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16 दिसंबर, 2025

50 वर्ष बाद शोले फ़िल्म : चंबल की किसान कथा


राश की कलम से
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                   ||थिएटर से लौटकर||


    कला समीक्षा में भोथड़े दिमाग कम नहीं। उसकी एक मिसाल फ़िल्म शोले को लेकर 50 वर्षों से होती रही किसिम किसिम की कुचर्चा है। यह सही है कि वह एक मसाला पॉपुलरिटी से क्राफ्टेड मूवी है लेकिन शोले को मारधार, दोस्ती, रोमांस,कॉमेडी,ट्रेजडी, गीत संगीत,संपादन,निर्देशन,संवाद,पटकथा तक सीमित रखना भारतीय सिनेमा की उस जमीनी दृष्टि को खारिज करना है जो यहां के मूल सामाजिक राजनीतिक प्रश्न रहे हैं।
           मैं जब कल बनारस के आईपी थियेटर में 4k dolby saund के साथ अपनी गोल्डन जुबली मना रही फिल्म शोले के फाइनल अनकट को शोले दर्शन की यात्रा में 11वीं बार देख रहा था तब मुझे पहली बार उसकी
दृष्टिसंपन्न पटकथा पर ध्यान गया जिसकी मूल समस्या चंबल इलाके के रामगढ़ गांव की किसान समस्या है। भारतीय हिंदी सिनेमा ने किसान प्रश्न को आरम्भ से मुख्य या गौण रूप में किसी न किसी तरह से जरूर उठाया है।मदर इंडिया से पिपली लाइव तक किसान
प्रश्न के अनेक सूत्र विन्यस्त दिखते हैं।
       शोले की पटकथा के केंद्र में डाकू गिरोह के सरदार गब्बर सिंह द्वारा रामगढ़ गांव के किसानों से अनाज वसूली है। ठाकुर बलदेव सिंह बड़े किसान का
पुलिस पुत्र है जबकि छोटे बड़े किसान पात्रों से यह गांव जीवंत बना रहता है। दो निम्न मध्यवर्गीय शहरी शातिर चोरों धर्मेंद्र और अमिताभ को किसानों का नायक बनाए जाने की कहानी रामगढ़ के किसानों की
रक्षा की कहानी है।
        सलीम जावेद की प्रगतिशील किसान मजूर और कौमी एकता की कलादृष्टि का कमाल है कि पटकथा
के संवादों में सीधे खेती से लगाव और ग्राम प्रेम के इंकलाबी डायलॉग रचे गए हैं। संजीव कुमार जिस तरह से कहते हैं कि किसान अपने हंसिए की दरांतियों से लोगों का जीवन पालते हैं या अब इस गांव से एक मुट्ठी अनाज
भी डाकुओं को नहीं मिलेगा तब यह उस दौर के चंबल की त्रासदी का ही नहीं बल्कि उत्तर भारतीय किसान के संघर्ष का प्रतिबिंब है। जय और वीरू गांव में खेती
बारी करने का स्वप्न देखने लगते हैं। एके हंगल का अपने कई बेटों को किसानों और गांव के लिए शहीद
करने की इच्छा किसान एकता की बुनियाद बनती है।प्रेम और पर्व किसानी भाषा,टोन, लय से विन्यस्त हैं।
              मुझे लगता है कि सलीम जावेद की पटकथा में  यह भारतीय किसानों के गल्प और हास्य व्यंग्यशिल्प का भी खूबसूरत इस्तेमाल है जिसमें कथा कथन से पटकथा में बार बार हुक पाइंट निर्मित होता है और त्रासदी व हिंसा की यात्रा को सहज बनाए रखने
का प्रयास जारी रहता है।
        अमजद खान द्वारा गब्बर की भूमिका भारतीय
सिनेमा के खलनायकत्व की अदा की ऊंचाई है। मैं 
एके हंगल से इप्टा के बिहार सम्मेलन में मिला था। इप्टा स्वर्ण जयंती के झंडा गीत के लिए  मेरा गीत 'वे सारे हमारी कतारों में शामिल ' के कोरस गायन के वक्त एके हंगल और ओमपुरी जैसे वैकल्पिक सिने कलाकार शामिल हुए। तब शोले का डायलॉग बोलकर एके हंगल इप्टा का महत्व बताते रहे।मैं उनसे धीरे धीरे प्रभावित हुआ। इस फ़िल्म में आए अमजद खान उर्फ  गब्बर के डायलॉग को क्लास 8 से बीए तक जन्मभूमि सिमरिया के अपने
टोल में घूम घूमकर बोलता था।तब मैं गब्बर ही हो
गया था।मेरा गांव किसानों और रंगबाजों की ज़ंग से
लाल बना रहता था।
        अब भारतीय सिनेमा ने ग्रैंड बनाना लगभग बंद
कर दिया है तब इस फ़िल्म को हर पीढ़ी द्वारा देखना
  चाहिए। संस्कृति से फ़िल्म पैदा होती है ,फिर वह फ़िल्म एक सामाजिक संस्कृति बना सकती है।शोले
ऐसी ही फ़िल्म है।

01 अक्टूबर, 2025

अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस का बाजारशास्त्र क्या है

रामाज्ञा शशिधर 
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आज अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस है। 
2014 से अंतर्राष्ट्रीय कॉफी संगठन ने अनेक देशों में अलग अलग तिथियों पर मनाए जाने वाले  राष्ट्रीय कॉफी डे से अलग एक अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस शुरू किया। इस दिन कॉफी कम्पनियां कॉफी किसानों,रोस्टरों, बरिस्ता और ग्राहकों में कॉफी कल्चर और एग्रीकल्चर  के प्रति तरह तरह की जागरूकता के लिए आयोजन करती हैं। बीन किसानों की ज़िंदगी में सुधार करने के वायदे भी करती हैं।
               चाय 19वीं सदी से ही अंग्रेजीराज द्वारा भारत और अमेरिका जैसे देशों में उपनिवेशन और शोषण का औजार थी। वह 2014 से गली गली,मीडिया,सभा,टपरी पर किसिम किसिम के विभाजन का हथियार हो गई।
          दूसरी ओर कई सदियों से बकरी, चरवाहे, मोंक, यायावर, फ्रांसीसी क्रांति से होती हुई, दुनिया भर में बदलाव,विद्रोह और जोश की प्रतीक बनती हुई, कॉफी आजकल 'थर्ड प्लेस' की 'सरप्लस कोमोडिटी सेवा' में तेज गति से शामिल है।
       ' थर्ड स्पेस' तो चाय अड्डे भी रहे हैं और कॉफी हाउस भी लेकिन दोनों के मिजाज,चरित्र, बहस, दिशा और विचार उत्पादन में बहुत अंतर रहा है।यह अलग से अध्ययन का विषय है।
              बहरहाल दुनिया की सबसे बड़ी कॉफी कंपनी स्टारबक्स बनारस जैसे देहाती नगर के दक्षिणी
कोने पर हाथ आजमा रही है वहीं कैफे कॉफी डे जैसी
भारतीय कंपनी भी बनारस में दो स्टोर के साथ पहले से जमी हुई है। 
          यह दुर्भाग्य है कि आईआईटी बीएचयू 
के सीसीडी आउटलेट का क्रमिक विनाश यहां के प्रशासन और शिक्षा की अर्थी चलाने वालों ने कर दिया है। दुनिया भर के उच्च शिक्षण संस्थानों में कैफे ज्ञान शोध उत्पादन के विमर्श स्पेस रहे हैं जबकि हमारा हाल सामने है।भारत के विवि क्यों नवाचार और ज्ञान विमर्श  में पिछड़ते गए इसका एक जरूरी कारण इनकी शिक्षा प्रणाली में 'रचनात्मक कैफे संस्कृति' के थर्ड स्पेस' निर्माण का महत्व नहीं देना है जहां से नई पीढ़ी भारत और दुनिया को अपनी ऊर्जा,सोच,विमर्श, नवाचारी ज्ञान उत्पादन से बड़ी ऊंचाई दे सकती थी।भारत चूक गया है। 
    और उधर हाय! विकट चाय चौपालों ने 'नया चीकट लम्पट हिंसक गिरोह' पैदा कर दिया है जो
लोकतंत्र विरोधी आंदोलन चला रहा है। बंगाल के चाय अड्डे और काशी की अड़ी अब इतिहास के फॉसिल हैं।
        नेसकैफे जैसी कारपोरेट कम्पनी बीएचयू में कई आउटलेट्स से वर्षों से कॉफी का तमाशा कर रही है।अभी हेजलनेट जैसी नई कम्पनी लंका पर कूद आई है।
    लंका से राजघाट तक सौ से अधिक देशी विदेशी कैफे हैं जो पारंपरिक चाय अड्डों को चुनौती दे रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से कुछ ही जगहें थर्ड स्पेस के लायक हैं बाकी होर्डिंग, पोस्टर, मैगी बर्गर, स्मोकिंग गैस चैंबर और डोपामाइन फायर प्लेस ही दिखाई देते हैं।

        कॉफी संस्कृति का काशी जैसे स्थान पर इतना आतंक है कि मजबूरन पप्पू अड़ी नेस कॉफी, पोई अड़ी चाफी, बंगाली दादा अड़ी कुल्हड़ कॉफी बेच रही है। हालांकि चाय और कॉफी दोनों प्योर फॉर्म से अलग डेयरी कल्चर की एनिमल क्रूरता और सेहतविरोधी क्रीम पर टिकी हुई हैं।
       बनारस में कॉफी वार साइलेंटली शुरू है। अभी थर्ड वेव, ब्लू टोकाय जैसी देशी कंपनियाँ उतरने 
के मूड में हैं।
              बनारस जैसे देहात का यह हाल है तब बंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों की बात छोड़िए। वे बड़ी जगहें दुनिया और देश की छोटी बड़ी कॉफी कम्पनियों के युद्ध स्थल हैं।
हमारी कल्पना से परे कॉफी पेय में प्रयोग चल रहे हैं।
यह अतिरिक्त कैफ़ीन से अतिरिक्त आनंद द्वारा अतिरिक्त मुनाफा कमाने का ग्लोबल बाजार है। दूसरी ओर नई पीढ़ी में 'थर्ड प्लेस' खोज की बैचेनी का प्रॉफिट प्लेस है।
            जैसे बनारसी हलवाई मिठाई में तरह तरह के प्रयोग करते रहते हैं, ठीक वैसे ही प्रशिक्षित बरिस्ता कॉफी में रोज रोज न्यू फ़्लेवर और टेक्सचर जोड़ रहे हैं।
       चाय की तरह  कॉफी भी एक विचारधारा है और विचार उत्पादन का अड्डा भी। कॉफी के विचार युग से अलग उपभोक्ता युग में  कॉफी हाउस में 'थर्ड स्पेस' बहुत कम बन रहा है और अलगाव का तनाव बढ़ता जा रहा है।
              कॉफी की खेती, किसान की हालत, बीन मार्केटिंग, रोस्टिंग, और उपभोग आउटलेट्स के बाजारशास्त्र में मेरी दिलचस्पी इसलिए बढ़ी है क्योंकि
किसान और खेत पर खतरे बढ़ते जा रहे हैं।
    केंद्रीकृत टेक्नो पूंजी द्वारा शोषण बढ़ने वाला है।ऐसे में किसान बीन की तरह फ्रेंच प्रेस की तली में घुलकर खत्म होते जाएंगे और मुनाफा स्विस लॉकर से गतिविधि  बढ़ाता जाएगा।
      तब अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस पर हमें कैफीन
की उत्तेजना और ताजगी के साथ बीन पैदा करने वाले लैटिन अमेरिका,अफ्रीका और एशिया के मेहनतकश किसानों की ज़िंदगी के जीवन में झांकना होगा, कि कहीं आग में उनका जीवन तो नहीं रोस्ट हो रहा, कहीं मशीन में लमहा तो नहीं पिस और घुल रहा है!
       
      ब्लैक कॉफी तन के लिए फायदेमंद है लेकिन
  मन के लिए उससे ज्यादा असरदार हो सकता है। मन के खेत में कॉफी बीन से वास्तविक खेत में ठोस कॉफी बीन की तरह नए नए उत्तेजक विचार पैदा किया जाना चाहिए। 
      वाल्टर बेंजामिन की एक स्थापना है कि लेखक भी उत्पादक होता है। बात सही है, किसान की तरह बौद्धिक भी उत्पादक होता है।एक अन्न उपजाता है,दूसरा शब्द। दोनों को गहरे जुड़ना चाहिए।इसलिए कि तमाम रिपोर्टें बताती हैं कि कॉफी किसानों का जीवन कॉफी की तरह सेहतमंद और स्वादिष्ट नहीं है।
समझ के लिए वाद विवाद संवाद जारी रखना है।