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03 दिसंबर, 2017

पद्मावती 'मानुस प्रेम'की फैंटेसीयुक्त यात्रा है-मालवीय चबूतरा


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जाड़े की खिली धूप और मिट्टी के पुरबे में टॉपअप वाली चाय।बहस दर बहस।पद्मिनी,पद्मावत से पद्मावती तक। रेशा रेशा खुलता हुआ।वैचारिक ताप से भरा सूफ़(चबूतरा)।उसपर जमे हुए प्रेम और ज्ञान के दर्जन से अधिक सूफी।बहस का विषय-   
            "पद्मावती की कहानी
             चबूतरे की जुबानी"
      यह विमर्श शुरू होता है रम्या श्रीनिवासन की 2007 में प्रकाशित किताब 'द मेनी लाइव्स ऑफ़ अ राजपूत क्वीन'।पद्मावती एक भारतीय स्त्री के अनेक अफ़साने हैं।ज्यादातर अफ़साने मर्द ही गढ़ते रहे।इतिहास और मिथक,रियलिटी और फैंटेसी,मध्यकालीनता और उत्तर आधुनिकता,युद्ध और प्रेम,कला और राजनीति,करणी सेना और परशुराम सेना,बॉक्स ऑफिस और टेलीविजन चैनल,वाद और विवाद,मुनाफा और वर्चस्व।हर कुछ एक प्योर,वर्जिन,नस्ली और कंडीशंड स्त्री निर्मित करने की कल्पना और स्वतन्त्रता विरोधी ऐतिहासिक यात्रा।और जिस मोड़ पर भारतीय सभ्यता और लोकतंत्र खड़ा है,अब पुरानी भाषा में पुरानी किस्म के समधानपूर्ण विमर्श चल नहीं सकते।
         जायसी के महाकाव्य पद्मावत से लेकर संजय लीला भंसाली की सेंसरबोर्ड के रील बक्से में बंद विवादित फ़िल्म पद्मावती के मध्य सबसे बड़ा प्रश्न है-कला और राजनीति के वर्चस्वशील  शोर में दबी हुई स्त्री की आकांक्षा। शोर कितना जेनुइन है और कितना वर्चुअल।आइए मालवीय चबूतरे के नवाचार और पॉलिमिक्स से मुक्त ज्ञान विमर्श से इस 'शोर' को समझने की कोशिश कीजिए~
कर्मकाण्डमुक्त बहस का आरंभ डा आशीष पांडेय के तीखे सवालों से होता है-क्या सोशल मीडिया और गूगल का बड़ा हिस्सा पद्मावती के नाम फासिस्ट कंटेंट से नहीं भर दिया गया है?वे लेखक कौन हैं?क्या भीड़ की चेतना ऐसे तर्कहीन और आक्रामक विचारों से उन्मादी नहीं होती जाएगी?भंसाली की फ़िल्म का आधार भले जायसी की कविता हो लेकिन क्या हमें प्योर आर्ट और अप्लाइड आर्ट में सृजन,व्यापार और राजनीति की दृष्टि से फर्क नहीं करना चाहिए।इतिहास और फैंटेसी के गडमड से हमारा समय उलझा दिया गया है।
          गौरव त्रिपाठी सूफ़ विमर्श का अनौपचारिक विकास करते हैं-पद्मावती इतिहास की ठोस सच्चाई नहीं है।इतिहासकार टाड भी एक नए तथ्य वाली पद्मिनी की खोज चारण नैरेटिव से प्राप्त करते हैं।जायसी की पद्मावती भारतीय स्त्री सौंदर्य परंपरा से ली गई स्त्री है।पद्मनी स्त्री सौंदर्य का एक प्रकार है।जायसी की पद्मावती इतिहास और कल्पना का मिश्रण है जो कला माध्यम का जरूरी गुण है।लोकतंत्र में सेना की धारणा ही संविधान की अवज्ञा है।कमजोर समाज की भावनाएं सबसे पहले और ज्यादा आहत होती हैं।आस्था कल्पना की दुश्मन हैं।
         सुनील कुमार सवर्ण और क्षत्रिय पुरुष सत्ता को चुनौती देते हुए विचार को नया आकार देते हैं-दरअसल यह सवर्णों द्वारा स्त्री सत्ता को नियंत्रित करने वाली कठोर विचारधारा का विकास है।लोकतंत्र कला और समाज की विविधता और स्वतन्त्रता को स्वीकारता है।वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इन मूल्यों का दमन कर रहा है। बैंडिट क्वीन फ़िल्म की फूलन देवी के समय करणी सेना का विरोध आंदोलन कहां था?यह जातिवादी और धार्मिक वोट की राजनीति की डिजाइन है।
           रवि घूमर नृत्य और ख़िलजी पद्मावती स्वप्न सम्बन्ध को विवाद के केंद्र में लाने को ख़ारिज करते हैं-घूमर नृत्य राजस्थान के लोक समाज का पुराना उत्सव नृत्य है।क्या बॉलीबुड की फ़िल्म और भारत का समाज बिना गीत नृत्य के सम्भव है?हमारे यहां देव देवी,राजा कलाकार,समुदाय सम्प्रदाय सभी गीत नृत्य के संचालक हैं।फिर गीत पर बहस क्यों?कला और फैंटसी का रिश्ता बहुत पुराना है।ख़िलजी का पद्मावती स्वप्न आकर्षण उसकी दमित इच्छा की मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति है।आजकल फ़िल्म में मनोविज्ञान का बड़ा प्रयोग हो रहा है।यह विरोध क्रूरता का शक्ति प्रदर्शन है।
        अरुण तिवारी पौराणिकता और मिथक की युंगीय यात्रा की बात करते हैं कि मिथक हमेशा गतिशील मूल्यों का वाहक होता है और मानव मस्तिष्क के रथ पर सवार होकर भविष्य की यात्रा करता है।
         प्रो सत्यदेव त्रिपाठी का सद्यः प्रकाशित आलेख का पाठ फ़िल्म उद्योग की व्यापारिक राजनीति की कलई खोलती है और कई बार कला के प्लेटो मॉडल का समर्थन करती हुई प्रतीत होती है।
           मुंबई से आए लेखक शाश्वत रतन का सुचिंतित और दोटूक वक्तव्य गौरतलब है कि कट्टर समाज और सरकार फ़तवा जारी करते हैं।आजकल यह विचार तेज़ी से फ़ैल रहा है। जौहर और सती की प्रथा कभी भी स्त्री और मानवता के गुणगान का विषय नहीं हो सकती।इतिहास का डॉक्यूमेंटेशन हो सकता है।फ़िल्म हमेशा रूपक और  फैंटेसी की कला होती है।पद्मावती इतिहास के गर्भ से नहीं मुसलमान सूफी कवि जायसी की कल्पना की उपज है।उसे उसी रूप में ग्रहण करना चाहिए।
        भोजपुरी अध्ययन केंद्र के नवनियुक्त समन्वयक प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल जायसी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हवाले से जरूरी सवाल उठाते हैं कि युद्ध और उन्माद के विरुद्ध प्रेम का आख्यान जायसी की अनूठी देन है।यह फ़िल्म जायसी को पाठ्यक्रम से बाहर निकालती है।ख़िलजी की तुलना रावण से करना बेमानी है।
        डा दीनबंधु तिवारी फ़िल्म को मनोरंजन और प्रायोगिक कला मानते हुए उसके रिलीज होने का समर्थन करते हैं-700 साल पुरानी एक कल्पित स्त्री के लिए एक जीवित स्त्री कलाकार की नाक काटने और उसपर ईनाम देने वाली विचारधारा और लोग किसी आधुनिक लोकतान्त्रिक समाज के प्रतिनधि कैसे हो सकते हैं?
         बुजुर्ग वाचस्पति को आज नहीं बोलना है क्योंकि उन्हें बिसेसरगंज गल्ला खरीदने जाना है।
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                             मध्यांतर
          
       
    

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