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18 अगस्त, 2014
बुरे समय में नींद पुस्तक की संपूर्ण कविताएँ : रामाज्ञा शशिधर pdf
06 अगस्त, 2014
तुलसीदास के मुखियामार पंचदश दोहे
तुलसी जयंती पखवाड़ा २०१४ पर विशेष पेशकश
गोस्वामी जी को श्रद्धांजलि स्वरूप पन्द्रह मुखियामार दोहे समर्पित हैं.क्यों? इसलिए कि महाकवि के एक मुखियामुखी आदर्श दोहा 'मुखिया मुख सो चाहिए खान पान में एक/पालहिं पोसहिं सकल अंग तुलसी सहित विवेक ' को यह फक्कड़ कवि इन दोहों का प्रेरणा बीज मानता है.अस्सी भदैनी वाले गोस्वामी बाबा की तरह इस पीड़ित, प्रताड़ित,बहिष्कृत,उपेक्षित बनारसी तुक्कड़ कवि का शब्द बीज अँखुआ उठा. मुखिया और मुख केंद्रित हर दोहे को ट्रुथ सीरम,मेटल डिटेक्टर,सीसीटीवी,माइक्रो केम,उत्तल अवतल समतल लेंस समझकर
आनंद लीजिए तभी मुखिया के मुख से उनकी आत्मा तक का काशी दर्शन कर सकते हैं.आजकल के कवि महाकवि की कविता चुराकर अपनी बताते हैं,यह तुक्कड़ अपनी तुकबंदी को महाकवि की कहने का दुस्साहस कर रहा है..जब कबीर,नानक,रविदास,मलूक में जोड़कर आप काम चला रहे थे तब यह कवि आपसे शिकायत करने नहीं गया,फिर तुलसी पर कोई करे हाय तौबा क्यों? जो नए बाबा लोग फेसबुक तक नहीं जाना चाहते और इस कवि से मुखियामुखी दोहों की मांग कर रहे हैं यह पोस्ट उनके लिए भी है-रामाज्ञा शशिधर मुखिया के मुख से बचो मुख में सौ संसार
पान सुपारी लौंग सा चांपे बेड़ा पार
मुखिया का चेहरा सरल जैसे गोमुखबाघ
भीतर मलजल सा बहे प्रतिशोध की आग
मुखिया के जीभन छुरी मुख में नकली राम
जो भी जबड़े में घुसा उसका काम तमाम
पंचायत में सतयुग सेवित एकल कुर्सी खास
परंपरा की खटमल के संग मुखिया का रहवास
मुखिया के दरबार में हर दिन लगती खाप
हर स्वाधीन विचार का दमन क़त्ल और चाँप
नख शिख गलकर ठाठ का उड़ गया उड़न कपूर
हिरिस न मुखिया का मिटा ठठरी खोजे हूर
मुखिया को मुखियाइन से घर में पड़ती चोट
सड़ा मसूडा प्यार का तोड़े जग अखरोट
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तुलसीदास के दोहे,
मुखियामुखी दोहे,
यह बनारस है
16 जनवरी, 2014
कविता घाट:नया आपातकाल
(बनारसी पनेरी छन्नूलाल चौरसिया के लिए)
रामाज्ञा शशिधर
मगही पान पर कत्था चूना फेरते हुए
बात कतरता जमा देता है छन्नूलाल
कि डाक् साब अजब का था वह साल
जब दीवार लांघकर आया था आपके पास
जर्दा पान सुपारी के साथ
क्या गजब की लत थी जनाब
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कविता
12 दिसंबर, 2013
पुरानी नाव की पुकार
छोड़ गया बाढ़ का पानी
तेरे संग की सघन निशानी
तेरे संग की सघन निशानी
डबडबाई आँखों सा गीला किनारा
बच गया
समय की पपनियों पर गाद
रच
बच गया
समय की पपनियों पर गाद
रच
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30 मार्च, 2013
मैं साम्यवादी नहीं था :मार्टिन नीमोलर
26 फ़रवरी, 2012
'बुरे समय में नींद' में शामिल मेरी ग्यारह प्रिय कविताएँ
दोस्तो!
कविता के पुराने प्रतिबद्ध कार्यकर्ता होने के बावजूद काव्य प्रकाशन और प्रदर्शन को लेकर मैं बेहद शर्मीला और आलसी आदमी हूँ.आप पाठकों की हौसला आफज़ाई का नतीजा है कि सितम्बर २०११ में अंतिका प्रकाशन से अपनी ६९ कविताओं का संकलन बुरे समय में नींद ला पाने में सफल हुआ.मेरे लिए यह उत्तेजक उपलब्धि है कि इस काव्य विरोधी समय में बुरे समय में नींद का पहला संस्करण सिर्फ छह महीने में बिक गया तथा प्रकाशक ने जल्द ही दूसरा संस्करण छापने का आश्वासन दिया है.अनेक दोस्तों ने कई महीने से लगातार मांग की है कि मैं एक साथ अपनी कुछ प्रिय कविताओं को परोसूं.आपके लिए मैं संकलन से अपनी ११ प्रिय कवितायें आपके हवाले कर रहा हूँ.उम्मीद है कि आस्वाद और मूल्य दोनों स्तरों पर आप इनसे जुड़कर आत्मीयता महसूस करेंगे.
आपका
रामाज्ञा शशिधर
04 अक्टूबर, 2011
कविता घाट:सूरन बाजार के खिलाफ देशी विचार है
20 नवंबर, 2010
कविता घाट : सौ साल बाद छः काव्य-फूल
नागार्जुन,अज्ञेय,केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर,फैज़ और गोपाल सिंह नेपाली हिन्दी-उर्दू कविता के छः ऐसे सितारे हैं जिनकी रोशनी में लगातार हम चीजों को ढूँढने की,सवालों को सुलझाने की, लोकपरिया पर चलने की कोशिश करते रहे हैं.सौवें साल में भारतीय जनता का दुःख और अँधेरा और तीखा हुआ है,साथ ही इन सितारों की जरूरत और बढ़ गई है.संवेदना और सरोकार के पांच फूल पेश हैं जिनकी खुशबू और ताज़गी और स्पर्शी हो गई है.-माडरेटर
नागार्जुन

जो नहीं हो सके पूर्ण–काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम ।
कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य–भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले हीजो वीर रिक्त तूणीर हुए
उनको प्रणाम !
जो छोटी–सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि–पार;
मन की मन में ही रही¸ स्वयं
हो गए उसी में निराकार
उनको प्रणाम !
जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह–रह नव–नव उत्साह भरे;
पर कुछ ने ले ली हिम–समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे
उनको प्रणाम !
एकाकी और अकिंचन हो
जो भू–परिक्रमा को निकले;
हो गए पंगु, प्रति–पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले
उनको प्रणाम !
कृत–कृत नहीं जो हो पाए;
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं¸ फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल
उनको प्रणाम !
थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ;
या जन्म–काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहांत हुआ
उनको प्रणाम !
दृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति–मंत ?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत
उनको प्रणाम !
जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर–चूर
उनको प्रणाम !
साँप !
अज्ञेय

- तुम सभ्य तो हुए नहीं
- नगर में बसना
- भी तुम्हें नहीं आया।
एक बात पूछूँ--(उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना--
-
- विष कहाँ पाया?
मजदूर का जन्म
केदारनाथ अग्रवाल
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !
हाथी सा बलवान,
जहाजी हाथों वाला और हुआ !
जहाजी हाथों वाला और हुआ !
सूरज-सा इंसान,
तरेरी आँखोंवाला और हुआ !!
तरेरी आँखोंवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!
माता रही विचार
अँधेरा हरनेवाला और हुआ !
दादा रहे निहार
सबेरा करनेवाला और हुआ !!
सबेरा करनेवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !
जनता रही पुकार
सलामत लानेवाला और हुआ !
सलामत लानेवाला और हुआ !
सुन ले री सरकार!
कयामत ढानेवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !
काल तुझसे होड़ है मेरी
शमशेर बहादुर सिंह
तुझसे होड़ है मेरी : अपराजित तू-
तुझमें अपराजित मैं वास करूं ।
इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूं
सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो-
कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं- तेरे भी, ओ' 'काल' ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल !
जो मैं हूं-
मैं कि जिसमें सब कुछ है...
क्रांतियां, कम्यून,
कम्यूनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं ।
मैं, जो वह हरेक हूं
जो, तुझसे, ओ काल, परे है
इंतेसाब
फैज़ अहमद फैज़
आज के नाम
और
आज के ग़म के नाम
आज का ग़म कि है ज़िन्दगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा
ज़र्द पत्तों का बन
ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है
दर्द का अंजुमन जो मेरा देस है
किलर्कों की अफ़सुर्दा जानों के नाम
किर्मख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम
पोस्ट-मैंनों के नाम
टांगेवालों के नाम
रेलबानों के नाम
कारख़ानों के भोले जियालों के नाम
बादशाह्-ए-जहाँ, वालि-ए-मासिवा, नएबुल्लाह-ए-फ़िल-अर्ज़, दहकाँ के नाम
जिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए
जिस की बेटी को डाकू उठा ले गए
हाथ भर ख़ेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है
दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली है
जिस के पग ज़ोर वालों के पाँवों तले
धज्जियाँ हो गई हैं
उन दुख़ी माँओं के नाम
रात में जिन के बच्चे बिलख़ते हैं और
नींद की मार खाए हुए बाज़ूओं से सँभलते नहीं
दुख बताते नहीं
मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं
उन हसीनाओं के नाम
जिनकी आँखों के गुल
चिलमनों और दरिचों की बेलों पे बेकार खिल-खिल के
मुर्झा गये हैं
उन ब्याहताओं के नाम
जिनके बदन
बेमोहब्बत रियाकार सेजों पे सज-सज के उकता गए हैं
बेवाओं के नाम
कतड़ियों और गलियों, मुहल्लों के नाम
जिनकी नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों
को आ-आ के करता है अक्सर वज़ू
जिनकी सायों में करती है आहो-बुका
आँचलों की हिना
चूड़ियों की खनक
काकुलों की महक
आरज़ूमंद सीनों की अपने पसीने में जलने की बू
पड़नेवालों के नाम
वो जो असहाब-ए-तब्लो-अलम
के दरों पर किताब और क़लम
का तकाज़ा लिये, हाथ फैलाये
पहुँचे, मगर लौट कर घर न आये
वो मासूम जो भोलेपन में
वहाँ अपने नंहे चिराग़ों में लौ की लगन
ले के पहुँचे जहाँ
बँट रहे थे घटाटोप, बे-अंत रातों के साये
उन असीरों के नाम
जिन के सीनों में फ़र्दा के शबताब गौहर
जेलख़ानों की शोरीदा रातों की सर-सर में
जल-जल के अंजुम-नुमाँ हो गये हैं
आनेवाले दिनों के सफ़ीरों के नाम
वो जो ख़ुश्बू-ए-गुल की तरह
अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा हो गये हैं
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
गोपाल सिंह नेपाली

राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
खंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
किस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों से छीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से
बचता हूँ कैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन खुदगर्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लम
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
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फैज़ शमशेर.अज्ञेय
05 नवंबर, 2010
कविता घाट:नया आपातकाल
(बनारसी पनेरी छन्नूलाल चौरसिया के लिए)
रामाज्ञा शशिधर
मगही पान पर कत्था चूना फेरते हुए
बात कतरता जमा देता है छन्नूलाल
कि डाक् साब अजब का था वह साल
जब दीवार लांघकर आया था आपके पास
जर्दा पान सुपारी के साथ
क्या गजब की लत थी जनाब
डाक् साब घुलाते हुए जीभ को होठ पर फेरते हैं
आपाताकाल सबसे पहले जीभ और होठ पर ही उतरता है
जर्दा सुपारी किमाम फड़क रहे हैं
बीरे पर सवारी कसने के लिए
आपातकाल में खास खुशबू भरने के लिए
घेरेबंदी में और भी लहर भरता है खुशबू का असर
डाक् साब कचरते हुए फरमाते हैं
कि क्या बताएं डाक् साहब
क्या जमाना था कि हम भी थे
विरोध का जुनून इतना था कि
चहारदीवारी के उस पार से हासिल कर लेते थे पान
लाल करते रहते थे सड़क सीढ़ियां और दीवार
विरोध करने के लिए जरूरी नहीं
कि सदा खून के छींटे ही उड़ाए जाएं
छन्नूलाल शान से बढ़ाता हाथ
डाक् साब गौरव से लबरेज थाम लेते हाथ
सड़क पर शुरु होता नया घमासान
ऐसे भी लड़ी जातीं इतिहास की लड़ाइयां
चूना ललकारता कि तेरे लाल के मार्क्सवाद से
मेरी सफेदी का गांधीवाद ज्यादा तगड़ा है संगदिल
देख तेरे लाल की लाली में मेरा कितना है हाथ
कत्था शरम से हो जाता और लाल
याद कर आपात्काल
गाल गुलाब और शरम लाल झंडी की तरह क्यों होता हाय!
मुख के बख्तरबंद में पक्ष और विपक्ष की
तेज होती जाती
हिंसा अहिंसा और प्रतिहिंसा की काररवाई
नए सिरे से जारी होता
दांतों के फासिज्म के खिलाफ जीभ का आंदोलन
चिड़ियाघर के तालाब में मेमना और घड़ियाल
‘‘पिपुल हैव नाट गन इन द हैंड्स’’
इधर देखिए 120 नंबर का कमाल कि
महक कितनी मारक है कि बीएचयू
और जेएनयू और डीयू और अलीगढ़
और इलाहाबाद और पटना और भोपाल
सबको सराबोर किए हुए है
झूम रहे हैं मंच और मचान
सडक की नजर में संसद चांदी का पीकदान
डाक साहब को घुलावट में तरावट के लिए
फिर चाहिए चूना सुपारी और किमाम
सुपारी है कि जेपी सिमेंट सी पहल्ो कड़क रहती
फिर मुलायम बुरादे में बदल जाती
जीभ को कुछ ज्यादा ही थकाती, लड़खड़ाती
किमाम है कि भर देता फिजा में
मस्ती हसरत और रवानी
जैसे लोहिया की पोथी से
निकल रही हो अमर-वाणी
लोहे की गेंद में पगुरा चुका प्रतिरोध
रबड़गोली आंसू गैस जल फव्वारे का जवाब
बूट और बंदूक का सारा हिसाब
-पिच् पिच् पिच्...
थुर्र थुर्र थू...
और अब जो शुरु होगा
नई नस्ल से संवाद
होगा बस नया आपातकाल
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13 अक्टूबर, 2010
कविता घाट : मुखियाजी
मुखियाजी का तांडव जारी है. चाहे गांव की पंचायत हो या देश की. संयोग से यूपी और बिहार के चुनावों से जनतंत्र का पाखंड फ़िर खुल रहा है.गांव,टोला,मुहल्ला,घर,दालान,खेत,बथान सभी बाजार,बारूद,जुल्म,जाति और जहर में नए सिरे से बदल गए हैं.दारू से,मुर्गे से,साडी से,धोती से,कट्टे से,टके से,जनेऊ से,खडाऊं से,गोत्र से,मूल से,नाभि से,नाल से मत का दान दनदना रहा है.लोकतंत्र फ़नफ़ना रहा है. ऐसे में बया और दिनकर स्मारिका में छपी आपबीती और जगबीती कविता मुखियाजी फ़िर से पोस्ट करने को मजबूर हूं.-रामाज्ञा शशिधर
मुखिया जी कुछ भी न बदला
बदल गए बस आप
जब से आप हुए जनसेवी
लोकतंत्र कुछ और फरेबी
जात धरम की नई जलेबी
हाट बाट है लेवी लेवी
हाथ न सूझे रात है कैसी
तीन ताल धुन सात है कैसी
पूरी गाड़ी खेंचे में है
निकल गए बस आप
न्याय समिति उत्थान सभाएं
बुश ब्लेयर हैं दाएं बाएं
रात रात चलती कक्षाएं
किसे उठाएं किसे गिराएं
एक कथा में सौ मुद्राएं
हर मुद्रा की सौ शाखाएं
चौसर के सब मंत्री मर गए
अमर हुए बस आप
प्राइवेट पब्लिक मिश्रित सेक्टर
आरक्षण के सारे फेक्टर
वर्ल्ड बैंक एनजीओ चैप्टर
लाल कार्ड का मेसी ट्रैक्टर
ठेका पट्टा लूट दलाली
फिर भी दांतिल आंत है खाली
रायल संग मुर्गा काकरेली
निगल गए बस आप
मैकाले की नई मनीषा
आपकी खातिर बुद्ध और ईसा
जाप लिये फुसफुस चालीसा
बिछा रही पत्तल पर शीशा
गिरे लाश न भरे गवाही
मूर्ति निमित्त धन करे उगाही
ग्राम बदर हो गया ससिधरवा
ग्राम रतन हुए आप
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कविता घाट : मुखियाजी
29 सितंबर, 2010
कविता घाट : रेडियो पर भजन
रामाज्ञा शशिधर की कविता
रेडियो ने जब गुनगुनाया
'रघुपति राघव राजाराम'
राजा का रथ कूच कर चुका का था
राजधानी से पूरब दिशा की ओर
देश की गलियों में रची जा रही थी अयोध्या
अयोध्या के भीतर रचा जा रहा था दुःख
दुःख के भीतर घृणा
घृणा के भीतर कई अयोध्याएं
रेडियो ने दुहराया जब
'पतितपावन सीताराम'
राजा आदेश दे चुका था
सीताओं के साथ
पतितपावनी सभा
खुलेआम करे रसविलास
अयोध्या में दुःख भोग रही थी सीता
लंका में दुःख भोग रही थी वह
एक दुःख अग्नि से मिला था एक लोकरीति से
एक दुःख पृथ्वी के ऊपर
एक पृथ्वी के भीतर
इस तरह वह दुःख भोग रही थी
एक रावण के हाथ
एक राम के साथ
रेडियो ने जब बांचा
'अल्ला ईश्वर तेरे नाम'
वहां राजा के नाम से बड़ा
न अल्ला था न ईश्वर
अल्लाह की जगह विराजमान था राजा
ईश्वर की जगह विराजमान था वह
आस्था की जगह वही था
अनास्था की जगह विराजमान था वही
बहुत विवेकसम्मत पंक्ति थी भजन की
'सबको सम्मति दे भगवान्'
राजा का फरमान था
उसकी सम्मति से पूरी सभा
सरयू में धो ले खून सने हाथ
पदोन्नति के लिए पधारे अवध दरबार
सरयू के जमने में किसी की
सम्मति नहीं ली गयी
सरयू के सूखने में भी नहीं
न सरयू के सरयू नहीं रहने में
इस तरह रेडियो पर सुनता हुआ भजन
एक देश झूम रहा था
एक देश जल रहा था
एक देश बस रहा था
एक देश रहा ही नहीं था देश

![]() |
| यह भारत माता है या सीता ? सबसे बड़े लोकतंत्र से निष्काषित हुसैन की कला |
'रघुपति राघव राजाराम'
राजा का रथ कूच कर चुका का था
राजधानी से पूरब दिशा की ओर
देश की गलियों में रची जा रही थी अयोध्या
अयोध्या के भीतर रचा जा रहा था दुःख
दुःख के भीतर घृणा
घृणा के भीतर कई अयोध्याएं
रेडियो ने दुहराया जब
'पतितपावन सीताराम'
राजा आदेश दे चुका था
सीताओं के साथ
पतितपावनी सभा
खुलेआम करे रसविलास
अयोध्या में दुःख भोग रही थी सीता
लंका में दुःख भोग रही थी वह
एक दुःख अग्नि से मिला था एक लोकरीति से
एक दुःख पृथ्वी के ऊपर
एक पृथ्वी के भीतर
इस तरह वह दुःख भोग रही थी
एक रावण के हाथ
एक राम के साथ
रेडियो ने जब बांचा
'अल्ला ईश्वर तेरे नाम'
वहां राजा के नाम से बड़ा
न अल्ला था न ईश्वर
अल्लाह की जगह विराजमान था राजा
ईश्वर की जगह विराजमान था वह
आस्था की जगह वही था
अनास्था की जगह विराजमान था वही
बहुत विवेकसम्मत पंक्ति थी भजन की
'सबको सम्मति दे भगवान्'
राजा का फरमान था
उसकी सम्मति से पूरी सभा
सरयू में धो ले खून सने हाथ
पदोन्नति के लिए पधारे अवध दरबार
सरयू के जमने में किसी की
सम्मति नहीं ली गयी
सरयू के सूखने में भी नहीं
न सरयू के सरयू नहीं रहने में
इस तरह रेडियो पर सुनता हुआ भजन
एक देश झूम रहा था
एक देश जल रहा था
एक देश बस रहा था
एक देश रहा ही नहीं था देश
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रेडियो पर भजन,
सांप्रदायिकता के विरुद्ध कविता
06 सितंबर, 2010
कविता घाट:बनारसीदास
बनारसीदास
किसी दिन
चांद तुम्हारे चूल्हे में आकर
कंडे सा सुलग जाए
किसी दिन
सूरज तुम्हारी जीभ पर
आइस्क्रीम सा पिघल जाए
किसी दिन
दुनिया के सारे पेशाबघरों में
चींटियों की धार बरसने लगे
और ग्लोब पर खरबों कतारों में फैल जाए
एक दिन
शुतुरमुर्ग सचमुच उठे
और सितारों सहित आसमान को उठाकर
दूसरे ब्रह्मांड पर रख आए
एक दिन
मधुमक्खियां आग उगलने लगे
कुत्तों की लार से जलेबी बनने लगे
छछूंदर की आवाज से राग मल्हार झरने लगे
मिट्टी से खरबूज
मार्बल से महबूब बनने लगे
एक दिन
गिरगिट गिलहरी में
गिलहरी ह्वाइट हाउस में
ह्वाइट हाउस सर्दी जुकाम में बदल जाए
भई बनारसीदास
क्या तब मानोगे कि दुनिया बदल रही है!
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कविता घाट:बनारसीदास
30 अगस्त, 2010
किसान-कसाइयों का घोषणा पत्र
किसान कवि घासीराम शर्मा
की प्रतिबंधित कविता
इन कागजी खिताबों से उड़ता हूं फलक पर
अधिकार कहीं मिल गया तो जारे रूस हूं.
भारत की गवर्नमेण्ट का मैं चापलूस हूं.
दरिया.ए.गुलामी का जबरदस्त सूंस हूं.
की प्रतिबंधित कविता
इन कागजी खिताबों से उड़ता हूं फलक पर
अधिकार कहीं मिल गया तो जारे रूस हूं.
भारत की गवर्नमेण्ट का मैं चापलूस हूं.
दरिया.ए.गुलामी का जबरदस्त सूंस हूं.
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किसान-कसाइयों का घोषणा पत्र
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