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08 सितंबर, 2010

कार्ल मार्क्स का करेला बनाम कामू का काशीफल

 पिछले शिक्षक दिवस पर अमर उजाला में साहित्य के बुजुर्ग शिक्षक नामवर सिंह पर रवींद्र त्रिपाठी की एक टिपण्णी है- नामवर सिंह हिंदी में चुप्पी के सबसे बड़े मास्टर हैं. इस चुप्पी का गहरा राजनीतिक निहितार्थ  है. बकैत बनारस से उन्होंने चुप्पी का रूप चुना है. इसलिए उनके पान घुलाने,१२० नंबर फांकने और मंद मंद मुस्काने की अपनी रणनीति है. पान नामवर सिंह के मुंह में चलने वाली राजनीति का  चलायमान जयगान है.
      यह चुप्पी उनके लिए जितनी  शुभ हो ,समाज और साहित्य के लिए घातक है. जैसे कुलपति वी एन राय के छिनाल प्रकरण पर कुलाधिपति पद की चुप्पी, विष्णु खरे के हिदी विभागों को चकला घर कहने और उन्हें पुरुष वेश्या कहने पर चुप्पी, सलवा जुडूम और ग्रीन हंट के संचालक के किताब लोकार्पण को लेकर हुए विरोध पर चुप्पी, बिहार के बाहुबली नेता प्रभुनाथ सिंह  के मंच पर जाने के कलाकारों द्वारा विरोध पर चुप्पी,जसवंत सिंह की किताब  की आलोचना के विरोध पर चुप्पी, प्रलेस महासचिव द्वारा फोर्ड फाउन्डेसन से  पैसा लेने के प्रकरण पर चुप्पी, बनारस में प्रलेस सम्मलेन में विचारधारा के अंत की घोषणा की आलोचना पर चुप्पी आदि. उम्मीद है, कोई अंध भक्त टेपित लाभ के लिए नामवर सिंह बोलवाए या भाषण अंकन के सिलसिले में वे  कुछ  बोलें तो बोलें वरना स्टैंड के नाम पर आई सी सी  का कार स्टैंड उनके लिए  सबसे सुविधाजनक है.
        १८ सितंबर को बनारस में उन्हें पाखी पत्रिका द्वारा ५१ हजार रूपये से सम्मानित होना है.पाखी इएमइसी ग्रुप की साहित्यिक पत्रिका है. आइये ,अगस्त में ग्रुप के मालिक का सम्पादकीय स्टैंड सुनिए. संपादक के लिए मध्य मार्ग उत्तम मार्ग है  यानी वर्त्तमान व्यवस्था सुमार्ग है.सम्पादकीय का कहना है कि अरुंधती रॉय अतिवादिता की  शिकार हैं. रूस वैचारिक स्वंत्रता का दुश्मन था.'' विचारधाराओं में बंधा मस्तिष्क अतिवादिता का शिकार हो जाता है.उसमे ठहरे हुए जल के समान दुर्गन्ध आने लगाती है.''  अमेरिकी साम्राज्यवादी नीति रूसी वामपंथ और भारतीय वाम विचारधारा  की जनविरोधी अतिवादिता एक जैसी है. आदिवासी किसानों की लडाई का मुद्दा केवल नक्सलपंथ का मुद्दा है.
        संपादक का कहना है कि कैसे कोई तय कर सकने की निर्णायक भूमिका में है कि विश्वरंजन के हाथ निर्दोषों के खून से रंगे हैं. सम्पादकीय के अनुसार मार्क्सवाद एक आयातित विचारधारा है. आदिवासी किसानों  को क्या पता है  कि मार्क्स-लेनिन किस चिड़िया  का नाम है. मालिक संपादक का कहना है" मैं किसी भी विचारधारा को अंतिम  सत्य नहीं मानता.''
        विचारधारा  को अफीम मानने वाले संपादक क़ी मानवता का राज यहाँ है कि ''मैं एक ब्राहमण परिवार में जन्मा हूँ मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं है. लेकिन मैं इसके लिए शर्मिंदा भी नहीं हूँ.'' आगे ''अब देखिये विचारधाराओं का प्रदूषण.  जब नरेन्द्र मोदी को अपराधी कहता हूँ तो सराहना होती है. हुसैन के खिलाफ लिखता हूँ तो दक्षिण पंथी करार दे दिया जाता हूँ.''
         कार्ल-मार्क्स के करेले से ज्यादा कामू के काशीफल पर नजर गडाए रखनेवाली विचारशील  हथेलियों से नामवर सिंह सम्मानित होकर बाजार और सरोकार दोनों धर्मों  की सेवा अवश्य  करेंगे. क्या उस वक्त भक्त-भजनियों-फुलधरियों की  तालियों के शोर  में याद कर पाएंगे क़ि  एक विचारधारा में उनकी इतनी आस्था थी कि कभी यहाँ से लोकसभा का चुनाव लड़े थे और अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को अपन जन्म दिवस मानते थे.
        बनारस में दो  दशक से  सैकड़ों  किसानों और बुनकरों की मौतों का सिलसिला जारी है और देश में लाखों . जनता और जनविचारधारा  को मनुष्यता का दुश्मन माननेवाली वैचारिकी से सम्मानित होते हुए क्या यह  चुप्पी टूटेगी ? सन्नाटे के कोहरे में विचारधारा लाश की तरह दबाकर रखी जाएगी. धूप उगने पर बहस  शुरू होगी कि करेला ज्यादा फायदेमंद है या काशीफल.    

4 टिप्‍पणियां:

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

बिल्कुल सही लिखा है…इस पत्रिका के संपादक से मैं पंकज बिष्ट जी के यहां समयांतर के दस साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मिला था…तभी उसकी उद्दण्डता साफ़ झलक रही थी और यह भी कि कैसे उसने 'अच्छे-अच्छों' और 'बड़े-बड़ों' को साध रखा है!

नामवर जी की छोड़िये…उनसे अब उम्मीद भी क्या की जाये…लेकिन क्या सभी स्वघोषित वामपंथी इस उज्जड्ड व्यवस्था समर्थक संपादक की पत्रिका का बहिष्कार करेंगे?

shiv ने कहा…

.हिंदी भक्तों,भजनियों और फूल धारियों से कब मुक्त होगी. जय मार्क्स

gopal pradhan ने कहा…

guruji, sawal to bahut sahi uthaya hai lekin baat ye hai ki iska kuch sambandh BHU ke hindi vibhag se bhi dikhai pad raha hai. namwarji ka puri yatra hindustani communist buddhijiviyon ke satta vyamoh me fansne aur uske anusar tark nirmit karne ki yatra rahi hai. hindi samaj aur hindi bauddhik ek dusre se kabhi itne door nahi rahe the jitne aaj hain.

Ritesh ने कहा…

thick kaha sir aapne ye kya jane rajya prayojit hinsa ko,visthapan ke dard ko.hamane bhi wo sampadakiy padhi thi.kabhi bastar ya dantewara jate tab pata chalta.iss daur main yadi gandhi bhi jinda hote to naxalvadi hote, shayad aap hamase sahamat na hon.