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24 दिसंबर, 2014

बनारसी बुनकर:मोदी,मौत और मुर्रीबंदी

समयांतर,मासिक के दिसंबर,२०१४ के अंक में प्रकाशित यह रिपोर्ताज बनारसी बुनकरों की तबाही की व्यथा कथा है.

रामाज्ञा शशिधर

बनारस प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। बनारस हिन्दुओं की आस्था और बुनकरों की आर्थिक गतिशीलता का भी शहर है। वह अपनी सांस्कृतिक संरचना में श्लघु भारत जैसा जनपद है और प्राचीनता में रोम या एथेन्स जैसा। इस नगर और जनपद का रेशम, करघा और कपड़े के कारोबार से रिश्ता महात्मा बुद्ध के समय से है। जातक कथाओं में काशी के चीनांशुक का जिक्र मिलता है। फिलहाल बनारस बुनकरों की वर्तमान तंगहाली,तबाही और मोदी.घोषणा से अखबारों की सुर्खियों में है।

राजू बुनकर की फांसी की रस्सी 


राजू बुनकर के पिता और पुत्र 


नवम्बर के पहले सप्ताह में सांसद एवं प्रधानमन्त्री मोदी बनारस आए। हिन्दुओं और पर्यटकों का केन्द्र अस्सी घाट पर कुदाल चला. जयापुर गांव को गोद लिया गया तथा बुनकर व्यापार सुविधा केन्द्र का प्रेमचन्द्र के गांव लमही से कुछ ही दूरी पर बड़ा लालपुर में उदघाटन हुआ। जयापुर को आदर्श ग्राम बनाने के लिए एनजीओ, प्रशासन, नेता, उद्योग जगत के लोगों ने ऐसा अभियान चलाया है कि हर ग्रामीण पर चार विकासकर्ता सवार हैं. वहीं अस्सी घाट पर मोदी की कुदाल वाली जगह से पचास फीट नीचे तक रेत-मिट्टी गायब है। अस्सी घाट की पाताली सीढ़ी का आखिरी प्लेटफार्म झांक रहा है तथा जिला प्रशासन ने सुबह-ए-बनारस का आगाज करते हुए वेद मंत्र, संगीत, आरती, योग और पूजा पाठ की धूम मचा दी है। इस तरह काशी को क्योटो बनाने की पहली पहल शुरू हो गर्इ है। क्योटो कथा की व्यथा छोडि़ए क्योंकि यह अभी सिर्फ कागजी बाघों का जिम कार्बेट बन पाया है।

सबसे खस्ताहाल है बनारसी बुनकरों का। अपनी जीत के छह महीने में दूसरी बार संसदीय क्षेत्र आए प्रधानमन्त्री ने बनारसी बुनकरों को बड़ा तोहफा दिया है। उन्होंने बड़ा लालपुर में सात एकड़ में पाँच सौ करोड़ रूपये से निर्मित होने वाले भारत के प्रथम बुनकर व्यापार सुविधा केन्द्र व शिल्प संग्रहालय का उदघाटन किया। बुनकर केन्द्र का उदघाटन करते हुए प्रधानमन्त्री ने कहा कि भारत में अभी बीस करोड़ कुंवारी बेटियां हैं। उन्हें अपनी शादी में बीस करोड़ बनारसी साडि़याँ चाहिए। कपड़ा क्षेत्र में इससे बड़ा कोर्इ व्यापार और रोजगार नहीं है। उन्होंने एक ही छत के नीचे बुनकर की हर समस्या का समाधान देने की घोषणा की। यह बताने की जरूरत नहीं है कि बालीवुड की हीरोइन प्रियंका चोपड़ा बनारसी साड़ी की ब्रांड एंबेसडर हैं। यह और बात है कि अब तक न तो मोदी ने और न ही प्रियंका चोपड़ा ने कुर्ते.साड़ी के तौर पर बनारसी हथकरघों के कपड़ों का इस्तेमाल किया है।
प्रधानमन्त्री मोदी की घोषणा के एक सप्ताह बाद बनारस में आर्थिक तंगी और बीमारी से पस्तहाल एक बुनकर ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। नाम . राजू शर्मा। उम्र . 38 साल। मुहल्ला . कादीपुरा खुर्द,सोनिया पोखरा। धर्म . हिन्दू। परिवार में माता.पिता के अतिरिक्त दो भार्इ, एक पुत्र और पत्नी। राजू बुनकर के दादा के पास चार करघे थे। पिता मजदूरी करने लगे। दो भाइयों ने सैलून खोल लिया। अब घर में एक भी करघा नहीं है। राजू बगल के मुहल्ले लल्लापुरा में दिहाड़ी बुनकर था। वह पहले हैंडलूम चलाता था। धीरे.धीरे हथकरघों का जमाना जाता रहा। मजबूरन उसने पावरलूम सीख लिया। नसीर हाजी और गुलजार नक्शेबन सहित अनेक गिरस्तों के यहाँ वह घूम.घूमकर बिनकारी करता था। मजदूरी घटती गर्इ। काम के घंटे बढ़ते गए। एक बच्चे का परिवार चलाना भी दुश्वार हो गया। डेढ़ साल से वह बीमार था। पावरलूम की आवाज से सरदर्दए चक्कर और उलझन होती थी। छह महीने से घुटने में दर्द रहता था। यह सब बुनकरों की बेहिसाब मेहनत से पैदा होने वाली बीमारियाँ हैं। मन्दी के कारण पत्नी एक दवा दुकान में काम करने लगी। एक बार करघा लगाने के लिए चौका घाट लोन मेला भी गया। वहाँ भी सिर्फ फटकार मिली।
         राजू बुनकर ने अलसुबह सड़क पर चाय पीए पान खाया। रस्सी खरीदी और जिस अंधेरे कमरे में ग्यारह साल के बेटे का धागा,लटाइन,परेता रहता था; पंखे की खूंटी से रस्सी बांधकर लटक गया। चौथी कक्षा के इम्तहान में कलम टूट जाने से बेटा अनीस घर लौट आया और जब आसमान से होड़ लेने के लिए अंधेरे कमरे में धागा परेता छूना चाहा तो हाथ में पिता के दोनों पांव आ गए। रस्सी का रंग रेशमी शादी साड़ी की तरह लाल था। राजू बुनकर ने फांसी की रस्सी का रंग शादी साड़ी के रंग का क्यों चुना थाए इसे पूछने के लिए अबतक न कोर्इ सांसद, विधायक गया, न जिला प्रशासन या बुनकर प्रशासन गया और न ही शहर का महान बौद्धिक वर्ग।
         प्रधानमन्त्री की व्यापार सुविधा केन्द्र की घोषणा और राजू बुनकर की मौत के बाद नगर के बनुकरों ने मुर्रीबन्दी  का आयोजन किया। बुनकरों का करघा रवायत के अनुसार खामोश रहा। मुर्री यानी दो तानों के जुड़ने का बिन्दु। मुर्रीबंदी का मतलब धागों का करघों पर न चढ़ना, न जुड़ना। मुर्रीबंदी के दिन सामूहिक दुआख्वानी हुर्इ . ऐ खुदा! हम फकीर की हैसियत से तेरी बारगाह में हाजिर हुए हैं। इलाही! हमारे अमाल और दुआओं को कबूल फरमा। हम सब कारोबार से परेशान हैं। तेरे करम पर हमें उम्मीद है। तेरे सिवा कोर्इ नहीं रोजी देने वाला। पूरे मुल्क का कारोबार खराब है। बुनकरों के बच्चे और औरतें तेरे करम की आस लगाए हैं। या खुदा! हमारे कारोबारी गुनाहों को बख्श दे। हमें रोजी रोटी में कामयाबी दे।
मुर्रीबंदी बनारसी बुनकरों की सैकड़ों साल पुरानी बहुसांस्कृतिक अनूठी और अद्वितीय रवायत है जिसे हिन्दुओं की वर्ष गणना के अनुसार अगहनी प्रथम जुम्मे को शक्ल दी जाती है। यह हिन्दू.मुसिलम तथा किसान.मजदूर एकता का दिन है। इस दिन बुनकर प्रेमचन्द के किसानों से बड़े पैमाने पर ऊख खरीदकर चूसते हैं।

मुर्रीबंदी के दिन बुनकर समाज लगातार अपने पेशे पर चिन्तन करता रहा। उनका मानना है कि 1992 के बाद ऐसी मंंदी कभी नही आर्इ। हैंडलूम और पावरलूम दोनों खामोश हैं। नगर में बनारसी कपड़ा डंप पड़ा है। बुनकर गिरस्ता कोए गिरस्ता गद्दीदार को, गद्दीदार बाजार को दोषी ठहरा रहा है।
बनारसी वस्त्र उद्योग में पाँच लाख बुनकर लगे हैं। लगभग एक लाख पावरलूम और पचास हजार हैंडलूम पर ताना बाना सवार रहता है। भारत और दुनिया के अन्य देशों में बनारसी साड़ी का व्यापार है। बुनकरों की मुर्रीबंदी और दुआख्वानी के दौरान हुए सामुदायिक चिन्तन से बनारसी साड़ी कारोबार में आर्इ मंदी के तात्कालिक कारण गौरतलब हैं। बुनकरों का मानना है कि सूरत और अहमदाबाद की अपेक्षा बनारस में धागा और कपड़ा दोनों महंगे हैं। बनारस में जब तक माल तैयार होता है तब तक सूरत का नकली माल बाजार में पहुँच जाता है। गुजरात की अपेक्षा स्थानीय बुनकर टेक्नालाजी और डिजाइन दोनों में पीछे हैं। गुजरात में बिजली 24 घण्टे मिलती है जबकि बनारस में 14 घण्टे से भी कम। चीन निर्मित कपड़े सस्ते और रेशम महंगा है। गुजरात बनारसी साड़ी के नकली ब्रांड उत्पादन का भारत में सबसे बड़ा हब है।
यह बनारसी बुनकरों की पस्तहाली का ऐसा सच है जिसमें उनका पूरा भविष्य बंद है। दरअसल जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है वैसे ही बड़ी प्रौद्योगिकी छोटी प्रौद्योगिकी को निगल जाती है। चीन और गुजरात बनारस के हस्तकरघा उद्योग के लिए बड़ी मछलियों की तरह हैं। इसका मतलब यह नहीं कि नेहरू युग से मोदी युग तक बनारसी हस्तकरघा उद्योग के संरक्षण की कोर्इ कोशिश हुर्इ ही नहीं। इन कोशिशों की संरचना, रूप और जटिलता भारतीय लोकतन्त्र से ज्यादा उलझाऊ है। कबीर ने यूं ही नहीं गाया - मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाए रे/ तेरा मेरा मनवा कैसे एक होर्इ रे।
  देश के पहले प्रधानमन्त्री नेहरू कारखाने को मंदिर कहते थे। उन्होंने जो गाँधी के चरखे के साथ किया कुछ वैसा ही बनारसी हथकरघे के साथ हुआ। चौकाघाट में देश का पहला बुनकर प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण केन्द्र खुला जहाँ छपार्इ, रंगार्इ और डिजाइन का कार्य 1956 में आरम्भ हुआ। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने रथयात्रा बुनकर सेवा केन्द्र की स्थापना की। केन्द्र और राज्य की इन दोनों संस्थाओं से साठ सालों में सैकड़ों सुविधाएँ, अनुदान और उपादान आए लेकिन बुनकर भी पुरानी खुशहाली, मस्ती और जिंदादिली लौट नहीं पार्इ।
  बनारसी बुनकरों के कर्इ स्तर हैं जिनमें दिहाड़ी बुनकर, करघेदार बुनकर, छोटा गिरस्ता, बड़ा गिरस्ता, हथकरघा बुनकर, पावरलूम बुनकर, शटल लेस बुनकर आदि हैं। बनारस में निबंधित साढ़े पाँच सौ बुनकर सहकारी समितियाँ हैं जिनमें ढार्इ सौ समितियाँ जीवित और सक्रिय हैं। आम बुनकरों की मान्यता है कि बुनकरों की तबाही की जिम्मेदार ये सहकारी समितियाँ हैं जो बड़े गिरस्तों, गद्दीदारों, महतो, नेताओं और बुनकर अधिकारियों की सांठगांठ से संचालित होती हैं तथा सुविधा व अनुदान का सारा पानी सोख जाती हैं। बनारसी बुनकरों को सरकारी सुविधाएँ जैसे कर्ज, अनुदान, निबंधन, पहचान पत्र, स्वास्थ्य एवं जीवन बीमा, तकनीकी प्रशिक्षण इनवर्टर, कच्चा रेशम, करघों के पूर्जे जहाँ दोनों सरकारी केन्द्रों से मिलते हैं वहीं बना बनाया माल गिरस्तों, गद्दीदारों के हाथों से बाजार में जाता है। पदाधिकारी, गद्दीदार और नेता के त्रिकोण से बुनकरों की जिन्दगी इतनी तबाह है कि सन दो हजार के बाद यहाँ सौ से अधिक बुनकरों की आत्महत्या या भूख-बीमारी से मौत हुर्इ है। राजू बुनकर की आत्महत्या से एक साल पहले बजरडीहा में नाजरा की दो सन्तानों की भूख से मौत हुर्इ थी। आन्दोलन इतना बड़ा हुआ कि भेलूपुर थाने में तत्कालीन भाजपार्इ सांसद डा मुरली मनोहर जोशी की गुमशुदगी का बुनकरों ने एफआर्इआर तक किया था।
  केन्द्र और राज्य सरकार के प्रशासकों की सोच है कि बुनकर की बदहाली का कारण खुद बुनकर हैं। गद्दीदार एवं बाजार का भी यही मानना है। दूसरी ओर बुनकर अपने कारोबार की तबाही से इतने ऊब गए हैं कि वे सरकार से कुछ ज्यादा अपेक्षाएँ रखते हैं। आम हथकरघा बुनकरों की मान्यता है कि सच्चा बुनकर केवल हथकरघेदार है। बनारसी साड़ी की बनावट सिर्फ हथकरघों से मुमकिन है और हथकरघा बड़ी मशीनों के सामने टिक नहीं सकता। इसलिए बनारसी साड़ी उद्योग को सौ फीसदी सरंक्षण मिलना चाहिए। बुनकर चाहते हैं कि भ्रष्टाचार की जननी बुनकर सहकारी समितियाँ खत्म हों तथा व्यकितगत स्तर पर हर बुनकर को सुविधा मिले। बुनकरों की मांग है कि उन्हें सस्ती दर पर चौबीस घण्टे बिजली, सस्ती दर पर सरकारी दुकानों से कच्चा रेशम मिले तथा उनका बना माल उचित मूल्य पर सरकार खरीदकर बाजार के हवाले करे। कारपोरेट योजना में यह साफ व्यवस्था है कि छोटी मछली को बड़ी मछली से टक्कर लेनी होगी। इसके दो बड़े उदाहरण हैं। पिछली कांग्रेस सरकार ने भूमण्डलीकरण की पीठ थपथपाते हुए हथकरघे पर बनने वाली बार्इस शिल्प किस्मों में से ग्यारह की बड़ी मशीनों के लिए छूट दे दी थी वहीं कारपोरेट मुखिया मोदी ने बुनकर व्यापार सुविधा केन्द्र को बाजार प्रतियोगिता के हवाले करने की रूपरेखा बनार्इ है। तब तय है कि बनारसी बुनकरों की जिन्दगीए खुशहाली और आबादी सिकुड़ती जाएगी और मुटठी भर बड़ी मशीनें बनारसी कपड़ा उद्योग के नाम पर दुनिया भर में ब्रांड और संस्कृति का आर्थिक खेल खेलेंगी। तब तक एक बड़ी आबादी रोटी और दवार्इ से महरूम होकर जमींदोज हो जाएगी।
 

बनारसी साड़ी की ब्रांड एम्बेसडर प्रियंका चोपड़ा 


बनारस की बड़ी बुनकर आबादी किस तरह सोमालिया या कालाहांडी या बस्तर या विदर्भ से ज्यादा बुरी हालत में है, इसका एक प्रमाण है मुहल्ला बजरडीहा। बजरडीहा यानी बंजर डीह। आबादी दो लाख। सारे बुनकर। ज्यादातर मजूरा और गरीब। यह बनारस में पाकिस्तान जैसा मुहल्ला है। उपेक्षित, अस्पृश्य। टूटे  फूटे करघे। बन्द एवं तंग मकान। कच्ची गली। सीवर पाइप नहीं। सड़क नहीं। पीने का पानी नहीं। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र नहीं। बैंक नहीं। दो मदरसे एवं एक प्राथमिक विद्यालय। नगर निगम का कूड़ाघर नहीं। सफार्इकर्मी लापता। बैंक नहीं। एटीएम नहीं। सिर्फ टीबी के मरीज। सिर्फ पीलिया के शिकार। हिलती डोलती हडिडयां। महंगार्इ के दौर में भी दूकान पर एक रूपये का पान और दो रूपये की चाय। हिन्दू दुकानदार और मुसिलम खरीदार। बौड़ा का मेला और हिन्दू.मुसिलम का ताना बाना। हर तरफ करघे की खटपट हर तरफ मजार पर जिन्न, हर तरफ कब्रगाह में मिट्टी कोडता हुआ कुदाल, हर तरफ कलम और स्लेट वाले हाथों में नरी- जरी और ढ़रकी, हर तरफ सूखी.बासी रोटी पर हरी सब्जी के बदले लाल मिर्च की चटनी तथा हर तरफ सफदे दाढ़ी पर हथेली इतना मोटा चश्मे का उत्तल शीशा। नगर में हालिया मौत के बाद बन्द हुर्इ मुर्री सांसद एवं पीएम मोदी के एजेंडों के इन्तजार में है कि अच्छे दिन कब आएंगे। पाँच लाख बुनकरों के पास एक ही सवाल है .
यदि मैं रेशम का कीड़ा होता
तो पहले खाता फिर कमाता
यदि आदमी होता
तो पहले कमाता फिर खाता
आप ही बताइए
मैं कौन सी प्रजाति हूँ
शुरू से अंत तक
सिर्फ कमाता हूँ
कब्र की मिट्टी के अलावा
कुछ नहीं खाता हूँ।

1 टिप्पणी:

पंकज कुमार सिंह ने कहा…

आपने बहुत अच्छा फरमाया। किंतु इ‌सके लिए जिम्मेदार हम लोग भी हैं। हम ब्रांड को तवज्जु देते हैं। लघु-कुटीर उद्दयोग को नहीं।