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12 अगस्त, 2014

पहचानिए:प्रेमचंद और भ्रष्टचंद

गांव की डायरी
प्रेमचंद और  भ्रष्टचंद


रामाज्ञा राय शशिधर


हल की मूठ पकड़े होरियों और फावड़े चलाते हल्कुओं को प्रेमचंद और भ्रष्टचंद में फर्क की गहरी समझ है। वे प्रेेमचंद पर हमले को आजादी पर हमला समझते है। यही कारण है कि प्रेमचंद के पात्र और पाठक निर्मला को अपमानित करने वाले सी¬.बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला हजारों की भीड़ में जला सकते हैं और मृदुला मुर्दाबाद/निर्मला जिंदाबाद’ के नारे लगा कर आईना दिखा सकते है। प्रेमचंद के ग्रामीण पात्रांे और पाठकों ने भाजपा नेता मृदुला सिन्हा के गृहराज्य बिहार में 2,700 सेकेंड तक राष्ट्रीय राजमार्ग-31 का चक्कर लगाकर सी.बी. एस. ई अध्यक्ष के पुतले को नारों, जनगीतों, पर्चो, भाषणों तख्तियों के बीच फूंक दिया तथा गगन भेदी स्वर में दुहराते रहे कि ‘हमें प्रेमचंद चाहिए भ्रष्टचंद नहीं। गांव के लोगें में ‘दो बैलों की कथा’ वाले प्रेमचंद कितने रचे बसे हैं यह इस बात से साबित होता है कि पांच किलोमीटर की जुलूस-यात्रा में होरी, हीरा, झूरी, हल्कू, गोबर, शंकर, घीसू, हामिद, वंशीधर, निर्मला, धनिया जैसे अनगिनत पात्रों के हाथों में तख्तियां और होठों पर नारे लहरा रहे थे-प्रेमचंद पर अत्याचार/नहीं सहेगा गांव-ज्वार, प्रेमचंद पर हमला यानी स्वतंत्रता पर हमला, हम हैं छात्र मजदूर, किसान/ हम बदलेंगे हिंदुस्तान, प्रेमचंद का यह अपमान। नहीं सहेगा हिंदुस्तान, सीबीएसई मुर्दाबाद, सांस्कृतिक क्रांति जिंदाबाद! यह सब दिल्ली के आईटीओ पुल पर में मिनरल वाटर पीकर पचास वर्षो से’ अबाध क्रांतिकारी स्पीच’ देने वाले बौद्धिकों द्वारा या जनता और जनकला की रोज हजार कसमें खाने वाले राष्ट्रीय सांस्कृतिक संगठनों द्वारा नहीं बल्कि बेगूसराय जनपद के ठेठ गांव सिमरिया की छोटी-सी संस्था’ ‘प्रतिबिंब‘ के बैनर तले लगभग महीने भर के जन अभियान के बाद संभव हो पाया था तथा हिंदी पट्टी की संभवतः ऐसी पहली कोशिश थी। यह जानना दिलचस्प होगा कि गोदान, मैलाआंचल और रागदरबारी के बाद के गांव द्वारा यह सब हुआ कैस। जब गांव के कान मे यह हवा पहुंची कि प्रेमचंद के साथ केंद्र सरकार ने अन्याय किया है तो लोग थोड़ा हिले डुले, फिर सुस्त हुए। प्रतिबिंब के सांस्कृतिकर्मियों ने एक गोष्ठी की ‘प्रेमचद पर हमलाः दुश्मनों की खोज।’ इसके साथ ही जन आंदोलन की रूपरेखा बनाते हुए किसानों, मजदूरों, छात्रों के बीच एक सरल पर्चा जारी किया गया जिसमें लिखा कि ‘आज प्रेमचंद के पन्ने ही हमारे चौपाल हैं। प्रेमचंद के लिए लड़ने का मलतब है होरी जैसे उन करोड़ों किसानों के लिए लडना जिनकी दुश्मन सामंती ब्राहमणवादी व्यवस्था, सरकार और डंकन-अमरीका है। क्या अब प्रेमचंद का कद इस देश में मंत्री पत्नी जितना हुआ।’ पंचों में सांस्कृतिकर्मियों ने पांच कसमें खाईः ‘वर्ष 2003 को हम प्रेमचंद वर्ष के रूप में मनाएगें। सी.बी.एस. ई को निर्मला को पाठयक्रम में ससम्मान लगवाने की कोशिश करेंगे। हम सांस्कृतिकर्मी मानसरोवर की 300 कहानियों का एक साल में पाठ करेंगे। गांव गांव जाकर प्रेमचंद की कहानियों का सार्वजनिक पाठ करेगें। इन कामों की शुरूआत 30 जून, 2003 को राष्ट्रकवि‘ दिनकर की जन्मभूमि से सी. बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला दहन कर यथावत शुरू कर दी गयी है। पुतला दहन कार्यक्रम और जुलूस यात्रा के लिए जब डेढ. दर्जन किसानों के बेटों ने गांव-गांव घूमना शुरु किया तो सामान्य जनता बुद्धिजीवियों के बीच सबसे बड़ी दीवार भाषा की आई। हमने कहा कि प्रेमचंद पर हमला सी.बी.एस.ई ने किया। उन्होंने समझा सी.बी.एस. ई यानी सी.बी. आई। ’क’ ने कहाः हां भाई, सी. बी. आई भी भ्रष्ट हो चुकी है। ’ख’ ने पूछा सी.बी.एस. ई किस जानवर का नाम है ? पर सबने माना, अच्छा, बौआ! प््रेमचंद नामक लेखक पर हमला अन्याय है, पर हुआ कैसे ? और एक नई भाषा की खोज हुई। ‘आपके बाल-बच्चे स्कूलों में जो किताबें पढ़ते हैं उन्हें भारत सरकार का परीक्षा लेनेवाला विभाग बच्चों की जरूरत के मुताबिक बनाता है। पूरे देश की 12 वीं कक्षा से उस विभाग यानी सी.बी. एस.ई केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने महान कहानीकार प्रेमचंद की किताब हटाकर मुजफरपूर जिले की भाजपा नेता मृदुला सिन्हा की किताब लगाई है। देश के लेखकों द्वारा विरोध करने पर अब आपके बच्चों को दोनों में एक किताब पढ़नी होगंी। जरा सोचिए ! प्रेमचंद की जीवनी और कहानी की जगह आज की नेता की जीवनी और कहानी पढ़े ंतो आपके बच्चे क्या बनेंगे’। बस क्या था। गांव-गांव आग सुलग उठी। गले में नारों लिखी तख्तियां टांगे जिधर से अभियानी गुजरते छात्रांे, मजदूरों, किसानों, महिलाओं के चेहरे पर आक्रोश, असंतोष, बेचैनी, असुरक्षा। सीमाएं तोड़ देते एक स्वर से आवाज गोलबंद होती, प्रेमचंद पर अत्याचार/नहीं सहेगा गांव जवार। क्या कोई आंदोलन बिना विरोध-अंतर्विरोध के ही चरम पर पहुंचता है् ? नहीं! ‘च’ बाबू की मान्यता थी कि कोई चुनावी राजनीति है।‘छ’ साहब ने कहा क्या फर्क पड़ता है कि प्रेमचंद जगह नए लोग पढ़े जाएं। ‘ज’ ने कहा क्या डा. प्रेमचंद पर हमला हुआ ?‘ट’ का स्वर था-बड़ जुल्मी छै इ सरकार । मार-काट अ महंगाई एकर प्रान छीकै। ‘ठ’ का साफ कहना था-जब लालू की जीवनी पढ़ाई जा रही थी तब आप कहां थे ? ‘त’ ने कई स्कूलों को भड़काया-यह लाल झंडा वाला है। ’द’ ने दांत गड़ाया -भैया यह सब नाम कमाने का धंधा है। ‘प’ ने पटाखा छोड़ा-सिमरिया की आवाज आज तक दिल्ली नहीं पहुंची तो अब क्या पहुंचेगी ? ‘म’ ने मक्खन मारा-हां, यार! गंाव में चिल्लाने से सरकार क्या किताब बदल देगी ? यह सब बैठारी की दिहाड़ी हैं। दूसरी ओर सकारात्मक उफान भी था। ‘र’ किसान ने मूंछ हिलाई- एं, ऐसन बात! बाबू इ दिनकर की धरती है। एक फूंक मारों तो अंगंरेज को उखाड़ा। दूसरा फूंक मारा, इ सरकार को उखाड़ों।‘ल’ ने गीत गाया -मानव जब जोर लगाता है। पत्थर पानी बन जाता है। ‘स’ ने हंुकार- सच कहता हूं। ऐसा कुछ भी होता तो मेरा शरीर थरथराने लगता है। मुझे लगता है कि देश के लिए कुछ करना चाहिए। यह सिमरिया गांव का 32 वर्षीय किसान तरूण कुमार है। कसहा, बरियाही, अमरपुर, रुपनगर, गंगाप्रसाद, बारो, गढ़हरा, मल्हीपुर,बडहिया, चंदन टोला, चकिया, बीहट सहित अनेक गांवों मंे लंबे समय तक भूखे-प्यासे, धूप-बरसात से लड़ते किशोर साथी दौड़ते रहे। मुहाने पर पहुंची क्रांति को नेतृत्व नहीं जनता अंजाम देती है। 30 जून के 10 बजे जब पुतला दिनकर द्वार पर जुलूस यात्रा के साथ पहंुचा तो दूसरे अनेक गांवों की जनता हजारों की संख्या में जुटी थी। तय था कि राष्ट्रीय राजमार्ग  की बगल में  ‘सदगति’ का पाठ, भाषण एवं जनगीतों के बाद पुतला जलाया जाएगा। जनता का परावार उमड़ा और सैकड़ों लोगों ने नेतृत्व की उपेक्षा कर राष्ट्रीय राजमार्ग को जामकर पुतला स्थानांतरित कर दिया। फिर सारी गतिविधियां 2,700 सेकेंड तक वहीं चलती रहीं। अगले दिन हिंदुस्तान ने खबर लगाई  निर्मला को लेकर जलाया गया सी.बी.एस. ई का पुतला। दैैकिल जागरण का शीर्षक था सी.बी.एस. ई के अध्यक्ष का पुतला फूंका। और आज ने लिखा ‘सी.बी. एस. ई के अध्यक्ष का पुतला दहन’। अनेक क्षेत्रीय पत्रों में भी खबरें आती रहीं। प्रतिदिन संस्कृतिकर्मी गांव-गांव जाकर प्रेमचंद की कहानियों का पाठ करते है। प्रेमचंद के पात्रों एवं पाठकों से इस पर राय ली जाती है। अब तक ‘सदगति’ ‘ठाकुर का कुआं’ ’सवा सेर गंेंहूं’ का पाठ हो चुका है। साथ ही जनपद के कवि दिनकर की क्रांतिकारी कविताओं का पाठ भी जारी है। लोग चौपाल में घेरकर अपने प्यारे-न्यारे कथाकार की कहानी चाव से सुनते हैं। हजार से अधिक हस्ताक्षर जमा हो चुके है। जानिए कि निर्मला के समर्थन एवं मृदुला के विरोध में अनेक ग्रामीण भाजपा कार्यकर्ताओं ने सहर्ष हस्ताक्षर किए क्योंकि प्रेमचंद उनकी आत्मा में रचे-बसे हैं।  ‘स’ को पता भीं है कि दिल्ली के राजेंद्र सभागार में आग और धुआं पर्चे के रूप में बंट चुका है। दिल्ली की दीवारों पर चिपक चुका है। उसे यह भी पता नहीं प्रेमचंद राष्ट्रीय संगोष्ठी में शेखर जोशी जैसे कथाकार ने चार मिनट तक उनके इस कार्य की सराहना की है।‘स’ नामक ग्रामीण किसान को कितना दुख होगा कि दिल्ली के बुद्धिजीवी जनता के ऐसे आंदोलन को ’स्पीच’ सुनने के दरम्यान चूतड़ों के नीचे दबा देने के कितने बड़े उस्ताद हैं। एक ही उम्मीद है कि होरी और हामिद एक

18 जुलाई, 2014

रूपनगर एक गाँव का नाम है!



 
.न रूप है न रूपया,न नगरीय सुविधा है न बोध.न जाने क्यों इस ठेठ देहात का नाम रूपनगर हुआ.इतिहास के नाम पर अंग्रेजों द्वारा एक दौर में लूट और यात्रा के लिए बनाया गया रेलवे टीसन था.आज़ादी क्या मिली, रेल ने भी रास्ता बदलकर मुंह मोड़ लिया.फिर भी यह गुणी गाँव रूपनगर ही कहलाता रहा.
गाँव का ह्रदय क्षेत्र दुर्गाथान.दिन के तीन बजे. यहाँ हर वार इतवार होता है.चाय के लिए चूल्हे में कोयला चढ़ गया है.फूस की छानी धुएं और आग से भर गई है.किसान और निठल्ले चर्चा को केतली,स्पेन और छन्ने पर खौलाना शुरू कर चुके हैं. बहस में हर चीज ठहरी हुई है.तभी बाल और युवा मंडल से लदी फटफट मैदान में पहुँचती है.
गाँव की संस्कृति में बदलाव और हस्तक्षेप शुरू है...बैनर टंग गया-प्रतिबिम्ब संवाद श्रृंखला .सिमरिया,बेगूसराय,बिहार-851126.बिस्मिलाह खान के बनारस से आई डफली बोलने को बेताब है.बाल कलाकारों के होठ –हम होंगे कामयाब-गीत से गाँव की जमी हुई काई को पोछ देना चाहते हैं...धीरे धीरे अच्छी खासी भीड़ जुट गई है..तास के पत्ते उर्फ़ साहब,जोकर,गुलाम,इक्के,नहले,दहले शर्मा उठे हैं.सत्तर पार के कामरेड गंगाधर पासवान का कमजोर और बीमार शरीर लगातार पसीना बहाकर हर जरूरी चीज को जुटा रहा है और सोलह से छब्बीस की जवानी मोबाइल पर मस्त है.

23 जून, 2014

तानाशाही के दौर में जादुई यथार्थवाद पर बहस जरूरी है : पंकज बिष्ट



 मई के मौसम में जब महिला कालेज रोड का आसमान  गुलमोहर के फूलों से सुर्ख हो गया था और ज़मीन पर सिर्फ भगवा रंगों की बहार थी तब पंकज बिष्ट बीएचयू के हिंदी विभाग में आए. जेनुइन कथाकार,प्रतिबद्ध पत्रकार और सरोकारी एक्टिविस्ट के रूप में वे पहली बार २००६ में तब आए थे जब प्रेमचंद के पात्र सीरियल आत्महत्याएँ कर रहे थे.उन्होंने एक लाख की गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार की राशि सारनाथ जाकर खुद वितरित की थी.दूसरी बार बिष्ट हिंदुत्व के उन्माद में डूबे कबीर के शहर में कार्पोरेट फासीवाद पर बोलने आए थे. कला संकाय के एनी बेसेंट हाल में हिंदी के छात्र, शिक्षकों और नगर के बौद्धिकों के बीच वे एक ऐसे कथा फॉर्म और शैली पर विचार करने आए थे जो तानाशाही के दौर का कला रूप है. हिंदी विभाग के लिए संभवतः यह पहला मौका था जब जादुई यथार्थवाद टर्म अपनी औपचारिक बहस के माध्यम से प्रवेश पा रहा था. आलोक कुमार गिरि द्वारा संगृहीत,लिपिबद्ध और सम्पादित यह व्याख्यान मार्क्वेज़ के बहाने हिंदी की बौद्धिक खिड़की में नया झोंका भरता है.-माडरेटर


30 मार्च, 2014

क्या बनारस में जसम,जलेस और प्रलेस के लेखक मोदी मार्ग को आसान कर रहे हैं?

 पाठक मित्रो! बुद्ध,कबीर,प्रेमचंद और बिस्मिल्लाह खान का बनारस इन दिनों सियासी जंग का उग्र मैदान हो गया है.जिन घाटों और गलियों में लोग शांति और मस्ती की खोज करते थे वहाँ बाहरी और इलाकाई युवा हिंदू वाहिनी,राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ,विश्व हिंदू परिषद्,बजरंग दल,शिवसेना और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने लिखित-वाचिक अफवाह और झूठ के साथ डेरा डाल दिया है. उधर गुजरात और दिल्ली से बड़ी संख्या में मोदीमार्गी टीम आ रही है जो अनेक रूपों में समाज में घुसपैठ कर भ्रम फैला रही है.'हर हर मोदी घर मोदी ' और 'या मोदी सर्वभूतेषू राष्ट्ररूपेण संस्थिताः' के आक्रामक संदेशों से काशी के बहुमिश्रित जन मन और जनपक्षीय नागरिकों के भीतर खौफ का बीज डाला जा रहा है.ऐसे में काशीनाथ सिंह के १७ मार्च को बीबीसी में छपे मोदी समर्थक बयान ने उस सवाल को और गहरा दिया जो  समयांतर,मार्च में प्रकाशित हुआ है.जन संस्कृति मंच,जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ का शानदार सांस्कृतिक इतिहास है लेकिन फासीवाद के उभरते इस कठिन दौर में उनकी चुप्पी भी उतनी ही चिंतनीय है.मेरे जैसे सरोकारी और निःसहाय सोचने विचारने वाले नागरिक के पास आपसे अपील करने के अतिरिक्त क्या है.क्या यह देश के बुद्धिजीवियों,लेखकों,अदीबों,कलाकारों,संस्कृतिकर्मियों की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है कि बनारस और भारत की सेकुलर-लोकतांत्रिक रूह की हिफाजत करें.आपसे उम्मीद है. मोदी आंधी से पूर्व समयांतर मार्च में छपी यह रिपोर्ट हिटलर के समर्थक पुरोहित,बाद में फासिज्म के विरोधी,जेल बंदी मार्टिन नीमोलर की आत्मस्वीकृति के साथ पोस्ट कर रहा हूँ ताकि इतिहास हमारी भूमिका का हिसाब रख सके.-माडरेटर 


पहले वो आए
साम्यवादियों के लिए
और मैं चुप रहा 
क्योंकि
मैं साम्यवादी नहीं था 

फिर वो आए
मजदूर संघियों के लिए
और मैं चुप रहा 
क्योंकि
मैं मजदूर संघी नहीं था 

फिर वो
यहूदियों के लिए आए
और मैं चुप रहा 
क्योंकि
मैं यहूदी नहीं था 

फिर
वो आए मेरे लिए
और तब तक
बोलने के लिए
 कोई बचा ही नहीं था

‘काशी में उत्सव और श्मशान की कोई विचारधारा नहीं होती है’.काशी के वाम लेखक संगठनों को देखकर तो ऐसा लगता है कि साहित्य भी इन दिनों विचारधारा से मुक्त और अवसरधारा से युक्त खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया है. यूपी में मुलायम और मोदी के दम दिखाने के पहले ही वाम लेखक संगठनों ने हिंदुत्व के गर्भगृह काशी में ‘नमो नमो’ की अपनी आहुति डालनी आरंभ कर दी है.
इसका एक शानदार उदाहरण पिछले दिनों विद्याश्री न्यास के मंच से धर्मसंघ शिक्षा मंडल, वाराणसी में घटित हुआ जहाँ धर्म संघ की लारी के नीचे वाम लेखक संघ की नैनो स्वेच्छया घुस गई.
जसम,जलेस और प्रलेस के अधिकारियों और सदस्यों ने हेडगेवार,गोविंदाचार्य,उमा भारती की कर्मभूमि,मुरली मनोहर जोशी की वोटभूमि,योगी आदित्यनाथ की दंगाभूमि और मोदी की भविष्यभूमि की एक मजबूत सांस्कृतिक कड़ी भाजपा सांसद स्व. विद्यानिवास मिश्र की स्मृति में उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में एक दशक से लगातार गतिशील वार्षिक आयोजन यात्रा के इस बार के तीन दिवसीय राष्ट्रीय लेखक शिविर(12-14 जनवरी) में इतना बढ़ चढकर प्रदर्शन किया कि साहित्यिक सामाजिक रंगरेजों को भी लाल और भगवा रंग में फर्क करना मुशिकल हो गया.इस आयोजन में प्रलेस के वरिष्ठ लेखक काशीनाथ सिंह,जलेस के स्थानीय अध्यक्ष प्रो.रामसुधार सिंह तथा घनघोर सरोकारी संगठन जसम के एकल संयोजक प्रो.बलराज पांडेय के साथ आधा दर्जन सदस्यों ने अध्यक्षता,संचालन,स्वागत,धन्यवाद और वक्तव्य की ऐतिहासिक भूमिका निभाई.
कहने को तो इस बार का विषय ‘नारी चेतना और हिंदी साहित्य’ था पर चेतना और
रणनीति के स्तर पर हर वर्ष की भाँति इस वर्ष का उद्द्येश्य भी दक्षिणपंथी चुम्बक की ओर साहित्यिक अकादेमिक लौह अयस्क को आकर्षित करना और अपना पंथ मजबूत करना था.सबसे पहले विद्यानिवास मिश्र का स्थानीय दैनिक हिन्दुस्तान में छपा नारी संबंधी अभिलेख-कथन देखिये-“भारतीय नारी नरी नहीं,नारी है.भारतीय लोक विश्वास है कि जिसके कन्या नहीं होती है,वह दूसरे का कन्यादान करके तरता है.कन्या दो कुलों को तारती है और पुत्र केवल एक कुल को”.नरी,नारी,कुल और कन्यादान के पितृबोध के बाद आइए अब इस संगोष्ठी में शामिल होने से ज्यादा आगामी चुनाव प्रचार के लिए आई भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय प्रभारी
मृदुला सिन्हा का गुलाबबाग के काशीखंड भाजपा कार्यालय में भाजपाई महिलाओं और  प्रेस को संबोधित वक्तव्य पढ़िए-सिर्फ नमो नमो से काम नहीं चलेगा.सभी महिला कार्यकर्ताओं को व्यापक जन संपर्क के लिए घरों से निकलना होगा,लोगों को जोड़ना पड़ेगा ताकि नरेंद्र मोदी और भाजपा के पक्ष में चल रही हवा को वोटों में बदला जा सके.” इतना ही नहीं एनसीइआरटी के पाठ्यक्रम से बनारस के प्रेमचंद के उपन्यास निर्मला को एक दशक पूर्व हटवाकर अपना एक एनजीओ आधारित उपन्यास लगवा लेने में सक्षम मृदुला सिन्हा के नेतृत्व में भाजपा महिला मोर्चा का मोदी-जोशी जीत के लिए विशाल मशाल जुलूस भी निकला जिसने सभी अखबारों का पर्याप्त पन्ना घेरा.साहित्य अकेदमी के यात्रा व्यय से चालित आयोजन में फेसवेल्यू के लिए अकादेमी अध्यक्ष की ओर से उड़िया लेखिका प्रतिभा राय और कमल कुमार थीं. दो अन्य लेखिकाओं में एक दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापक और विद्यानिवास मिश्र की साहित्य अमृत संपादन सहयोगी दक्षिणपंथी डा.कुमुद शर्मा थी, दूसरी पटना की उषा किरण खान. गौरतलब है कि उषा किरण खान जिन्हें इस बार एक सम्मान से नवाजा गया है, संगोष्ठी आयोजक एवं विद्यानिवास मिश्र के छोटे भाई पूर्व आईपीएस दयानिधि मिश्र के आइपीएस मित्र रामचन्द्र खान की बीवी हैं, जिन पूर्व लोकसेवी को बिहार सरकार के वर्दी घोटाले में सीबीआई द्वारा अभियुक्त बनाये जाने पर हाल ही में जेल जानी पड़ी थी.पूरा आयोजन इन चमकदार बाहरी चेहरों के अतिरिक्त स्थानीय दक्षिण-वाम विद्वानों का घोल था जिसके स्थाई उद्द्येश्य को जानने के लिए इस समारोह और काशी के साहित्य विद्यामंडल के ढांचे को जान लीजिए.
यह आयोजन एक दशक से चौदह जनवरी को स्व. मिश्र के जन्मदिन पर उनके भाई के नेतृत्व में विद्याश्री न्यास द्वारा होता है जिसके स्थानिक सहयोगियों में जसम शुरू से रहा है.
यह दुहराने की जरूरत नहीं कि विद्यानिवास मिश्र की हिंदी में छवि साहित्यकार-पत्रकार के आलावा भाजपा के सांसद व देवरिया के कठोर पंक्तिपावन ब्राहमण की रही है.वे आचरण में इतने कट्टर थे कि परिवार के अलावा किसी दूसरे के हाथ से अन्य बर्तन में बनाया भोजन नहीं करते थे,पानी,चाय का अलग गिलास लेकर चलते थे,चुटिया और जनेऊ पंथ के घनघोर समर्थक और उद्धारक थे.अंतिम दिनों में भाजपा सांसद रहते समय उन्होंने बनारस के काशी खंड भाजपा के गुलाबबाग कार्यालय से पूर्वांचल के भाजपाई चुनाव प्रचार का वैदिक रीति से आरंभ किया था. गौरतलब है कि पूर्वांचल के रोबदार-दबंग ब्राहमण नेता स्व. मिश्र पर इस बार का आयोजन जिस धर्म संघ के करपात्री सत्संग सभागार में हुआ और जहाँ की प्रमुख भूमिका में तीनों वाम लेखक संघ के सदस्य थे,की बिल्डिंग के निर्माण के लिए संसद निधि से ८० लाख की राशि उन्होंने अपने संसदीय काल में दी थी. जानना दिलचस्प होगा कि करपात्री जी कौन थे,क्यों स्व.मिश्र ने सत्संग हाल के लिए राशि दी थी तथा आजकल वहाँ क्या होता है?
भारतीय लेखक शिविर का मंचस्थल धर्मसंघ शिक्षा मंडल था जहाँ के आदि महंथ स्व. करपात्री जी वर्ण व्यवस्था के प्रचारक,दलित और स्त्री के वेद अध्ययन के विरोधी,विश्वहिंदू परिषद के अधिकारी,रामराज्य परिषद के संस्थापक,काशी में आजादी के बाद राजनारायण द्वारा पुराने विश्वनाथ मंदिर में दलित भक्त प्रवेश के कारण  नए विश्वनाथ मंदिर के निर्माता थे.कहते हैं विद्यानिवास मिश्र के लिए वे एक आदर्श माडल थे.इस आयोजन के श्रोता इसी धर्म संघ के संस्कृत वेद वेदांग विद्यालय के एक सौ नन्हें ब्राहमण बटुक थे जहाँ अन्य जाति तो छोड़िये श्राद्ध कराने वाले  ब्राहमण बटुक तक का वेद अध्ययन निषेध है.वे बेचारे स्त्री विमर्श क्या समझते, हाँ तीन दिनों तक व्यंजनों का स्वाद समझ कर प्रसन्न रहे.श्रोताओं में इसके आलावा बड़ा गाँव कालेज की कुछ छात्राएं लाई गई थीं तथा कुछ सर्टिफिकेट क्रेता शोध छात्र थे.


 आखिर संसदीय पार्टियों की तरह काशी में विद्याश्री न्यास के साथ जसम,जलेस और प्रलेस का इन्द्रधनुषी गठबंधन या सैंडविच गठबंधन क्यों है?इसके ठोस कारण हैं.सबसे सर्वाधिक रेडिकल लेखक संघ जसम का हाल जानिये जिसके सदस्य इस मंच की लाइफलाइन की तरह हैं.यह ऐसा लेखक संघ है जो बनारस में एक दशक से तीन सदस्यों वाला रहा है तथा इसका कभी चुनाव नहीं हुआ.इसके स्थाई संयोजक प्रो बलराज पांडेय हैं. जब गुरू से झंझट हुआ तो जसम में आ गए.प्रो साहब की विचारधारात्मक  नींद ऐसी गहरी रही कि वाममार्गी मित्र प्रो.अवधेश प्रधान ने धर्म के आध्यामिक आवरण ग्रहण कर लिया. कहते हैं कि एक दशक से वार्षिक व्यक्तिगत चंदे के बल पर प्रो.बलराज पांडेय जसम के प्रभारी हैं तथा अपनी प्रतिभा के बल पर जन संस्कृति मंच को बनारस में निर्जन संस्कृति मंच बनाये रखा है.विद्या न्यास मंच के वे प्लानर से लेकर आमंत्रण वितरक तक रहे हैं. ये और बात है कि दो साल से जसम का एक भी कार्यक्रम नहीं हुआ है.विद्या न्यास के जातिवादी और दक्षिणपंथी रुख से जुड़ने का एक आयाम उनके रोजमर्रे में आप देख सकते हैं.
प्रो बलराज पांडेय ने हिंदी विभाग,बीएचयू अध्यक्ष रहते हुए शोध नामांकन में पिछले साल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण ही नहीं दिया. बड़ा छात्र आंदोलन होने पर उन्हें कोटा देना पड़ा.प्रो बलराज पांडेय का एक रिकार्ड है कि आजतक उन्होंने एक भी शोध अनुसूचित या अनुसूचित जनजाति कोटे से नहीं करवाया है. वे काशीनाथ सिंह के शोध छात्र और प्रलेस के पूर्व सदस्य रहे हैं तथा इनदिनों विद्याश्री न्यास के हिमायती हैं.
दूसरा थोड़ा कम क्रांतिकारी मंच जलेस का है.यह दुर्भाग्य ही है कि जिस जनवादी लेखक संघ के प्रतिबद्ध संस्थापक बनारस के प्रो.चंद्रबली सिंह रहे हैं उनके निधन के पूर्व से ही इस मंच पर दक्षिणपंथ का प्रभाव पड़ने लगा था. आजकल इसके करताधर्ता यूपी कालेज के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो रामसुधार सिंह है.राममंदिर आंदोलन के बाद से वे अक्सर काशी के दक्षिणपंथी साहित्यिक और राजनीतिक मंचों से दहाडते रहे हैं.बनारस में जलेस का भी नई पीढ़ी में कोई विकास विस्तार नहीं होने का कारण विद्यान्यास जैसे मंचों पर जलेस अध्यक्ष की आवाजाही और विचारधारा से गुरेज है.एक ताज़ा प्रमाण दैनिक हिंदुस्तान में लिखी प्रो. रामसुधार सिंह की हालिया टिपण्णी है जिसमें उन्होंने पूरे बनारस के अध्यपकों-लेखकों को विद्याश्री न्यास जैसे मंच और आयोजन की नसीहत दे डाली.
रही बात सबसे पुराने मंच प्रलेस और उसके काशी संरक्षक काशीनाथ सिंह की. काशीनाथ सिंह की मंचीय विचारधारा के विकास का संबंध अपने बड़े भाई नामवर सिंह की विचारधारा से जुड़ा रहा है.जब से नामवर सिंह ने जसवंत सिंह,राजनाथ सिंह,मुरारी बापू,रामदेव,पप्पू यादव आदि के मंचों पर जाना शुरू किया है,काशीनाथ सिंह के लिए चुनौती की तरह हो गया है कि लोकल ही सही कितने दक्षिणपंथी मंचों का उद्धार किया जाए.इसका एक उदाहरण तो विद्यानिवास मंच ही है.काशीनाथ सिंह को याद ही होगा कि भाजपा सांसद रहते हुए विद्यानिवास मिश्र के घर पर एक बार जब अजय मिश्र के उपन्यास पक्का महाल का विमोचन समारोह था तो उन्होंने यह कहकर जाने से इनकार कर दिया कि विद्यानिवास जी भाजपा के सांसद हैं.आज वे वहाँ लोकल हीरो हैं.यह हैरानी और आश्वस्ति है कि काशीनाथ सिंह जैसे प्रभावकारी लेखक के विचलन के बावजूद बनारस में अन्य लेखक संगठनों से कई गुना ज्यादा सदस्यतावाले प्रलेस की लेखक पीढ़ी विद्याश्री न्यास से इतनी दूरी बनाये कैसे रख पाती है.
वाम लेखक संगठनों के बनारसी प्रदर्शन से कुछ सवाल उठते हैं.क्या अब स्थानीय वाम लेखक संगठनों पर राष्ट्रीय संगठनों की कोई पहुँच और पकड़ नहीं है? क्या लेखक मंचों से विचारधारा का सचमुच अंत हो गया है?क्या लेखक संघ के भीतर आंतरिक बहस और लोकतंत्र पूर्णतः खत्म हो गया है? क्या रसूख और चंदे के बल पर कोई भी व्यक्ति लेखक संगठन की फ्रेंचाइजी ले सकता है और उसका दुरूपयोग कर सकता है?क्या लेखक संघों पर पार्टियों के भटकाव का प्रभाव अपने अंतिम दौर में है?क्या केन्द्रीय नेतृत्व की देखादेखी के कारण स्थानिक नेतृत्व में भटकाव है?क्या लिखने पढ़ने वाली नई पीढ़ी में पुरानी पीढ़ी के भटकाव के कारण मंच को लेकर उदासी है?क्या दक्षिणपंथी सत्ता और शक्तियाँ लगातार लेखक संघों को भीतर से खोखला कर रही हैं?
और अंतिम बात. क्या जसम,जलेस,प्रलेस जैसे वाम लेखक संगठन केंद्र में भाजपा और मोदी को सत्ता सौंपने में स्थानिक सहयोगी हैं? भीतर के बरक्स बाहर जवाब ढूँढना मार्क्सवादी विचार नियम का निषेध है और विद्याश्री जैसे मंच का निर्वाह.



29 जनवरी, 2014

क्या मार्क्स को नोमार्क्स दागमुक्त चेहरा दे सकता है

गांव में अब भी हवा मिठाई या रुइया मिठाई बेचनेवाला  आता है.  साइकिल के चौरे करियर,मजबूत टायर,झोलेनुमा तीन चार खाली लटकन बोरे,दायें बाएं कंधे पर कुछ छोटे छोटे झोले. एक ढक्कनदार टिनहा कनस्तर में आकार में भंडार और भार में सेर सवा सेर की बेकरार हवा मिठाई. उसके  एक हाथ में टुनटुनिया घंटी जिसके लगातार टन टन का लुभावन स्वादिष्ट स्वर बच्चों को घर,खेत,मैदान,सड़क,स्कूल से चुंबक की तरह खींच लेता है.
            वह कागज के टुकड़े पर चुटकी भर मिठाई देता और बदले में बच्चे घरों से मक्का,गेंहू,धान,आलू,धनिया,सरसों,चना,मटर,लोहा लक्कड,शीशी-बोतल,चप्पल-जूते लाकर उसके बोरे झोले भरते जाते. हवा मिठाई वाले की पूरी साइकिल लदकर चरमराने लगती,कंधे अकड़ने लगते लेकिन मिठाई आधी बची ही रहती.सारे मोहल्ले का घर खाली,पेट खाली लेकिन  जीभ संतुष्ट.
          स्वाद में  हवा,जुबान पर हवा, दौरी भर अनाज  हवा,पेट में हवा,स्वप्न में हवा.वाह रे हवा मिठाई,तेरा कोई जवाब नहीं.हवा मिठाई वाले की एक समझ होती है-पक्का बेचना है,कच्चा लेना है.मजाल क्या कि आप सिक्के या नोट से चुटकी भर  हवा मिठाई पा लें.
         कारपोरेट बहुराष्ट्रीय बाजार हवा मिठाईवाला है.वह कच्चा लेता है और बदले में पक्का देता है. भारी लेता है और हल्का देता है.पोस्को हो या वेदांता;मोंसेंतो हो या पेप्सी;उन्हें केवल कच्चा चाहिए और पक्का पाइए. इस देश के जंगल,खेत,खनिज,पानी,नदी,जड़ी बूटी,अंतरिक्ष सब देकर उनके बदले टेलीविजन,मोबाइल,स्मार्ट फोन, टेबलेट, सोडा,ड्रिंक,क्रीम,पाउडर लीजिए.
          हम ऐसी दुनिया के निवासी हैं जहाँ हमारे जीने के ठोस सामान प्रेम से,बन्दूक की नोंक से,मर्जी से,बेमर्जी से  दिनरात ढोए जा रहे हैं और हमें जो मिल रहा है वह हमारे लिए कूड़े की सभ्यता बना रहा है.
          दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है और स्विट्जरलेंड सबसे तंदुरुस्त.
         इसका मतलब हुआ कि हमारे देश के फेफड़े में सबसे ज्यादा खराब हवा है,धमनी में सबसे गंदा रक्त है.
         इसका एक मतलब यह भी हुआ कि जो कच्चा लुटाता है वह बीमार होता जाता है और जहाँ कच्चे पक्के की  स्याह कमाई जमा होती वहाँ की हवा सफ़ेद संजीवनी से भरी रहती है.
         आखिर  हम  पक्का लेने और कच्चा देने की कीमत  कबतक चुकायेंगे?
          क्या पीलिया से शिकार बदन को विक्को टर्मरिक क्रीम स्वस्थ कर पायेगा?
         क्या मार्क्स को नोमार्क्स क्रीम दागमुक्त चेहरा दे सकता है?
     
            

22 जनवरी, 2014

'आप' के विरोध के असल कारण ढूंढिए



कितना सच?पहले लड़े थे गोरों से,अ़ब लड़ेंगे चोरों से 

अब तक पचास लाख सदस्यों और लोकसभाई छब्बीस सौ  उम्मीदवार आवेदकों वाली  'आप' को सोचना ही होगा कि एक साथ इतनी तरह की शक्तियां और विचारधाराएं  उस पर क्यों टूट पड़ी हैं?
       

04 अक्टूबर, 2012

वालमार्ट खुद एक बड़ा बिचौलिया है


देविंदर शर्मा,अर्थशास्त्री 

रिटेल में एफडीआइ को कृषि की तमाम बीमारियों का रामबाण इलाज बताया जा रहा है। सरकार प्रचारित कर रही है कि इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी, बिचौलिये खत्म होंगे और उपभोक्ताओं को कम कीमत में सामान मिलेगा। साथ ही कृषि उपज की आपूर्ति में होने वाली बर्बादी पर अंकुश लगेगा। यह सब झूठ है। यह दोषपूर्ण नीति लागू करने के बाद उद्योग जगत तथा नीति निर्माताओं द्वारा सुविधाजनक बहाना है।

04 जून, 2012

अँधेरी कोठरी में अक्षर का ताना बाना

रामाज्ञा शशिधर 
उनका ताना बाना जगह बेजगह टूट चुका  है।अँधेरी कोठरी इस मुल्क की तरह।गर्दन तक लटके हुए जाले  फंदे की तरह।टंगा हुआ जकात अतीत के साये की तरह।सामने तनी पगिया जंजीर की तरह।कमर तक गड्ढे में धंसे हुए दोनों सूखे पांव कब्र की तरह।ताने को रेशम के बाने से भरती  हुई ढरकी  भविष्य की तरह।
                    
बनारस में बुनकर 
       

05 मार्च, 2012

कविता की दुनिया में एक नई आवाज़ : नामवर सिंह


दूरदर्शन और द पब्लिक एजेंडा (१-१५ मार्च २०१२)से साभार 

रामाज्ञा शशिधर हमारे जेएनयू की उपज हैं। पहली बार मैंने इसी रूप में इनको जाना था। आजकल तो काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं। अब चूंकि ये रहनेवाले सिमरिया घाट के हैं। बनारस में इनको नौकरी मिली, और बनारस में जहां वे रहते हैं, रामनगर के ठीक सामने गंगा किनारे सामने घाट है। तो सिमरिया घाट से सामने घाट तक ये पहुंचे हैं। यानी घाट घाट का पानी पीकर।

10 सितंबर, 2011

बुरे समय में नींद ने कविता न पढ़ने के मिथ को तोडा :गौरीनाथ

15 जून, 2011

समयांतर,जून ,२०११: अनुज लुगुन की पाण्डुलिपि में पलाश

यह लेख जून ,२०११ के समयांतर में  छप  चुका है .मुझे अनुज ने अपनी 7-8 रचनाओं  की पाण्डुलिपि तब दी थी जब वे हमारे छात्र  थे और मैंने  उनकी  कविता पर लिखना जरूरी समझा.अनुज  लुगुन की कविता 'यह पलाश फूलने का समय है' भी साथ में छपी है. यहाँ साभार  पुन: प्रकाशित  किया जा रहा है.भारत  भूषण  अग्रवाल  पुरस्कार  मिलने पर  अस्सी चौराहा परिवार  एवं  हिंदी  विभाग ,बी.एच.यू. की और से प्रिय  कवि  एवं छात्र  अनुज लुगुन को बधाई!-रामाज्ञा शशिधर


सिमडेगा में जलडेगा है। देश के अन्य हिस्सों की तरह सिमडेगा और जलडेगा में उलगुलान जारी है। उलगुलान यानी राज्य और देश के बीच युद्ध। सत्ता और जनता के बीच संघर्ष। यह उलगुलान लगभग डेढ़ सौ सालों से चल रहा है। लेकिन शायद सभ्यता के इतिहास में इस बार अस्मिता और अस्तित्व दोनों पूर्णतः सर्वनाश के कगार पर हैं।
जलडेगा का एक युवतर आदिवासी कवि है अनुज लुगुन। मुण्डारी भाषा का यह नागरिक देश की बड़ी और ताकतवर भाषा का भी नागरिक होना चाहता है। इसलिए वह हिन्दी पढ़ता है और हिन्दी में कविताएं लिखता है। वह अपनी जनता का दुभाषिया है, अपनी जनता के दुख, सुख, संघर्ष, संस्कृति, स्वतन्त्रता, इच्छा, यातना का दुभाषिया है। वह अपनी कविता के माध्यम से अपनी नदी, अपने जंगल, अपने पहाड़, अपने खेत, अपने पशु-पक्षी की यातना, स्वप्न और संघर्ष का अविकल अनुवाद भारतीय राज्य और राष्ट्र को सुनाना चाहता है।
तरुण कवि अनुज लुगुन अपनी कविता के द्वारा बीसवीं सदी के सबसे बड़े भारतीय जनकवि बाबा नागार्जुन के अधूरे एजेंडे को पूरा करना चाहता है। चर्चा है कि नागार्जुन का काव्य पात्र फूल बाबू आज भी सलाखों के पीछे कैद है। नागार्जुन की 1973 में लिखी एक कविता है शालवनों के निविड़ टापू में। नागार्जुन दंतेवाड़ा से पचपन किलोमीटर आगे हलबी और हिन्दी के दुभाषिए से फूल बाबू का जवाब जानना चाहते हैं कि जब फूल बाबू साठ के दशक में आदिवासी लोकनृत्य वाली पार्टी के साथ दिल्ली पहुंचा था तब देश का राजा कौन था। दियासलाई के साथ फूलबाबू बिना जवाब दिए शालवनों की पगडंडी में खो गया। जेल में बंद फूल बाबू का हालचाल लेना अब हिन्दी कविता की आदत नहीं है। शायद इसलिए भी यह आदिवासी कवि हिन्दी को संबोधित करना चाहता है।
मेरे सामने तीन पांडुलिपियाँ मौजूद हैं। पहली पाण्डुलिपि सलावा जुडुम और ग्रीन हांट के नायक छत्तीसगढ़ के पुलिस मुखिया की तीस रूपये कीमत वाली है जिसके चार सौ पचास पृष्ठों में मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ के सारे पात्र अपनी पूरी रवानी के साथ मार्शल लॉ का बैंडबाजा बजा रहे हैं। इसमें कवि हैं लेखक हैं, आलोचक हैं, पत्रकार हैं, शिक्षक हैं और डोमाजी उस्ताद भी। मैं अभी इस पाण्डुलिपि पर बात करना नहीं चाहता।
दूसरी पाण्डुलिपि के तौर पर हमारे समय के अतिमहत्वपूर्ण लोकधर्मी कवि एवं पाण्डुलिपि के संरक्षक केदारनाथ सिंह की छपित कवित ‘पाण्डुलिपियाँ’ है। उसकी कुछ पंक्तियों पर गैर फरमाइए-पाण्डुलिपियाँ/कहीं आज भी पड़ी हैं/किसी पेड़ की छाल/किसी नदी के कंठ/किसी जेल की दीवार/या किसी पत्थर की स्मृति में। मेरे सामने मौजूद तीसरी पांडुलिपि की कविताएं केदारनाथ सिंह के काव्य स्वप्न का वास्तविक विस्फोट हैं। यहाँ पेड़ की छाल को खरोंचने, छीलने, चूसने, जलाने और बेचने वाली कथित बर्बर आधुनिकता की शिनाख्त है; नदी के पानी को बोतलों में बंदकर रेत को रक्त में डुबो देने वाली कारपोरेट पूंजी के बड़े नाखूनवाले पंजों की पहचान है; अपने ही घर और देश में दुश्मन, द्रोही और पराए बना दिए गए लाखों फूल बाबुओं की जेल जैसी जिन्दगी की दीवारों की दरकन है और है पत्थर के नीचे से करोड़ों साल में निर्मित चीजों की लूट का जरूरी प्रतिरोध। भारतीय समाज और हिन्दी कविता का भविष्य तीसरी पाण्डुलिपि की पगडंडी से तय होगा। इसलिए तीसरी पांडुलिपि की छानबीन और पड़ताल जरूरी है।



अनुज लुगुन की एक कविता है- अघोषित उलगुलान। अर्थात अघोषित आंदोलन। औपनिवेशिक आधुनिकता पूंजी के रथ पर सवार होकर जिस तरह हाशिए का विनाश कर रही है, यह कविता उसकी सूक्ष्म जांच करती है। यह प्रकृति के राजनीतीकरण का दौर है। तरंगों पर सवार आधुनिकता मुट्ठी भर समाज के लिए शेष पृथ्वी को निचोड़ने का अभियान चला रही है। कविता इस राजनीति का पोल खोलती है- अघोषित उलगुलान में/लड़ रहे हैं जंगल/लड़ रहे हैं ये/ नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ। कविता को मालूम है कि आदिवासी किसानों के नाम पर सियासत की गलियों में आरक्षण और धर्मांतरण की बहस चल रही है लेकिन वहाँ कटते हुए पेड़ों की चीख, बिकती हुई नदियों की तड़प, बारूद से ध्वस्त होती हुई झरनों की झंकृति, गोश्त में बदलते चिड़ियों और जानवरों का हाहाकार और प्रकृति के समुद्र में जी रही आदिम मानव मछलियों सेे रत्तीभर रहमदिली नहीं है। कविता के सामने सवाल विकास और लोकतंत्र का नहीं, सम्पूर्ण मानवीय अस्तित्व का है।
एक कविता है लालगढ़। कवि कहता है- कुछ तो है जरूर साहब/जो वातानुकूलित कमरे में/रहते हुए महसूते नहीं/कुछ तो जरूर है साहब/जो रोबड़ा सोरेन/पिछले कई सालों से/ नाम बदलकर घूमता है/वरना कोई गढ़/यूं ही लाल नहीं होता। कविता राज्य की संरचनात्मक हिंसा और विषमता पर आधारित दमन कानून का प्रतिरोध करती है। नागार्जुन और गोरख पांडेय की परम्परा में वह राज्य हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा की वकालत करती है। वह युद्ध और गृहयुद्ध के वास्तविक कारणों की खोज करती है जिसकी जड़ें जनता में नहीं राज्यसत्ता में हैं।
अनुज लुगुन की कविता का एक ‘देश’ है। यह ‘देश’ ग्लोबल के खिलाफ लोकल, देशद्रोह के खिलाफ देशभक्ति राजपरस्ती के खिलाफ जनपरस्ती, मध्यवर्गीय बहुरूपियेपन के बरक्स निम्नवर्गीय वैचारिक ठोसपन का समर्थन करते हुए सत्ता के इस दर्शन को ध्वस्त कर देता है कि राज्यभक्ति ही देशभक्ति है। देश, देशभक्ति और देशान्तरण नामक तीन खण्डों में बंटी ‘गंगाराम कलुण्डिया’ कविता आदिवासी जनता के देशद्रोही होने के मिथ को ध्वस्त कर देती है। कहना न होगा कि 1857 से पहले संथाल विद्रोह और बाद में बिरसा मुंडा, ताना भगत, गोविन्द गिरि, प्रेमचन्द भील जैसे सैकड़ों आदिवासी नायक औपनिवेशिक और सामंती सत्ता के सामने अपनी कुर्बानियों का इतिहास रच चुके हैं। गंगाराम कलुण्डिया एक ऐतिहासिक व्यक्ति और घटना है। 1972 के भारत-पाक युद्ध में लड़ाई लड़ने के कारण राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से सम्मानित गंगाराम सेवानिवृत्ति के बाद जब ईचा बाँध से विस्थापित आदिवासियों के आन्दोलन का नेतृत्व करता है तब उसके ही देश की पुलिस 3 अप्रैल 1982 को उसकी हत्या कर देती है। कविता देश को कटघरे में खड़ा कर देती है- गंगाराम/तुम देश के लिए हो या/देश तुम्हारे लिए है/संसदीय बहसों और/अदालती फैसलों में नहीं हुआ है निर्णय/जबकि तुमने तय कर लिया था/तुम लड़ोगे अपने देश के लिए। समय के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश जनता से बनता है या जनता देश बनती है। यह ऐसा वक्त है जिसमें देशभक्ति भी अन्य चीजों की तरह बाजार का एक खूबसूरत बिकाऊ उत्पाद है अथवा फासीवाद की हिंसक कार्रवाई है, वहाँ आदिवासी मासूम संवेदना गंगाराम के लिए एक मार्मिक इच्छा रखती है- तुम्हारे मरने पर/नहीं झुकाया गया तिरंगा/नहीं हुए सरकारी अवकाश और न ही बजाई गई/शोक गीत की धुन। ऐसे दौर में जब नवसाम्राज्य ने देश और राष्ट्र की अवधारणा ही खत्म कर दी है, आदिवासी कविता में देशभक्ति की यह मिसाल सत्ता और उपभोक्ता वर्ग के सामने शर्मसार करने वाला आईना रखती है।
हिन्दी कविता में मिथक का जनतंत्रीकरण बहुत हुआ है। एकलव्य से संवाद एक लम्बी कविता है जो एक ओर अब तक प्रचलित एकलव्य की धारणा को ध्वस्त कर देती है वहीं गुरू द्रोण के बहाने पूरी मध्यवर्गीय बौद्धिकता को प्रश्नांकित करती है। कवि का कथन है- ‘रगों में संचरित कला किसी दुर्घटना के बाद एकबारगी समाप्त नहीं हो जाती।’ कवि उड़ीसा के सीमावर्ती झारखण्ड के सिमडेगा जिले के मुण्डा आदिवासी समाज से आता है जहाँ अंगूठे का प्रयोग किये बिना तर्जनी और मध्यमा अंगुली के बीच तीर को कमान में फंसाकर तीरंदाजी करने की परम्परा है। कवि अनुज लुगुन स्वयं इसका प्रमाण है। इस अग्निधर्मी और आख्यानमूलक कविता में कवि सत्ता से अनैतिक और फायदे का संबंध रखने वाली छद्म हिन्दी बौद्धिकता पर सन्देहनिशानी करते हुए आदिवासी किसानों को सचेत करती है कि उनका गुरू बाघ, शेर, हिरन, वृक्ष की छाल तो हो सकते हैं लेकिन भाषायी छद्म से लदी वर्चस्वशाली बौद्धिकता नहीं। वस्तुतः व अंगूठे के विरूद्ध मध्यमा और तर्जनी की खोज वैकल्पिक व्यवस्था की खोज है।
कवि को पता है कि अब हत्यारा भी कविता लिख सकता है। कवि हैरान है कि यह कैसा खतरनाक समय है जब शिकारी का शिकार हो रहा है। जिस शिकारी के तीर से बाघ थर्रा उठता था और परम्परा शाबाशी देती थी- जोवार सिकारी बोंगा जोवार अर्थात शिकारी युवा तुम बहुत खूबसूरत हो- उसका हाँका लग रहा है। आदिवासी एक ऐसी चिड़िया की तरह है जिसे शिकारी दायीं अंगुलियों से गोली मारता है और बायीं अंगुलियों से कविता लिखता है। तड़पती हुई चिड़िया और हड़िया से मस्ती लेने के लिए बौद्धिक मेहमान विचार कोलाहल करते है, भोज सम्मान के बाद पुरस्कार, वातानुकूलित यात्रा भत्ता और ढेर सारे सुमनाक्षर समर्पित किए जाते हैं। हिन्दी की ऐसी द्रोणमार्गी बौद्धिकता के पास स्टैण्ड के नाम पर यदि केवल इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर स्टैण्ड ही शेष है तो कोई हैरानी की बात नहीं है। कवि को जब पता है कि भारतीय कविता का जन्म आदिकवि द्वारा सुनी घायल चिड़िया की चीख से हुआ था तब उसका अविश्वास उन बौद्धिकों पर लाजिमी है जो चिड़िया का पंख मोंच कर उसके आर्तनाद को शब्द में बाँधना चाहते हैं। कवि कहता है- एकलव्य/अब जब भी तुम आना/तीर धनुष के साथ ही आना/हाँ किसी द्रोण को अपना गुरु न मानना/ वह सिर्फ छल करता है।
लुगुन की कविता सत्ता विमर्श की नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की कविता है। वह राजनीतिक चेतना से सम्पन्न ऐसी कविता है जिसे संसदीय वामपंथ के सिलसिलेवार पाखण्ड, सत्तापरस्ती, समझौता परस्ती, अप्रांसगिकता, और निरर्थकता का गहरा बोध है। लिंकन का भूत कविता पूंजीवादी जनतंत्र और संसदीय वामपंथ के बहरूपिएपन का शिनाख्त करते हुए उससे उबरने की राह खोजती है। कविता शुरू होती है- लिंकन की परिभाषा सुनकर/मैं शहर से दूर भागा/जंगलों में छुपने के लिए/मुझे डर था कि/ वे लोग मेरा शिकार करंेगे। एकालाप और आत्मालाप से ग्रस्त हिन्दी कविता के बीच यह संवादधर्मी कविता बातचीत की शैली में रचित है जिसमें सखुआ की ओट लिए बैठे आदमखोर अभिजात की बारीक पहचान है। विदर्भ, नन्दीग्राम, सिंगूर, ददरी, बलिया, भट्ठा पारसौल जैसे देश के सैकड़ों इलाकों की धरती बहुराष्ट्रीय बुलडोजर और बाडे़ की गिरफ्त में लगातार आ रही है, मिदनापुर से लेकर दंतेवाड़ा तक के जल, जंगल, जमीन कारपोरेटी दाँतों में फंस चुके हैं और यह सारा कारोबार लिंकन के भूत के हाथों सम्पन्न हो रहा है। तब कवि शिकारी से बचने के लिए ठिकाने खोजता है- मैं रोज भागता हूँ/कभी शहर तो कभी गांव/कभी वियतनाम भागता हूूं तो कभी नक्सलबाड़ी/कभी इराक भागता हूँ/तो कभी दाँतेवाड़ा/मेरे साथ हमेशा/लिंकन का भूत भागता है।
शमशेर की कविता ‘ओ युग आ’ की पंक्तियां हैं- ओ युग आ/मुझे और लिए चल/जरा और/शक्ति और प्रेम की गर्वभरी बांहों में/और उस सादगी के सीने पे/जो छोटी-छोटी दैनिक/बातों में होती है/कि लोक/गुनगुनाने लगे/शान्त सरल आनंद में। समानता स्वतंत्रता और बंधुत्व का शमशेरी आदिम लोक यही आदिवासी समाज है जिसके सीने में सरलता, सहजता, शक्ति, शान्ति, प्रेम, उमंग, संगीत, सम्मोहन आनंद, कर्म जैसे मनुष्यता के सारे अवयव मौजूद हैं। वे अवयव लुगुन की कविता यह पलाश के फूलने का समय है में भरपूर मात्रा में उपस्थित हैं। वहाँ साखू, केन्दू, सागौन पर कोयल की कूक है, गिलहरियों की घमाचौकड़ी है, जवान औरतों की मर्दों के साथ उन्मुक्त प्रेमलीलाएं हैं। लेकिन इस कविता का दूसरा पहलू दिल हिला देने वाला है।
सभ्यता और आधुनिकता के नाम पर चली पूंजी की प्रचण्ड आंधी चारों ओर से इस सरल समाज को घेर चुकी है- गुफाओं को खबर है/खदानों में वेदान्ता का विज्ञापन टंगा है/साखू के सागर/सारण्डा की लहरों में/बिछ गई है बारूदी सुरंगे/हर दस्तक का रंग यहां लाल है। कविता को पता है जंगल खत्म होने वाला है, नदी खत्म होने वाली है, चिड़िया खत्म होने वाली है, खनिज खत्म होने वाले है, बादल खत्म होने वाला है, ऑक्सीजन खत्म होने वाली है, संगीत खत्म होने वाला हैं, त्योहार खत्म होने वाले हैं, परम्परा खत्म होने वाली है, संस्कृति खत्म होने वाली है, तीर धनुष खत्म होने वाले हैं। यानी सादगी और समानता की आदिम सभ्यता बारूद के ढेर पर रख दी गई है और इसका नाम रखा गया है विकास, लोकतंत्र, आधुनिकीकरण, मुख्यधारा आदि।
कविता का आखिरी पहलू सौन्दर्य की महिमा का एक नया अनूठा संसार रचता है दूर-दूर तक/जंगल का हर कोना पलाश है/साखू पलाश है/सागवान पलाश है/पलाश आग है/आग पलाश है। यह क्रान्ति का सौन्दर्य, यह प्रकृति के सुलगने का सौन्दर्य है। जो पलाश प्रेमिकाओं के जूड़े में गुंथकर प्रेमियों को ललचाने का काम करता है, सूरज की आँखों में आँखें डाल रोशनी को कोमल बनाने का काम करता है, जो धरती के जिस्म पर लाल परिधान पहनाने का काम करता है, जो वासना की आँखों, होठों और लहरों को और रक्तिम बना देता है, वह आज आग ही तरह जल रहा है। जाहिर है कविता कभी नहीं चाहती कि पलाश आग की तरह दहके। वह हमेशा पलाश को पलाश की तरह और आग को आग की तरह देखना चाहती है। कविता के लिए यह कितना कठिन समय है कि पलाश के फूलने के मौसम में पूरा जंगल जल रहा है।
लुगुन की कविता एक ऐसी सौन्दर्य महिमा, शब्द भंगिमा, राजनीतिक चेतना, ज्ञान और संवेदना से भरे युवतर कवि की अनूठी धमक है जो हिन्दी कविता के एकालापी, आत्मालापी भाषाई कौशल, गद्यात्मक खिलवाड़, जनविरोधी रूपात्मकता के विरूद्ध क्रांतिकारी परम्परा की अगली कड़ी है। हिन्दी कविता को इस कवि से बड़ी उम्मीद है। अनुज लुगुन अपनी कविता और जीवन में गंगाराम कलुण्डिया के साथ है। यदि अभी शताब्दी कवि नागार्जुन होते तो वे किसके हाथ होते? सलवा जुडूम के या फूल बाबू के?
सवाल इसलिए भी जरूरी है कि दंतेवाड़ा के मोरपल्ली, ताइमेताला और तिम्मपुरम गांवों को मार्च के पलाशी मौसम में सलवा जुडुम के एसपीओ और केन्द्रीय सेना द्वारा जलाकर खाककर दिया जाता है। महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। सामंत एवं फासीवादी मुख्यमंत्री रमन सिंह तथा केन्द्रीय खाद्य सुरक्षा सलाहकार हर्षमंदर के हेलीकाप्टर के उड़ान भरते ही इन्हीं ताकतों द्वारा राहत की खाद्य सामग्री लूट ली जाती है, कपड़े लूट लिये जाते हैं, कई बच्चे भूख से तड़प कर मर जाते हैं। गांवों के लोग सरकार द्वारा उठाकर ले गये दुभाषि परिजन नुपा मुत्ता और माडवी सुल्ला का अता-पता न मिलने से भयभीत हैं। झोपड़ियों की छतें उतार दी गई हैं। मांएं कोमल बच्चों को धूप में लिये खड़ी हैं। क्यों? इसलिए कि जंगल में सरकारी आग दौड़ रही है, सुलग रही है, धधक रही है और उनका कहना है कि पलाश फूल रहा है।



08 सितंबर, 2010

कार्ल मार्क्स का करेला बनाम कामू का काशीफल

 पिछले शिक्षक दिवस पर अमर उजाला में साहित्य के बुजुर्ग शिक्षक नामवर सिंह पर रवींद्र त्रिपाठी की एक टिपण्णी है- नामवर सिंह हिंदी में चुप्पी के सबसे बड़े मास्टर हैं. इस चुप्पी का गहरा राजनीतिक निहितार्थ  है. बकैत बनारस से उन्होंने चुप्पी का रूप चुना है. इसलिए उनके पान घुलाने,१२० नंबर फांकने और मंद मंद मुस्काने की अपनी रणनीति है. पान नामवर सिंह के मुंह में चलने वाली राजनीति का  चलायमान जयगान है.
      यह चुप्पी उनके लिए जितनी  शुभ हो ,समाज और साहित्य के लिए घातक है. जैसे कुलपति वी एन राय के छिनाल प्रकरण पर कुलाधिपति पद की चुप्पी, विष्णु खरे के हिदी विभागों को चकला घर कहने और उन्हें पुरुष वेश्या कहने पर चुप्पी, सलवा जुडूम और ग्रीन हंट के संचालक के किताब लोकार्पण को लेकर हुए विरोध पर चुप्पी, बिहार के बाहुबली नेता प्रभुनाथ सिंह  के मंच पर जाने के कलाकारों द्वारा विरोध पर चुप्पी,जसवंत सिंह की किताब  की आलोचना के विरोध पर चुप्पी, प्रलेस महासचिव द्वारा फोर्ड फाउन्डेसन से  पैसा लेने के प्रकरण पर चुप्पी, बनारस में प्रलेस सम्मलेन में विचारधारा के अंत की घोषणा की आलोचना पर चुप्पी आदि. उम्मीद है, कोई अंध भक्त टेपित लाभ के लिए नामवर सिंह बोलवाए या भाषण अंकन के सिलसिले में वे  कुछ  बोलें तो बोलें वरना स्टैंड के नाम पर आई सी सी  का कार स्टैंड उनके लिए  सबसे सुविधाजनक है.
        १८ सितंबर को बनारस में उन्हें पाखी पत्रिका द्वारा ५१ हजार रूपये से सम्मानित होना है.पाखी इएमइसी ग्रुप की साहित्यिक पत्रिका है. आइये ,अगस्त में ग्रुप के मालिक का सम्पादकीय स्टैंड सुनिए. संपादक के लिए मध्य मार्ग उत्तम मार्ग है  यानी वर्त्तमान व्यवस्था सुमार्ग है.सम्पादकीय का कहना है कि अरुंधती रॉय अतिवादिता की  शिकार हैं. रूस वैचारिक स्वंत्रता का दुश्मन था.'' विचारधाराओं में बंधा मस्तिष्क अतिवादिता का शिकार हो जाता है.उसमे ठहरे हुए जल के समान दुर्गन्ध आने लगाती है.''  अमेरिकी साम्राज्यवादी नीति रूसी वामपंथ और भारतीय वाम विचारधारा  की जनविरोधी अतिवादिता एक जैसी है. आदिवासी किसानों की लडाई का मुद्दा केवल नक्सलपंथ का मुद्दा है.
        संपादक का कहना है कि कैसे कोई तय कर सकने की निर्णायक भूमिका में है कि विश्वरंजन के हाथ निर्दोषों के खून से रंगे हैं. सम्पादकीय के अनुसार मार्क्सवाद एक आयातित विचारधारा है. आदिवासी किसानों  को क्या पता है  कि मार्क्स-लेनिन किस चिड़िया  का नाम है. मालिक संपादक का कहना है" मैं किसी भी विचारधारा को अंतिम  सत्य नहीं मानता.''
        विचारधारा  को अफीम मानने वाले संपादक क़ी मानवता का राज यहाँ है कि ''मैं एक ब्राहमण परिवार में जन्मा हूँ मेरे लिए इसका कोई महत्व नहीं है. लेकिन मैं इसके लिए शर्मिंदा भी नहीं हूँ.'' आगे ''अब देखिये विचारधाराओं का प्रदूषण.  जब नरेन्द्र मोदी को अपराधी कहता हूँ तो सराहना होती है. हुसैन के खिलाफ लिखता हूँ तो दक्षिण पंथी करार दे दिया जाता हूँ.''
         कार्ल-मार्क्स के करेले से ज्यादा कामू के काशीफल पर नजर गडाए रखनेवाली विचारशील  हथेलियों से नामवर सिंह सम्मानित होकर बाजार और सरोकार दोनों धर्मों  की सेवा अवश्य  करेंगे. क्या उस वक्त भक्त-भजनियों-फुलधरियों की  तालियों के शोर  में याद कर पाएंगे क़ि  एक विचारधारा में उनकी इतनी आस्था थी कि कभी यहाँ से लोकसभा का चुनाव लड़े थे और अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को अपन जन्म दिवस मानते थे.
        बनारस में दो  दशक से  सैकड़ों  किसानों और बुनकरों की मौतों का सिलसिला जारी है और देश में लाखों . जनता और जनविचारधारा  को मनुष्यता का दुश्मन माननेवाली वैचारिकी से सम्मानित होते हुए क्या यह  चुप्पी टूटेगी ? सन्नाटे के कोहरे में विचारधारा लाश की तरह दबाकर रखी जाएगी. धूप उगने पर बहस  शुरू होगी कि करेला ज्यादा फायदेमंद है या काशीफल.    

07 सितंबर, 2010

चौरासी के नामवर को अस्सी की बधाई

             क्या  बनारस में  18 सितंबर  को पाखी पत्रिका की ओर से आयोजित  नामवर सिंह की सम्मान व पुरस्कार  सभा पुरानी यादों से सारांशतः अलग होगी?  क्या वहां कार्ल मार्क्स के करेले पर कामू का काशीफल (दूसरी रपट भी पढ़ें ) भारी नहीं होगा?
        फिलहाल ८० वीं वर्षगांठ के  आयोजन के सूरते हाल पर दरबारीलाल की
       समयांतर में छपी टिपण्णी यहाँ हाजिर हैA
                                       
                                      नामवर का अस्सी
इस बार हिन्दी आलोचना के कमांडर नामवर सिंह चुपचाप अस्सी के हो गए. कई स्तरों पर उनका अस्सी हुआ. वे अस्सी साल के हुए. काशी के अस्सी के हुए. नापसंद एवं पसंद करनेवालों के असि हुए। नहीं हुए तो सिर्फ बीसवीं सदी के अस्सी वाले नामवर। 28 जुलाई को अपने जन्म दिन पर बनारसी श्रोताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने पहला वाक्य कहा, काशी का अस्सी, अस्सी का नामवर आपको प्रणाम करता है।काशी के लिए मंच से कुछ ऐसा हुआ कि काशी भी अस्सी के हो गए हों।।
बनारस ने नामवर सिंह के साठ को भी सेलीब्रेट कियाA पचहत्तर को भी और इस दफा अस्सी को भी। बनारसी बुद्धिजीवी ऊबकर अब कहने लगे हैं कि काशी में केवल नामवर ही साठ के होते हैंA पचहत्तर के होते हैं और  अस्सी के भी।
      कई प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि आलोचक बच्चन सिंह की पचहत्तरवीं वर्षगांठ पर नामवर सिंह ने सम्मान आयोजन को ध्वस्त करते हुए कहा था कि बनारस का प्रलेस बना ही इसलिए है कि अपनों का सम्मान करे। बच्चन सिंह इतने आहत हुए कि गोष्ठी से सीधे अस्पताल पहुंच गए। नामवर का अस्सी आयोजन को देखकर बुद्धिजीवियों ने टिप्पणी करनी शुरू कर दी है कि बनारस और इस देश का प्रलेस बना ही इसलिए है कि नामवर सिंह की सम्मान गोष्ठी करते चले।
       नामवर का अस्सी इसलिए भी रोमांचक है कि पिछले दिनों महादेवी जन्म शताब्दी के दरम्यान बनारस में ही उन्होंने पंत के तीन चौथाई साहित्य को कूड़ा कह दिया था। अखबारी साहित्यिक बहस चल ही रही थी कि स्थानीय भाजपाइयों ने मुकदमा दायर कर इसे नया रंग दे दिया था। कहा जाता है कि नामवर का अस्सी उसकी जबाबी कार्रवाई था। आइए इस हादसे के आंतरिक दृश्यों छवियों एवं अंतर्विरोधों का थोड़ा जायजा लें।
नामवरजी जब साठ के हुए थे तब बनारस की सम्मान गोष्ठी में बाएं -दाएं प्रलेस के दो विराट खंभे थे-नागार्जुन और त्रिलोचन। नागार्जुन ने एक कविता पढ़ी थी% अगर कृति का फल चखना है@आलोचक को खुश रखना है। अस्सी वाले कार्यक्रम में कृति की जगह नौकरी पदोन्नति पार्टी संगठन संबंध बुद्धिजीविता आदि भी रख लीजिए तो इस कविता की व्यंजना बढ़ जाती है। नागार्जुन नहीं रहे लेकिन 20 अगस्त 2007 को नब्बे साल के होने वाले प्रलेस के शुरूआती नायक त्रिलोचन  बेटे बहू के घर में जर्जर हालत में सांसें गिन रहे हैं। नामवर सिंह के अस्सी के होने पर त्रिचोलन का एक लंबा इंटरव्यू स्थानीय हिन्दुस्तान में छपा जिसमें आशीर्वादी मुद्रा में कहा गया&हिन्दी में नामवर सिंह जैसी प्रतिष्ठा किसी को नहीं मिली। 28 जुलाई के बाद ही 20 अगस्त आता है। बनारसी बुद्धिजीवियों का कहना है कि नामवर सिंह एवं उनके भाई कुछ भी कर सकते हैं दूसरों का सम्मान नहीं कर सकते। 
  पचहत्तरवीं वर्षगांठ में सुविख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी थे और देशभर में हवाई जहाज के साथ थे। 80वीं के उधार का जिम्मा हिन्दी विभाग बीएचयू एवं प्रलेस की बनारस इकाई ने लिया और अद्वितीय ढंग से कर्ज चुकाया।
      सम्मान समारोह में नामवर जी का चादर से सम्मान जलेस के उद्धारक चन्द्रबली सिंह ने कियाA कई दर्जन संगठनों संस्थानों एवं व्यक्तियों द्वारा माल्यार्पण की फेहरिस्त में जसम की स्थानीय इकाई ने माला भेंट कीA कला कम्यून ने पोटेªट दियाA अनपढ़ बुनकर शायर ने कुर्ता सिलकर पेश कियाA हिन्दी विभाग के अध्यक्ष ने स्वागत भाषण कियाA नवनियुक्त शिष्य ने नामवर की धरती  हाजिर कीA परिवार ने पूरी मंगल कामना कीA संस्कृत के पंडितों विद्वानों ने श्लोकों की छौंक से शतायु होने का मंगलगान गाया। इसके बावजूद नामवर सिंह द्वारा प्रस्तुत दो शेर का लुत्फ लीजिए&aa हमको मालूम है महफिल की हकीकत लेकिन@दिल के बहलाने को गालिब यह खयाल अच्छा है। बात इतनी पर ही नहीं रूकीA नामवर जी ने कहा कि काशी में मेरे लिए धरती नहीं है और ज़फर का यह शेर सुनाया&a दो ग़ज ज़मीं भी न मिली कूए यार में।
दो सत्रों में चले आयोजन में तीन चीजें खूब छाई रहीं। नामवर सिंह के लिए कसीदा पढ़ा जानाA रामविलास शर्मा पर हमला करना तथा महादेवी बनाम पंत। पहला प्रसंग आ चुका है। नामवर सिंह को खुश करने एवं खास जगह तक पहुंचने की होड़ में उनका इतनी बार जयकार हुआ कि आखिरी गोष्ठी आलोचना का धर्म में उन्होंने क्रुद्ध होकर कहा& यदि अब एक बार भी मेरा नाम लिया गया तो मैं गोष्ठी से उठकर चला जाउंगा। दिलचस्प यह कि तब भी जयकार होता ही रहा । रामविलास शर्मा प्रकरण भी खूब चला।  प्रारंभिक गोष्ठी में चन्द्रबली सिंह ने सम्मान करते हुए कहा कि रामविलास शर्मा के प्रति नामवर ऐसी स्थिति  मत बनाएं कि उनकी जयंती पंचजन्य के कार्यालय में होने लगे। दूसरे सत्र में नामवर जी के एक उत्तराधिकारी आलोचक ने मंच से फतवा जारी कर दिया कि रामविलास शर्मा का हिन्दी आलोचना में लगभग कोई योगदान नहीं है।
मजेदार यह है कि समारोह में एक ओर रामविलास शर्मा चुभ रहे थे दूसरी ओर विचार गोष्ठी का विषय ही था&a आलोचना का धर्म। कहां धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक अवधारणा आलोचना और कहां भाजपाइयों के हाथों जख्मी शब्द- धर्म। नामवर जी ने तो इस बार एक तरह से विनय पत्रिका ही रच डाली। सम्मान सत्र में उन्होंने उपनिषद के श्लोक पढ़े। संस्कृत पंडितों ने उनके लिए दर्जन भर श्लोक गाए। नामवर सिंह ने न केवल तुलसी की चौपाइयों से पूरे समारोह को चकाचौंध बनाए रखा बल्कि तुलसी पर सुधीश पचौरी द्वारा वाक में आयोजित परिचर्चा की कड़ी निंदा की। स्थानीय भाजपाइयों को ललकारा कि तुलसी भक्त भाजपाई नहीं वे हैं। इसलिए कि तुलसी की तरह उन्होंने भी कई बार गंगा पार किया है। नामवर जी ने आखिरी इच्छा बतायी कि वे तुलसीदास पर एक आलोचना पुस्तक लिखना चाहते हैं।  उन्होंने कहा कि इन दिनों वे बार-बार तुलसी ग्रन्थावली को उलटते पढ़ते रहते हैं। दूसरी ओर तुलसी भक्त अस्सी के भाजपाइयों ने नामवर जी के अस्सी के होने की शुभकामना में अस्सी घाट पर बुद्धि शुद्धि यज्ञ कियाA धूप दीप जलाएA मंत्रोच्चार किया तथा बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना की कि ईश्वर उन्हें चिरायु बनाए। ऐसा है कबीर समर्थक नामवर का तुलसी प्यार और तुलसीपंथी रामविलास से तकरार।
अब अंत में महादेवी-पंत प्रकरण का उपेक्षित सच। नामवर सिंह ने हिन्दी में अंधभक्तों एवं कट्टर समर्थकों की एक बड़ी टीम तैयार कर ली है। इसमें लेखक कार्यकर्ता संगठनकर्ता प्राध्यापक चारों है। उनके लिए नामवर ही मानस पारायण के सातों कांड हैं। दूसरी ओर नापसंद करने वालों की भी एक बड़ी फ़ौज है। ज्यो ही नामवर जी ने पंत के साहित्य के तीन चौथाई को कूड़ा कहा वे पत्र-पत्रिकाओं में कलम की तलवार लेकर कूद पडे़। दिलचस्प है कि अब तक किसी ने नामवर जी के  जेहन में यह बात नही पहुंचायी कि जिस आचार्य रामचन्द्र शुक्ल( आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एवं मुक्तिबोध को हिन्दी आलोचना का वे प्रस्थान बिन्दु मानते हैं उन्होंने पंत के काव्य वैभव की जबर्दस्त प्रशंसा की है। नामवर जी ने छायावाद में खुद पंत की प्रशंसा की है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सोवियत संघ के विघटन  नवउदारीकरण के आगमन कम्युनिस्ट पार्टियों के कांग्रेसीकरण एवं नंदीग्रामीकरण के फलस्वरूप पंत की ऐतिहासिक अनुभूति (बकौल मुक्तिबोध से ज्यादा महाaदेवी का झिलमिल उन्हें भाने लगा है। ।
रही बात मुकदमा प्रकरण की। उनके अस्सी मुहल्ले के भाजपाई मीडियोकरों ने छपास रोग के कारण इस घटना को उड़ा लिया। वे खुश हैं कि पंत और तुलसी को थानेदारों वकीलों और जजों के कटघरे में आनंद आ रहा होगा। वे लोग ऐसा ही करते रहते हैं और कहते भी रहते हैं। कहा जाता है कि उन लोगों को अनुज काशीनाथ सिंह खुद सम्मान समारोह के लिए न्यौतने गए थे। कितना दिलचस्प है कि तुलसीदास पर नामवर जी ने कुछ कहा ही नहीं थाA न भाजपाइयों का उनपर आरोप है पर देश के मीडिया ने उन्हे एम एफ हुसैन की पंक्ति में लाने की होड़ लगाई। कहा जाता है इस रणनीति में भी काशी का ही योगदान है। कितना विडम्बनामूलक है कि एक ओर मुकदमा और दूसरी ओर चिरायु होने के लिए यज्ञ।         हाय रे नामवर का अस्सी! कोई क्यों न मर जाए इस सादगी पर ए खुदा लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार नहीं है।
 

30 अगस्त, 2010

लेखक संगठन: अंधेरे में प्रतिरोध

रामाज्ञा शशिधर

रस्मी आजादी की स्वर्णजयंती बीत जाने के बावजूद आजाद भारत में छपित मुक्तिबोध की किताब भारत: इतिहास और संस्कृति आज तक सत्ता द्वारा प्रतिबंधित है। दो साल बाद इस किताब के प्रतिबंधित होने की भी स्वर्णजयंती आएगी। आधी अधूरी छपित किताब की परिशिष्ट प्रश्नावली में मुक्तिबोध का नई पीढ़ी से एक प्रश्न है:“भविष्य के भारत का क्या कोई स्वप्न आपके पास है? यदि है तो क्या है? और यदि नहीं तो क्यों नहीं ? कारण सहित उत्तर दीजिए!” कवि तत्कालीन बौद्धिकता को स्वप्नहंता होने का गुनहगार मानता है-“ओ मेरे आदर्शवादी मन। ओ मेरे सिद्धांतवादी मन। अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया। उदरंभरि बन अनात्म बन गये। भूतों की शादी मंे कनात से तन गये। किसी व्यभिचार के बन गये बिस्तर। दुखों के दागों को तमगों सा पहना। अपने ही खयालांे मंे दिन रात रहना। असंग बुद्धि व अकेले मंे सहना। बहुत बहुत ज्यादा लिया। दिया बहुत बहुत कम। मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम।” असंग बुद्धि और एकांत खयाल को एकताबद्ध आंदोलन मंे बदलने वाले लेखकों-कलकारों के मातृसंगठन प्रगतिशील लेखक संघ ने स्वर्णजयंती मनाई। सच्ची आजादी को ज्यादा धारदार तरीके से खोजने का दावा करनेवाले जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के भी रजत जयंती साल बीत गए। पर, मुक्तिबोध की किताब प्रतिबंधित और प्रश्न उपेक्षित। हिन्दी बौद्धिकता में उदर बढ़ता जा रहा है, सिर और हृदय संक्षिप्त होते जा रहे हैं, भूतों की शादियां ज्यादा लकदका रही हैं, कनातों की व्यापकता और गहराई अछोर अनंत हो रही है। ऐसे समय में जनपक्षीय लेखक संगठनों की प्रतिरोधी भूमिका के इतिहास और वर्तमान पर विचार होना चाहिए। यदि 21 वीं सदी को या तो समाजवाद की सदी या बर्बरता की सदी-दो में से एक दिशा में पूर्णतः बदल जाना है-तो इसकी सांस्कृृतिक शिनाख्त और बहुआयामी प्रतिरोध की जिम्मेदारी इन्हीं लेखक संगठनों पर है।

आजकल शोषण और दमन की ताकतों और रूपों का विस्तार हो रहा है, दूसरी ओर उनसे संघर्ष करने वाले प्रतिरोधों की ताकतों और रूपों की जरूरत बढ़ती जा रही है। नव साम्राज्य भूमंडलीकरण के जिस बुलडोजर पर आरूढ़ है उसका एक पहिया बाजार का तथा दूसरा हथियार का है। उस बुलडोजर में रास्ता दिखानेवाली हेडलाइट(फं्रटलाइट ट्रूप्स) संचार क्रांति है, मीडिया है, हवाई तरंग है। चकाचाैंधपूर्ण रोशनी और छवियों भरी हेडलाइट वस्तुतः सामा्रज्यवाद का अगुआ दस्ता है, सांस्कृतिक सेना है।

नव साम्राज्य के दमन अभियान और सांस्कृतिक सेना की संस्कृति से संघर्ष करने का दायित्व जनता की विचारधारा, राजनीति और संस्कृति से जुड़े संगठनों का है। जनता की राजनीति से जुड़े होने या जुड़ने का दावा करने वाले राजनीतिक दलों के आनुषंगिक सांस्कृतिक प्लेटफार्मों में प्रतिरोध की नई संस्कृति की जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है क्यांेकि राजनीतिक दल विचारधारा, सिद्धांत, प्रतिबद्धता, जन सरोकार, भावी कार्यक्रम के मोर्चों पर लगभग चुक गए हैं। हिंदी क्षेत्र तो इसका ठोस प्रमाण है। 10 अप्रैल 1936 को लखनऊ में हुए प्रलेस के पहले अधिवेशन में दिया प्रेमचंद का अध्यक्षीय वक्तव्य नए सिरे से प्रासंगिक हो उठा है-“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महाफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है। उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीें बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सचाई है।” जनता की हस्ती और पस्ती से ज्यादा पार्टी लाइन की अवसरपरस्ती पर भरोसा करने और पीछे चलने की कवायद का नतीजा है कि जनपक्षीय लेखक संगठन लगातार जनता और इतिहास की निगाहों मंे संदेहशील और अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। संस्कृति के विभिन्न मोर्चों पर उनके प्रतिरोधी रूपों की शानदार परंपरा रही है लेकिन चुकने का इतिहास भी क्या कम चिंतनीय है।

जनता, जमीन, जल, जंगल और जन संस्कृति की तबाही का कुचक्र जितना तेज होता जा रहा है उसी अनुपात में हमारे जनपक्षीय लेखक संगठन पेटी बुर्जुआ गतिविधियों के कछुआ धर्म का शिकार होते जा रहे हैं। हिन्दी लेखकों एवं लेखन के हाशिए पर बढ़ते जाने का एक कारण प्रेमचंद की उसी वक्तव्य में है-“हमें अक्सर यह शिकायत होती है कि साहित्यकारों के लिए समाज मे कोई स्थान नहीं। यदि साहित्यकार ने अमीरों का याचक बनने को जीवन का सहारा बना लिया हो, और उन आंदोलनों, हलचलों और क्रांतियों से बेखबर हो जो समाज में हो रही हैं-अपनी ही दुनिया बनाकर उसमें रोता और हंसता हो, इस दुनिया में उसके लिए जगह न होने में कोई अन्याय नहीं है।” दुर्भाग्य से पिछले तीन दशकों से हिन्दी बौद्धिकता आंदोलनों, हलचलों और क्रांतियों से बेखबर जैसी दुनिया बनाती रही वह प्रतिरोध की संगठित परंपरा के लिए घातक सिद्ध हुई है। यह समय प्रतिरोध के नए मोर्चांे, नए विचार और नए कार्यक्रम से लैस होने का है। इस पर बात करने से पहले लेखक संगठनों की ऐतिहासिक प्रतिरोधी भूमिकाओं पर एक नजर डाल लेनी चाहिए।

गुलाम हिंदुस्तान मे जनता, जनता की राजनीति और साहित्य कला के सामने सबसे बड़े प्रश्न थे- कैसी आजादी, किसकी आजादी? कैसा राष्ट्रराज्य, किसका राष्ट्रराज्य? 1930 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा की विफलता, क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रभाव तथा किसान-मजदूर आंदोलनों के दबाव की कोख से प्रगतिशील लेखक संघ और इंडियन पिपुल्स थियेटर का जन्म हुआ। 1930 तथा 40 के दशक में राजनीति से ज्यादा मूलगामी कार्य सामाजिक-सांस्कृतिक मोर्चोंे पर हुए। विभाजित अधूरी आजादी को किसान नेता सहजानंद सरस्वती ने आजादी का फांसी दिवस कहा वहीं नागार्जुन जैसे क्रांतिकारी कवि की कविता बोल उठी- “कागज की आजादी मिलती ले लो दो दो आने में। लाल भवानी प्रगट हुई है सुना कि तेलंगाने में।” संस्कृति की प्रतिरोधी धारा जहां विचारधारात्मक संघर्ष के साथ जनता की सच्ची आजादी की पड़ताल कर रही थी वहीं तत्कालीन कांग्रेसी सत्ता मंें समाजवाद को आकार लेते देखकर वाम राजनीतिक शक्ति संसदीय रेल में बैठी तथा तेलंगाना जैसे जन आंदोलन के दमन अभियान के साथ हो गई। 1953 में प्रगतिशील लेखक संघ को भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने विघटित करवा दिया जब औपनिवेशिक सांस्कृतिक दासता से मुक्त होकर जनता के जनवादी राष्ट्र का निर्माण-अभियान चलना चाहिए था। यह सांस्कृतिक प्रतिरोध को जनता की राजनीति का पहला झटका था।

1960 के दशक तक अदीबों-कलाकारों के सामने यह साफ हो गया कि वैकल्पिक स्वप्न के सांस्कृतिक संघर्ष की जरूरत है। साठ के दशक में कृषि संकट, मिलों की तबाही और हड़तालें, अनगिनत अकाल, सूखा और भुखमरी, युवा पीढ़ी की रोजगारहीनता, सामंती और पंूंजीवादी संरचना का दमनचक्र इतना गहरा गया कि अनेक मोर्चों पर जन आंदोलन आरंभ हो गए। नक्सलबाड़ी सशस्त्र क्रंाति और युवा आंदोलन केंद्रीय भूमिका में आ गए। मुक्तिबोध 1950 से ही इस सवाल को उठा रहे थे कि साहित्य में नए जनवादी मोर्चे की जरूरत है। मुक्तिबोध साहित्य मे नये जनवादी मोर्चे की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं कि “खेत मजदूर, गरीब किसान, प्राथमिक शिक्षक, जनपद द्वारा लिगाए गए करों के बोझ से चूर दरिद्र ग्रामवासी, पटवारी, रिक्शा मजदूर, गाड़ीवान, बिक्री करों से ग्रस्त गरीब दुकानदार- आज सभी शोषण के खिलाफ न सिर्फ आवाज लगा रहे हैं, वरन उससे मुक्ति पाने के कार्य में संलग्न दिखाई पड़ते हैं।” वे प्रतिरोध के संगठित मोर्चे का आहवान करते हैं कि “जनवादी धारा के विरोधी बहुत हैं। जब तक कि साहित्य सृजन, साहित्य सिद्धांत तथा उसका प्रचार- इन सब क्षेत्रों मंे प्रतिक्रियावादियों के खिलाफ संघर्ष और मोर्चेबंदी की जाएगी, तब तक नई धारा का विकास नहीं हो सकता। वह एक ऐतिहासिक अनिवार्यता है जो लाखों विरोधों के बावजूद होकर रहेगी। सवाल यह है कि हम उस अग्नि प्रक्रिया में अपना हाथ कहां तक और कितना बंटाते हैं।” सोवियत लाइन और चीनी लाइन पर वैचारिक असहमतियों के कारण 1964 और 1967 मे जन राजनीति के संगठन विभाजित हुए। अदीबों-कलाकारों के पुराने नए तबकों में प्रतिरोधी उबाल आया जो सत्तर के दशक की रचनाशीलता में दर्ज है।

जनता और राष्ट्र के गहरे दवाब में हुआ 1973 का ऐतिहासिक बांदा सम्मेलन लेखकों की प्रतिरोधी भूमिका की जरूरत बताता है। पहल के प्रयास से छपी चिट्ठियों और मसौदों से पता चलता है कि केदारनाथ अग्रवाल के प्रयास से आयोजित अखिल भारतीय प्रगतिशील हिन्दी साहित्यकार सम्मेलन अतीत के अनेक अनुत्तरित सांस्कृतिक प्रश्नों के प्रति चिंतित था। 22 से 25 फरवरी के बीच हुए अधिवेशन में मन्मथनाथ गुप्त, सज्जाद जहीर, नागार्जुन, त्रिलोचन, विश्वंभरनाथ उपाध्याय, अमरकांत, शिवदान सिंह चौहान, सव्यसाची, सुरेंद्र चौधरी, चन्द्रभूषण तिवारी, धूमिल, वेणु गोपाल, कर्ण सिंह चौहान, खगेन्द्र ठाकुर, आनंद प्रकाश, विजेन्द्र आदि बड़ी संख्या में कई पीढ़ियांे के रचनाकार शामिल हुए। तमाम कोशिशों के बावजूद रामविलास शर्मा नहीं पहुंचे। अधिवेशन में गैरमौजूद डा.नामवर सिंह के पत्र में आग्रह है कि “हम सब के नेता डा. रामविलास शर्मा का आना बहुत जरूरी है।” सम्मेलन ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया कि ”सप्तम दशक मंे देशी विदेशी जन विरोधी शक्तियों से आम आदमी के पक्षधर तत्वों ने लगातार टक्करें ली हैं। प्रगतिशील हिन्दी साहित्यकारों के इस सम्मेलन में यही नया जन उभार प्रतिबिंबित हुआ।”

नए जन उभार की प्रगतिशील बौद्धिकता के पांचसूत्री मसौदे में कई बातें उल्लेखनीय हैं। जैसे, राष्ट्र के जीवन मे साम्राज्यवादी सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के प्रयासों का विरोध, सामंती व्यवस्था के अवशेषों-अंधविश्वासों, धार्मिक रूढ़ियों, सांप्रदायिक विचारों, पुनरोत्थानवादी मान्यताओं तथा विवेकहीन अवैज्ञानिक धारणाओं का विरोध, पिछले 25 वर्षों के दौरान समाजवादी घोषणाओं के बावजूद शासक वर्ग द्वारा हमारे देश में विकसित किये जा रहे पूंजीवाद का विरोध, सांस्कृतिक संस्थानों, अकादमियों, पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रेस और सूचना के अन्य माध्यमों पर इजारेदार घरानों के एकाधिपत्य का विरोध तथा शासक वर्ग द्वारा किये जा रहे लेखकीय स्वतंत्रता के प्रतिरोध और दमन का विरोध। विभिन्न राज्यांे में संगठन संचालन के लिए संपर्क समिति का निर्माण हुआ। अन्य प्रस्तावों मंे एक प्रस्ताव यह भी था कि प्रगतिशील हिन्दी साहित्यकारों का यह सम्मेलन दुख प्रकट करता है कि हथियारबंद कं्राति में विश्वास करने के आरोप में देश भर में तीस हजार से अधिक व्यक्ति, जिनमें कुछ लेखक भी हैं, लंबी नजरबंदियां भोग रहे हैं। सम्मेलन भारत सरकार तथा प्रांतीय सरकारों से मंाग करता है कि नजरबंदियों को रिहा करें तथा उन्हंे अपनी जनता के बीच कार्य करने का अवसर दें। यह सम्मेलन समस्त लेखकों का आहवान करता है कि वे उनकी रिहाई के आंदोलन में भाग लें और नागरिक अधिकारों की रक्षा करें। सम्मेलन ने वियतनाम की अपराजेय जनता का अभिनंदन किया तथा अमेरिका को विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्यवादी देश बताया।

विचारणीय है कि प्रगतिशील लेखकों की कई पीढ़ियां, कई वैचारिक धाराओं के आपसी संघर्षो के बाद यह मसौदा आया था जिसमें शासक वर्ग को एक ओर समाजवादी समझने की राजनीतिक चूक है वहीं साम्राज्यवादी, सामंती और सांप्रदायिक-पुनरोत्थानवादी मूल्यों से वैचारिक संघर्ष करते हुए राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय कं्रातिकारी जन आंदोलनों का व्यापक समर्थन है। हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता से पूर्व प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन आदि किसान आंदोलन के मोर्चे पर जेल मे नजरबंद थे।



आपातकाल हिन्दी लेखकोें के प्रतिरोध के इतिहास और भविष्य का संक्रांतिकाल साबित हुआ। सीपीआई के आपातकाल संमर्थन से प्रगतिशील साहित्यकारों का ढुलमुलकारी खोल उतर गया। राजनीति, विचारधारा और जन सरोकार में आस्था के हिसाब से प्रगतिशील बौद्धिकता विभाजित हो गई। दो साल पूर्व बांदा में शासक वर्ग द्वारा किए जा रहे लेखकीय स्वतंत्रता के प्रतिरोध और दमन का विरोध करनेवाले लेखकों का एक हिस्सा अपातकाल के समर्थन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरूद्ध था। आपातकाल की तानाशाही का विरोध करनेवाले लेखकों को जेल जानी पड़ी, पत्र-पत्रिकाओं का स्थगन हुआ। सत्ता संस्कृति का दमनचक्र जन संस्कृति के विरुद्ध क्रूरतम रूप में मौजूद हुआ। नागार्जुन जैसे क्रांतिकारी लेखकों ने राजनीति से आगे चलने वाली सचाई की मशाल बनने का कार्य किया। यह सच है कि भारतीय संसदीय राजनीति की सीमाओं ने नागनाथ और संापनाथ को एक जैसा बनाया लेकिन नागार्जुन की वैचारिक और रचनात्मक आस्था तेलंगाना से नक्सलबाड़ी तक सशस्त्र कं्राति में थी और संशोधनवाद हमेशा उनके निशाने पर रहा। गोरख पांडेय और आलोकधन्वा तीसरी धारा के संस्कृति मंच निर्माण से पूर्व सांस्कृतिक प्रतिरोध की व्यापक जमीन गढ़ रहे थे जिसका साकार रूप अस्सी के दशक मंे सामने आया।

बीसवीं सदी के अस्सी का दशक सांगठनिक प्रतिरोध का नए सिरे से प्रस्थान दशक है। 1953 में भंग स्वतंत्रता संग्राम कालीन प्रगतिशील लेखक संघ का पुनर्गठन 1980 में जबलपुर सम्मेलन में हुआ। 1982 में जनवादी लेखक संघ गठित हुआ। पटना मंे नव जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, दिल्ली में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक संगठन और बनारस में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के नाम से संचालित तीसरी धारा के लेखकों-कलाकारों के सांस्कृतिक मंचों का जन संस्कृति मंच में एकीकरण 1984 में हुआ। उत्तर प्रदेश जन संस्कृति मंच इसके पहले 1981 में गठित हो चुका था। तीनों लेखक संगठनों की वैचारिक सांस्कृतिक शक्ति और सीमा को समझने के लिए इतिहास के दो नियमों को ध्यान में रखना चाहिए जो आपातकाल के बाद एक बार फिर सच साबित हुए।

इतिहास का पहला नियम यह कि सत्ता द्वारा जनता का प्रत्यक्ष आर्थिक दमन तो संभव है किंतु प्रत्यक्ष सांस्कृतिक दमन असंभव। जनता प्रत्यक्ष सांस्कृतिक दमन का प्रतिरोध अपने अस्तित्व को दांव पर लगाकर करती है। इसलिए सत्ता जनता में सांस्कृतिक वैधीकरण की जटिल प्रक्रिया चलाती है। सत्ता इस प्रक्रिया में पदों, पुरस्कारों, यात्राओं, सुविधाओं, संस्थानों अकादमियों के माध्यम से बुद्धिजीवियों की विचारधारा, रचनाशीलता और सांस्कृतिक स्वप्न को भ्रष्ट करती है तथा उन्हें सत्ता और जनता के बीच सांस्कृतिक वैधीकरण का सेतु बनाती है। आपातकाल के दमन अभियान के बाद चालाक सत्ता वर्ग ने संस्थानों, अकादमियों के माध्यम से सांस्कृतिक करतूत को अंजाम दिया।

इतिहास का एक अन्य बुनियादी नियम यह है कि कोई वस्तु, विचार, आंदोलन या संगठन अपने आंतरिक गुणों और शक्तियों से गठित, गतिशील और विकसित होता है। उसका संघटन और विनाश भी आंतरिक कारणों से होता है। बाहरी परिस्थितियां केवल प्रेरक की भूमिका निभाती हैं। भारतीय जनता की राजनीति करनेवाले दलों और जन संस्कृति की राजनीति करने वाले संगठनों पर भी यह नियम पूर्णतः लागू होता है। आपातकाल में कांग्रेसी सत्ता को साथ देनेवाली भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के आनुषंगिक सांस्कृतिक संगठन प्रगतिशील लेखक संघ का अस्सी के बाद सत्ता संस्कृति से बहुपक्षीय स्तरों पर जुड़ाव हुआ तथा विचारधारात्मक संघर्ष कम होता गया। प्रगतिशील लेखक संघ के सत्ताकरण की प्रक्रिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रमाण पटना प्रगतिशील लेखक संघ का बुलेटिन धारा है जिसके 1985 के पहले साल के चौथे अंक मंे ही बिहार प्रलेस ने नागार्जुन की राजनीति नामक लेख तैयार कर नागार्जुन की क्रंातिकारी राजनीति और संघर्ष प्रक्रियाओं के चित्रण को ढुलमुल और प्रतिक्रियावादी करार दिया। इसमें अपूर्वानंद का लेख था, नंदकिशोर नवल की भूमिका थी और खगेंद्र ठाकुर की बातचीत व साक्षात्कार का हिस्सा था। नागार्जुन का यह शताब्दी वर्ष है। कांग्रेसपरस्त बौद्धिकता की उपलब्धि, जन आंदोलन विरोधी विचारधारा और सांप्रदायिक शक्तियों से समझौतापरस्ती का प्रलेसी रूप हमारे सामने है। इस अंधेरे समय में प्रतिरोध की धाराओं पर फिर एकबार जन अदालत में बहस शुरू हानी चाहिए। दूसरी बात, अस्सी के दशक की हिन्दी रचनाशीलता चौथे दशक के प्रगतिवादी आंदोलन और सातवें-आठवें दशक के जनवादी आंदोलन के दौरान शुरू किए गए संघर्ष प्रक्रियाआंें के चित्रण का क्षेत्र छोड़कर व्यक्तिवादी अनुभवों और मध्यवर्गीय उत्सवधर्मी चिंताओं में धंस गई। जनवादी लेखक संघ की सीमा यह थी कि इसके लेखकों का मुख्य आधार क्षेत्र हिन्दी प्रदेश था जबकि विचारधारात्मक राजनीति के आधार क्षेत्र गैर हिन्दी प्रदेश। लेकिन केंद्रीय सत्ता से राजनीतिक संघर्ष के कारण इस संगठन की जनबद्धता कुछ ज्यादा धारदार थी।

पिछला दो दशक विश्व राजनीति, भारतीय जनतंत्र और भारतीय जनता के इतिहास में सभ्यता का सर्वाधिक उथल पुथल भरा समय खंड है। उत्पादन प्रणाली, और उत्पादन संबंध के नए रूप ने न केवल राजनीतिक-सामाजिक संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया है बल्कि विचारधारा, संस्कृति और साहित्य के मसले पर भी मूलगामी ढंग से विचार करने का अवसर दिया हैं। पिछले समय में जनपक्षीय लेखक संगठनों के सांस्कृतिक-वैचारिक चिंतन मनन का कार्यभार बढ़ा वहीं विघटन और ध्वंस के दौर से गुजर रही समाज व्यवस्था के दुखों और मुक्ति संघर्षो में सहयात्री होने तथा प्रक्रियाओं को रचनाशीलता में बदलने की जिम्मेदारी भी गुरुतर हुई। इस नजरिए से तीनों लेखक संगठनों की प्रतिरोधी भूमिकाओं और सांस्कृतिक वैचारिक सीमाओं पर सैद्धांतिक-व्यावहारिक ढंग से थोड़ा विचार होना चाहिए।

सदी के अंतिम दशक के आरंभ में समाजवाद के पुराने मॉडल सोवियत संघ का बिखराव, चीनी मॉडल का पूंजीवाद के रास्ते पर तीव्र प्रस्थान, भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक फासीवाद का उभार, आरक्षण की राजनीति से क्षेत्रीय दलों का संसदीय वर्चस्व ऐसी घटनाएं हैं जिन्होंने जनपक्षीय लेखक संगठनों के वर्ग दृष्टिकोण और वर्ग संघर्ष के सांस्कृतिक रचनात्मक एजेंडे को हिलाकर रख दिया। विभ्रमकारी सामा्रज्यवाद विरोधी दृष्टिकोण, सांप्रदायिकता को लेकर संसदीय तुष्टीकरण का चिंतन तथा कांग्रेसी और क्षेत्रीय अस्मिताओं के बीच दो पाटन के बीच पीसते चले जाने की नियति के कारण जहां वाम राजनीति रसातल की ओर बढ़ती गई वहीं प्रलेस और जलेस जैसे लेखक संगठनों में आनुषंगिक मशाल के लिए जरूरी तेल, कपड़े और हाथ तीनों कम होते गए। दो दशकों के विचारधारात्मक हस्तक्षेप और विचलन देानों को लेखक संगठनों के रुख से समझा जा सकता है।

तीनों लेखक संगठनों के लखकों के सांगठनिक आधार क्षेत्र पर ध्यान दीजिए तो प्रलेस मध्य प्रदेश, बिहार ओर राजस्थान में ज्यादा सक्रिय है, जलेस दिल्ली विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में गतिशील है तथा जन संस्कृति मंच बिहार और उत्तर प्रदेश में संघर्षशील है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद तीनों संगठनों ने संस्कृति संगम नाम से अनेक साम्प्रदायिकता विरोधी सेमिनार किए। भाजपा के केंद्रीय शासन और गुजरात दंगांे के दौरान जलेस की सांप्रदायिकता विरोधी भूमिका प्रशंसनीय रही। 1857 को लेकर तीनों संगठनों ने न केवल अनेक आयोजन किए बल्कि लेखन-प्रकाशन अभियान भी शानदार ढं़ग से चलाया। जनसंस्कृति मंच का भगत सिंह शताब्दी वर्ष के बहाने अनेक जनपदों में विचार अभियान महत्वपूर्ण रहा। बनारस में वाटर फिल्म शूटिंग पर हमले के दौरान तीनों संगठनों का साझा प्रतिरोधी प्रयास, नंदीग्राम के विरूद्ध और तसलीमा नसरीन के समर्थन में जसम का कलकत्ता मार्च ऐतिहासिक महत्व रखता है।

साम्राज्यवाद विरोध, सांप्रदायिक फासीवाद विरोध तथा सामंती-ब्राहमणवादी विचारधारा से संघर्ष-तीनों मोर्चों पर हमारे लेखक संगठन पेटी बर्जुआ अवसरवाद, सुविधावाद और व्यवहारवाद के शिकार रहे हैं। आंतरिक जनतंत्र का अभाव, आलोचना और आत्म आलोचना के स्पेस को लगातार कम करने की प्रवृति और नेतृत्व की पूंजीवादी-सामंती मनोगत वृत्तियों के कारण लेखक संगठन लगातार अप्रासंगिक हुए हैं।संगठनों में जेनुइन लेखकों से ज्यादा संगठन के लेखक हावी होते रहे हैं। बिहार प्रलेस इसका अच्छा उदाहरण है। वहां के वर्तमान महासचिव सीपीआई के पूर्व विधायक हैं, मजदूरों और ठीकेदारों से धन उगाही के उस्ताद हैं, तथा जलसा भोज के कुशल प्रबंधक भी हैं। इस गुण की बदौलत वे विधान सभाई भाषणों की किताब छपाकर लेखक कहलाते हैं, देशभर के साहित्यकारों को अपने कस्बे में बुलाकर जबरदस्त जलसा कराते हैं, अपने ऊपर फिल्म बनाकर शो चलाते और बुद्धिजीवियों पर धाक जमाते हैं तथा पार्टी और प्रतिबद्ध लेखकों को हांकते चराते हैं। संगठन में आंतरिक जनतंत्र इतना कम है कि जिस उम्र में नेतृत्व को आदरणीय और फादरणीय मंडल में लौट जाना चाहिए, उस उम्र में नेतृत्व संगठन को पालकी और पालने की तरह इस्तेमाल करता है।

साम्राज्यवाद विरोध का एक रूप वामपंथियों के सहयोग से निर्मित कांग्रेसी सत्ता के दौरान हमारे सामने आया तो दूसरा रूप पश्चिम बंगाल मे नंदीग्राम, सिंगूर के साम्राज्य विरोधी जन आंदोलन के वक्त। जनवादी लेखक संघ की भूमिका कितनी कं्रातिकारी रही कि नंदीग्राम के किसानों के समर्थन मंे पश्चिम बंगाल के सैकड़ों कलाकार-लेखक सड़क पर उतरे लेकिन हिन्दी प्रदेश के जलेसी पार्टी लाइन पर बहस करते रहे। नंदीग्राम विरोधी भूमिका पर पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचना के हस्ताक्षर पत्र पर जलेस के संस्थापक सदस्य एवं प्रथम महासचिव चंद्रबली सिंह ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। आदिवासी किसानों क जल, जंगल जमीन और खनिज को लूटनेवाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सरकार की दमनकारी हिंसा को सहयोग देने वाले और सलवा जुडुम के समर्थक लोगों के सांस्कृतिक अभियान में प्रलेस, जलेस और जसम की भूमिका जगजाहिर है।

जहां तक सांप्रदायिक फासीवाद के विरोध का प्रश्न है, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ प्रलेस की स्थानीय इकाइयों का सांप्रदायिक सत्ता के पदों, पुरस्कारों विज्ञापनों और सुविधाओं से कितना गहरा संबंध ह,ै हिंदी बुद्धिजीवियों को बताने की जरूरत नहीं। प्रलेस के मुखिया नामवर सिंह राजनाथ सिंह और जसवंत सिंह के मंच पर जाते है, भाजपाई सरकार के मुख्य अतिथि बनते है तथा भाजपाई मुख्यमंत्री को बुलाकर अपनी पूर्व पाठशाला में सम्मानित हाते हैं। पिछले दिनों यूपी प्रलेस राज्य सम्मेलन के मंच से नामवर सिंह का यह कहना कि सोवियत संघ के विघटन के बाद विचारधारा गैरप्रासंगिक चीज हो गई है, बताता है कि सांप्रदायिकता के एजेंडे पर बहस के लिए प्रलेस के पास कुछ नहीं है। तसलीमा नसरीन के बंगाल और देश निष्कासन पर निर्णयकारी आंदोलन का न करना तथा मकबूल फिदा हुसैन जैसे चित्रकार का विदेशी नागरिकता लेना ऐसे प्रश्न हैं जो लेखक संगठनों के धार्मिक और सांप्रदायिक रुख को स्पष्ट कर देते हैं। कलाकारों-लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अस्तित्व की लड़ाई लेखक संगठन नहंी लडें़गे तो किससे उम्मीद की जा सकती है।

आजकल अच्छी और बुरी सांप्रदायिकता की बहस बुद्धिजीवियों का अवसरवादी शगल है। जनवरी 1934 की प्रेमचंद की टिप्पणी नए सिरे से बहस के केन्द्र में आनी चाहिए कि “अगर सांप्रदायिकता अच्छी हो सकती है तो पराधीनता भी अच्छी हो सकती है, मक्कारी भी अच्छी हो सकती है, झूठ भी अच्छा हो सकता है-क्योंकि पराधीनता मंे जिम्मेदारी की बचत होती है, मक्कारी से अपना उल्लू सीधा किया जाता है और झूठ से दुनिया को ठगा जाता है।“ बनारस में अच्छी और बुरी सांप्रदायिकता के दो उदाहरण लेखक संगठनों से जुड़े हैं। कुछ वर्ष पूर्व बेनियाबाग पुस्तक मेले में उग्र हिन्दुत्व संगठन शिवसेना ने हिन्दू धर्म की आलोचना करने वाली एक पुस्तक के प्रकाशन का स्टाल उजाड़ दिया और किताब की प्रतियां जलाई। दूसरे दिन जलेस के तत्कालीन जिला अध्यक्ष ने उस कृत्य का समर्थन किया। दूसरी घटना जसम की है।बनारस जैसी जगह जहां सत्तर और अस्सी के दशक में गोरख पांडेय, माहेश्वर और अवधेश प्रधान जैसे तीसरी धारा के बुद्धिजीवी रात दिन सांस्कृतिक क्रांति का सपना बुनते थे, इन दिनों जन संस्कृति लेखकविहीन निर्जन संस्कृति बनी हुई है। एक दशक से जिला सम्मेलन तक नहीं हुआ है। विनोद मिश्र जैसे क्रांतिकारी विचारक के विचार का संवहन करनेवाली जन संस्कृति बनारस मंे सांप्रदायिक एवं पुनरोत्थानवादी सत्ता व रचनाशीलता से संबद्ध विद्यानिवास मिश्र की बासमती गंधी श्राद्धोत्सव संस्कृति में सक्रिय भूमिका निभाती हो तथा बुद्धि दर्शन से ज्यादा बल प्रदर्शन में भरोसा करती हो वहां प्रेमचंद के सांप्रदायिकता संबंधी चिंतन के लिए कोई जगह नहीं बचती है।

लेखक संगठनों में सामंती-ब्राहमणवादी मनोवृत्तियांें के हावी होने के कारण वर्ग और वर्ण की संश्रयकारी बहसों को निर्णायक रास्ता नहीं मिला। दलित और स्त्री अस्मिताओं की वर्गीय मुक्ति का प्रश्न वामपंथी लेखक संगठनों का कभी केंद्रीय प्रश्न नहंीं बन पाया। नतीजा सामने है कि वर्ग संघर्ष और वर्ग दृष्टिकोण से दूर जाते हुए ये सांस्कृतिक विमर्श साम्राज्यवादी ताकतों के इस्तेमाल की संस्कृति बन रहे हैं।

जनचेतना निर्माण के मोर्चों पर जनपक्षीय सांस्कृतिक संगठन दक्षिणपंथी सांस्कृतिक संगठनों से बहुत पीछे छूट गए हैं। तैंतीस हजार स्कूलों, दर्जनों प्रेस, सैकड़ों पुस्तिकाओं और स्थानिक संगठन निर्माण के माध्यम से सांप्रदायिक पनरुत्थानवादी विचारधारा ने जनता के दिमागों में जहर घोलने का अभूतपूर्व कार्य किया है। गोलवलकर से लेकर सुदर्शन तक के विचारों के जनोन्मुख शैली में पुस्तिका निर्माण और वितरण ने सांप्रदायिक संस्कृति के विस्तार मंे अहम भूमिका निभाई है। दूसरी ओर राहुल सांस्कृत्यायन, नागार्जुन और सव्यसाची जैसे लेखकों की पुस्तिका निर्माण परंपरा को आगे बढ़ाने में लेखक संगठन असफल रहे। पिपुल्स पब्लिसिंग हाउस बेच दिया गया। इन दिनों पीपीएच पाठय पुस्तकों की महंगी किताबें छापता है। लेखक संगठनों के मुख पत्र वसुधा, नया पथ, समकालीन जनमत के अंकों का कार्य साहित्य और विचारधारा की नई संस्कृति या प्रस्थानक संस्कृति का निर्माण जनोन्मुख भाषा और शैली में करना था लेकिन लंबे समय से वे विश्वविद्यालीय गरिष्ठ व कट एंड पेस्ट चिंतन प्रणाली से ग्रस्त रही हैैैं। तीनों पत्रिकाओं की जरूरत अग्रगामी विचार और साहित्य के दिशा निर्देशन की रहीे है, वर्चस्व और प्रतिरोध की संस्कृति को तीव्रतर करने की रही है तथा जन संघर्षो के अनुभवों को लेखकों-पाठकों तक पहुंचाने की रहीं है। इस कार्य मंे वे पूर्णतः असफल हैं। इप्टा की इकाइयां निष्क्रिय हैैं तथा जन नाटय मंच शहरों में नाटय प्रदर्शन करता है। क्रंातिकारी कवि महेश्वर द्वारा 1981 में स्थापित हिरावल की पटना इकाई और बनारस के कला कम्यून के सहारे जन संस्कृतिमंच का श्रव्य-दृश्य अभियान चलता है।

निःसंदेह लेखक संगठनों की इतिहास में प्रतिरोध की क्रांतिकारी भूमिका रही है लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उन्हें वैचारिक और रचनाकार स्तर पर नए सिरे से संगठित, क्रियाशील और प्रतिबद्ध हाने की जरूरत है। नंदीग्राम सिंगूर और सलवा जुडुम जैसी सांस्कृतिक घटनाएं ऐसे प्रस्थान बिंदु हैं जहां से वे भरतीय समाज में परिव्याप्त मुख्य अंतर्विरोध तथा अंतर्विरोध के मुख्य और गौण पहलुओं की पहचान करते हुए सांस्कृतिक संघर्ष तेज कर सकते हैं। सोवियत संघ के ढह जाने के बाद जार्ज आरवेल के अन्यास एनिमल फार्म को फिर से पढ़ने की जरूरत है। नव साम्राज्य जिस बर्बर दुनिया का निर्माण कर रहा है वहां जनपक्षीय राजनीति और संस्कृति से जुड़े संगठनों के लिए एनिमल फार्म का यह गीत वास्तविक और छदम चेतना की पहचान में मदद करेगा-

चार पैर अच्छा

दो पैर ज्यादा अच्छा

अथवा

सारे जानवर बराबर हैं

पर कुछ जानवर औरों से ज्यादा बराबर हैं



इन गीत पंक्तियों मंे चार पैर समाजवादी संस्कृति के प्रतीक हैं तथा दो पैर पंूजीवादी संस्कृति केे। हमारे जनपद मंे एक किस्सा मशहूर है कि सोवियत के जमाने मंे एक कामरेड लेखक थे। उनके पुत्र अभियंता बनने रूस भेजे गए, पांच साल के बाद वे अखरोट व्यापारी बनकर भारत लौटे। कहते हैं, 1992 के बाद हिन्दी के अनेक कामरेड लेखकों बुद्धिजीवियों का यही धंधा अमेरिका के साथ आरंभ हुआ है। अंततः यह बाजार का युग है जिसे लेखक-कलाकार सुविधा के लिए डंडीमार विचार का युग कहते हैं। जनता के सरोकार से कटकर कोई संस्कृति आमूल रूपांतर की दिशा में नहीं जाएगी।