़ की गिरफ्त में लगातार आ रही है, मिदनापुर से लेकर दंतेवाड़ा तक के जल, जंगल, जमीन कारपोरेटी दाँतों में फंस चुके हैं और यह सारा कारोबार लिंकन के भूत के हाथों सम्पन्न हो रहा है। तब कवि शिकारी से बचने के लिए ठिकाने खोजता है- मैं रोज भागता हूँ/कभी शहर तो कभी गांव/कभी वियतनाम भागता हूूं तो कभी नक्सलबाड़ी/कभी इराक भागता हूँ/तो कभी दाँतेवाड़ा/मेरे साथ हमेशा/लिंकन का भूत भागता है।
शमशेर की कविता ‘ओ युग आ’ की पंक्तियां हैं- ओ युग आ/मुझे और लिए चल/जरा और/शक्ति और प्रेम की गर्वभरी बांहों में/और उस सादगी के सीने पे/जो छोटी-छोटी दैनिक/बातों में होती है/कि लोक/गुनगुनाने लगे/शान्त सरल आनंद में। समानता स्वतंत्रता और बंधुत्व का शमशेरी आदिम लोक यही आदिवासी समाज है जिसके सीने में सरलता, सहजता, शक्ति, शान्ति, प्रेम, उमंग, संगीत, सम्मोहन आनंद, कर्म जैसे मनुष्यता के सारे अवयव मौजूद हैं। वे अवयव लुगुन की कविता यह पलाश के फूलने का समय है में भरपूर मात्रा में उपस्थित हैं। वहाँ साखू, केन्दू, सागौन पर कोयल की कूक है, गिलहरियों की घमाचौकड़ी है, जवान औरतों की मर्दों के साथ उन्मुक्त प्रेमलीलाएं हैं। लेकिन इस कविता का दूसरा पहलू दिल हिला देने वाला है।
सभ्यता और आधुनिकता के नाम पर चली पूंजी की प्रचण्ड आंधी चारों ओर से इस सरल समाज को घेर चुकी है- गुफाओं को खबर है/खदानों में वेदान्ता का विज्ञापन टंगा है/साखू के सागर/सारण्डा की लहरों में/बिछ गई है बारूदी सुरंगे/हर दस्तक का रंग यहां लाल है। कविता को पता है जंगल खत्म होने वाला है, नदी खत्म होने वाली है, चिड़िया खत्म होने वाली है, खनिज खत्म होने वाले है, बादल खत्म होने वाला है, ऑक्सीजन खत्म होने वाली है, संगीत खत्म होने वाला हैं, त्योहार खत्म होने वाले हैं, परम्परा खत्म होने वाली है, संस्कृति खत्म होने वाली है, तीर धनुष खत्म होने वाले हैं। यानी सादगी और समानता की आदिम सभ्यता बारूद के ढेर पर रख दी गई है और इसका नाम रखा गया है विकास, लोकतंत्र, आधुनिकीकरण, मुख्यधारा आदि।
कविता का आखिरी पहलू सौन्दर्य की महिमा का एक नया अनूठा संसार रचता है दूर-दूर तक/जंगल का हर कोना पलाश है/साखू पलाश है/सागवान पलाश है/पलाश आग है/आग पलाश है। यह क्रान्ति का सौन्दर्य, यह प्रकृति के सुलगने का सौन्दर्य है। जो पलाश प्रेमिकाओं के जूड़े में गुंथकर प्रेमियों को ललचाने का काम करता है, सूरज की आँखों में आँखें डाल रोशनी को कोमल बनाने का काम करता है, जो धरती के जिस्म पर लाल परिधान पहनाने का काम करता है, जो वासना की आँखों, होठों और लहरों को और रक्तिम बना देता है, वह आज आग ही तरह जल रहा है। जाहिर है कविता कभी नहीं चाहती कि पलाश आग की तरह दहके। वह हमेशा पलाश को पलाश की तरह और आग को आग की तरह देखना चाहती है। कविता के लिए यह कितना कठिन समय है कि पलाश के फूलने के मौसम में पूरा जंगल जल रहा है।
लुगुन की कविता एक ऐसी सौन्दर्य महिमा, शब्द भंगिमा, राजनीतिक चेतना, ज्ञान और संवेदना से भरे युवतर कवि की अनूठी धमक है जो हिन्दी कविता के एकालापी, आत्मालापी भाषाई कौशल, गद्यात्मक खिलवाड़, जनविरोधी रूपात्मकता के विरूद्ध क्रांतिकारी परम्परा की अगली कड़ी है। हिन्दी कविता को इस कवि से बड़ी उम्मीद है। अनुज लुगुन अपनी कविता और जीवन में गंगाराम कलुण्डिया के साथ है। यदि अभी शताब्दी कवि नागार्जुन होते तो वे किसके हाथ होते? सलवा जुडूम के या फूल बाबू के?
सवाल इसलिए भी जरूरी है कि दंतेवाड़ा के मोरपल्ली, ताइमेताला और तिम्मपुरम गांवों को मार्च के पलाशी मौसम में सलवा जुडुम के एसपीओ और केन्द्रीय सेना द्वारा जलाकर खाककर दिया जाता है। महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। सामंत एवं फासीवादी मुख्यमंत्री रमन सिंह तथा केन्द्रीय खाद्य सुरक्षा सलाहकार हर्षमंदर के हेलीकाप्टर के उड़ान भरते ही इन्हीं ताकतों द्वारा राहत की खाद्य सामग्री लूट ली जाती है, कपड़े लूट लिये जाते हैं, कई बच्चे भूख से तड़प कर मर जाते हैं। गांवों के लोग सरकार द्वारा उठाकर ले गये दुभाषि परिजन नुपा मुत्ता और माडवी सुल्ला का अता-पता न मिलने से भयभीत हैं। झोपड़ियों की छतें उतार दी गई हैं। मांएं कोमल बच्चों को धूप में लिये खड़ी हैं। क्यों? इसलिए कि जंगल में सरकारी आग दौड़ रही है, सुलग रही है, धधक रही है और उनका कहना है कि पलाश फूल रहा है।



3 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार राही ने कहा…

गंभीर आलेख...अनुज की कविता पहली बार किसी मित्र ने बीएचयू से निकलने वाली पत्रिका में पढवाया था.पहली बार में ही अनुज ने प्रभावित किया था...पुनः आशीष त्रिपाठी के माध्यम से उसे जानने और पढ़ने का मौका प्रगतिशील वसुधा में मिला...लगा कि आग अब भी वही है पर थोडी तीक्ष्णता आ गयी हैऔर अब आपके मार्फ़त उसे सुनने-गुनने का मौका मिला.
अनुज की कविता का आपने सचमुच बारीक़ और पक्षधर्मी आलोचना की है...असल में अनुज की आदिवासी समाज के प्रति पक्षधरता ही उसे महत्वपूर्ण कवि बनाती है,और इस पक्षधरता को हासिल करना और साधना कोई सहज बात नहीं...चाहे वो आदिवासी समाज में पैदा हुआ व्यक्ति ही क्यों न हो.
अनुज की कविताओं को सामने लाना और हिंदी की हिंस्र दुनिया में उसे प्रोत्साहित करना भी उसकी कविता और उसकी जमीन के प्रति प्रतिबद्धता ज्ञापित करना ही है, जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं.

Rajeev Ranjan Prasad ने कहा…

तीसरी पाण्डुलिपि राजाज्ञा नहीं है। रामाज्ञा जी की खुद की गढ़ी कथा, कहानी, किवंदती या दंतकथा भी नहीं है जो इस पोस्ट में पद्य-कलरव का आभास कराते हुए प्रस्तुत है। यह प्रस्तुति मनोरंजन या विश्वरंजन के लिए नहीं; बल्कि विचार के धरातल पर बहस-मुबाहिसे के लिए हैं। संकटग्रस्त वर्तमान समय की सार्थक आवाज़ है-‘पाण्डुलिपि में पलाश।’ उम्दा अभिव्यक्ति का साधिकार प्रवेशन। पोस्ट लेखक अपने वैचारिक पैनेपन और पूरेपन को समर्थ तरीके से इस पोस्ट में अभिव्यक्त करने में सफल रहा है, तो इसमें तीसरी पाण्डुलिपि की अंतहीन ऊर्जा और चेतना प्राणबीज की तरह अंतर्निहित है। ख़ालिस कविताई नहीं है यह तीसरी पाण्डुलिपि। यह तो प्रायोजित आह-जाह से परे एक चमकदार पारा है जिसमें पलाश के रंग हैं, तो उस रंग की आड़ में पैठे बहुरुपिए ठिकानों की मुकम्मल पड़ताल भी।

तीसरी पाण्डुलिपि अपने समय में समानांतर प्रविष्ट पाण्डुलिपियों के बारे में प्रश्नचिह्न है। युवा कवि अनुज लुगुन का ध्येय-वाक्य हैै-‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है...?’ यह प्रश्न सिर्फ बस्तर, दंतेवाड़ा, सिंगुर, नंदीग्राम, वेदान्ता और पोस्को से नहीं है। दरअसल, इसका परिधिय-भूगोल व्यापक है।

यानी अनुज की पाण्डुलिपि पारिस्थितिक ताप-दाब से निर्मित है। यह चेतस धातु अपने समाज का प्रतिनिधि चेहरा है, दुभाषिया है, लोक, क्षितिज और निद्वंद्व कैनवास है। यह पारा स्वाभाव में तरल है, ठोस नहीं। लेकिन वह अपने बरक्स तमाम पाण्डुलिपियों के बुख़ार नाप सकता है। वैचारिक रुग्णता के शिकार लोगों की तबीयत भाँप सकता है। तीसरी पाण्डुलिपि दहकते देह और सुलगते मन का विकल्प है जो अपने विरूद्ध जारी अंतहीन साजिशों के बरअक्स वैकल्पिक व्यवस्था की खोज करने के लिए तैयार-तत्पर है। फिलहाल जोहार! साथी।

-राजीव रंजन प्रसाद, प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता)

सुजाता ने कहा…

पलाश झारखण्ड की राजकीय फूल है... महक न सही परन्तु अपनी रंगत एक बार कही छोड़ जाये तो उतरे ही न ... ऐसी है अपनी झारखंडी संस्कृति... इसीलिए तो अनुज जी का विद्रोह लाजमी है।
पाण्डुलिपि की भाषा आखिर पलाश के कारण ही तो है।
सर आपने पलाश के माध्यम से सत्ता और जनता के बीच संघर्ष का जो सवाल रखा है यह सोचनिए है। जंग लड़ती पलाश की आवाज तो सुनो !
...सुजाता