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03 मई, 2021

संस्मरण:सिमरिया के दिनकर रत्न मुचकुंद की मृत्यु असंभव है

★रामाज्ञा शशिधर
【संस्मरण】


पूर्वज दिनकर की पुस्तक 'संस्मरण और श्रद्धांजलियां' की पहली पंक्ति है कि अपने समकालीनों की चर्चा करना बहुत ही नाजुक काम है।मेरे लिए मुझसे तेरह साल छोटे सिमरिया की दोमट माटी पर उगे और असमय मुरझाए मुचकुंद पर चर्चा करना असंभव काम है।लेकिन काल के आदेश को
कैसे ठुकरा सकता हूँ।उसकी जैसी मर्जी!
     मुचकुंद की बात कहां से शुरू करूँ!आरम्भ और अंत दोनों मातम से भरा है।इसलिए बीच से करता हूँ।वहां आग भी है और जनराग भी ।
        बात 2003 की है।मैं जेएनयू से किसान आंदोलन और हिंदी कविता के रिश्तों पर रिसर्च के दौरान जनपद जनपद भटक रहा था।उनदिनों क्षय रोग से उबरकर गांव आया था।
      जून का महीना।तपती दोपहरी।दालान के आगे पिताजी द्वारा पोसे गए जामुन के पेड़ के नीचे मेरी खाट।देखता हूँ- सांवली त्वचा और कमजोर काया का एक किशोर।उम्र लगभग 20 साल।धूप में तमतमाया तांबे सा चेहरा।खुली मुस्कान।हाथ में समयांतर।उसकी तह के नीचे इतिहास
का नोट्स।नमस्कार करते हुए खड़ा हुआ।पहचानने की कोशिश की।पहचान नहीं पाया।
     संजीव फिरोज़ ने अपनी धीमी गति का समाचार शुरू किया -यह मोनू हैं।मेरे भाई लगेंगे।ननिहाल में रहते थे।अब गांव में रह रहे हैं।इनके घर मे चार मर्डर हुआ था।आपको याद होगा।प्रतिबिंब की चर्चा सुनी है।आप से मिलना और बात करना चाहते थे।
        मोनू विचार की तरह शुरू हो गए-समाज इतिहास से सीख लेकर बदलता है।सिमरिया ने दिनकर से कितना सीखा है।जब दिनकर और उनकी किताबें गॉंव को नहीं बदल
पा रही तब आपलोग नाटक,गीत,झाल,ढोल से समाज कैसे
बदल देंगे।समाज को बदलने के लिए नया विचार और उस विचार का प्लेटफॉर्म चाहिए....इसलिए प्रतिबिंब में विचारबिंब होना चाहिए।
     मैं चुपचाप अपनी आदत के विरुद्ध पहली बार सुन रहा था-चीख से भरा स्वर।थूक के छींटों में लिपटी ध्वनियां।लहराते हुए हाथ।नाचती हुई लाल आंखें।फड़कती हुई भौंह।जैसे आग का पिघलता हुआ गोला हो!जैसे दिनकर का रश्मिरथी।जैसे सिमरिया घाट का प्रफुल्ल चाकी।जैसे जनकवि शक्र की इंकलाबी छापे की मशीन।जैसे घड़ियालों,मगरमच्छों की गंगा के ताल जल में नन्हीं मछरी।जैसे सिमरिया के फैले हुए उद्यानों बागीचों के बीच गूंजती हुई
कोई  दमदार चिड़िया।
       तब से जीवनपर्यंत मुचकुंद विचार की अलख जगाते रहे;बदलाव के नारे दोहराते रहे;डफली की धुन पर गीत गुनगुनाते रहे।और एक दिन कबीर की कविता हो गए-हंसा जाई अकेला/जग दर्शन का मेला।

        ◆
        टर्नर,जिम और दिनकर तीनों सही थे।टर्नर ने कहा कि 1918 की महमारी  युद्ध के जहाज पर चढ़कर यूरोप से भारत आयी और लगभग 2 करोड़ मनुष्यों को लील गई।जिम ने कहा कि सिमरिया- मोकामा घाट के अनेक श्रमिक
महामारी के गाल में समा गए।दिनकर ने देखा कि सिमरिया के दो सौ से अधिक परिजन पुरजन महामारी से खत्म हो गए।दिनकर ने यह भी देखा कि बचपन की पाठशाला के गुरुजी भूख के कारण महुआ चुनकर खा रहे हैं।ब्रिटिश दस्तावेज,औपनिवेशिक साहित्य से लेकर दिनकर-शक्र के लेखन में अकाल महामारी के दबे निशान को खोजने वाला
प्रतिभा सिमरिया में एक ही थी,मुचकुंद।मैंने साहित्य की यात्रा में ये चिह्न देखे और इतिहास प्रेमी मुचकुंद को उत्साहित किया।उसने वादा किया था कि बेगूसराय में घर बनाने के बाद आपके बताए तरीके और लिखे गए संक्षिप्त विवरण से सहयोग लेकर सिमरिया का विस्तृत इतिहास लिखूंगा।यह कार्य सिमरिया का कौन सपूत करेगा,अभी कोई
प्रकाश नहीं।

     ◆
            आह!मोनू हम सबको छोड़कर वेबक्त चले गए।अभी उनके जाने की उम्र नहीं थी।उनके जाने से सिमरिया और जनपद दोनों जगहों में रिक्ति बन गई है। उससे भी ज्यादा मेरे भीतर रेत की आंधी उड़ रही है।उनकी उपस्थिति का अभाव हम सबको लंबे समय तक परेशान और दुःखी करेगा।
     मोनू का मूल नाम तो मुचकुंद था।मुचकुंद यानी खुशबूदार सफेद फूलों का वृक्ष।लंबा, मजबूत और अल्हड़।
यह नाम तो ननिहाल से मिला होगा।सिमरिया तो तब ही छूट गया जब वे गर्भ में थे।दिनकर के यहां कुछ ही फूल हैं,वेणुवन है,दूब है,कास है।मुचकुंद सफेद,पीले सुगंधित फूलों का बौर। मुचकुंद के वृक्ष की उम्र लंबी होती है ।यह क्षणभंगुरता अनहोनी ही है।
    2019-21 इस पृथ्वी और भारत के लिए वैसे ही विनाशकारी है जैसे 1918-22 के महामारी वर्ष थे।1918-19 में महामारी से सिमरिया में लगभग दो सौ किसानों की मौत हुई थी।जनपद में शवों की संख्या बड़ी थी। तत्कालीन सिमरिया घाट शवों से पट गया था।इसका उल्लेख दिनकर से जुड़े साहित्य में भी मिलता है।दिनकर ने बाद की महामारी पर कविता भी लिखी है।
     मुचकुंद का जन्म और मरण दोनों दुखांत है।अक्सर जन्म खुशी का द्योतक होता है और मृत्यु मातम का।मुचकुंद का जन्म 27 जुलाई 1983 को हुआ।जब वे पैदा नहीं हुए थे ,उनके घर में चार हत्याएं हुईं।लगभग पूरा घर खत्म हो गया।दो चाचा भागवत सिंह और सिंकदर सिंह मारे गए,पिता रज्जन सिंह(राजेन्द्र प्रसाद सिंह)मारे गए,बुआ राजवती देवी मारी गई।गोली खाकर भी मां छुप गई और गर्भ रत्न को बचा लिया।आज पत्नी एकता ,ढाई वर्ष का नन्हा बेटा नयन प्रकाश के साथ बूढ़ी मां की मजबूत लाठी खो गई।
        वह दौर ऐसा ही था। तब सिमरिया में कविता की नहीं,बंदूक की खेती होती थी। इतिहास से बेखबर गांव को आजतक इहलाम नहीं है कि उसका बड़ा दुश्मन सात समुद्र पार है।ब्रिटिश रेलवे द्वारा डाले गए 100 वर्ष पुराने विष बीज अब विष वृक्ष बन रहे थे।कई दर्जन लाशें गिरी होंगी।मेरा बचपन भी उस माहौल से लगभग तबाह हो गया।वह कहानी और कभी।


      मुचकुंद 19 अप्रैल,दिन सोमवार 2021 की सुबह हम सबको अलविदा कह गए।तब वे पीएमसीएच पटना में थे।उनकी मौत भी कोरोना वायरस की तरह काल के आघात से,अस्तव्यस्त,रहस्यमय और हृदयविदारक हुई।
      15 अप्रैल की शाम कलाकार साथी सीताराम जी ने पहली सूचना दी कि मोनू कोविडग्रस्त हैं।बेगूसराय के सृष्टि जीवन अस्पताल में ऑक्सीजन पर हैं।डॉक्टर का कहना है कि रेमडेसिविर दवा से ही जान बच सकती है।बेगूसराय में दवा की किल्लत है।

       मैंने डीएम,सीएमओ,सांसद से फेसबुक अपील की कि तुरत रेमडेसिविर की व्यवस्था हो।कल होकर दवा दिल्ली से आ गई।दवा दी गई लेकिन सीटी स्कैन में फेफड़े का अधिकांश हिस्सा घिर चुका था।डॉक्टर ने हाथ उठा दिया।रामनाथ सिंह ने पटना ले जाने का सुझाव दिया।
       मैंने सीएम और स्वाथ्यमंत्री को ट्वीटर टैग करते हुए निवेदन किया कि दिनकर की धरती के लाल को एम्स,पटना में एक बेड चाहिए।वह अंधड़ में बगुले की खबर थी।तभी स्वास्थ्यमंत्री ट्वीटर पर टैग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक बुजुर्ग कार्यकर्ता की बेड बिना मौत की खबर पढ़ी।बेटे का दर्द मंत्री पर गुस्से में फूट पड़ा था।मैं निराश हो गया।
        जिस दिनकर मंच पर नेता,मंत्री आकर माला से लद जाते,वैधता पाते और सुर्खी बटोरते,उस मंच के सबसे सुगंधित फूल के लिए कोई राहत और चाहत नहीं।हे दिनकर!ग्रामीण मित्र अवधेश कुमार से आग्रह किया कि जनपद के सांसद या  सत्ताधारी दल के किसी नेता से निवेदन कीजिए।
उन्होंने बताया कि बीजेपी जिलाध्यक्ष श्री राजकिशोर सिंह ने
स्वास्थ्य मंत्री से आग्रह किया है।कल होकर पता चला कि उनकी बात और फोन को मंत्री अनसुनी कर गए।
      यह भाग्य कहिए कि मुचकुंद की साली पीएमसीएच में नर्स हैं और सिर्फ उनकी कोशिश से भर्ती हुई।सीटी स्कैन की हालत से साफ था कि परिणाम कुछ भी हो सकता है।परिणाम सामने आया।
       बाद में रामप्रवेश सिंह,प्रवीण प्रियदर्शी,बब्लू दिव्यांशु,विनोद बिहारी और मेरे विद्यार्थी पंकज कुमार व रूपम से जो जानकारी मिली उससे समझ में आया कि नानी के शव संस्कार से लौटने के बाद मोनू बेगूसराय-बरौनी लगातार भागते हुए डॉक्टरों के निर्देशानुसार कोविड टेस्ट,अन्य टेस्ट एवं दवा से सम्बद्ध थे।
      ◆

         मेरा मानना है कि अगर समय पर उचित स्वास्थ्य व्यवस्था व सलाह मिलती तो मुचकुंद की जान बच सकती थी।यह हैरानी होगी कि एंटीजन और आरटी-पीसीआर दोनों टेस्ट निगेटिव आए और एंटीजन ने भरम पैदा किया।सिस्टम की बलिहारी कहिए कि दूसरा टेस्ट मौत के बाद मिला और सरकार के खाते में मुचकुंद नॉन कोविड मरीज हैं।
         दुनिया भर के डॉक्टर और वैज्ञानिक कह रहे हैं कि
तीस फीसदी टेस्ट रिपोर्ट गलत है,रेमडेसिविर सिर्फ पहले सप्ताह में मोडरेट मरीज पर सिर्फ ऑक्सीजन लेवल बनाए रखने के लिए सफल है, आवश्यक दवा और परहेज पहले दिन से जरूरी है।उसके बावजूद मुचकुंद का
इलाज उचित दिशा में शायद नहीं रह पाया।सिमरिया के साथी रामप्रवेश जी से मुचकुंद लगातार संपर्क में थे।उनका भी यही मानना था।खैर!पब्लिक स्वस्थ्य सिस्टम के लिए
मोनू भविष्य के आंदोलन के प्रतीक बन सकते हैं ताकि भविष्य में लाखों मोनू को बचाया जा सके।
      ◆

         मुचकुंद की मृत्यु विचार की मृत्यु है।वे सिमरिया की दोमट मिट्टी पर विचार के पेड़ थे।उनके साथ बिताए संस्मरण व कार्यों का वर्णन करूँ तो एक किताब बन सकती है।
        कुछ यादें यहां जरूरी हैं।वे 2003 में प्रतिबिंब से जुड़े। उनके कारण 1998 से सक्रिय प्रतिबिंब गीत,नुक्कड़ नाटक,कविता पाठ से  ग्रामीण क्षेत्र में विचार निर्माण की ओर मुड़ गई।संस्कृति का क्रांतिकारी पहलू पुस्तिका इस बात का प्रमाण है कि दर्जनों गोष्ठियां गांव गांव हुईं।हमलोगों ने जनेऊ और कोका-पेप्सी दोनों से सामूहिक मुक्ति ली।मनुवाद और साम्राज्यवाद दोनों पर प्रहार।प्रेमचंद की किताब सरकार द्वारा पाठ्यक्रम से हटाने पर मुचकुंद के नेतृत्व में प्रेमचंद कथा अभियान चला।मुचकुंद एक्टिविस्ट बने,संगठन कर्ता हुए,इतिहास के विद्यार्थी हुए। समयांतर पत्रिका अपने ग्रामीण पते पर मंगाकर जनपद को बांटने लगे।इसतरह जनपद के बौद्धिकों लेखकों से संपर्क संवाद घना होता गया।
     प्रतिबिम्ब के कारवां में शामिल प्रवीण प्रियदर्शी,केदारनाथ भास्कर, तरुण,पंकज,चेतन,शिवदास,मुकेश दास,अविनाश अशेष,
संजीव फ़िरोज,राधे,श्यामनंदन निशाकर,बबलू दिव्यांशु,अशोक झा,विनोद बिहारी झा आदि नामों का एक
कारवां है जिन्होंने कला,साहित्य,संस्कृति और विमर्श के माध्यम से सिमरिया और आस पास के गांवों में जन जागरण
का  अभियान चलाया।मेरे द्वारा लिखे दो नुक्कड़ नाटक 'जात पांत पूछे सब कोई' और 'मैं हूँ भ्रष्टाचार' को लेकर प्रतिबिंब गांव गांव तक पहुंचा।मोनू इसी टीम के सक्रिय साथी थे।
      ◆
बीएचयू में बीएड के दौरान एडमिशन से लेकर अंतिम सत्र तक उनके निर्माण में मैं जो कुछ सहयोग कर सकता था,करता रहा।काशी अस्सी क्षेत्र मेरे लिए साधना और मुक्ति का क्षेत्र है।चाय,काफी,पान के दर्जनों अड्डे और सैकड़ों बुद्धिजीवी,कवि,लेखक,पत्रकार,नेता,शिक्षक,गुंडे,पर्यटक,एक्टिविस्ट,पागल,साधु,गाउल सब मेरी जान हैं।तुलसीदास,धूमिल,नामवर सिंह,काशीनाथ सिंह और मेरी उसी अस्सी की
की अंतरराष्ट्रीय चाय अड़ी के वे स्पीकर भी हुए।
      ◆

         बीएचयू से बीएड करने के बाद मुचकुंद डीएवी में शिक्षक भी हुए।शिक्षा दान के साथ दिनकर मिशन के लिए उनका बाद का जीवन पूर्णतः समर्पित हो गया।दिनकर पुस्तकालय और दिनकर मंच से साहित्य की गंगा बहाकर उन्होंने दिनकर पुस्तकालय के साहित्यिक स्वरूप को जनपद,राज्य और राष्ट्र की हलचल से नए सिरे जोड़ दिया।
    मुचकुंद का एक गुण नई पीढ़ी के लिए ज्यादा प्रेरणादायक है।वह गुण है उनका पढाकूपन।वे जब दिनकर पुस्तकालय से जुड़े,तब जनपद से लेकर जनपद से बाहर तक दिनकर पुस्तकालय के पाठक फैल गए।वे जिस तरह
जनपद भर में समयांतर पत्रिका घूमघूमकर बांटते थे,वैसे ही
दिनकर पुस्तकालय की किताब झोले में लेकर लोगों को पढ़ाने लगे।वे चलता फिरता पुस्तकालय हो गए जिनके झोले
में किसिम किसिम की पुस्तकें रहती थीं।शिक्षक,लेखक,पत्रकार,नाट्यकर्मी,नेता,अफसर सभी को उन्होंने पुस्तक संस्कृति और अध्ययन स्वभाव से जोड़ा।यह अक्षर विरोधी दौर में उनका बड़ा योगदान था।पाठक संस्कृति को बनाकर ही पुस्कालय जीवित रह सकता है।
      मुझे याद है।जब वे बीएड करने बीएचयू आए तो अपनी
अदा के अनुसार झगड़ा कर मेरी मेंबरशिप रिनुअल की और
एक मुश्त वर्षों का सदस्यता शुल्क लिया।उनका तर्क अकाट्य था कि आप दिनकर पुस्तकालय के भीम राव आंबेडकर हैं।आपके हाथों लिखे संविधान के नियमानुसार हमलोग चुनाव समिति का करते और नेता बनते हैं।आपने पुस्तकालय दीवार निर्माण में ईंट, सीमेंट,बालू  व्यव्यस्था लेकर पुस्तक की खरीद,ढुलाई, जिल्दसाजी तक की है तब उससे दूर कैसे हो सकते हैं।इतना ही नहीं वे
मेरे लिए पुस्तकालय से पुस्तक निर्गत कराकर बनारस में लाते और पढ़ाते थे।मोनू को नई किताबें और नए विचार किसी भी चीज़ से ज्यादा पसंद थे।इस आदत के कारण
मैं उन्हें ज्यादा चाहने लगा था।जब भी कोई नई किताब
चर्चित होती,मैं उन्हें तुरत सूचित करता।कुछ किताबें उपलब्ध
भी कराता।वे कोशिश करते कि पहले उसे पढ़ें और जरूरी
हो तो दिनकर पुस्तकालय के लिए खरीद करवाएं।गुरुवर
प्रो मैनेजर पांडेय द्वारा संपादित गुलाम भारत के आर्थिक शोषण पर आधारित सखाराम देउस्कर की दुर्लभ पुस्तक 'देश की बात' जब मैंने उन्हें सिमरिया में भेंट की,वे उछल पड़े।बोले-इसे पुस्तकालय में हरहाल में होना चाहिए।इसे
हर नौजवान को पढ़ना चाहिए ताकि पता चले कि हमारा शोषण किस तरह हुआ था।

            एक संस्मरण और।2007 में जब दिनकर शताब्दी वर्ष आने वाला था।गर्मी छुट्टी में मैं बीएचयू की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर एक महीने ग्राम सुख लेने सिमरिया पहुंचा।मोनू आ धमके।बोले-दिनकर जी हमलोगों को माफ नहीं करेंगे।मैंने कहा-ऐसा क्यों बोल रहे हो?वे शुरू हो गए-सरजी,गांव का माहौल ठीक नहीं है।समिति भी बिखर गई है।दिलीप भारद्वाज,सेठ जी,परमानंद जी और राजेश जी-सब पिछले साल से ही मुंह फुलाकर अपने अपने घर बैठे हैं।दिनकर शताब्दी सर पर है।लोग क्या कहेंगे!फिर मुचकुंद जी ने अपनी अदा से मुझपर महाजाल फेंक दिया-सर जी!अगर आप हरेक के दरबाजे पर चलकर कहिए तो एका हो सकता है।हुआ भी वही।मैं महीनों लगा रहा। दिनकर शताब्दी वर्ष कैसे मने और सिमरिया भूमि को साहित्यिक तीर्थ कैसे बनाया जाए,यह योजना शुरू में मुचकुंद, प्रवीण,सजीव फिरोज़ और मैंने मौखिक रूप से तैयार की।दिनकर पुस्तकालय पर बैठक करवायी।फिर क्या था!भूली हुई शक्ति
दिनकर पंथियों को याद आ गई।वे चल पड़े।कारवां बन
गया।2007 में जेएनयू से बड़े आलोचक और मेरे शोधगुरु मैनेजर पांडेय,पटना से अग्रज कवि अरुण कमल और मेरे विभाग से प्रखर दिनकर अध्येता प्रो अवधेश प्रधान साहित्य
मंच पर आए।सचाई तो यह है कि दिनकर  सदी वर्ष के लिए  मैंने जिस तरह ग्रामीण दिनकरपंथियों को जोड़ा तथा सालभर की पूरी रूपरेखा प्रकाशित कर दी;इसका मूल कारण तो मोनू की प्रतिबद्धता ही है।
         जबतक सिमरिया और दिनकर के अक्षर रहेंगे मुचकुंद उस साहित्यिक प्रांगण में रश्मिरथी की तरह चमकते रहेंगे।सिमरिया को मुचकुंद की यादों के लिए बहुत कुछ दिल खोलकर करना चाहिए।जब भी मैं गांव आऊंगा और सिमरिया की दीवारों पर दिनकर की उगी हुई काव्य पंक्तियां देखूंगा तब मेरी आँखें भर उठेंगी।
         मुचकुंद!तुम विज्ञापन-प्रचार के दौर में सुलगते हुए विचार थे।तुम दुनिया बदलने आए थे,खुद ही बदल गए।मैं स्वीकार करता हूँ कि तुम मेरे गुरू थे,मैं तुम्हारा शिष्य।तुम्हारी हर फटकार से प्यार का अमृत झरता था।तुम सिमरिया के आकाश का ध्रुवतारा हो।अटल और अमर!सेल्फी युग में लाइट ऑफ सेल्फ!युवा बुद्ध!
                  --------
दिनकर मुचकुंद के लिए गाते रहेंगे-
  
      आवरण गिरा,जगती की सीमा शेष हुई
      अब पहुंच नहीं तुमतक इन हाहाकारों की
       नीचे की महफ़िल उजड़ गयी, ऊपर कल से
       कुछ और चमक उट्ठेगी सभा सितारों की

                              
    
    
        
     
       

     
         

30 अप्रैल, 2021

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28 अप्रैल, 2021

हिंदी समांतर कोश के कोशकार अरविंद कुमार नहीं रहे


वे हिंदी की किसी संस्था से अकेले बड़े थे।वे भाषा के सच्चे सागर थे।
       20 साल तक अनवरत श्रम करते हुए 1800 पृष्ठों और 268000 अभिव्यक्तियों की पांडुलिपि से हिंदी का समांतर कोश तैयार करने वाले अरविंद कुमार आज 95 वर्ष की उम्र में कोविड के आक्रमण से गुज़र गए।
        उन्होंने 1960 के दशक में फिल्मी पत्रिका  माधुरी का संपादन ही नहीं किया बल्कि उसके माध्यम से कला सिनेमा आंदोलन को दिशा भी दी।समांतर सिनेमा जैसे पद को रचने का सार्थक कार्य किया।
       हिंदी भाषा और समाज को अरविंद कुमार और उनकी पत्नी कुसुम जी के श्रम और योगदान का ऋणी होना चाहिए ।
       हिंदी विभाग,बीएचयू,मालवीय चबूतरा,ताना बाना(बनारस)प्रतिबिम्ब(बेगूसराय) की ओर से उन्हें मार्मिक श्रद्धांजलि।
                                     -रामाज्ञा शशिधर,बनारस

25 अप्रैल, 2021

कोविड कविता:सुनो पीपल की पत्तियो

【सुनो पीपल की पत्तियो】
   ©रामाज्ञा शशिधर, बनारस
     ★★★★
आओ पीपल की पत्तियो
वक़्त कम है
तुम फेफड़े बन जाओ

मेरी शिथिल देह में 
फेफड़े होकर भी वे नहीं हैं
वे अब काम नहीं कर रहे हैं
थक गए हैं 
भीतरी और बाहरी दुश्मनों से लड़ते हुए

हे धरती
तुम मुझे वरदान दो

मेरी राख पर उगाना
एक पीपल का पेड़
उसमें पत्तियों की जगह फेफड़े लगाना 

जब भी 
करोड़ों सूक्ष्म दुश्मन हवा के सारे रास्ते बंद कर दे

बाजार के घोड़े पर सवार तानाशाह 
लोहे के पेड़ से जुटाए प्राणवायु जब्त कर ले

मैं पीपल का पत्ता 
एक साथ
ऑक्सीजन और फेफड़ा 
दोनों बनकर
तुम्हारी कोख के सबसे खूबसूरत सृजन को 
मानव भविष्य की पताका बनने के लिए 
बचा लूं

अगले जन्म में मुझे पीपल ही बनाना धरती
फेफड़े और प्राणवायु से गझिन
            ---------------------
     
      ------------------अंग्रेजी अनुवाद---------
      ★Ghanshyam Kumar 
         लेखक और अनुवादक
   ◆
Hark! The Peepal-leaves
   ***************

O Peepal leaves!
Come
I've very little time
Be the lungs

My sluggish body
Seems to contain no lungs despite their being inside

They now appear to have stopped working 
They are dog-tired 
Fighting with foes, outward and inward

O Earth!
Grant me a boon-- 

Over my ashes
Grow a peepal tree
With lungs hanging in lieu of leaves

Whenever 
Crores and crores of the micro-enemies close all the pathways for the air
And the Dictator riding the horses of the market seizes the oxygen obtained from the iron-trees,

I, a Peepalleaf,
Turning myself at the same time into both oxygen and a lung
Earnestly wish to save the most beautiful creation of your womb
In order to become the emblem of the future of mankind

In my next birth
Make me just the peepal densely laden with lungs and oxygen!

22 अप्रैल, 2021

महामारी और ऑक्सीजन आपातकाल से मुक्ति चाहिए


       ©रामाज्ञा शशिधर
       सोशल मीडिया पर कोविड 19 जैसी महामारी को भय और भरम बताने और हल्के में लेने का एक सरल और सत्तामुखी ट्रेंड बढ़ता जा रहा है।यह कॉमन चेतना को कन्फ्यूज करने और खतरे में ढकेलने की 
कुसमय कोशिश है।

      मैं इस परिपाटी से असहमत हूँ।यह खाए अघाए और सेफ जोन में बैठे लोगों का जुमला हो सकता है या अनजान लोगों की अज्ञानता या दाढ़ीबाबा बनने का शौक!
 
      आप सिक्के का एक पहलू रखकर लोगों को भय और भरम से मुक्त रहने का दृष्टांत दे रहे हैं।इतिहासबोध बताता है कि इसी प्लेग और स्पेनिश फ्लू (1892-1922) से भारत में लाखों नहीं,करोड़ में लोगों का सफाया हो गया था।तब आबादी भी कम थी।
       इटली,जर्मनी,ब्रिटेन,अमेरिका की बड़ी आबादी स्वाहा हो गई है।
      हमारा ग्रामीण साथी मोनू चला गया।बनारस और देश में 100 से अधिक परिचित 15 दिन के अंदर खत्म हो गए।
        जीवमनोविज्ञान का अध्ययन बताता है कि भूकम्प,बाढ़,आपदा,दुश्मन को वे पशु पक्षी पहले भांप लेते हैं जो भय और सतर्कता का अभ्यास करते हैं।कृषि,टेक्नोलॉजी,भोग और आलस्य ने मनुष्य का बड़ा नुकसान किया है।जंगल में वे ज्यादा स्मार्ट थे।
       दूसरी बात।कोरोना का नया वेरिएंट दो गज की दूरी,मास्क है जरूरी से आगे निकल गया है।लेंसेन्ट और विश्व स्वास्थ्य संगठन का तथ्य गौरतलब है कि 
यह और हल्का होकर हवा में लंबे समय तक बना रहता और कई गुना ज्यादा संक्रमित करता है।
      महानगरों के बाद भैया एक्सप्रेस की वापसी से अब गांवों की बारी है।साथ ही इस म्यूटेट ने ऑक्सीजन की जरूरत को बढ़ा दिया है।
      बुद्धिजीवियों और जनजीवियों को यह सवाल चीखकर उठाना चाहिए कि एक साल में बेड, ऑक्सीजन,दवा,वेक्सिनेशन और पूरे हेल्थ सिस्टम को जनता की जरूरत के हिसाब से क्यों मजबूत नहीं किया गया।
      ब्रांडिंग,वाहवाही,मंदिर निर्माण,चुनाव,कुम्भ और बेशर्म प्रोपगैंडा का परिणाम सामने है कि श्मसान में लाशें रखने और जलाने की जगह नहीं है।अभी तूफान आना बाकी है।
     ऑक्सीजन इमरजेंसी के दौर में हमें भयभीत भी होना है और डर के पार भी जाना है।इस बात पर जनमत को एकमत से केंद्रीय सत्ता से सवाल पूछना चाहिए कि जब देश में ऑक्सीजन जमा करने की जरूरत थी,जब वेक्सिन आंदोलन की जरूरत थी,जब रेमडेसिविर संग्रह करने की जरूरत थी तब सरकार ने इसका बड़े पैमाने पर निर्यात क्यों किया। सरकार जनता के सम्मुख योग्यता और नैतिकता खो चुकी है।
     इसलिए पब्लिक हेल्थ सिस्टम की बड़ी लड़ाई की तैयारी तुरत शुरू करनी चाहिए।रीयल और वर्चुल दोनों स्तरों पर।
           -रामाज्ञा शशिधर
            #दिनकर लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर,वाराणसी
            #मालवीयचबूतराबीएचयू  
            #प्रतिबिम्बसिमरिया
            #तानाबानाबनारस

23 मार्च, 2021

विचारों के खेत में भगत सिंह की याद

©रामाज्ञा शशिधर
~~~~♀~~~~~~~~~
भारतीय समाज और साहित्य को गांधी के विचार और आचरण ने जितना बदला है,भगत सिंह के विचार और आचरण उससे कम नहीं।
      गांधी का राजनीतिक सांस्कृतिक दुरुपयोग थोड़ा मुमकिन है लेकिन भगत सिंह के सामने आते ही राष्ट्र और मानवता के हमसफ़र और गद्दार अलग अलग चमकने लगते हैं।
      मेरे लिए भगत सिंह तक पहुंचना अपनी जन्मभूमि सिमरिया,प्रफुल्लचंद चाकी की स्थानिक विरासत,आज़ादी की लड़ाई में शामिल अपने लड़ाकू पुरखे किसान,महाकवि दिनकर साहित्य के माध्यम से हुआ।
       आजकल नख कटाकर क्रांतिकारी और गाली ताली
   चलाकर उग्र राष्ट्रवादी बनने वाले उचक्कों की बहार है।वे भगत सिंह से भागते और ओझा भगत को पूजते हैं।उन्हें कौन समझाए कि भाषणवीरता और विचारशीलता में बहुत फर्क है।
       किसान और उनके जवान बेटे 1857 में भी सच्चे देशभक्त थे,आज भी हैं और कल भी रहेंगे।
       लोदी,फिरंगी और भक्तरंगी आते हैं और इतिहास के खलनायक होकर पुरातत्व बन जाते हैं।
       मेरे किसान पिता को गौरव था कि एक बेटे के हाथ में बॉर्डर की हिफाज़त की बंदूक,दूसरे के हाथ में सृजन का हथौड़ा और मेरे हाथ में जड़ता चीरने की कलम थमायी।
       आजकल लुटेरे व्यापारी और उनके दल्ले लल्ले फर्जी
देशभक्ति और सत्ता की शक्ति के खेल खेल रहे हैं।झूठ और नफरत के खेल का पुरस्कार राख का तूफान होता है।
    बदलाव की आग और जुड़ाव के राग वाले चिरयुवा भगत सिंह की चेतना,विचार और स्वप्न को रूहानी प्रणाम!इंकलाब जिंदाबाद के अर्थ में ही भगत सिंह रहा करते हैं।

20 मार्च, 2021

कैफे कॉफी डे की कहानी:रामाज्ञा शशिधर

【कॉफी वॉर के दौर में सूफी कॉफी कथा!】
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El Cafe 80 में CCD की कॉफी मिल गई!
@अस्सी चौराहा,बनारस
कभी शाम को अस्सी जाइए और कॉफी लवर हों तो अस्सी की बेस्ट कॉफी यहां पीजिए।
     इस नए कॉफी कैफ़े के पास मेरे लिए जो सबसे बेहतरीन चीज है वह इसका लोक रूप और सीसीडी की कॉफी मशीन।इसके ऑनर kk हैं।कॉफी मशीन कम्पनी से किराए पर ली है।एस्प्रेसो हो या अमेरिकेनो।लट्टे हो या कपचिनो।सीडीडी का कोई जवाब नहीं।भारतीय कॉफी लवर के लिए।
      बनारस में हर असली का नकली ब्रांड मिल जाता है।यहां असली है।
      मैं हैरान हुआ जब सीसीडी के लोगोस जहां तहां दिखे।बनारस में सीसीडी के ओरिजनल तीन ब्रांच हैं।एक बीएचयू,दूसरा जेएचवी मॉल, तीसरा सारनाथ।बीएचयू के
शानदार कॉफी हाउस के बाहरी हिस्से को मतिमूढ़ों ने लॉक डाउन में तोड़ दिया है।पता नहीं आज भी वे किस दुनिया में रहते हैं और क्या चाहते हैं।जेएचवी की कॉफी बनारसी जेब के हिसाब से भारी है और बुद्धदेव का ज्ञान स्थल दूर।
     इसलिए आप El 80 में सस्ती और अच्छी सीसीडी कॉफी का आनंद ले सकते हैं।
            हमें जानना चाहिए कि सीसीडी की कहानी भारत में लघु उद्यम के कारपोरेट में बदलने और बड़े कारपोरेट से युद्ध में पिछड़ने की कहानी है।1996 में बंगलुरू से वीजी सिद्धार्थ नामक नौजवान उद्यमी के लघु प्रयास ने दुनिया के दर्जनाधिक देशों में हजारों ब्रांच से चित मंगलुरु कॉफी की पहचान दी।
     कहते हैं मध्यकाल में सूफी संत बूदन पश्चिम से एक मुट्ठी कॉफी बीन लेकर आए और दक्षिण की पहाड़ी पर छींट दिया।खास स्वाद और टेक्सचर की कॉफी के दुनिया भर में दीवाने हैं।
      एक साधरण युवा ने जिस देश को शानदार कॉफी पिलाई,उस देश की सरकार के इनकम टैक्स विभाग ने उस उद्यमी को आत्महत्या तक पहुंचा दिया।आखिर कुछ साल पहले उनका सपना टूट गया।
          इस कहानी का एक छोर जीएसटी,नोटबन्दी वाली सरकार के क्रूर ब्यरोक्रेटिक अभियान से जुड़ता है और दूसरा अमेरिकन स्टारबक,वरिस्ता जैसी महंगी और आक्रामक कम्पनी के भारतीय बाजार पर कब्जा करने के होड़ से।
      दिल्ली के माल और कनॉट प्लेस में स्टार बक की एक कॉफी 400 की मिलती है और सीसीडी की सौ पचास में।इस कम्पनी को खरीदने और निगलने की भी कोशिश अमेरिकन कम्पनी द्वारा हुई है।खैर।यह सब कॉफ़ी वॉर की कथा है।
        कॉफी वॉर के दौर में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत जैसे क्लाइमेट में कॉफी चाय का रिश्ता
उपनिवेशवाद की लूट से भी जुड़ता है।चाय की नई कथा तो आप जानते ही हैं।
        इन सब बातों को छोड़िए।अगर आप कॉफी लवर हैं तो जाड़े में इसका सही मज़ा है।एक कप कॉफी से गरमागरम बहस और पसीना दोनों निकल सकते हैं।
           कॉफी का इतिहास फ्रेंच क्रांति से आजतक चार चरणों में बंट सकता है।पहला फ्रेंच क्रान्तिकालीन कॉफी युग,दूसरा उपनिवेशित राष्ट्रों में उपनिवेशक की कॉफी कथा,तीसरा उत्तर औपनिवेशिक कॉफी युग और चौथा 
भूमण्डलवादी कॉफी युग।कभी इस पर विस्तार से चर्चा होगी।
         आज तो सूफी संत बूदन के कॉफी बीज से बनी एस्प्रेसो के आनंद में डूबने दीजिए।
     ©रामाज्ञा शशिधर,बनारस

अस्सी:यह मार्क्स कैफे नहीं,मार्क'स कैफे है


【मार्क्स कैफे नहीं,मार्क'स कैफे 】
बताना जरूरी है।यह मार्क्स कैफे नहीं,मार्क'स कैफे है।
80 इवेंट्स घाट के चौराहे पर।
क्या पता जाहिल दिमागों की उपज के खेत से कोई सांढ़ आए और हनुमान पर हमला इसलिए कर दे क्योंकि उनके लंगोट का रंग 'लाल' है। 
चाय प्रपंच के संगीन दौर में कॉफी लवर्स की एक बड़ी पहचान कि वह डार्क रोस्टेड बीन से बनी ब्लैक कॉफी पीता है।वह भी चीनीमुक्त।मैं दिल्ली के इंडियन कॉफी हाउस के अपने ज़माने से ब्लैक पसंद करता हूँ।

कुछ बातें:
1. आज का सौंदर्यशास्त्र सत्तामूलक विचारधारा का पिछलग्गू हो गया है।उससे मुक्त होने की चुनौती उसके 
सामने है।
2.जीवन के सौंदर्यबोध को टेक्नोगति और बाजार की मति तय कर रही है।
3.अलगाव,अकेलापन और अवसाद आज के चित्त का
  आधार और आयतन है।साहित्य इसे दरकिनार नहीं कर सकता।
4 विषय,समस्या और अस्मिता केंद्रित सौंदर्य की केन्द्रीयता के स्थान पर यंत्र,प्रकृति और अवचेतन के त्रिकोण से निर्मित सौंदर्यशास्त्र साहित्य को भावी जीवन देगा।
5.खंडमानस के अनुभवों को इतिहासबोध और अखंड आख्यान से जोड़कर ही साहित्य का नया दर्शन निर्मित हो सकता है।
6.भविष्य का कला सिद्धांत राष्ट्रवाद और भूमण्डलवाद की जगह ग्लोकल चिंतन या सांस्कृतिक संकरण के इर्द गिर्द सभ्यता विमर्श करेगा।
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  【यह तस्वीर एक नवोदित आलोचक ने कॉफी विद मिल्क पीते हुए उतार ली है।उनसे साहित्य के नए सौंदर्यशास्त्र पर लंबा संवाद हुआ।उनकी स्मृति अच्छी है,इसलिए जरूर उस संवाद का रचनात्मक उपयोग करेंगे।】

22 फ़रवरी, 2021

सेल्फी शूटर वाली काशी में फ्रीडम फाइटर की खोज

©रामाज्ञा शशिधर
■【काशी के घाट आज़ादी के दीवानों के हैं!
                                  ...सेल्फी शूटरों के नहीं!】■
【तिरंगा बर्फी का बना रस】
 दिल्ली से दूर!
       बनारस का भदैनी घाट!भदैनी यानी भद्रवन।भद्र ही भद्र लेकिन पेड़ का नामोनिशान नहीं।    हर तरफ विंध्य की पुरानी गुलाबी चट्टान!चट्टान से बनी राजतंत्र की याद दिलाती विशाल हवेली।।मोक्ष की राह दिखाती चट्टान से बनी सीढियां।साधना प्रांगण का आभास कराता चट्टान का प्लेटफॉर्म।
       सामने गंगा के तट को चूमती गंगा की किशोर लहरें!बाएं अहिंसा के दिगम्बरों के ऊंचे खिले मंदिर गुम्बज!दाएं ब्रिटिशराज के जुल्म और शोषण की की दास्तां 'राम हल्ला' सुनाता इतिहासवाचक जलकल ! सम्मुख नदी की लहर पर खेलती आदिम डोंगियां,कटर,नाव,बोट,बजरा।पीछे की अछोर गलियों से निकले नन्हें धागों की अनगिन पतंगों की ओट में छुपता हुआ थका मांदा सांझ का सूरज!
       और अब शुरू होता है गणतंत्र का बना हुआ रस!
  सामंती हवेली के जर्जर सीने पर गणतंत्र की तीनों रंगीन उंगलियां धंस गई हैं।राजतंत्र की दीवार लोकतंत्र के विराट तिरंगे से ढंक दी गई है।उसके आगे का पहला प्लेटफॉर्म थियेटर में बदल गया है।अनेक सीढ़ियों के बाद दूसरा प्लेटफॉर्म दर्शक दीर्घा-1 है और गंगा का जल आंगन दर्शक दीर्घा-2।
        रंगमंच पर मुहल्ले की बाल छात्राओं का नृत्य राष्ट्रीय गीतों की धुन पर घण्टे पर चलता रहा।मैं मंत्रमुग्ध गहरे रोमांच और सोच से भरा हूँ।कौन हैं ये कलाकार लड़कियां?कहाँ से आती है इनके भीतर कला की बारीकियां?कितना जानती हैं यह लोकतंत्र को,आज़ादी को,अतीत और भविष्य को?
     

  बगल की आसमान छूती सीढ़ियों पर दर्शकों की गली वाली भीड़ है।
     किसी की माई जो दिनभर किसी तोंदू महंथ के घर में हाड़तोड़ बर्तन पोछा कर लौटी है।किसी की बहन जो अभी फूल दीप बेचना बंदकर देशभक्ति का दीया जला रही है।किसी का बाप जो पतंग,धागा,कचालू बेचना रोककर अपनी नन्हीं पतंग को दिल के आसमां में उड़ा रहा है।किसी का नशेड़ी दादा जो भंगियाई नेत्रों से त्रिलोक निहार रहा है।
     सामने नए लवर्स झुंड जो पाखंडी पंडों,जातिवादी गुंडों और नीरस महंतों को साइबेरियन बर्ड में संक्रमित बर्ड फ्लू के डर जैसा लग रहा है।
      हर कोई रुककर देख रहा है-बाल गणतंत्र का बनारस!लेमन वाला,चना वाला,लाय वाला,गुब्बारे वाला,फूल वाला,गमछा वाला,लंगोट वाला,जिंस वाला,कैप वाला,शूटिंग वाला,वोटिंग वाला,सेल्फी वाला,हेल्पी वाला,जनेऊ वाला,शंखवाला,चिलमवाला,कंठीवाला, गाउल, खोटर, जेबकतरा,कुत्ता और बकरा।हर कोई राष्ट्रगीतों की धुन पर गणतंत्र हो रहा है।
        मेरा गहरा मानस सोच रहा है।इन नन्हीं कलाकारों के लिए आज़ादी का क्या मतलब है?उनके लिए उड़ती हुई पतंग,निडर बहती हुई धारा, हवा से खेलती रोशनी,लहर से खेलती डोंगी,जाल से दूर नाचती मछली,रेत इतना बड़ा लाल सूरज,आसमान छूती हवेली की छत,सीढ़ियों पर मुहल्ले के खेल,लाखों टिमटिमाते मिट्टी के दीये।ये सब आज़ादी और उमंग हैं।नन्हीं जान में उगते नन्हें स्वप्न हैं।
        क्या खिलन और उड़न की उम्र में चूल्हे की आग से बहुत भारी जलते हुए मसान की आग नहीं होती है!क्या मोक्ष की आग बनारस के बचपन की कीमत पर खड़ी और बड़ी नहीं है!
     क्या कुछ दिनों में ये लड़कियां  बालपन की आज़ादी भूलकर मसानी लिबर्टी के बोझ तले नहीं दब जाएगी!मुझे लग रहा है कि बनारस का हल्का छोर पतंग और भारी छोर मसानी अग्नि है।
        इन दोनों के बीच बनारस रहस्य का पिटारा है,सच का फरेब है।
        

       इन लड़कियों के लिए अभी गणतंत्र पतंग में उलझी रोटी की तरह है जिसको किसी धारदार मंझे से काटना है और आपस में तोड़कर बांटना है।फिलहाल तो गणतंत्र का गीत बज रहा है।
        नाम राजकुमार!चेहरा प्रजापुत्र!बदन पर इतना मांस कि खुद का बोझ भी हल्का लगे।आत्मिक काम किसान के बीजों से बुद्ध से लेकर बुद्धिदेव तक के चित्र उकेरना;रामलीला से लेकर रासलीला तक के लिए उत्सवों का शिल्प गढ़ना।सांस्कृतिक काम सैकड़ों बाल कलाकारों को रंगमंच देना।
     राजकुमार जी को हमलोग प्यार से दिव्यांग रंगकर्मी कहते हैं।वे एक पांव से विकलांग हैं।यह सब उन्हीं का करिश्मा है।
         रंगकर्मी राजकुमार  सेल्फी दौर में हेल्पी जर्नी कर रहे हैं।
      काशी के घाट 2014 के बाद अध्यात्म,शांति,साधना,खोज,आत्मशोध,विरेचन को रौंदने के घाट होते जा रहे हैं।।  

          जितने बड़े बुलडोजर बनारस की देह पर चल रहे हैं उनसे ज्यादा बड़े उसकी आत्मा पर दौड़ाए जा रहे है।
        वॉकिंग,टूरिंग,पिकनिक,सेल्फी शूटिंग,हंटर्स हूटिंग, चेकिंग,सर्विलांस,एलीट अधिकारियों की बूस्टिंग,सेलिब्रटी लीडर्स की वोट बैंक एडवरटाइजिंग,नकली बाबाओं की जम्पिंग रैम्पिंग के बाजार हो रहे हैं।
     हर घाट एक भोंपू है और हर तथाकथित दबंग एक व्यास।
      बोट कम्पनी से लेकर आरती के इवेंट मैनेजर तक हर कोई हॉर्न से चीख रहा है।मानो मृत गंगा को सती की आग में डालने के पहले का नागड़ेदार उत्सव हो रहा हो।
     तब सोचता हूँ राजाओं,जमींदारों,बनियों और भिखारियों द्वारा सम्मिलित रूप से गढ़े हुए नगर की नन्हीं लड़कियां नगर की जंगे आज़ादी के बारे में कितना जानती होगी।
     

        क्या वे जानती हैं कि यह नगर वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ 1781 के चेत सिंह के संघर्ष का है;यह नगर 1857 में फांसी पर लटका दिए गए सैकड़ों किसानों और साधुओं का है;यह नगर बनारस षड्यंत्र केस के हीरो शचीन्द्रनाथ सांन्याल का है;यह नगर महात्मा गांधी के असहयोग प्रयोग का है;बालक चंद्रशेखर के आज़ाद बनने का है;गदरची रास बिहारी बोस और काकोरी कांड के शहीद हीरो राजेन्द्र लाहिरी का है ;यह नगर स्वतंत्रता के अगुआ मालवीय, विष्णुराव पराड़कर,शिव प्रसाद गुप्त,भगवान दास और राजनारायण का है!
    यह नगर  बेनी पैनी जैसे गद्दार बनियों पंडितों का ही नहीं बल्कि अनगिन देशभक्तों का है।कहानी लम्बी है...
     मैं इस आयोजन का मुख्य अतिथि हूँ।मुझे बाल कलाकारों को तिरंगा के तले पुरस्कार ही देने हैं।लेकिन मेरा दिल कह रहा है इस ठंड भरी शाम में जल्द से जल्द
मिठाई की राजधानी की फेमस नेशनल स्वीट्स तिरंगा बर्फी अपने हाथों से खिलाऊँ!
           दिल्ली में किसान लाठी,गोली,टीयर गैस खा पी रहे होंगे।बनारस में कम से कम बूढ़े गणतंत्र के नाम पर इन नन्हें मुन्ने अबोध कलाकारों को मिठाई खिला दूं।
     और मैंने ऐसा ही किया।

          दिल्ली से बनारस इसलिए अलग है कि दिल्ली में तिरंगा फहराया जाता है और बनारस में खाया जाता है।क्या पता किसी दिन तिरंगा मिठाई पर भी राष्ट्रद्रोह की छाया न आ धमके!

01 जनवरी, 2021

अस्सी ने पूछा कि काशीनाथ और ज्ञानेंद्रपति एक ही दिन क्यों पैदा हुए!


@रामाज्ञा शशिधर की कलम से
【बनारस में काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति का जन्मदिन】
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दोस्तो!
 यह अनोखा संयोग है कि काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति दोनों बनारसी तरावट के लेखक हैं और दोनों का  जन्मदिन नववर्ष के दिन ही है।यानी दोनों का जन्मदिन
'गरीबों का गोआ' बन चुके बनारसी घाटों की भीड़ की भेंट है।
        आज बनारस का गली कूचा सब सड़क पर है,घाट पर है,बोट पर है,रेत पर है।नगर के घर खाली और गंगा घाट छाली ताली।
       मैं घुमक्कड़ी और फक्कड़ी करता हुआ अस्सी पर हूँ।बाएं में दायां ऐसा घुसा है कि नगर का चक्का जाम।भीड़ से घबड़ाकर पोई की अड़ी पहुंचा।पोई की तनी छाती और फैली बांहें अड़ी के खोहनुमा दरबे के काफी भीतर दबी दबी सी हैं।काशीनाथ के सुपात्र और अड़ीवीर प्रो गया सिंह गायब हैं।पता चला इनदिनों में अर्धरात्रि में अपने मांद से हवाखोरी के लिए निकलते हैं जिन्हें सिर्फ पागल,नशेड़ी और बाबा ही देख पाते।
     चौराहे के जाम के धुएं से पीपल हांफ रहे हैं।
       पप्पू की अड़ी पर भी रंग तरंग का सांध्य मजमा है।घिसे पिटे गदरची और ढिंढोरची से मुक्त।
     नींबू की चाय की चुस्की लेते ही,अपने पुराने छात्र जो अब टीवी पत्रकार हैं,पर नजर पड़ी।हालचाल हुआ।
    तभी उधर से एक मद्धिम आवाज़ आई-आज 'काशी का अस्सी' के लेखक काशीनाथ का जन्मदिन है।चूरा मटर पोई के यहां होता था।
      दूसरी आवाज़ ने पहली को काटा-यह वर्षों पहले होता था जब काशीनाथ अस्सी के नागरिक थे।वे अब विदेश में रहते हैं बेटे के साथ।
          बहस शुरू हुई जिसका सारांश है कि 1ली जनवरी को जन्मदिन का चलन बहुत पहले से है।जिसके जन्मदिन का पता नहीं रहता वह 1ली जनवरी में ईस्वी
लगाकर रखवा लेता है।अधिकारी बर्थ सर्टिफिकेट,आधार कार्ड,वोटर कार्ड और प्रिंसिपल स्कूल में पहली तिथि आंख मूंदकर डालता है।यह माँ बाप और समाज के लिए सहूलियत भरा दिन है।देश की एक तिहाई आबादी फाइलों में पहली जनवरी को ही पैदा होती है। काशीनाथ के साथ हुए हादसे का पता बाबू गया सिंह को लग गया हो इसलिए पोस्टपोन कर दिया।
           मुझे राहत हुई कि ज्ञानेन्द्रपति ने अस्सी पर किसी को भले ही जन्मदिन नहीं बताया और सेलिब्रेट नहीं किया वरना ये संसदिए हमारे गंभीर और सत्याग्रही कवि पर जब धुआंधार शब्द फुहार फेंकते तो उनकी तरोताज़ा कल्पना वेबजह सीलन फील करती।
             दोनों लेखक मेरे अज़ीज हैं।दोनों के कारण बनारस में मुझे अपने होने का कारण दिखता है।
       दोनों को नगर ने अपनी तरह से ढाला है और दोनों ने नगर को अपनी तरह से रचा है।दोनों बनारस में चाहे जहां रहते हों जनगणमन  ने दोनों के लिविंग पॉइंट्स फिक्स कर दिए हैं।
       काशीनाथ डेढ़ दशक पूर्व अस्सी भदैनी से मंडुआडीह की ओर चले गए लेकिन वे आज भी पाठकों के लिए अस्सी की अड़ी पर हैं।
     ज्ञानेन्द्रपति अब कम ही केंट रेलवे  के 9 नम्बर प्लेटफॉर्म पुल पर खड़े रहते हैं लेकिन पाठक उन्हें पुल पर किसी का इंतज़ार करनेवाला लेखक ही महसूसते हैं।
      दोनों के सपने थे-नगर कबीर की मौज में चले।दोनों में कोई नहीं चाहता था कि नगर फौज में चले।
         हर हर मोदी ,घर घर मोदी और हर हर बुलडोजर,घर घर बुलडोजर के विकास अभियान में दोनों लेखक अदृश्य होते गए।बनारस की पुरानी गलियों और  डोंगियों की तरह।
        मैं दोनों फक्कड़ लेखकों के द्वारा उड़ाई गई भाषा की धूल में अपनी यादों और सपनों के निशान खोज रहा हूँ।
      दोनों मुझमें शामिल हो गए हैं और मैं दोनों की रूहों का पांव पैदल नगर होना चाहता हूँ।
        कितना इत्तिफाक है कि मेरे दोनों अज़ीज लेखक का जन्मदिन जिन कारणों से 1ली जनवरी है,उन्हीं कारणों का शिकार मेरा बर्थ डेट 2री जनवरी है।
    मतलब वे दोनों एक को जन्म लेकर एक नम्बरी हैं और मैं 2 को जन्म लेकर दो नम्बरी।
    यह मैं नहीं कहता हूँ,अस्सी के हाइपर बोलिक ढिंढोरची कहते हैं।
         नगर में किसको पता है कि काशीनाथ बीमार हुए तो ठीक भी हुए ।परिजन की बहार और दोस्त चौथीराम यादव जी के प्यार के मरहम से।
   ज्ञानेन्द्रपति के पास न कोई परिवार है और न कोई चौथीराम यादव।ज्ञानेंद्रपति के लिए यह नगर ही चौथीराम यादव है।वे इस्पाती मनुष्य हैं।सौ साल लोहा रहें।
           दोनों को जन्मदिन की अशेष शुभकानाएं!