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12 अगस्त, 2014

पहचानिए:प्रेमचंद और भ्रष्टचंद

गांव की डायरी
प्रेमचंद और  भ्रष्टचंद


रामाज्ञा राय शशिधर


हल की मूठ पकड़े होरियों और फावड़े चलाते हल्कुओं को प्रेमचंद और भ्रष्टचंद में फर्क की गहरी समझ है। वे प्रेेमचंद पर हमले को आजादी पर हमला समझते है। यही कारण है कि प्रेमचंद के पात्र और पाठक निर्मला को अपमानित करने वाले सी¬.बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला हजारों की भीड़ में जला सकते हैं और मृदुला मुर्दाबाद/निर्मला जिंदाबाद’ के नारे लगा कर आईना दिखा सकते है। प्रेमचंद के ग्रामीण पात्रांे और पाठकों ने भाजपा नेता मृदुला सिन्हा के गृहराज्य बिहार में 2,700 सेकेंड तक राष्ट्रीय राजमार्ग-31 का चक्कर लगाकर सी.बी. एस. ई अध्यक्ष के पुतले को नारों, जनगीतों, पर्चो, भाषणों तख्तियों के बीच फूंक दिया तथा गगन भेदी स्वर में दुहराते रहे कि ‘हमें प्रेमचंद चाहिए भ्रष्टचंद नहीं। गांव के लोगें में ‘दो बैलों की कथा’ वाले प्रेमचंद कितने रचे बसे हैं यह इस बात से साबित होता है कि पांच किलोमीटर की जुलूस-यात्रा में होरी, हीरा, झूरी, हल्कू, गोबर, शंकर, घीसू, हामिद, वंशीधर, निर्मला, धनिया जैसे अनगिनत पात्रों के हाथों में तख्तियां और होठों पर नारे लहरा रहे थे-प्रेमचंद पर अत्याचार/नहीं सहेगा गांव-ज्वार, प्रेमचंद पर हमला यानी स्वतंत्रता पर हमला, हम हैं छात्र मजदूर, किसान/ हम बदलेंगे हिंदुस्तान, प्रेमचंद का यह अपमान। नहीं सहेगा हिंदुस्तान, सीबीएसई मुर्दाबाद, सांस्कृतिक क्रांति जिंदाबाद! यह सब दिल्ली के आईटीओ पुल पर में मिनरल वाटर पीकर पचास वर्षो से’ अबाध क्रांतिकारी स्पीच’ देने वाले बौद्धिकों द्वारा या जनता और जनकला की रोज हजार कसमें खाने वाले राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगठनों द्वारा नहीं बल्कि बेगूसराय जनपद के ठेठ गांव सिमरिया की छोटी-सी संस्था’ ‘प्रतिबिंब‘ के बैनर तले लगभग महीने भर के जन अभियान के बाद संभव हो पाया था तथा हिंदी पट्टी की संभवतः ऐसी पहली कोशिश थी। यह जानना दिलचस्प होगा कि गोदान, मैलाआंचल और रागदरबारी के बाद के गांव द्वारा यह सब हुआ कैस। जब गांव के कान मे यह हवा पहुंची कि प्रेमचंद के साथ केंद्र सरकार ने अन्याय किया है तो लोग थोड़ा हिले डुले, फिर सुस्त हुए। प्रतिबिंब के सांस्कृतिकर्मियों ने एक गोष्ठी की ‘प्रेमचद पर हमलाः दुश्मनों की खोज।’ इसके साथ ही जन आंदोलन की रूपरेखा बनाते हुए किसानों, मजदूरों, छात्रों के बीच एक सरल पर्चा जारी किया गया जिसमें लिखा कि ‘आज प्रेमचंद के पन्ने ही हमारे चौपाल हैं। प्रेमचंद के लिए लड़ने का मलतब है होरी जैसे उन करोड़ों किसानों के लिए लडना जिनकी दुश्मन सामंती ब्राहमणवादी व्यवस्था, सरकार और डंकन-अमरीका है। क्या अब प्रेमचंद का कद इस देश में मंत्री पत्नी जितना हुआ।’ पंचों में सांस्कृतिकर्मियों ने पांच कसमें खाईः ‘वर्ष 2003 को हम प्रेमचंद वर्ष के रूप में मनाएगें। सी.बी.एस. ई को निर्मला को पाठयक्रम में ससम्मान लगवाने की कोशिश करेंगे। हम सांस्कृतिकर्मी मानसरोवर की 300 कहानियों का एक साल में पाठ करेंगे। गांव गांव जाकर प्रेमचंद की कहानियों का सार्वजनिक पाठ करेगें। इन कामों की शुरूआत 30 जून, 2003 को राष्ट्रकवि‘ दिनकर की जन्मभूमि से सी. बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला दहन कर यथावत शुरू कर दी गयी है। पुतला दहन कार्यक्रम और जुलूस यात्रा के लिए जब डेढ. दर्जन किसानों के बेटों ने गांव-गांव घूमना शुरु किया तो सामान्य जनता बुद्धिजीवियों के बीच सबसे बड़ी दीवार भाषा की आई। हमने कहा कि प्रेमचंद पर हमला सी.बी.एस.ई ने किया। उन्होंने समझा सी.बी.एस. ई यानी सी.बी. आई। ’क’ ने कहाः हां भाई, सी. बी. आई भी भ्रष्ट हो चुकी है। ’ख’ ने पूछा सी.बी.एस. ई किस जानवर का नाम है ? पर सबने माना, अच्छा, बौआ! प््रेमचंद नामक लेखक पर हमला अन्याय है, पर हुआ कैसे ? और एक नई भाषा की खोज हुई। ‘आपके बाल-बच्चे स्कूलों में जो किताबें पढ़ते हैं उन्हें भारत सरकार का परीक्षा लेनेवाला विभाग बच्चों की जरूरत के मुताबिक बनाता है। पूरे देश की 12 वीं कक्षा से उस विभाग यानी सी.बी. एस.ई केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने महान कहानीकार प्रेमचंद की किताब हटाकर मुजफरपूर जिले की भाजपा नेता मृदुला सिन्हा की किताब लगाई है। देश के लेखकों द्वारा विरोध करने पर अब आपके बच्चों को दोनों में एक किताब पढ़नी होगंी। जरा सोचिए ! प्रेमचंद की जीवनी और कहानी की जगह आज की नेता की जीवनी और कहानी पढ़े ंतो आपके बच्चे क्या बनेंगे’। बस क्या था। गांव-गांव आग सुलग उठी। गले में नारों लिखी तख्तियां टांगे जिधर से अभियानी गुजरते छात्रांे, मजदूरों, किसानों, महिलाओं के चेहरे पर आक्रोश, असंतोष, बेचैनी, असुरक्षा। सीमाएं तोड़ देते एक स्वर से आवाज गोलबंद होती, प्रेमचंद पर अत्याचार/नहीं सहेगा गांव जवार। क्या कोई आंदोलन बिना विरोध-अंतर्विरोध के ही चरम पर पहुंचता है् ? नहीं! ‘च’ बाबू की मान्यता थी कि कोई चुनावी राजनीति है।‘छ’ साहब ने कहा क्या फर्क पड़ता है कि प्रेमचंद जगह नए लोग पढ़े जाएं। ‘ज’ ने कहा क्या डा. प्रेमचंद पर हमला हुआ ?‘ट’ का स्वर था-बड़ जुल्मी छै इ सरकार । मार-काट अ महंगाई एकर प्रान छीकै। ‘ठ’ का साफ कहना था-जब लालू की जीवनी पढ़ाई जा रही थी तब आप कहां थे ? ‘त’ ने कई स्कूलों को भड़काया-यह लाल झंडा वाला है। ’द’ ने दांत गड़ाया -भैया यह सब नाम कमाने का धंधा है। ‘प’ ने पटाखा छोड़ा-सिमरिया की आवाज आज तक दिल्ली नहीं पहुंची तो अब क्या पहुंचेगी ? ‘म’ ने मक्खन मारा-हां, यार! गंाव में चिल्लाने से सरकार क्या किताब बदल देगी ? यह सब बैठारी की दिहाड़ी हैं। दूसरी ओर सकारात्मक उफान भी था। ‘र’ किसान ने मूंछ हिलाई- एं, ऐसन बात! बाबू इ दिनकर की धरती है। एक फूंक मारों तो अंगंरेज को उखाड़ा। दूसरा फूंक मारा, इ सरकार को उखाड़ों।‘ल’ ने गीत गाया -मानव जब जोर लगाता है। पत्थर पानी बन जाता है। ‘स’ ने हंुकार- सच कहता हूं। ऐसा कुछ भी होता तो मेरा शरीर थरथराने लगता है। मुझे लगता है कि देश के लिए कुछ करना चाहिए। यह सिमरिया गांव का 32 वर्षीय किसान तरूण कुमार है। कसहा, बरियाही, अमरपुर, रुपनगर, गंगाप्रसाद, बारो, गढ़हरा, मल्हीपुर,बडहिया, चंदन टोला, चकिया, बीहट सहित अनेक गांवों मंे लंबे समय तक भूखे-प्यासे, धूप-बरसात से लड़ते किशोर साथी दौड़ते रहे। मुहाने पर पहुंची क्रांति को नेतृत्व नहीं जनता अंजाम देती है। 30 जून के 10 बजे जब पुतला दिनकर द्वार पर जुलूस यात्रा के साथ पहंुचा तो दूसरे अनेक गांवों की जनता हजारों की संख्या में जुटी थी। तय था कि राष्ट्रीय राजमार्ग  की बगल में  ‘सदगति’ का पाठ, भाषण एवं जनगीतों के बाद पुतला जलाया जाएगा। जनता का परावार उमड़ा और सैकड़ों लोगों ने नेतृत्व की उपेक्षा कर राष्ट्रीय राजमार्ग को जामकर पुतला स्थानांतरित कर दिया। फिर सारी गतिविधियां 2,700 सेकेंड तक वहीं चलती रहीं। अगले दिन हिंदुस्तान ने खबर लगाई  निर्मला को लेकर जलाया गया सी.बी.एस. ई का पुतला। दैैकिल जागरण का शीर्षक था सी.बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला फूंका। और आज ने लिखा ‘सी.बी. एस. ई के अध्यक्ष का पुतला दहन’। अनेक क्षेत्रीय पत्रों में भी खबरें आती रहीं। प्रतिदिन संस्कृतिकर्मी गांव-गांव जाकर प्रेमचंद की कहानियों का पाठ करते है। प्रेमचंद के पात्रों एवं पाठकों से इस पर राय ली जाती है। अब तक ‘सदगति’ ‘ठाकुर का कुआं’ ’सवा सेर गंेंहूं’ का पाठ हो चुका है। साथ ही जनपद के कवि दिनकर की क्रांतिकारी कविताओं का पाठ भी जारी है। लोग चौपाल में घेरकर अपने प्यारे-न्यारे कथाकार की कहानी चाव से सुनते हैं। हजार से अधिक हस्ताक्षर जमा हो चुके है। जानिए कि निर्मला के समर्थन एवं मृदुला के विरोध में अनेक ग्रामीण भाजपा कार्यकर्ताओं ने सहर्ष हस्ताक्षर किए क्योंकि प्रेमचंद उनकी आत्मा में रचे-बसे हैं।  ‘स’ को पता भीं है कि दिल्ली के राजेंद्र सभागार में आग और धुआं पर्चे के रूप में बंट चुका है। दिल्ली की दीवारों पर चिपक चुका है। उसे यह भी पता नहीं प्रेमचंद राष्ट्रीय संगोष्ठी में शेखर जोशी जैसे कथाकार ने चार मिनट तक उनके इस कार्य की सराहना की है।‘स’ नामक ग्रामीण किसान को कितना दुख होगा कि दिल्ली के बुद्धिजीवी जनता के ऐसे आंदोलन को ’स्पीच’ सुनने के दरम्यान चूतड़ों के नीचे दबा देने के कितने बड़े उस्ताद हैं। एक ही उम्मीद है कि होरी और हामिद एक

18 जुलाई, 2014

रूपनगर एक गाँव का नाम है!



 
.न रूप है न रूपया,न नगरीय सुविधा है न बोध.न जाने क्यों इस ठेठ देहात का नाम रूपनगर हुआ.इतिहास के नाम पर अंग्रेजों द्वारा एक दौर में लूट और यात्रा के लिए बनाया गया रेलवे टीसन था.आज़ादी क्या मिली, रेल ने भी रास्ता बदलकर मुंह मोड़ लिया.फिर भी यह गुणी गाँव रूपनगर ही कहलाता रहा.
गाँव का ह्रदय क्षेत्र दुर्गाथान.दिन के तीन बजे. यहाँ हर वार इतवार होता है.चाय के लिए चूल्हे में कोयला चढ़ गया है.फूस की छानी धुएं और आग से भर गई है.किसान और निठल्ले चर्चा को केतली,स्पेन और छन्ने पर खौलाना शुरू कर चुके हैं. बहस में हर चीज ठहरी हुई है.तभी बाल और युवा मंडल से लदी फटफट मैदान में पहुँचती है.
गाँव की संस्कृति में बदलाव और हस्तक्षेप शुरू है...बैनर टंग गया-प्रतिबिम्ब संवाद श्रृंखला .सिमरिया,बेगूसराय,बिहार-851126.बिस्मिलाह खान के बनारस से आई डफली बोलने को बेताब है.बाल कलाकारों के होठ –हम होंगे कामयाब-गीत से गाँव की जमी हुई काई को पोछ देना चाहते हैं...धीरे धीरे अच्छी खासी भीड़ जुट गई है..तास के पत्ते उर्फ़ साहब,जोकर,गुलाम,इक्के,नहले,दहले शर्मा उठे हैं.सत्तर पार के कामरेड गंगाधर पासवान का कमजोर और बीमार शरीर लगातार पसीना बहाकर हर जरूरी चीज को जुटा रहा है और सोलह से छब्बीस की जवानी मोबाइल पर मस्त है.

23 जून, 2014

तानाशाही के दौर में जादुई यथार्थवाद पर बहस जरूरी है : पंकज बिष्ट



 मई के मौसम में जब महिला कालेज रोड का आसमान  गुलमोहर के फूलों से सुर्ख हो गया था और ज़मीन पर सिर्फ भगवा रंगों की बहार थी तब पंकज बिष्ट बीएचयू के हिंदी विभाग में आए. जेनुइन कथाकार,प्रतिबद्ध पत्रकार और सरोकारी एक्टिविस्ट के रूप में वे पहली बार २००६ में तब आए थे जब प्रेमचंद के पात्र सीरियल आत्महत्याएँ कर रहे थे.उन्होंने एक लाख की गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार की राशि सारनाथ जाकर खुद वितरित की थी.दूसरी बार बिष्ट हिंदुत्व के उन्माद में डूबे कबीर के शहर में कार्पोरेट फासीवाद पर बोलने आए थे. कला संकाय के एनी बेसेंट हाल में हिंदी के छात्र, शिक्षकों और नगर के बौद्धिकों के बीच वे एक ऐसे कथा फॉर्म और शैली पर विचार करने आए थे जो तानाशाही के दौर का कला रूप है. हिंदी विभाग के लिए संभवतः यह पहला मौका था जब जादुई यथार्थवाद टर्म अपनी औपचारिक बहस के माध्यम से प्रवेश पा रहा था. आलोक कुमार गिरि द्वारा संगृहीत,लिपिबद्ध और सम्पादित यह व्याख्यान मार्क्वेज़ के बहाने हिंदी की बौद्धिक खिड़की में नया झोंका भरता है.-माडरेटर


19 जून, 2014

गाँव में दो पीढ़ियों के बीच का धागा टूट गया

                                            रामाज्ञा शशिधर 


गाँव में दो पीढ़ियों के बीच का धागा लगभग टूट गया है.ताने को बाने का और बाने को ताने का पता नहीं है.नई पीढ़ी के लिए पुरानी पीढ़ी उस पुराने अबूझ गीत की तरह है जिसका रिमिक्स नहीं बन सकता.पुरानी पीढ़ी के लिए नई पीढ़ी डीजे का कानफोडू शोर है जो सिर्फ पुराने दिलों की धमनी को तोड़ रहा है. इसे समाजशास्त्री लोग 'जेनेरेशन गैप' कहते हैं लेकिन मेरे लिए यह बदलाव पुराने गाँव का नए बनते कथित गाँव से पूर्ण संबंध विच्छेद है.

30 मार्च, 2014

क्या बनारस में जसम,जलेस और प्रलेस के लेखक मोदी मार्ग को आसान कर रहे हैं?

 पाठक मित्रो! बुद्ध,कबीर,प्रेमचंद और बिस्मिल्लाह खान का बनारस इन दिनों सियासी जंग का उग्र मैदान हो गया है.जिन घाटों और गलियों में लोग शांति और मस्ती की खोज करते थे वहाँ बाहरी और इलाकाई युवा हिंदू वाहिनी,राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ,विश्व हिंदू परिषद्,बजरंग दल,शिवसेना और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने लिखित-वाचिक अफवाह और झूठ के साथ डेरा डाल दिया है. उधर गुजरात और दिल्ली से बड़ी संख्या में मोदीमार्गी टीम आ रही है जो अनेक रूपों में समाज में घुसपैठ कर भ्रम फैला रही है.'हर हर मोदी घर मोदी ' और 'या मोदी सर्वभूतेषू राष्ट्ररूपेण संस्थिताः' के आक्रामक संदेशों से काशी के बहुमिश्रित जन मन और जनपक्षीय नागरिकों के भीतर खौफ का बीज डाला जा रहा है.ऐसे में काशीनाथ सिंह के १७ मार्च को बीबीसी में छपे मोदी समर्थक बयान ने उस सवाल को और गहरा दिया जो  समयांतर,मार्च में प्रकाशित हुआ है.जन संस्कृति मंच,जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ का शानदार सांस्कृतिक इतिहास है लेकिन फासीवाद के उभरते इस कठिन दौर में उनकी चुप्पी भी उतनी ही चिंतनीय है.मेरे जैसे सरोकारी और निःसहाय सोचने विचारने वाले नागरिक के पास आपसे अपील करने के अतिरिक्त क्या है.क्या यह देश के बुद्धिजीवियों,लेखकों,अदीबों,कलाकारों,संस्कृतिकर्मियों की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है कि बनारस और भारत की सेकुलर-लोकतांत्रिक रूह की हिफाजत करें.आपसे उम्मीद है. मोदी आंधी से पूर्व समयांतर मार्च में छपी यह रिपोर्ट हिटलर के समर्थक पुरोहित,बाद में फासिज्म के विरोधी,जेल बंदी मार्टिन नीमोलर की आत्मस्वीकृति के साथ पोस्ट कर रहा हूँ ताकि इतिहास हमारी भूमिका का हिसाब रख सके.-माडरेटर 


पहले वो आए
साम्यवादियों के लिए
और मैं चुप रहा 
क्योंकि
मैं साम्यवादी नहीं था 

फिर वो आए
मजदूर संघियों के लिए
और मैं चुप रहा 
क्योंकि
मैं मजदूर संघी नहीं था 

फिर वो
यहूदियों के लिए आए
और मैं चुप रहा 
क्योंकि
मैं यहूदी नहीं था 

फिर
वो आए मेरे लिए
और तब तक
बोलने के लिए
 कोई बचा ही नहीं था

‘काशी में उत्सव और श्मशान की कोई विचारधारा नहीं होती है’.काशी के वाम लेखक संगठनों को देखकर तो ऐसा लगता है कि साहित्य भी इन दिनों विचारधारा से मुक्त और अवसरधारा से युक्त खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया है. यूपी में मुलायम और मोदी के दम दिखाने के पहले ही वाम लेखक संगठनों ने हिंदुत्व के गर्भगृह काशी में ‘नमो नमो’ की अपनी आहुति डालनी आरंभ कर दी है.
इसका एक शानदार उदाहरण पिछले दिनों विद्याश्री न्यास के मंच से धर्मसंघ शिक्षा मंडल, वाराणसी में घटित हुआ जहाँ धर्म संघ की लारी के नीचे वाम लेखक संघ की नैनो स्वेच्छया घुस गई.
जसम,जलेस और प्रलेस के अधिकारियों और सदस्यों ने हेडगेवार,गोविंदाचार्य,उमा भारती की कर्मभूमि,मुरली मनोहर जोशी की वोटभूमि,योगी आदित्यनाथ की दंगाभूमि और मोदी की भविष्यभूमि की एक मजबूत सांस्कृतिक कड़ी भाजपा सांसद स्व. विद्यानिवास मिश्र की स्मृति में उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में एक दशक से लगातार गतिशील वार्षिक आयोजन यात्रा के इस बार के तीन दिवसीय राष्ट्रीय लेखक शिविर(12-14 जनवरी) में इतना बढ़ चढकर प्रदर्शन किया कि साहित्यिक सामाजिक रंगरेजों को भी लाल और भगवा रंग में फर्क करना मुशिकल हो गया.इस आयोजन में प्रलेस के वरिष्ठ लेखक काशीनाथ सिंह,जलेस के स्थानीय अध्यक्ष प्रो.रामसुधार सिंह तथा घनघोर सरोकारी संगठन जसम के एकल संयोजक प्रो.बलराज पांडेय के साथ आधा दर्जन सदस्यों ने अध्यक्षता,संचालन,स्वागत,धन्यवाद और वक्तव्य की ऐतिहासिक भूमिका निभाई.
कहने को तो इस बार का विषय ‘नारी चेतना और हिंदी साहित्य’ था पर चेतना और
रणनीति के स्तर पर हर वर्ष की भाँति इस वर्ष का उद्द्येश्य भी दक्षिणपंथी चुम्बक की ओर साहित्यिक अकादेमिक लौह अयस्क को आकर्षित करना और अपना पंथ मजबूत करना था.सबसे पहले विद्यानिवास मिश्र का स्थानीय दैनिक हिन्दुस्तान में छपा नारी संबंधी अभिलेख-कथन देखिये-“भारतीय नारी नरी नहीं,नारी है.भारतीय लोक विश्वास है कि जिसके कन्या नहीं होती है,वह दूसरे का कन्यादान करके तरता है.कन्या दो कुलों को तारती है और पुत्र केवल एक कुल को”.नरी,नारी,कुल और कन्यादान के पितृबोध के बाद आइए अब इस संगोष्ठी में शामिल होने से ज्यादा आगामी चुनाव प्रचार के लिए आई भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय प्रभारी
मृदुला सिन्हा का गुलाबबाग के काशीखंड भाजपा कार्यालय में भाजपाई महिलाओं और  प्रेस को संबोधित वक्तव्य पढ़िए-सिर्फ नमो नमो से काम नहीं चलेगा.सभी महिला कार्यकर्ताओं को व्यापक जन संपर्क के लिए घरों से निकलना होगा,लोगों को जोड़ना पड़ेगा ताकि नरेंद्र मोदी और भाजपा के पक्ष में चल रही हवा को वोटों में बदला जा सके.” इतना ही नहीं एनसीइआरटी के पाठ्यक्रम से बनारस के प्रेमचंद के उपन्यास निर्मला को एक दशक पूर्व हटवाकर अपना एक एनजीओ आधारित उपन्यास लगवा लेने में सक्षम मृदुला सिन्हा के नेतृत्व में भाजपा महिला मोर्चा का मोदी-जोशी जीत के लिए विशाल मशाल जुलूस भी निकला जिसने सभी अखबारों का पर्याप्त पन्ना घेरा.साहित्य अकेदमी के यात्रा व्यय से चालित आयोजन में फेसवेल्यू के लिए अकादेमी अध्यक्ष की ओर से उड़िया लेखिका प्रतिभा राय और कमल कुमार थीं. दो अन्य लेखिकाओं में एक दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापक और विद्यानिवास मिश्र की साहित्य अमृत संपादन सहयोगी दक्षिणपंथी डा.कुमुद शर्मा थी, दूसरी पटना की उषा किरण खान. गौरतलब है कि उषा किरण खान जिन्हें इस बार एक सम्मान से नवाजा गया है, संगोष्ठी आयोजक एवं विद्यानिवास मिश्र के छोटे भाई पूर्व आईपीएस दयानिधि मिश्र के आइपीएस मित्र रामचन्द्र खान की बीवी हैं, जिन पूर्व लोकसेवी को बिहार सरकार के वर्दी घोटाले में सीबीआई द्वारा अभियुक्त बनाये जाने पर हाल ही में जेल जानी पड़ी थी.पूरा आयोजन इन चमकदार बाहरी चेहरों के अतिरिक्त स्थानीय दक्षिण-वाम विद्वानों का घोल था जिसके स्थाई उद्द्येश्य को जानने के लिए इस समारोह और काशी के साहित्य विद्यामंडल के ढांचे को जान लीजिए.
यह आयोजन एक दशक से चौदह जनवरी को स्व. मिश्र के जन्मदिन पर उनके भाई के नेतृत्व में विद्याश्री न्यास द्वारा होता है जिसके स्थानिक सहयोगियों में जसम शुरू से रहा है.
यह दुहराने की जरूरत नहीं कि विद्यानिवास मिश्र की हिंदी में छवि साहित्यकार-पत्रकार के आलावा भाजपा के सांसद व देवरिया के कठोर पंक्तिपावन ब्राहमण की रही है.वे आचरण में इतने कट्टर थे कि परिवार के अलावा किसी दूसरे के हाथ से अन्य बर्तन में बनाया भोजन नहीं करते थे,पानी,चाय का अलग गिलास लेकर चलते थे,चुटिया और जनेऊ पंथ के घनघोर समर्थक और उद्धारक थे.अंतिम दिनों में भाजपा सांसद रहते समय उन्होंने बनारस के काशी खंड भाजपा के गुलाबबाग कार्यालय से पूर्वांचल के भाजपाई चुनाव प्रचार का वैदिक रीति से आरंभ किया था. गौरतलब है कि पूर्वांचल के रोबदार-दबंग ब्राहमण नेता स्व. मिश्र पर इस बार का आयोजन जिस धर्म संघ के करपात्री सत्संग सभागार में हुआ और जहाँ की प्रमुख भूमिका में तीनों वाम लेखक संघ के सदस्य थे,की बिल्डिंग के निर्माण के लिए संसद निधि से ८० लाख की राशि उन्होंने अपने संसदीय काल में दी थी. जानना दिलचस्प होगा कि करपात्री जी कौन थे,क्यों स्व.मिश्र ने सत्संग हाल के लिए राशि दी थी तथा आजकल वहाँ क्या होता है?
भारतीय लेखक शिविर का मंचस्थल धर्मसंघ शिक्षा मंडल था जहाँ के आदि महंथ स्व. करपात्री जी वर्ण व्यवस्था के प्रचारक,दलित और स्त्री के वेद अध्ययन के विरोधी,विश्वहिंदू परिषद के अधिकारी,रामराज्य परिषद के संस्थापक,काशी में आजादी के बाद राजनारायण द्वारा पुराने विश्वनाथ मंदिर में दलित भक्त प्रवेश के कारण  नए विश्वनाथ मंदिर के निर्माता थे.कहते हैं विद्यानिवास मिश्र के लिए वे एक आदर्श माडल थे.इस आयोजन के श्रोता इसी धर्म संघ के संस्कृत वेद वेदांग विद्यालय के एक सौ नन्हें ब्राहमण बटुक थे जहाँ अन्य जाति तो छोड़िये श्राद्ध कराने वाले  ब्राहमण बटुक तक का वेद अध्ययन निषेध है.वे बेचारे स्त्री विमर्श क्या समझते, हाँ तीन दिनों तक व्यंजनों का स्वाद समझ कर प्रसन्न रहे.श्रोताओं में इसके आलावा बड़ा गाँव कालेज की कुछ छात्राएं लाई गई थीं तथा कुछ सर्टिफिकेट क्रेता शोध छात्र थे.


 आखिर संसदीय पार्टियों की तरह काशी में विद्याश्री न्यास के साथ जसम,जलेस और प्रलेस का इन्द्रधनुषी गठबंधन या सैंडविच गठबंधन क्यों है?इसके ठोस कारण हैं.सबसे सर्वाधिक रेडिकल लेखक संघ जसम का हाल जानिये जिसके सदस्य इस मंच की लाइफलाइन की तरह हैं.यह ऐसा लेखक संघ है जो बनारस में एक दशक से तीन सदस्यों वाला रहा है तथा इसका कभी चुनाव नहीं हुआ.इसके स्थाई संयोजक प्रो बलराज पांडेय हैं. जब गुरू से झंझट हुआ तो जसम में आ गए.प्रो साहब की विचारधारात्मक  नींद ऐसी गहरी रही कि वाममार्गी मित्र प्रो.अवधेश प्रधान ने धर्म के आध्यामिक आवरण ग्रहण कर लिया. कहते हैं कि एक दशक से वार्षिक व्यक्तिगत चंदे के बल पर प्रो.बलराज पांडेय जसम के प्रभारी हैं तथा अपनी प्रतिभा के बल पर जन संस्कृति मंच को बनारस में निर्जन संस्कृति मंच बनाये रखा है.विद्या न्यास मंच के वे प्लानर से लेकर आमंत्रण वितरक तक रहे हैं. ये और बात है कि दो साल से जसम का एक भी कार्यक्रम नहीं हुआ है.विद्या न्यास के जातिवादी और दक्षिणपंथी रुख से जुड़ने का एक आयाम उनके रोजमर्रे में आप देख सकते हैं.
प्रो बलराज पांडेय ने हिंदी विभाग,बीएचयू अध्यक्ष रहते हुए शोध नामांकन में पिछले साल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण ही नहीं दिया. बड़ा छात्र आंदोलन होने पर उन्हें कोटा देना पड़ा.प्रो बलराज पांडेय का एक रिकार्ड है कि आजतक उन्होंने एक भी शोध अनुसूचित या अनुसूचित जनजाति कोटे से नहीं करवाया है. वे काशीनाथ सिंह के शोध छात्र और प्रलेस के पूर्व सदस्य रहे हैं तथा इनदिनों विद्याश्री न्यास के हिमायती हैं.
दूसरा थोड़ा कम क्रांतिकारी मंच जलेस का है.यह दुर्भाग्य ही है कि जिस जनवादी लेखक संघ के प्रतिबद्ध संस्थापक बनारस के प्रो.चंद्रबली सिंह रहे हैं उनके निधन के पूर्व से ही इस मंच पर दक्षिणपंथ का प्रभाव पड़ने लगा था. आजकल इसके करताधर्ता यूपी कालेज के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो रामसुधार सिंह है.राममंदिर आंदोलन के बाद से वे अक्सर काशी के दक्षिणपंथी साहित्यिक और राजनीतिक मंचों से दहाडते रहे हैं.बनारस में जलेस का भी नई पीढ़ी में कोई विकास विस्तार नहीं होने का कारण विद्यान्यास जैसे मंचों पर जलेस अध्यक्ष की आवाजाही और विचारधारा से गुरेज है.एक ताज़ा प्रमाण दैनिक हिंदुस्तान में लिखी प्रो. रामसुधार सिंह की हालिया टिपण्णी है जिसमें उन्होंने पूरे बनारस के अध्यपकों-लेखकों को विद्याश्री न्यास जैसे मंच और आयोजन की नसीहत दे डाली.
रही बात सबसे पुराने मंच प्रलेस और उसके काशी संरक्षक काशीनाथ सिंह की. काशीनाथ सिंह की मंचीय विचारधारा के विकास का संबंध अपने बड़े भाई नामवर सिंह की विचारधारा से जुड़ा रहा है.जब से नामवर सिंह ने जसवंत सिंह,राजनाथ सिंह,मुरारी बापू,रामदेव,पप्पू यादव आदि के मंचों पर जाना शुरू किया है,काशीनाथ सिंह के लिए चुनौती की तरह हो गया है कि लोकल ही सही कितने दक्षिणपंथी मंचों का उद्धार किया जाए.इसका एक उदाहरण तो विद्यानिवास मंच ही है.काशीनाथ सिंह को याद ही होगा कि भाजपा सांसद रहते हुए विद्यानिवास मिश्र के घर पर एक बार जब अजय मिश्र के उपन्यास पक्का महाल का विमोचन समारोह था तो उन्होंने यह कहकर जाने से इनकार कर दिया कि विद्यानिवास जी भाजपा के सांसद हैं.आज वे वहाँ लोकल हीरो हैं.यह हैरानी और आश्वस्ति है कि काशीनाथ सिंह जैसे प्रभावकारी लेखक के विचलन के बावजूद बनारस में अन्य लेखक संगठनों से कई गुना ज्यादा सदस्यतावाले प्रलेस की लेखक पीढ़ी विद्याश्री न्यास से इतनी दूरी बनाये कैसे रख पाती है.
वाम लेखक संगठनों के बनारसी प्रदर्शन से कुछ सवाल उठते हैं.क्या अब स्थानीय वाम लेखक संगठनों पर राष्ट्रीय संगठनों की कोई पहुँच और पकड़ नहीं है? क्या लेखक मंचों से विचारधारा का सचमुच अंत हो गया है?क्या लेखक संघ के भीतर आंतरिक बहस और लोकतंत्र पूर्णतः खत्म हो गया है? क्या रसूख और चंदे के बल पर कोई भी व्यक्ति लेखक संगठन की फ्रेंचाइजी ले सकता है और उसका दुरूपयोग कर सकता है?क्या लेखक संघों पर पार्टियों के भटकाव का प्रभाव अपने अंतिम दौर में है?क्या केन्द्रीय नेतृत्व की देखादेखी के कारण स्थानिक नेतृत्व में भटकाव है?क्या लिखने पढ़ने वाली नई पीढ़ी में पुरानी पीढ़ी के भटकाव के कारण मंच को लेकर उदासी है?क्या दक्षिणपंथी सत्ता और शक्तियाँ लगातार लेखक संघों को भीतर से खोखला कर रही हैं?
और अंतिम बात. क्या जसम,जलेस,प्रलेस जैसे वाम लेखक संगठन केंद्र में भाजपा और मोदी को सत्ता सौंपने में स्थानिक सहयोगी हैं? भीतर के बरक्स बाहर जवाब ढूँढना मार्क्सवादी विचार नियम का निषेध है और विद्याश्री जैसे मंच का निर्वाह.



22 जनवरी, 2014

'आप' के विरोध के असल कारण ढूंढिए



कितना सच?पहले लड़े थे गोरों से,अ़ब लड़ेंगे चोरों से 

अब तक पचास लाख सदस्यों और लोकसभाई छब्बीस सौ  उम्मीदवार आवेदकों वाली  'आप' को सोचना ही होगा कि एक साथ इतनी तरह की शक्तियां और विचारधाराएं  उस पर क्यों टूट पड़ी हैं?
       

04 जून, 2012

अँधेरी कोठरी में अक्षर का ताना बाना

रामाज्ञा शशिधर 
उनका ताना बाना जगह बेजगह टूट चुका  है।अँधेरी कोठरी इस मुल्क की तरह।गर्दन तक लटके हुए जाले  फंदे की तरह।टंगा हुआ जकात अतीत के साये की तरह।सामने तनी पगिया जंजीर की तरह।कमर तक गड्ढे में धंसे हुए दोनों सूखे पांव कब्र की तरह।ताने को रेशम के बाने से भरती  हुई ढरकी  भविष्य की तरह।
                    
बनारस में बुनकर 
       

01 अक्टूबर, 2011

कविता से पहले कवियों को दीमक के हवाले कर देना चाहिए


हमारा समय और आज की हिंदी कविता' पर राष्ट्रीय बहस बीएचयू के राधाकृष्णन सभागार में 24 सितम्बर 2011 को सात घंटे तक चलती रही.हिंदी कविता की दिशा,दशा और भविष्य को लेकर हुई .गोष्ठी से अनेक जरूरी सूत्र निकले हैं जो आज की कविता के गतिरोध,खूबी और ताकत को शिद्दत से रेखांकित करते हैं.रस्मी और फर्जी गोष्ठियों से अलग कविता से गंभीरता से प्यार करने वालों के बीच हुए वाद विवाद संवाद के सम्पादित अंश को आज की कविता के घोषणा पत्र के तौर पर श्रोताओं ने लेने की अपील की है..हम आपसे चाहते हैं कि इस बहस को आगे बढ़ाएं ताकि हिंदी में असली और नकली कविता,जनधर्मी और जनविरोधी कविता का नया पैमाना विकसित हो सके-माडरेटर 

10 सितंबर, 2011

बुरे समय में नींद ने कविता न पढ़ने के मिथ को तोडा :गौरीनाथ

08 सितंबर, 2010

कार्ल मार्क्स का करेला बनाम कामू का काशीफल

 पिछले शिक्षक दिवस पर अमर उजाला में साहित्य के बुजुर्ग शिक्षक नामवर सिंह पर रवींद्र त्रिपाठी की एक टिपण्णी है- नामवर सिंह हिंदी में चुप्पी के सबसे बड़े मास्टर हैं. इस चुप्पी का गहरा राजनीतिक निहितार्थ  है. बकैत बनारस से उन्होंने चुप्पी का रूप चुना है. इसलिए उनके पान घुलाने,१२० नंबर फांकने और मंद मंद मुस्काने की अपनी रणनीति है. पान नामवर सिंह के मुंह में चलने वाली राजनीति का  चलायमान जयगान है.
      यह चुप्पी उनके लिए जितनी  शुभ हो ,समाज और साहित्य के लिए घातक है. जैसे कुलपति वी एन राय के छिनाल प्रकरण पर कुलाधिपति पद की चुप्पी, विष्णु खरे के हिदी विभागों को चकला घर कहने और उन्हें पुरुष वेश्या कहने पर चुप्पी, सलवा जुडूम और ग्रीन हंट के संचालक के किताब लोकार्पण को लेकर हुए विरोध पर चुप्पी, बिहार के बाहुबली नेता प्रभुनाथ सिंह  के मंच पर जाने के कलाकारों द्वारा विरोध पर चुप्पी,जसवंत सिंह की किताब  की आलोचना के विरोध पर चुप्पी, प्रलेस महासचिव द्वारा फोर्ड फाउन्डेसन से  पैसा लेने के प्रकरण पर चुप्पी, बनारस में प्रलेस सम्मलेन में विचारधारा के अंत की घोषणा की आलोचना पर चुप्पी आदि. उम्मीद है, कोई अंध भक्त टेपित लाभ के लिए नामवर सिंह बोलवाए या भाषण अंकन के सिलसिले में वे  कुछ  बोलें तो बोलें वरना स्टैंड के नाम पर आई सी सी  का कार स्टैंड उनके लिए  सबसे सुविधाजनक है.
        १८ सितंबर को बनारस में उन्हें पाखी पत्रिका द्वारा ५१ हजार रूपये से सम्मानित होना है.पाखी इएमइसी ग्रुप की साहित्यिक पत्रिका है. आइये ,अगस्त में ग्रुप के मालिक का सम्पादकीय स्टैंड सुनिए. संपादक के लिए मध्य मार्ग उत्तम मार्ग है  यानी वर्त्तमान व्यवस्था सुमार्ग है.सम्पादकीय का कहना है कि अरुंधती रॉय अतिवादिता की  शिकार हैं. रूस वैचारिक स्वंत्रता का दुश्मन था.'' विचारधाराओं में बंधा मस्तिष्क अतिवादिता का शिकार हो जाता है.उसमे ठहरे हुए जल के समान दुर्गन्ध आने लगाती है.''  अमेरिकी साम्राज्यवादी नीति रूसी वामपंथ और भारतीय वाम विचारधारा  की जनविरोधी अतिवादिता एक जैसी है. आदिवासी किसानों की लडाई का मुद्दा केवल नक्सलपंथ का मुद्दा है.
        संपादक का कहना है कि कैसे कोई तय कर सकने की निर्णायक भूमिका में है कि विश्वरंजन के हाथ निर्दोषों के खून से रंगे हैं. सम्पादकीय के अनुसार मार्क्सवाद एक आयातित विचारधारा है. आदिवासी किसानों  को क्या पता है  कि मार्क्स-लेनिन किस चिड़िया  का नाम है. मालिक संपादक का कहना है" मैं किसी भी विचारधारा को अंतिम  सत्य नहीं मानता.''
        विचारधारा  को अफीम मानने वाले संपादक क़ी मानवता का राज यहाँ है कि ''मैं एक ब्राहमण परिवार में जन्मा हूँ मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं है. लेकिन मैं इसके लिए शर्मिंदा भी नहीं हूँ.'' आगे ''अब देखिये विचारधाराओं का प्रदूषण.  जब नरेन्द्र मोदी को अपराधी कहता हूँ तो सराहना होती है. हुसैन के खिलाफ लिखता हूँ तो दक्षिण पंथी करार दे दिया जाता हूँ.''
         कार्ल-मार्क्स के करेले से ज्यादा कामू के काशीफल पर नजर गडाए रखनेवाली विचारशील  हथेलियों से नामवर सिंह सम्मानित होकर बाजार और सरोकार दोनों धर्मों  की सेवा अवश्य  करेंगे. क्या उस वक्त भक्त-भजनियों-फुलधरियों की  तालियों के शोर  में याद कर पाएंगे क़ि  एक विचारधारा में उनकी इतनी आस्था थी कि कभी यहाँ से लोकसभा का चुनाव लड़े थे और अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को अपन जन्म दिवस मानते थे.
        बनारस में दो  दशक से  सैकड़ों  किसानों और बुनकरों की मौतों का सिलसिला जारी है और देश में लाखों . जनता और जनविचारधारा  को मनुष्यता का दुश्मन माननेवाली वैचारिकी से सम्मानित होते हुए क्या यह  चुप्पी टूटेगी ? सन्नाटे के कोहरे में विचारधारा लाश की तरह दबाकर रखी जाएगी. धूप उगने पर बहस  शुरू होगी कि करेला ज्यादा फायदेमंद है या काशीफल.    

07 सितंबर, 2010

चौरासी के नामवर को अस्सी की बधाई

             क्या  बनारस में  18 सितंबर  को पाखी पत्रिका की ओर से आयोजित  नामवर सिंह की सम्मान व पुरस्कार  सभा पुरानी यादों से सारांशतः अलग होगी?  क्या वहां कार्ल मार्क्स के करेले पर कामू का काशीफल (दूसरी रपट भी पढ़ें ) भारी नहीं होगा?
        फिलहाल ८० वीं वर्षगांठ के  आयोजन के सूरते हाल पर दरबारीलाल की
       समयांतर में छपी टिपण्णी यहाँ हाजिर हैA
                                       
                                      नामवर का अस्सी
इस बार हिन्दी आलोचना के कमांडर नामवर सिंह चुपचाप अस्सी के हो गए. कई स्तरों पर उनका अस्सी हुआ. वे अस्सी साल के हुए. काशी के अस्सी के हुए. नापसंद एवं पसंद करनेवालों के असि हुए। नहीं हुए तो सिर्फ बीसवीं सदी के अस्सी वाले नामवर। 28 जुलाई को अपने जन्म दिन पर बनारसी श्रोताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने पहला वाक्य कहा, काशी का अस्सी, अस्सी का नामवर आपको प्रणाम करता है।काशी के लिए मंच से कुछ ऐसा हुआ कि काशी भी अस्सी के हो गए हों।।
बनारस ने नामवर सिंह के साठ को भी सेलीब्रेट कियाA पचहत्तर को भी और इस दफा अस्सी को भी। बनारसी बुद्धिजीवी ऊबकर अब कहने लगे हैं कि काशी में केवल नामवर ही साठ के होते हैंA पचहत्तर के होते हैं और  अस्सी के भी।
      कई प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि आलोचक बच्चन सिंह की पचहत्तरवीं वर्षगांठ पर नामवर सिंह ने सम्मान आयोजन को ध्वस्त करते हुए कहा था कि बनारस का प्रलेस बना ही इसलिए है कि अपनों का सम्मान करे। बच्चन सिंह इतने आहत हुए कि गोष्ठी से सीधे अस्पताल पहुंच गए। नामवर का अस्सी आयोजन को देखकर बुद्धिजीवियों ने टिप्पणी करनी शुरू कर दी है कि बनारस और इस देश का प्रलेस बना ही इसलिए है कि नामवर सिंह की सम्मान गोष्ठी करते चले।
       नामवर का अस्सी इसलिए भी रोमांचक है कि पिछले दिनों महादेवी जन्म शताब्दी के दरम्यान बनारस में ही उन्होंने पंत के तीन चौथाई साहित्य को कूड़ा कह दिया था। अखबारी साहित्यिक बहस चल ही रही थी कि स्थानीय भाजपाइयों ने मुकदमा दायर कर इसे नया रंग दे दिया था। कहा जाता है कि नामवर का अस्सी उसकी जबाबी कार्रवाई था। आइए इस हादसे के आंतरिक दृश्यों छवियों एवं अंतर्विरोधों का थोड़ा जायजा लें।
नामवरजी जब साठ के हुए थे तब बनारस की सम्मान गोष्ठी में बाएं -दाएं प्रलेस के दो विराट खंभे थे-नागार्जुन और त्रिलोचन। नागार्जुन ने एक कविता पढ़ी थी% अगर कृति का फल चखना है@आलोचक को खुश रखना है। अस्सी वाले कार्यक्रम में कृति की जगह नौकरी पदोन्नति पार्टी संगठन संबंध बुद्धिजीविता आदि भी रख लीजिए तो इस कविता की व्यंजना बढ़ जाती है। नागार्जुन नहीं रहे लेकिन 20 अगस्त 2007 को नब्बे साल के होने वाले प्रलेस के शुरूआती नायक त्रिलोचन  बेटे बहू के घर में जर्जर हालत में सांसें गिन रहे हैं। नामवर सिंह के अस्सी के होने पर त्रिचोलन का एक लंबा इंटरव्यू स्थानीय हिन्दुस्तान में छपा जिसमें आशीर्वादी मुद्रा में कहा गया&हिन्दी में नामवर सिंह जैसी प्रतिष्ठा किसी को नहीं मिली। 28 जुलाई के बाद ही 20 अगस्त आता है। बनारसी बुद्धिजीवियों का कहना है कि नामवर सिंह एवं उनके भाई कुछ भी कर सकते हैं दूसरों का सम्मान नहीं कर सकते। 
  पचहत्तरवीं वर्षगांठ में सुविख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी थे और देशभर में हवाई जहाज के साथ थे। 80वीं के उधार का जिम्मा हिन्दी विभाग बीएचयू एवं प्रलेस की बनारस इकाई ने लिया और अद्वितीय ढंग से कर्ज चुकाया।
      सम्मान समारोह में नामवर जी का चादर से सम्मान जलेस के उद्धारक चन्द्रबली सिंह ने कियाA कई दर्जन संगठनों संस्थानों एवं व्यक्तियों द्वारा माल्यार्पण की फेहरिस्त में जसम की स्थानीय इकाई ने माला भेंट कीA कला कम्यून ने पोटेªट दियाA अनपढ़ बुनकर शायर ने कुर्ता सिलकर पेश कियाA हिन्दी विभाग के अध्यक्ष ने स्वागत भाषण कियाA नवनियुक्त शिष्य ने नामवर की धरती  हाजिर कीA परिवार ने पूरी मंगल कामना कीA संस्कृत के पंडितों विद्वानों ने श्लोकों की छौंक से शतायु होने का मंगलगान गाया। इसके बावजूद नामवर सिंह द्वारा प्रस्तुत दो शेर का लुत्फ लीजिए&aa हमको मालूम है महफिल की हकीकत लेकिन@दिल के बहलाने को गालिब यह खयाल अच्छा है। बात इतनी पर ही नहीं रूकीA नामवर जी ने कहा कि काशी में मेरे लिए धरती नहीं है और ज़फर का यह शेर सुनाया&a दो ग़ज ज़मीं भी न मिली कूए यार में।
दो सत्रों में चले आयोजन में तीन चीजें खूब छाई रहीं। नामवर सिंह के लिए कसीदा पढ़ा जानाA रामविलास शर्मा पर हमला करना तथा महादेवी बनाम पंत। पहला प्रसंग आ चुका है। नामवर सिंह को खुश करने एवं खास जगह तक पहुंचने की होड़ में उनका इतनी बार जयकार हुआ कि आखिरी गोष्ठी आलोचना का धर्म में उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा& यदि अब एक बार भी मेरा नाम लिया गया तो मैं गोष्ठी से उठकर चला जाउंगा। दिलचस्प यह कि तब भी जयकार होता ही रहा । रामविलास शर्मा प्रकरण भी खूब चला।  प्रारंभिक गोष्ठी में चन्द्रबली सिंह ने सम्मान करते हुए कहा कि रामविलास शर्मा के प्रति नामवर ऐसी स्थिति  मत बनाएं कि उनकी जयंती पंचजन्य के कार्यालय में होने लगे। दूसरे सत्र में नामवर जी के एक उत्तराधिकारी आलोचक ने मंच से फतवा जारी कर दिया कि रामविलास शर्मा का हिन्दी आलोचना में लगभग कोई योगदान नहीं है।
मजेदार यह है कि समारोह में एक ओर रामविलास शर्मा चुभ रहे थे दूसरी ओर विचार गोष्ठी का विषय ही था&a आलोचना का धर्म। कहां धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक अवधारणा आलोचना और कहां भाजपाइयों के हाथों जख्मी शब्द- धर्म। नामवर जी ने तो इस बार एक तरह से विनय पत्रिका ही रच डाली। सम्मान सत्र में उन्होंने उपनिषद के श्लोक पढ़े। संस्कृत पंडितों ने उनके लिए दर्जन भर श्लोक गाए। नामवर सिंह ने न केवल तुलसी की चौपाइयों से पूरे समारोह को चकाचौंध बनाए रखा बल्कि तुलसी पर सुधीश पचौरी द्वारा वाक में आयोजित परिचर्चा की कड़ी निंदा की। स्थानीय भाजपाइयों को ललकारा कि तुलसी भक्त भाजपाई नहीं वे हैं। इसलिए कि तुलसी की तरह उन्होंने भी कई बार गंगा पार किया है। नामवर जी ने आखिरी इच्छा बतायी कि वे तुलसीदास पर एक आलोचना पुस्तक लिखना चाहते हैं।  उन्होंने कहा कि इन दिनों वे बार-बार तुलसी ग्रन्थावली को उलटते पढ़ते रहते हैं। दूसरी ओर तुलसी भक्त अस्सी के भाजपाइयों ने नामवर जी के अस्सी के होने की शुभकामना में अस्सी घाट पर बुद्धि शुद्धि यज्ञ कियाA धूप दीप जलाएA मंत्रोच्चार किया तथा बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना की कि ईश्वर उन्हें चिरायु बनाए। ऐसा है कबीर समर्थक नामवर का तुलसी प्यार और तुलसीपंथी रामविलास से तकरार।
अब अंत में महादेवी-पंत प्रकरण का उपेक्षित सच। नामवर सिंह ने हिन्दी में अंधभक्तों एवं कट्टर समर्थकों की एक बड़ी टीम तैयार कर ली है। इसमें लेखक कार्यकर्ता संगठनकर्ता प्राध्यापक चारों है। उनके लिए नामवर ही मानस पारायण के सातों कांड हैं। दूसरी ओर नापसंद करने वालों की भी एक बड़ी फ़ौज है। ज्यो ही नामवर जी ने पंत के साहित्य के तीन चौथाई को कूड़ा कहा वे पत्र-पत्रिकाओं में कलम की तलवार लेकर कूद पडे़। दिलचस्प है कि अब तक किसी ने नामवर जी के  जेहन में यह बात नही पहुंचायी कि जिस आचार्य रामचन्द्र शुक्ल( आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एवं मुक्तिबोध को हिन्दी आलोचना का वे प्रस्थान बिन्दु मानते हैं उन्होंने पंत के काव्य वैभव की जबर्दस्त प्रशंसा की है। नामवर जी ने छायावाद में खुद पंत की प्रशंसा की है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सोवियत संघ के विघटन  नवउदारीकरण के आगमन कम्युनिस्ट पार्टियों के कांग्रेसीकरण एवं नंदीग्रामीकरण के फलस्वरूप पंत की ऐतिहासिक अनुभूति (बकौल मुक्तिबोध से ज्यादा महाaदेवी का झिलमिल उन्हें भाने लगा है। ।
रही बात मुकदमा प्रकरण की। उनके अस्सी मुहल्ले के भाजपाई मीडियोकरों ने छपास रोग के कारण इस घटना को उड़ा लिया। वे खुश हैं कि पंत और तुलसी को थानेदारों वकीलों और जजों के कटघरे में आनंद आ रहा होगा। वे लोग ऐसा ही करते रहते हैं और कहते भी रहते हैं। कहा जाता है कि उन लोगों को अनुज काशीनाथ सिंह खुद सम्मान समारोह के लिए न्यौतने गए थे। कितना दिलचस्प है कि तुलसीदास पर नामवर जी ने कुछ कहा ही नहीं थाA न भाजपाइयों का उनपर आरोप है पर देश के मीडिया ने उन्हे एम एफ हुसैन की पंक्ति में लाने की होड़ लगाई। कहा जाता है इस रणनीति में भी काशी का ही योगदान है। कितना विडम्बनामूलक है कि एक ओर मुकदमा और दूसरी ओर चिरायु होने के लिए यज्ञ।         हाय रे नामवर का अस्सी! कोई क्यों न मर जाए इस सादगी पर ए खुदा लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार नहीं है।