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21 सितंबर, 2026

देशज दिनकर : हटो व्योम के मेघ पंथ से


🎞दिनकर सांस्कृतिक दोचित्तेपन के विरोधी रचनाकार हैं
@रामाज्ञा शशिधर


दिनकर अंग्रेजीराज के खिलाफ आंदोलन छेड़ने में द्विधाग्रस्त गांधी से पूछते हैं-'ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल बोल.' भारत की मुक्ति को लेकर गांधी सबसे कम द्विधाग्रस्त थे।
         दिनकर भी गांधी के साथ हैं लेकिन द्विधाग्रस्त हैं।यह दुविधा आज़ादी के तरीकों और परिणाम को लेकर है।आज़ादी के बाद नेहरू सभ्यता विकास को लेकर पूर्ण स्पष्ट हैं।दिनकर यहां भी द्विधाग्रस्त हैं। वे सभ्यता की रचना में अब गांधी की जरूरत ज्यादा देखते हैं।
         दिनकर का पूरा लेखन 'प्राच्य' और पश्चिम के बीच के सांस्कृतिक
संकरण और प्रतिरोध का क्रिटिक है।इसलिए उपनिवेश की कोख से जनमे दिनकर के चित्त,व्यक्तित्व और कविता
पर दुविधा और दरार का का लगाया गया आरोप विचारणीय है।लेकिन लेखक पर तारी आरोप अंशतः जायज है क्योंकि ठीक से जांच हो तो वह आलोचना  या तो उपनिवेश से जन्मी आधुनिकता की चाकर मिलेगी या फटन और दरार की बेमिसाल चिह्न श्रृंखला।
          क्यों?
           वक्त आ गया है जब औपनिवेशिक शासन और संस्कृति की पूरी यात्रा को उत्तर औपनिवेशिक पश्चिमी शोषण और संस्कृति से जोड़कर देखा जाए और दिनकर जैसे लेखक के नजरबंद रचना बॉक्स का ताला खोलकर 
उसकी शिनाख्त नए देशकाल के आलोक में किया जाए।
           

  नया अध्ययन यह बतलाता है कि 'पश्चिम' के प्रबोधन, नवजागरण,विज्ञानवाद से लैस अंग्रेजीराज खुद
अपने सिद्धांत और व्यवहार,शासन और संस्कृति,तथ्य और विचार,घटना और नैरेटिव में उभयमुखी, दुविधाग्रस्त,दोचित्ता और दोगला था।वह तब से अबतक
कभी भी सिद्धान्त और व्यवहार,करनी और कथनी में एक रहा ही नहीं।
             इसलिए उसके उपनिवेशित समुदाय में संक्रमण,संकरण और प्रतिरोध के रूप में ये तत्व शामिल हुए हैं।
          राजनीति,समाज और संस्कृति के क्षेत्र में यह दुविधा समझौते,स्वीकृति और प्रतिरोध की शक्ल में जबरदस्त ढंग से उपस्थित है।
         जाहिर है कि उपनिवेश के दौर में रचे गए साहित्य में यह दरार अनेक स्तरों पर दिखाई देती है।यह केवल दिनकर की कविता में ही नहीं बल्कि भारतेंदु युग से आज तक के  हिंदी साहित्य में बारीकी से ढूंढी जा सकती है।
         दिनकर के साहित्य के अध्ययन से जाहिर होता है कि रविंद्र और गांधी के गहरे प्रभाव में दिनकर ने
अपनी रचनाशीलता में जैसा पश्चिम के विरुद्ध बहुआयामी क्रिटिक तैयार किया है,यह गहरी तैयारी औपनिवेशिक काल के किसी और हिंदी लेखक में दिखाई नहीं पड़ती है।
       दिनकर की कविता की ही बात करें तो यह औपनिवेशिक प्रभाव में टूटे हुए शीशे जैसे चित्त में देखी गई छवियों के द्वंद्व को व्यक्त करने वाली कविताएं हैं।।       प्रणभंग से हारे को हरिनाम तक दिनकर भारतीय मानस की फटन के दर्द को देशज आधुनिकता के साथ सृजन करने वाले कवि हैं।
            किशोर और युवा दिनकर की कविताएं भीषण रूप से विभाजित चित्तभूमि की पहचान देशज भारतीयता और पश्चिमी सभ्यतागत आक्रमण के टक्कर के रूप में करती हैं और सतत भारतीय जीवन और दार्शनिकता का पक्ष लेती हैं। 

           भारतीय मन की  प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की धारणा के विरुद्ध  आधुनिक औपनिवेशिक विज्ञानवाद की कड़ी आलोचना दिनकर की
काव्य दार्शनिकता का एक जरूरी आधार है।क्षीण उम्मीद कि लोहे के पेड़ हरे होंगे।
           दिनकर दुविधा के रचनाकार नहीं बल्कि औपनिवेशिक द्वैध से भरतीय संस्कृति और मनुष्य को 
उबारने के क्रम में तरह तरह के समाधान खोजने वाले कवि हैं।यह समाधान कभी साम्राज्यवाद और शुद्धतामूलक राष्ट्रवाद के विकल्प के तौर पर समावेशी राष्ट्रवाद बनकर आता है,कभी विश्व नागरिकता के यूटोपिया निर्माण के सिलसिले में राष्ट्र का विसर्जन करते हुए दिखता है।
        दिनकर को स्थूल अर्थों में आज राष्ट्रकवि
कहना उनके साहित्य ढांचे और सोच पर संकीर्णतामूलक 
प्रहार है।
         राष्ट्रवाद के चौखटे तोड़कर वे वैशाली,मगध ,मुगल काल की सामासिक यात्रा ही नहीं करते बल्कि गांधी के हत्यारे विचार को स्थायी तौर कटघरे में लाते हैं।
          यह और बात है कि सत्ता और लोक में
आज दिनकर के गांधी की गरिमा और महिमा पर गोडसे
की काली बदली मंडरा रही है।
          रश्मिरथी सिर्फ हाशिया विमर्श का ही काव्य नहीं है, भारतीय जीवन में शुद्धतावाद पर जबरदस्त प्रहार है।

            दिनकर के साहित्य का नव विवेचन आज ग्राम के इंस्टाग्राम में घुस जाने के बाद का जरूरी सबक होगा।दिनकर 'सभ्यता समीक्षा' के लेखक हैं जहां विनाश और विकास का,आधुनिकता और बर्बरता का, मनुष्य और मशीन का,इतिहास और मिथक का,तर्क और उन्माद का फर्क आसिन के पारदर्शी जल में दिखे चेहरे की तरह देखा जा सकता है।
             दिनकर को जो लोग अपने स्वार्थ और सुविधा के फ्रेम में फिट करने की जुगत में हैं,वास्तव
में वे औपनिवेशिक-उत्तर औपनिवेशिक दोचित्तेपन की उपज के तबके हैं जिनके लिए विरासत मकान में इस्तेमाल होनेवाली रेत है और वर्तमान कंक्रीट के जंगल को सौंप दिया गया खेत है।
              द्विधाग्रस्त उत्तर आधुनिक मन के भविष्य के आंगन में सिर्फ लोहे के पेड़ होंगे जो न फूल देंगे न फल।छाया तो दूर की कौड़ी है।


16 दिसंबर, 2025

50 वर्ष बाद शोले फ़िल्म : चंबल की किसान कथा


राश की कलम से
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                   ||थिएटर से लौटकर||


    कला समीक्षा में भोथड़े दिमाग कम नहीं। उसकी एक मिसाल फ़िल्म शोले को लेकर 50 वर्षों से होती रही किसिम किसिम की कुचर्चा है। यह सही है कि वह एक मसाला पॉपुलरिटी से क्राफ्टेड मूवी है लेकिन शोले को मारधार, दोस्ती, रोमांस,कॉमेडी,ट्रेजडी, गीत संगीत,संपादन,निर्देशन,संवाद,पटकथा तक सीमित रखना भारतीय सिनेमा की उस जमीनी दृष्टि को खारिज करना है जो यहां के मूल सामाजिक राजनीतिक प्रश्न रहे हैं।
           मैं जब कल बनारस के आईपी थियेटर में 4k dolby saund के साथ अपनी गोल्डन जुबली मना रही फिल्म शोले के फाइनल अनकट को शोले दर्शन की यात्रा में 11वीं बार देख रहा था तब मुझे पहली बार उसकी
दृष्टिसंपन्न पटकथा पर ध्यान गया जिसकी मूल समस्या चंबल इलाके के रामगढ़ गांव की किसान समस्या है। भारतीय हिंदी सिनेमा ने किसान प्रश्न को आरम्भ से मुख्य या गौण रूप में किसी न किसी तरह से जरूर उठाया है।मदर इंडिया से पिपली लाइव तक किसान
प्रश्न के अनेक सूत्र विन्यस्त दिखते हैं।
       शोले की पटकथा के केंद्र में डाकू गिरोह के सरदार गब्बर सिंह द्वारा रामगढ़ गांव के किसानों से अनाज वसूली है। ठाकुर बलदेव सिंह बड़े किसान का
पुलिस पुत्र है जबकि छोटे बड़े किसान पात्रों से यह गांव जीवंत बना रहता है। दो निम्न मध्यवर्गीय शहरी शातिर चोरों धर्मेंद्र और अमिताभ को किसानों का नायक बनाए जाने की कहानी रामगढ़ के किसानों की
रक्षा की कहानी है।
        सलीम जावेद की प्रगतिशील किसान मजूर और कौमी एकता की कलादृष्टि का कमाल है कि पटकथा
के संवादों में सीधे खेती से लगाव और ग्राम प्रेम के इंकलाबी डायलॉग रचे गए हैं। संजीव कुमार जिस तरह से कहते हैं कि किसान अपने हंसिए की दरांतियों से लोगों का जीवन पालते हैं या अब इस गांव से एक मुट्ठी अनाज
भी डाकुओं को नहीं मिलेगा तब यह उस दौर के चंबल की त्रासदी का ही नहीं बल्कि उत्तर भारतीय किसान के संघर्ष का प्रतिबिंब है। जय और वीरू गांव में खेती
बारी करने का स्वप्न देखने लगते हैं। एके हंगल का अपने कई बेटों को किसानों और गांव के लिए शहीद
करने की इच्छा किसान एकता की बुनियाद बनती है।प्रेम और पर्व किसानी भाषा,टोन, लय से विन्यस्त हैं।
              मुझे लगता है कि सलीम जावेद की पटकथा में  यह भारतीय किसानों के गल्प और हास्य व्यंग्यशिल्प का भी खूबसूरत इस्तेमाल है जिसमें कथा कथन से पटकथा में बार बार हुक पाइंट निर्मित होता है और त्रासदी व हिंसा की यात्रा को सहज बनाए रखने
का प्रयास जारी रहता है।
        अमजद खान द्वारा गब्बर की भूमिका भारतीय
सिनेमा के खलनायकत्व की अदा की ऊंचाई है। मैं 
एके हंगल से इप्टा के बिहार सम्मेलन में मिला था। इप्टा स्वर्ण जयंती के झंडा गीत के लिए  मेरा गीत 'वे सारे हमारी कतारों में शामिल ' के कोरस गायन के वक्त एके हंगल और ओमपुरी जैसे वैकल्पिक सिने कलाकार शामिल हुए। तब शोले का डायलॉग बोलकर एके हंगल इप्टा का महत्व बताते रहे।मैं उनसे धीरे धीरे प्रभावित हुआ। इस फ़िल्म में आए अमजद खान उर्फ  गब्बर के डायलॉग को क्लास 8 से बीए तक जन्मभूमि सिमरिया के अपने
टोल में घूम घूमकर बोलता था।तब मैं गब्बर ही हो
गया था।मेरा गांव किसानों और रंगबाजों की ज़ंग से
लाल बना रहता था।
        अब भारतीय सिनेमा ने ग्रैंड बनाना लगभग बंद
कर दिया है तब इस फ़िल्म को हर पीढ़ी द्वारा देखना
  चाहिए। संस्कृति से फ़िल्म पैदा होती है ,फिर वह फ़िल्म एक सामाजिक संस्कृति बना सकती है।शोले
ऐसी ही फ़िल्म है।