🎞दिनकर सांस्कृतिक दोचित्तेपन के विरोधी रचनाकार हैं
@रामाज्ञा शशिधर
दिनकर अंग्रेजीराज के खिलाफ आंदोलन छेड़ने में द्विधाग्रस्त गांधी से पूछते हैं-'ओ द्विधाग्रस्त शार्दूल बोल.' भारत की मुक्ति को लेकर गांधी सबसे कम द्विधाग्रस्त थे।
दिनकर भी गांधी के साथ हैं लेकिन द्विधाग्रस्त हैं।यह दुविधा आज़ादी के तरीकों और परिणाम को लेकर है।आज़ादी के बाद नेहरू सभ्यता विकास को लेकर पूर्ण स्पष्ट हैं।दिनकर यहां भी द्विधाग्रस्त हैं। वे सभ्यता की रचना में अब गांधी की जरूरत ज्यादा देखते हैं।
दिनकर का पूरा लेखन 'प्राच्य' और पश्चिम के बीच के सांस्कृतिक
संकरण और प्रतिरोध का क्रिटिक है।इसलिए उपनिवेश की कोख से जनमे दिनकर के चित्त,व्यक्तित्व और कविता
पर दुविधा और दरार का का लगाया गया आरोप विचारणीय है।लेकिन लेखक पर तारी आरोप अंशतः जायज है क्योंकि ठीक से जांच हो तो वह आलोचना या तो उपनिवेश से जन्मी आधुनिकता की चाकर मिलेगी या फटन और दरार की बेमिसाल चिह्न श्रृंखला।
क्यों?
वक्त आ गया है जब औपनिवेशिक शासन और संस्कृति की पूरी यात्रा को उत्तर औपनिवेशिक पश्चिमी शोषण और संस्कृति से जोड़कर देखा जाए और दिनकर जैसे लेखक के नजरबंद रचना बॉक्स का ताला खोलकर
उसकी शिनाख्त नए देशकाल के आलोक में किया जाए।
नया अध्ययन यह बतलाता है कि 'पश्चिम' के प्रबोधन, नवजागरण,विज्ञानवाद से लैस अंग्रेजीराज खुद
अपने सिद्धांत और व्यवहार,शासन और संस्कृति,तथ्य और विचार,घटना और नैरेटिव में उभयमुखी, दुविधाग्रस्त,दोचित्ता और दोगला था।वह तब से अबतक
कभी भी सिद्धान्त और व्यवहार,करनी और कथनी में एक रहा ही नहीं।
इसलिए उसके उपनिवेशित समुदाय में संक्रमण,संकरण और प्रतिरोध के रूप में ये तत्व शामिल हुए हैं।
राजनीति,समाज और संस्कृति के क्षेत्र में यह दुविधा समझौते,स्वीकृति और प्रतिरोध की शक्ल में जबरदस्त ढंग से उपस्थित है।
जाहिर है कि उपनिवेश के दौर में रचे गए साहित्य में यह दरार अनेक स्तरों पर दिखाई देती है।यह केवल दिनकर की कविता में ही नहीं बल्कि भारतेंदु युग से आज तक के हिंदी साहित्य में बारीकी से ढूंढी जा सकती है।
दिनकर के साहित्य के अध्ययन से जाहिर होता है कि रविंद्र और गांधी के गहरे प्रभाव में दिनकर ने
अपनी रचनाशीलता में जैसा पश्चिम के विरुद्ध बहुआयामी क्रिटिक तैयार किया है,यह गहरी तैयारी औपनिवेशिक काल के किसी और हिंदी लेखक में दिखाई नहीं पड़ती है।
दिनकर की कविता की ही बात करें तो यह औपनिवेशिक प्रभाव में टूटे हुए शीशे जैसे चित्त में देखी गई छवियों के द्वंद्व को व्यक्त करने वाली कविताएं हैं।। प्रणभंग से हारे को हरिनाम तक दिनकर भारतीय मानस की फटन के दर्द को देशज आधुनिकता के साथ सृजन करने वाले कवि हैं।
किशोर और युवा दिनकर की कविताएं भीषण रूप से विभाजित चित्तभूमि की पहचान देशज भारतीयता और पश्चिमी सभ्यतागत आक्रमण के टक्कर के रूप में करती हैं और सतत भारतीय जीवन और दार्शनिकता का पक्ष लेती हैं।
भारतीय मन की प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की धारणा के विरुद्ध आधुनिक औपनिवेशिक विज्ञानवाद की कड़ी आलोचना दिनकर की
काव्य दार्शनिकता का एक जरूरी आधार है।क्षीण उम्मीद कि लोहे के पेड़ हरे होंगे।
दिनकर दुविधा के रचनाकार नहीं बल्कि औपनिवेशिक द्वैध से भरतीय संस्कृति और मनुष्य को
उबारने के क्रम में तरह तरह के समाधान खोजने वाले कवि हैं।यह समाधान कभी साम्राज्यवाद और शुद्धतामूलक राष्ट्रवाद के विकल्प के तौर पर समावेशी राष्ट्रवाद बनकर आता है,कभी विश्व नागरिकता के यूटोपिया निर्माण के सिलसिले में राष्ट्र का विसर्जन करते हुए दिखता है।
दिनकर को स्थूल अर्थों में आज राष्ट्रकवि
कहना उनके साहित्य ढांचे और सोच पर संकीर्णतामूलक
प्रहार है।
राष्ट्रवाद के चौखटे तोड़कर वे वैशाली,मगध ,मुगल काल की सामासिक यात्रा ही नहीं करते बल्कि गांधी के हत्यारे विचार को स्थायी तौर कटघरे में लाते हैं।
यह और बात है कि सत्ता और लोक में
आज दिनकर के गांधी की गरिमा और महिमा पर गोडसे
की काली बदली मंडरा रही है।
रश्मिरथी सिर्फ हाशिया विमर्श का ही काव्य नहीं है, भारतीय जीवन में शुद्धतावाद पर जबरदस्त प्रहार है।
दिनकर के साहित्य का नव विवेचन आज ग्राम के इंस्टाग्राम में घुस जाने के बाद का जरूरी सबक होगा।दिनकर 'सभ्यता समीक्षा' के लेखक हैं जहां विनाश और विकास का,आधुनिकता और बर्बरता का, मनुष्य और मशीन का,इतिहास और मिथक का,तर्क और उन्माद का फर्क आसिन के पारदर्शी जल में दिखे चेहरे की तरह देखा जा सकता है।
दिनकर को जो लोग अपने स्वार्थ और सुविधा के फ्रेम में फिट करने की जुगत में हैं,वास्तव
में वे औपनिवेशिक-उत्तर औपनिवेशिक दोचित्तेपन की उपज के तबके हैं जिनके लिए विरासत मकान में इस्तेमाल होनेवाली रेत है और वर्तमान कंक्रीट के जंगल को सौंप दिया गया खेत है।
द्विधाग्रस्त उत्तर आधुनिक मन के भविष्य के आंगन में सिर्फ लोहे के पेड़ होंगे जो न फूल देंगे न फल।छाया तो दूर की कौड़ी है।