यह टिपण्णी परिकथा के युवा आलोचना विशेषांक के परिचर्चा स्तम्भ में भी छपी है.रामाज्ञा शशिधर
1. मैं पिछल्ो दो दशक की युवा हिन्दी आलोचना को हिन्दी आलोचना का हड़ताल युग मानता हूँ। जहाँ रचना समय के गति और द्वन्द्व को पकड़ने की कोशिश करती हुई लगातार सक्रिय है, आलोचना समय और रचना से जरूरी मांगों के कारण नहीं अपनी ऐतिहासिक पस्ती और वैचारिक समझौतापरस्ती के कारण कर्म का मैदान छोड़कर हड़ताली मुद्रा में दिख रही है। मैं नब्बे के दशक से पूर्व की आलोचना को पड़ताली आलोचना मानता हूँ। इस मध्य आलोचना की एक नई प्रवृत्ति भी विकसित हुई है जिसे करताली आलोचना कहा जा सकता है।