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10 नवंबर, 2017

मालवीय चबूतरे पर गिरिजा देवी की याद में संगीत विमर्श

आज ठुमरी की मल्लिका अप्पा जी को  बीएचयू  के मालवीय चबूतरे पर अनोखे रंग और ढंग से याद किया गया।गिरिजा देवी की याद में 'संगीत और शब्द' विषय पर आयोजित चबूतरा चर्चा में कैम्पस,नगर और देश के
संगीत रसिकों और विमर्शकारों ने हिस्सा लिया।
    सुबह 8.20 पर गिरिजा देवी के फेन जुट चुके थे।बारी बारी से संगीत प्रेमी आते गए और मालवीय चबूतरे का विमर्श कारवां बढ़ता गया।जहाँ कैम्पस भर के विभिन्न विषयों के छात्र छात्राएं संगीत विमर्श के लिए  आए वहीं स्थानिक गुरुओं के अतिरिक्त मुंबई से मनोज भावुक,देवरिया से जनार्दन सिंह तथा नगर से प्रो सत्यदेव त्रिपाठी,वाचस्पति और आशीष पांडेय को संगीत विमर्श खींच लाया।
     
          संगीत परिचर्चा की अध्यक्षता वाचस्पति ने की तथा परिचर्चा संचालन चबूतरा संस्थापक डा रामाज्ञा शशिधर ने किया।
        बनारस घराने की शान और पूरब अंग की गायकी की पहचान गिरिजा देवी के गायन का गंभीर विश्लेषण
करते हुए संगीत समीक्षक डा आशीष पांडेय ने कहा कि
गिरिजा देवी ने ठुमरी को श्रृंगार और मनुहार से निकालकर विश्व भर में रूहानी दर्जा दिलाया।संगीत जगत में गिरिजा देवी संगीत का पर्याय हैं।गिरिजा देवी ने काशी की गलियों की क्रियोल भाषा में ठुमरी के बोल दिए वहीँ आम जीवन से लोकधुनों को चुनकर उन्हें राग
के रथ पर सवार किया।गिरिजा देवी ने ठुमरी को रागों का गुलदस्ता बना दिया।गिरिजा देवी के कंठ में अनूठी मिठास और खनक के मेल ने साहित्यिक अन्योक्ति के सहारे ठुमरी को अभूतपूर्व ऊंचाई दी।
      नाट्य समीक्षक प्रो सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि गिरिजा देवी ने ठुमरी में प्रेम,स्वप्न और भक्ति की ऐसी
त्रिवेणी बहाई जिसका दीवाना सदियों तक ज़माना रहेगा।गीतकार मनोज भावुक ने कहा कि गिरिजा देवी पूरबिया सेमिक्लासिकल की जड़ हैं जिनके बिना संगीत की नई पीढ़ी प्लास्टिक का फूल साबित होगी।भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि गिरिजा देवी में संगीतकार के भीतर
गुरू शिष्य परंपरा का एक आदर्श शिक्षक था।उन्होंने ठुमरी को भोजपुरी गीतों की अश्लीलता के बरक्स अध्यात्म का मार्ग दिया।जनार्दन सिंह ने कहा कि भोजपुरी की हाइटेक और अश्लील संगीत पीढ़ी को गिरिजा देवी से सच्चे संगीत और लोक की नई नई प्रयोगशीलता सीखनी चाहिए।
       अरुण तिवारी ने कहा कि जिस समाज में संगीत का विकास होता है वह संवेदनशील और लोकतांत्रिक
समाज बनता है।एथेंस से भारत तक इसके उदाहरण हैं।नेहा ने कहा कि गिरिजा देवी ने गुलाम देश में सामंती
परिवार से बाहर निकलकर स्त्री मुक्ति
की राह दिखाई।सम्भवतः गिरिजा देवी संकट मोचन के संगीत मंच पर क्लासिकल गायन करने वाली प्रथम स्त्री
कलाकार थी।पंकज कुमार ने कहा कि गिरिजा देवी चलती फिरती संगीत सभा थी।वे जितनी बड़ी गायिका थीं उससे बड़ी सम्बंधजीवी बनारसी संस्कृति थी।
      

04 सितंबर, 2014

मुक्तिबोध की कविता 'अँधेरे में' पर पुनर्विचार

रामाज्ञा शशिधर 

*सभ्यता का हर दस्तावेज बर्बरता का भी दस्तावेज होता है। -वाल्टर बेंजामिन

*अचेतन ‘अन्य’ का विमर्श क्षेत्र है। – लाकां

यह मुक्तिबोध की अंतिम कविता अंधेरे में का पचासवां साल है। अंधेरे में कविता 1957 से 1962 के बीच रची गई, जिसका अंतिम संशोधन 1962 में हुआ तथा प्रकाशन ‘आशंका के द्वीप: अंधेरे में’ शीर्षक से कल्पना में नवंबर 1964 में हुआ। यह मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब भारत: इतिहास और संस्कृति का भी पचासवां साल है। ग्वालियर से 1962 में प्रकाशित होने और मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद जबलपुर न्यायालय द्वारा 1963 में किताब के प्रतिबंधित अंश हटाकर अतिरिक्त छापने के फैसले का यह पचासवां साल आशंका के द्वीप भारत के अंधेरे को ज्यादा विचारणीय बना देता है। यह अनायास नहीं है कि अंधेरे में की जब पचासवीं सालगिरह मनायी जा रही है, तब मुक्तिबोध की प्रतिबंधित किताब पर कहीं कोई बहस नहीं है। शायद इसका जवाब भी अंधेरे में कविता में मौजूद है।
अंधेरे में फैंटेसी में निर्मित कविता है। स्वाधीनता के छियासठ और भूमंडलीकरण के बाईस वर्षों बाद भारतीय समय, समाज, सत्ता और राष्ट्र का अंधेरा फैंटेसीमय हो गया है। मध्यवर्ग का चरित्र ज्यादा पतित हो गया है। आम जनता से उसका लगभग संबंध विच्छेद हो गया है। सत्ता के साथ वह ज्यादा नाभिनालबद्ध है। बौद्धिक वर्ग पूर्णत: रक्तपाई वर्ग का क्रीतदास हो गया है। राष्ट्रवाद, वर्गचेतना, सर्वहारा, जनक्रांति आदि शब्द मध्यवर्ग के शब्दकोश से गायब हो गए हैं। पश्चिमी आधुनिकता और कॉरपोरेट पूंजी राष्ट्रराज्य से गठबंधन कर जनता के सामने तानाशाह की भूमिका में है। शीतयुद्ध समाप्ति के बाद रहा-सहा मार्क्‍सवादी संस्कृति चिंतन बासी कढ़ी में उबाल की तरह दिखता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा सभ्यतागत विनाश के आखिरी कगार पर विस्थापन, आत्महत्या, दमन और संघर्ष में संलग्न है लेकिन मध्यवर्ग और क्रीतदास बौद्धिक वर्ग का उससे किसी तरह का सृजनशील जुड़ाव नहीं है। वैश्विक सत्ता प्राकृतिक संसाधन और गांव-खेत के साथ मानव अचेतन के तिलस्मी इलाके पर भी उच्च तकनीकी संस्कृति के माध्यम से कब्जा कर चुकी है। अस्तित्व और चेतना का पूरा इलाका राजनीति, बाजार और भाषा के पाखंड एवं झूठ से पटा हुआ है। ‘अंधेरे की’ फैंटेसी ने रहस्य और जादू के जटिल खेल में पूरी सभ्यता को उलझा दिया है।
सभ्यता संकट के इस सर्वग्रासी दौर में ‘अंधेरे में’ कविता पाठकों के लिए एक नई रोशनी का काम कर सकती है। लेकिन हिंदी आलोचना के मठवाद और गढ़वाद ने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का अंधेरा और बढ़ा दिया है। दिलचस्प है कि हिंदी आलोचना के फैंटेसी जैसे कला रूप से भले संबंध नहीं हो, लेकिन ‘अंधेरे में’ जैसी कविता की आलोचना के क्रम में उसका फैंटेसीमय गड्डमड स्वप्नचित्र देखने लायक है। क्लासिक मार्क्‍सवादी और यथार्थवादी आलोचक रामविलास शर्मा के लिए इस कविता पर एक ओर विकृत मनोचेतना के रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सात्र्र के खंडित व्यक्तित्व के अस्तित्ववाद का। आधुनिकताबोध और नई समीक्षा से प्रभावित नामवर सिंह के लिए वहां भाषिक एवं साहित्यवादी अस्मिता की खोज है, वहीं स्थूल मार्क्‍सवादी प्रभाकर माचवे के लिए वह ‘गुएरनिका इन वर्स’ है। शमशेर के लिए यह कविता देश के आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रतापूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है तो कलावादी अशोक वाजपेयी के लिए ‘खंडित रामायण’। एक आलोचक को इसमें लंदन की रात दिखती है तो दूसरे कवि को जापानी फिल्म का जंगल। बात यहीं ठहर जाये तो गनीमत है। तिलस्मी खोह में कुहासा बढ़ाने के लिए हिंदी आलोचना की हांफती हुई युवा पीढ़ी मुक्तिबोध पर किताब लिखती है तथा मार्शल लॉ लगाने वाली शक्ति से पुरस्कृत होती है। यहां गाइड छाप पदोन्नतिमूलक समीक्षा की चर्चा करना व्यर्थ है जिसे हिंदी आलोचना में ‘कूड़ावाद’ के प्रर्वतन का श्रेय दिया जाना चाहिए। जितनी चेतना मध्यवर्ग की तथा फैंटेसी की टूटी बिखरी हुई नहीं होती है, उससे ज्यादा कविता की आलोचना की है। विचारणीय है कि व्यक्तिपूजा और कर्मकांड से ग्रस्त हिंदी मनीषा पिछले समय में नदी के द्वीप के अज्ञेय की जिस तल्लीनता से पूजा-पाठ कर थी, इस वर्ष से आशंका के द्वीप: अंधेरे में के कवि मुक्तिबोध का उसी सम पर भजन-कीर्तन शुरू कर चुकी है। ऐसी परिस्थिति में मुक्तिबोध की इस कविता की आलोचना आग में पूरी हथेली डालने जैसा काम है।


‘अंधेरे में’ कविता के विश्लेषण-मूल्यांकन का संकट वस्तुत: उसमें प्रयुक्त फैंटेसी कलारूप, अचेतन विश्लेषण एवं मनोभाषिकी के संबंधों को ठीक से नहीं साधने-समझने का संकट है। यह समस्या हिंदी में जितनी बड़ी कलावादियों के सामने रही है, उससे कम बड़ी क्लासिक/ मार्क्‍सवादियों के लिए नहीं। वस्तुत: उपनिवेशित आधुनिकता के प्रचंड प्रभाव से पीडि़त हिंदी का ज्ञानकांड चेतन-अचेतन में जरूरत से ज्यादा यथार्थवाहक और पश्चिमोन्मुख है। इसकी जड़ें पुराने औपनिवेशिक ज्ञानकांड से नव साम्राज्यी चेतना कांड तक महीन रूप से फैली हुई हैं। अंधेरे में आधुनिक हिंदी में अकेली कविता है जो चार सौ साल के औपनिवेशिक ज्ञानकांड और कला रूप को बहुआयामी चुनौती देती है।

मुक्तिबोध ने गहरी साधना से इस काव्यरूप को अपने लिए संभव किया था। वे एक साथ सत्ता, व्यवस्था और सभ्यता के सच्चे समीक्षक थे। इसके लिए उन्होंने पूरा जीवन दांव पर लगा दिया तथा इस कारण उनकी अकाल मौत हुई। फैंटेसी एक यातनाकारी काव्यरूप है जो कलाकार से पूरा जीवन मांगती है। फैंटेसी ऐसा कलारूप है, जो मानव मन के चेतन, अवचेतन और अचेतन में विशिष्ट ढंग से आवाजाही करते हुए स्वप्न बिंबों की शृंखला का भाषिक सृजन करती है। फैंटेसी जाग्रत स्वप्न चित्रावली है। परिवेश के दमन और दबाव से फैंटेसी की शक्ति बढ़ती है। प्रतिरोध का आधार अंतर्वस्तु के रूप में भी होता है। फैंटेसी एक भाववादी किंतु क्रांतिकारी शिल्प है जो आधुनिकता और यथार्थ के दमनकारी एवं गैरलोकतांत्रिक रूपों का संकेत अपनी उपस्थिति से ही नहीं करती है बल्कि रचना प्रक्रिया के दौरान अंतर्वस्तु चित्रण के माध्यम से दमन प्रक्रिया से भी साक्षात्कार कराती है।
मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ को चरित्र, आख्यान और विचार तीन बिंदुओं के माध्मय से समझने की कोशिश होनी चाहिए। ‘अंधेरे में’ के दो नायक हैं। एक काव्य नायक, दूसरा स्वप्न नायक। पहला ‘मैं’ है तथा दूसरा उसका ‘अन्य’। दोनों के घात-प्रतिघात से कविता के आख्यान का विकास होता है। आठ खंडों में विभाजित महाकाव्यात्मक उपाख्यान के लिए यह कविता काव्य नायक और और स्वप्ननायक की विभाजित चेतना को एक करने का प्रयास करती है तथा ‘अन्य’ में ‘मैं’ का व्यक्तित्वांतरण कर सत्ता, व्यवस्था और सभ्यता के मूलगामी प्रश्नों का हल खोजती है।
काव्य नायक का स्वप्न नायक में विलोप कैसे होता है? कविता में काव्य नायक कवि और मध्यवर्गीय बौद्धिक वर्ग है। वह आधुनिकताबोध से ग्रस्त मनुष्य है। स्वतंत्रता के बाद उसकी चेतना बहुविभाजित, बहुखंडित और जनविरोधी हो गई है। वह नदी का द्वीप है। यह औपनिवेशिक दृष्टि पश्चिमी ज्ञानवाद, तर्कप्रणाली, जीवनशैली और मशीनी सभ्यता के कारण हुई है। काव्य नायक का ‘अहं’ प्रचंड व्यक्तित्ववाद का शिकार है। काव्य नायक की छटपटाहट से कविता आरंभ होती है तथा वह स्वप्ननायक को मनु, श्वेत आकृति, रक्तालोक स्नात पुरुष, संभावित स्नेह सा प्रिय, आजानुभुज, रहस्यमय व्यक्ति, अब तक न पाई गई अभिव्यक्ति, आत्मा की प्रतिमा, हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव, निज संभावना और प्रतिभा आदि के रूप में बार-बार देखता है। आत्मालोचन और आत्मग्लानि के माध्यम से काव्य नायक धीरे-धीरे स्वप्न नायक के पास पहुंचता है, एकाकार होता है, दमन सहता है, संघर्ष करता है और अंतत: उसके अस्तित्व का विलय हो जाता है। फैंटेसी द्वारा विलोपीकरण की प्रक्रिया अचेतन मन के भीतर मुमकिन होती है।
मन की तीन अवस्थाएं होती हैं—चेतन, अवचेतन, अचेतन। जीवनानुभव का दो तिहाई हिस्से यथार्थ और भाषा दोनों अचेतन में रहते हैं। कला के दो क्षण यहीं घटित होते हैं। मन के तीन रूप होते हैं—बाह्य मन, प्रतीक मन और कल्पना मन। प्रतीक मन में भाषा-मिथक होते हैं जो सामूहिक अचेतन का प्रतिनिधित्व करते हैं। कल्पना मन तो अचेतन का वह इलाका है जहां फैंटेसी घटित होती है। जब काव्य नायक का ‘मैं’ और स्वप्न नायक का ‘अन्य’ कल्पना मन में पहुंचते हैं तथा कला के तीसरे क्षण में संवेदन उद्देश्य से प्रेरित होते हुए पिघल जाते हंै तब वहीं दोनों की एकता होती है। फिर स्वप्न चित्र प्रतीक मन में आकर भाषिक संरचना में ठोस रूप में तब्दील हो जाते हैं। इस तरह ‘मैं’ और ‘अन्य’ का अचेतन इलाके में विलोपीकरण होता है। इसे मुक्तिबोध कला के तीन क्षण और संवेदन उद्देश्य द्वारा अपनी तरह से आलोचना में व्याख्यायित करते हैं।
पूंजीवाद की बुनियादी विशेषता है कि वह संरचना, अवधारणा और अनुभव के क्षेत्र में दरार पैदा कर देता है—सार्वजनिक और निजी के बीच, सामाजिकता और मनोविज्ञान के बीच, राजनीति और काव्य के बीच, इतिहास, समाज और व्यक्ति के बीच। इस कारण वैयक्तिक विषय में हमारा चिंतन विकलांग हो जाता है। समय और बदलाव के बारे में हमारी सोच लकवाग्रस्त हो जाती है। इस तरह पूंजीवाद हमें हमारी वैयक्तिक अभिव्यक्ति से अलग-थलग कर देता है (फ्रेडरिक जेम्सन)। यह समस्या स्थूल समाजशास्त्रीय और मार्क्‍सवादी दोनों दृष्टियों पर समान रूप से लागू होती है। मुक्तिबोध के संदर्भ में इसके सबसे बड़े उदाहरण रामविलास शर्मा हैं। मुक्तिबोध की कविता इसी पूंजीवादी दृष्टि की शिकार हुई।
औपनिवेशिक आधुनिकता के दमनकारी, तानाशाह, एकांगी, यथार्थवादी, तर्कप्रधान, मशीनी एवं तकनीकी सत्य को चुनौती देने के लिए मुक्तिबोध ने फैंटेसी प्रविधि का प्रयोग किया। लेकिन उत्तर आधुनिकता से उपजी समस्या के दौर में फैंटेसी का महत्त्व और बढ़ गया है। उत्तर आधुनिकता ने यथार्थ को छवियों में बदल दिया है तथा समय को वर्तमान क्षणों में खंडित कर दिया है। मुक्तिबोध द्वारा अर्जित फैंटेसी प्रविधि आज उत्तर आधुनिक वायवीय एवं भ्रममूलक स्वप्न छवियों तथा समय के खंडित क्षणों को साहित्य की दुनिया में चुनौती देने में सर्वाधिक सक्षम कलारूप है। अंधेेरे में कविता की समकालीनता इस कसौटी पर और बढ़ गई है। फैंटेसी साहित्य रचना के क्रम में एक ओर भाषा के खोए हुए जीवनमूल्य और अर्थमूल्य को पुनर्सृजन द्वारा लाती है तथा दूसरी ओर यथार्थ की बाह्य मन में मौजूद वस्तु संरचना तथा कल्पना मन में प्रवाहित स्वप्न संरचना के विभ्रममूलक एवं आडंबरीकृत परत को हटा देती है। संभवत: फैंटेसी शिल्प के कारण ‘अंधेरे में’ का काव्य नायक मध्यवर्गीय मिथ्या चेतना से मुक्त होकर रेडिकल वर्ग चेतना से संपन्न होता है। इस कविता के काव्य नायक की सर्वहारा के स्वप्न नायक से एकता का प्रश्न कविता में चेतना और अस्तित्व दोनों स्तरों पर है। इस तरह एक मरते हुए मूल्य का अग्रगामी मूल्य में गुणात्मक रूपांतरण होता है।
इसके व्यक्तित्वांतरण की चुनौती दरअसल मध्यवर्ग के अविभाजित नायक को जनयूथ और जनक्रांति में शामिल करने की चुनौती है जहां उसे जनांदोलन का नेतृत्व सौंपा जाए—मेरे युवकों में व्यक्तित्वांतर/विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर/मानो कि ज्वाला-पुंखरी-दल में घिरे हुए सब/अग्नि कमल के केंद्र में बैठे/द्रुत वेग बहती हैं शक्तियां संचयी/कहीं आग लग गई/कहीं गोली चल गई। कलावादी आरोप लगा सकते हैं कि क्या कविता क्रांति कर सकती है। जवाब होगा कि कविता क्रांति नहीं कर सकती है, किंतु एक ओर क्रांति प्रक्रियाओं का चित्रण करती है तथा दूसरी ओर क्रांति प्रक्रिया में रचनात्मक योगदान देती है। दुनिया भर की कविता और हमारा स्वतंत्र साहित्य इसका जीवित प्रमाण है।
शमशेर की टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है कि यह कविता स्वतंत्रतापूर्व और स्वतंत्रता पश्चात का दहकता इस्पाती दस्तावेज है। मुक्तिबोध ने अपनी बीमारी की अवस्था में मित्र श्रीकांत वर्मा से आग्रह किया था कि चांद का मुंह टेढ़ा है में उनकी दो कविताएं एक साथ चंबल की घाटियां और आशंका के द्वीप: अंधेरे में को जरूर शामिल किया जाए। उन्होंने कहा था कि आशंका के द्वीप: अंधेरे में शीर्षक एक विशेष मन:स्थिति के प्रवाह में दिया गया था। श्रीकांत वर्मा का भी मानना है कि यह शीर्षक इस कविता के अर्थ को अच्छी तरह व्यंजित करता है। गौरतलब है कि कविता को अंतिम रूप देने के दौरान मुक्तिबोध गंभीर तनाव से गुजर रहे थे। उनके अस्तित्व को बचाने वाली स्कूली पाठ्यक्रम की किताब भारत: इतिहास और संस्कृति तत्कालीन सत्ता द्वारा प्रतिबंधित हो गई थी। इस प्रतिबंध मांग अभियान में मध्य प्रदेश की कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। यह नहीं भूलना चाहिए कि तत्कालीन कम्युनिस्ट आंदोलन पर नेहरू युग का नशा इतना था कि इसका तेलंगाना किसान आंदोलन के दमन और प्रगतिवादी आंदोलन की समाप्ति से बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है। उस दौर में मुक्तिबोध के लिए भारतीय उपमहाद्वीप का प्रश्न, अधूरी आजादी का प्रश्न, औपनिवेशिक आधुनिकता का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न था। यूं ही मध्यवर्गीय काव्य नायक के सम्मुख छंद लय से युक्त गीत एक पागल नहीं गाता है—अब तक क्या किया/जीवन क्या जिया/ज्यादा लिया और दिया बहुत बहुत कम/मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम। तब मार्क्‍सवादी आलोचना अंतरराष्ट्रीयता बोध से इतनी मोहग्रस्त थी कि राष्ट्र, राष्ट्रीयता और संघर्ष का प्रश्न गौण लगता था। मुक्तिबोध के सम्मुख अधूरी आजादी के स्थान पर मुकम्मल आजादी का संभावित नक्शा पेश करने का प्रश्न था—इस तम शून्य में तैरती है जगत् समीक्षा/की हुई इस उसकी/विवेक विक्षोभ महान उसका/तम अंतराल में/अंधियारे मुझमें द्युति आकृति सा/भविष्य का नक्शा दिया हुआ उसका। काव्य नायक को बोध है—लोकहित पिता को घर से निकाल दिया/जन मन करुणा सी मां को हकाल दिया/स्वार्थों के टेरियर कुत्तों को पाल लिया/जमे जाम हुए फंस गए/अपने ही कीचड़ में धंस गए।
राष्ट्रवाद का प्रश्न मार्क्‍सवादी विचारधारा के लिए भी अब अर्थव्यवस्था की मुक्ति का उपप्रश्न नहीं है। यह मानवता के संपूर्ण अस्तित्व के लिए ऊर्जा पाने का प्राथमिक प्रश्न है। मार्क्‍स ने कभी कहा था कि क्रांति राष्ट्र करता है पार्टी नहीं। यह तथ्य आज ज्यादा सच है। आज भारत जैसा देश बाहरी औपनिवेशिक विकसित राष्ट्रों के बाजारवादी और हथियारवादी राष्ट्रवाद तथा आंतरिक उन्मादी सांप्रदायिक राष्ट्रवाद दोनों के दमन, शोषण का शिकार है। ‘अंधेरे में’ कविता इन दोनों कट्टर राहों से अलग जनता के जनराष्ट्रवाद का नक्शा देती है। इसे कविता में तिलक और गांधी के रूपकों से समझना चाहिए। तिलक की प्रतिमा का हिलना, चिंता से मस्तिष्क का फटना तथा खून की धार का बहना राष्ट्रीय मुक्ति के क्रांतिकारी मसौदे का अगला संकेत है। कविता में गांधी के कंधों पर सवार शिशु वह स्वातंत्र्य शिशु स्वप्न है जो पहले तो सूरजमुखी के प्रकाश कण से भरे पुष्प गुच्छ में बदलता है तथा अंतत: काव्य नायक के कंधे पर भारी रायफल में तब्दील हो जाता है। आजादी के बाद राष्ट्र के सामने प्रश्न शेष थे—किसकी आजादी? कैसी आजादी? किसका राष्ट्र? कैसा राष्ट्र? तेलंगाना किसान आंदोलन से नक्सलबाड़ी किसान आंदोलन के बीच बीस सालों का अंतराल आम जनता और मध्यवर्ग के असंतोष, आक्रोश और बेचैनी का दौर था जिसे अनगिनत राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय घटनाएं प्रेरित एवं प्रभावित कर रही थीं। वस्तुत: तिलक और गांधी के स्मृति निर्माण की काव्य राजनीति नेहरू युगीन स्मृति लोप की राजनीति का सृजनात्मक जवाब है। इस कविता से यह प्रेरणा मिलती है कि पुराने दौर की तरह आज भी राष्ट्रीय मुक्ति और वर्ग मुक्ति का सवाल एक दूसरे से अलग नहीं है, बल्कि नवउपनिवेश ने राष्ट्रमुक्ति के प्रश्न को जीवनमरण का प्रश्न बना दिया है। कहना न होगा आधुनिक सभ्यता की भूलने की राजनीति का विश्लेषण और याद करने की राजनीति का मार्ग अन्वेषण फैंटेसी कला रूप के द्वारा ही संभव है।
मुक्तिबोध के लिए जनमुक्ति का प्रश्न राष्ट्रमुक्ति से जुड़ा हुआ है तथा राष्ट्रमुक्ति और जनमुक्ति का संयुक्त प्रश्न मध्यवर्गीय चेतना की मुक्ति से है। मुक्तिबोध को इन प्रश्नों का हल सभ्यता मुक्ति में दिखता है। उन्हें मालूम है कि पूंजीवादी राष्ट्रराज्य दमनकारी है। वह पश्चिमी आधुनिकता के विजय रथ पर आरूढ़ है। कविता में मौजूद ‘पागल’ का रूप आधुनिकता पर प्रश्न चिह्न लगाता है। आधुनिकता के उजाले में जिसे पागल साबित किया गया है अंधेरे में वह जागरित बुद्धि और आत्मोद्बोधमय है। वस्तुत: आधुनिकता के भीतर विद्रोही, विसंगत, स्वप्नमय मनुष्य के लिए कोई जगह नहीं है। उस कथित पागल विद्रोही को पता है कि पूरा मध्यवर्ग इतना मूल्यहीन है कि वह उदर भरने के लिए आत्मा बेचता है, भूतों की शादी में कनात सा तनता है, व्यभिचार का विस्तर बनता है, दुखों के दागों को तमगों सा पहनता है, असंग बुद्धि और निष्क्रिय जीवन शैली के साथ दिन-रात अपने ही खयालों में मग्न रहता है। इसलिए आधुनिकता के उजाले ने उसे खारिज कर दिया है। बिना सभ्यता मुक्ति के मनुष्य को कथित पागलपन और विखंडित व्यक्तित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता है।
मुक्तिबोध के मध्यवर्गीय काव्य नायक की समस्या केवल बाह्य औपनिवेशिक आधुनिकता नहीं है बल्कि आंतरिक गढ़वाद और मठवाद भी है। सच्ची जनमुक्ति और जनक्रांति के लिए—अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे/तोडऩे होंगे ही मठ और गढ़ सब/पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार/तब कहीं मिलेगी हमको/नीली झील की लहरीली थाहें/ जिसमें कि प्रतिपल कांपता रहता/अरुण कमल एक। ‘अंधेरे में’ कविता में मौजूद प्रकृति की संवेदन सघनता तथा पुरानी इमारतों, मठों, गढ़ों की जर्जरता हमारे सामने एक वैकल्पिक सभ्यता निर्माण का मानचित्र उपस्थित करती है।
मुक्तिबोध ऐेसे दौर के कवि हैं जिनके सामने रूप, भाषा और काव्यजीवन से जुड़ी दोहरी चुनौतियां थीं। एक तरफ प्रगतिवादी साहित्य का एकांगी यथार्थ बोध तथा दूसरी तरफ नई कविता का संत्रासमूलक व्यक्तिवाद। मुक्तिबोध ने इन दोनों चुनौतियों का हल अपनी कविता में प्रस्तुत किया। इसके लिए उन्हें कला संघर्ष, आत्म संघर्ष और युग संघर्ष तीनों करने पड़े। मुक्तिबोध कला में जिस सौंदर्य अनुभव और जीवनबोध को लाना चाहते थे, इसके लिए आधुनिकता और उसका यथार्थवाद दोनों दमनकारी और अपर्याप्त थे। वस्तुत: यह कला नियम की अपर्याप्तता पश्चिम के ज्ञानोदय, नवजागरण, विज्ञानवाद और आधुनिकता संबंधी धारणा सेे पैदा हुई थी जो पुरानी औपनिवेशिक सत्ता के दौरान भारतीय समाज का पूर्ण यथार्थ बन चुकी थी।
आधुनिकता की कुछ बुनियादी समस्याएं हैं—संपूर्णता, पश्चिमी वैश्विक मूल्य, पूंजीवादी महाआख्यान, वस्तुनिष्ठ विज्ञानवादी ज्ञान, सांस्कृतिक अभिजातवाद, राष्ट्रराज्य, उपभोक्तामूलक जीवन शैली, व्यक्तिवाद आदि। मुक्तिबोध अपने कला रूप फैंटेसी, काव्यभाषा, जीवनबोध और विचारधारा के माध्यम से इस कविता में इन समस्याओं का हल ढूंढ़ते हैं। अचेतन मन के इलाके में कवि का संवेदन उद्देश्य यही है। सभ्यता संकट इतना गहरा है कि विचार और सौंदर्य अनुभव की जमीन पर समाज लगभग अघाया हुआ दिख रहा है। कविता संतृप्त समाज के सामने पूंजीवाद द्वारा चलाए जा रहे सांस्कृतिक-आर्थिक अभियान के अचेतन की राजनीति का तिलस्मी द्वार खोलती है। दुर्भाग्य से मार्क्‍सवादी चिंतन इस पक्ष की सर्वाधिक उपेक्षा करता है जिसका शिकार हिंदी आलोचना है। आज कला और संस्कृति की राजनीति वस्तुत: अचेतन की राजनीति है।
आधुनिकता उपनिवेशित मध्यवर्गीय अचेतन के काव्य नायक के स्वप्न नायक में व्यक्तित्वांतरित होने तथा जनक्रांति का नायकत्व प्रदान करने की समस्या बहुत गहरी है। इसके दो बड़े कारण हैं—एक तो सत्ता द्वारा दमन अभियान, दूसरी मध्यवर्ग की भूमिका। मध्यवर्ग जनक्रांति के समय कविता में दो रूपों में मौजूद है।
जनमुक्ति की सबसे बड़ी समस्या राष्ट्रराज्य का दमन अभियान है। सत्ता के दो रूप हैं। वह अंधेरे में दमन करती है तथा उजाले में लोकतंत्र का कारोबार। जनक्रांति के दमन निमित्त मार्शल लॉ की यात्रा दिल दहला देने वाली है। निस्तब्ध नगर की मध्य रात्रि में बैंड बाजे के साथ जुलूस चल रहा है। आधुनिक सभ्यता के अंधेरे में काव्य नायक को कोलतार की सड़क ‘मरी हुई खिंची हुई काली जिह्वा’ तथा खंभे पर टंगे बिजली के बल्ब ‘मरे हुए दांतों का चमकदार नमूना’ लगते हैं। चमकदार बैंडदल अस्थि रूप, यकृत स्वरूप, उदर आकृति और उलझी हुई आंतों के जालों जैसा विरूपित है। इस शोभायात्रा में—संगीन नोकों का चमकता जंगल/चल रही पदचाप/तालबद्ध दीर्घ पात/टैंक दल, मोर्टार, आर्टिलरी/सन्नद्ध/धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना—जैसा दृश्य है। इस जुलूस में कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल, सेनापति, अध्यक्ष, मंत्री, उद्योगपति सभी शामिल हंै। इससे ज्यादा डरावनी बात काव्य नायक के लिए यह है कि जुलूस में पत्रकार, प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण भी शामिल हैं। विडंबना तब चरम पर पहुंच जाती है जब उनके साथ शहर के हत्यारे कुख्यात डोमाजी उस्ताद की सक्रिय सहभागिता जगमगाती हुई दिखाई पड़ती है। सत्ता के साथ मध्यवर्गीय बौद्धिक का यह अनैतिक, मूल्यहीन गठबंधन ही जनक्रांति में बाधक है। काव्य नायक की त्रासदी है कि दिन के दफ्तरों में नग्न हो जाने के डर से यह बौद्धिक वर्ग उसे अंधेरे में खत्म कर देना चाहता है। काव्य नायक को संकट की गहरी पहचान है—गहन मृतात्माएं इसी नगर की/हर रात जुलूस में चलतीं/परंतु दिन में/बैठकर हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र विभिन्न दफ्तरों, कार्यालयों, केंद्रों में, घरों में।
काव्य नायक के स्वप्न नायक में एकाकार होकर शुरू की गई जनक्रांति प्रक्रिया की दूसरी बाधा मध्यवर्ग की तमाशबीन भूमिका है। उसकी तटस्थता और उदासीनता के ठोस कारण हैं। मुक्तिबोध को इस संकट की भी प्रामाणिक पहचान है। बौद्धिक वर्ग का जब श्रमजीवी वर्ग से रिश्ता कट जाता है तब वह ‘जन मन उद्देश्य’ से भटक जाता है। आजकल मध्य वर्ग कलम और कुदाल, शब्द और श्रम, ज्ञान और कर्म की फांक से गुजर रहा है। हिंदी जनता गन प्वाइंट पर है और हिंदी साहित्य पावर प्वाइंट पर है। काव्य नायक की मान्यता है कि बौद्धिक वर्ग क्रीतदास है, उसके विचार किराए के हैं तथा अपनी काली करतूतों में इतना डूब गया है कि चेहरे पर स्याही पुत गई है। जब बौद्धिक वर्ग रक्तचूसक सत्ता से नाभिनाल बंध जाता है तब जनक्रांति पर संकट अवश्यंभावी है। काव्य नायक हैरान है कि ऐसे कठिन वक्त में साहित्यकार चुप हैं और कविजन निर्वाक। चिंतक, शिल्पकार, नर्तक सबके लिए बदलाव एक ख्याली गप है, कोरी किंवदंती है। ऐसा इसलिए है—रक्तपाई वर्ग से नाभिनाल बद्ध ये सब लोग/नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे/प्रश्न की उथली सी पहचान/राह से अनजान।
‘अंधेरे में’ की महत्त्वपूर्ण चिंता मिथ्या चेतना से लैस काव्य नायक को वर्ग चेतना से युक्त करना है। कविता में एक मध्यवर्गीय कलाकार की असंग मृत्यु का क्या अर्थ संकेत है? जब शिशु फूल के गुच्छ से रायफल में बदलता है, ठीक उसी वक्त एक एकांतप्रिय कलाकार की हत्या हो जाती है। काव्य नायक अंधेरे में टार्च फैलाकर देखता है, तो उसे खून भरे बाल में उलझा माथा, भौंहों के बीच में गोली की सुराख, होठों पर कत्थई धारा, फूटा चश्मा दिखाई पड़ता है—सचाई थी सिर्फ एक अहसास/वह कलाकार था/गलियों में अंधेरे का हृदय में भार था। /पर कार्य क्षमता से वंचित व्यक्तित्व/चलाता था अपना असंग अस्तित्व/किंतु न जाने किस झोंक में क्या कर गुजरा कि/संदेहास्पद समझा गया और/मारा गया वह बधिकों के हाथों। वस्तुत: असंग अस्तित्व की खोज में जनविमुख कलाकार और कोई नहीं काव्य नायक का मध्यवर्गीय बौद्धिक अचेतन है। आज का मध्यवर्गीय बौद्धिक बाजार संस्कृति और बजरंग संस्कृति, सत्ता संस्कृति और जन संस्कृति, मार्शल लॉ और जनसंघर्ष, क्रांति और भ्रांति, आधुनिकता और बर्बरता, मध्यकालीनता और उत्तरआधुनिकता के विभ्रमकारी भंवर में इस कदर फंस गया है कि उसका असंग व्यक्तित्व आसन्न विध्वंस की ओर मुखातिब है। यह पुराना प्रश्न है कि कला कला के लिए होनी चाहिए या कला जीवन के लिए। नया जवाब है कि अब कला जीवन के लिए नहीं, जीवन-यापन, आत्म विज्ञापन और ब्रांड सत्यापन का अंग बन गई है। तब मुक्तिबोध और ‘अंधेरे में’ की सार्थकता और बढ़ गई है।
‘अंधेरे में’ कविता फैंटेसी रूपक द्वारा संस्कृति के अचेतन के राजनीतिक प्रतिमानों का निर्माण करती है, मानव अचेतन पर हो रहे दमन, अधिग्रहण और अतिक्रमण का विरोध करती है, काल्पनिक अचेतन में भाषा के नए सृजनशील संसार का आह्वान करती है तथा अधूरे यूटोपिया को पूर्ण स्वप्न में बदल देने का मानचित्र बनाती है। मुक्तिबोध ने लिखा है कि आलोचक साहित्य का दारोगा होता है। ‘अंधेरे में’ कविता आधुनिक सत्ता, व्यवस्था और सभ्यता से नाभिनाल बद्ध आलोचक की दारोगाई चेतना को अपने काव्य रूप, काव्य वस्तु और विचार धारा से कटघरे में खड़ा कर देती है—दुनिया न कचरे का ढेर कि जिस पर/दानों को चुगने चढ़ा हुआ कोई भी कुक्कुट/कोई मुर्गा/यदि बांग दे उठे जोरदार/बन जाए मसीहा।
क्या वर्तमान दुनिया कचरे के ढेर में नहीं बदल गई है! तब क्या मुमकिन नहीं कि कोई मुर्गा जब चाहे ढेर पर दाना चुगने चढ़े और जोरदार बांग देकर मसीहा बन जाये! आजकल तो ऐसा है।

18 अगस्त, 2014

किसान आंदोलन की साहित्यिक ज़मीन : रामाज्ञा शशिधर pdf file

किसान आंदोलन की साहित्यिक ज़मीन(शोध-आलोचना) पुस्तक यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं.
usp=sharinghttps://drive.google.com/file/d/0B-t8_bs-TD6MM0hZY28taEEzT2c/edit?usp=sharing

23 जून, 2014

तानाशाही के दौर में जादुई यथार्थवाद पर बहस जरूरी है : पंकज बिष्ट



 मई के मौसम में जब महिला कालेज रोड का आसमान  गुलमोहर के फूलों से सुर्ख हो गया था और ज़मीन पर सिर्फ भगवा रंगों की बहार थी तब पंकज बिष्ट बीएचयू के हिंदी विभाग में आए. जेनुइन कथाकार,प्रतिबद्ध पत्रकार और सरोकारी एक्टिविस्ट के रूप में वे पहली बार २००६ में तब आए थे जब प्रेमचंद के पात्र सीरियल आत्महत्याएँ कर रहे थे.उन्होंने एक लाख की गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार की राशि सारनाथ जाकर खुद वितरित की थी.दूसरी बार बिष्ट हिंदुत्व के उन्माद में डूबे कबीर के शहर में कार्पोरेट फासीवाद पर बोलने आए थे. कला संकाय के एनी बेसेंट हाल में हिंदी के छात्र, शिक्षकों और नगर के बौद्धिकों के बीच वे एक ऐसे कथा फॉर्म और शैली पर विचार करने आए थे जो तानाशाही के दौर का कला रूप है. हिंदी विभाग के लिए संभवतः यह पहला मौका था जब जादुई यथार्थवाद टर्म अपनी औपचारिक बहस के माध्यम से प्रवेश पा रहा था. आलोक कुमार गिरि द्वारा संगृहीत,लिपिबद्ध और सम्पादित यह व्याख्यान मार्क्वेज़ के बहाने हिंदी की बौद्धिक खिड़की में नया झोंका भरता है.-माडरेटर


08 जनवरी, 2014

यह हिन्दी आलोचना का हड़ताल युग है


यह टिपण्णी परिकथा के युवा आलोचना विशेषांक के परिचर्चा  स्तम्भ में भी छपी है.रामाज्ञा शशिधर

1. मैं पिछल्ो दो दशक की युवा हिन्दी आलोचना को हिन्दी आलोचना का हड़ताल युग मानता हूँ। जहाँ रचना समय के गति और द्वन्द्व को पकड़ने की कोशिश करती हुई लगातार सक्रिय है, आलोचना समय और रचना से जरूरी मांगों के कारण नहीं अपनी ऐतिहासिक पस्ती और वैचारिक समझौतापरस्ती के कारण कर्म का मैदान छोड़कर हड़ताली मुद्रा में दिख रही है। मैं नब्बे के दशक से पूर्व की आलोचना को पड़ताली आलोचना मानता हूँ। इस मध्य आलोचना की एक नई प्रवृत्ति भी विकसित हुई है जिसे करताली आलोचना कहा जा सकता है।

11 जून, 2013

आंदोलन की जमीन को कला की कड़ी से मापने वाली किताब

.रामप्रकाश कुशवाहा हिंदी आलोचना में मार्क्स,आंबेडकर और निजी परंपराओं के भीतर से सूत्र विकसित करने वाले हमारी पीढ़ी के विरल आलोचक हैं.पिछले दिनों चिंतन दिशा में कवि ज्ञानेंद्रपति पर आया इनका मुकम्मल लेख पठनीय है. शोर और गठजोड़ संस्कृति से दूर रहने के कारण वस्तुओं से  सिद्धांत सृजन में उन्हें मजा आता है.समयांतर के जून २०१३ में छपित रामप्रकाश की  यह समीक्षा आपके सामने हाजिर है-माडरेटर 

30 मार्च, 2013

कविता में किसान




  रामप्रकाश कुशवाहा 

    चिंतक  एवं  लेखक                                              

हिन्दी कविता में किसान-जीवन और यथार्थ की उपसिथति-अनुपसिथति के बढ़ते-घटते ग्राफ को समझने के लिए हमें साहित्य से पहले हिन्दी-क्षेत्र के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र को समझना होगा । यह एक दुखद सच्चार्इ है कि औधोगिककरण,शहरीकरण,बाजारवाद और भूमण्डलीकरण की दिशा में हुए देश के विकास तथा सरकारी नीतियों नें

25 सितंबर, 2012

विकास और आधुनिकता पूँजीवादी सभ्यता के दमन-शोषण के 'बीज शब्द’



  
                      भूमिका : 'अदृश्य’ प्रतिरोध की पुनर्रचना


अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4, शालीमारगार्डन, एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-2648212,मोबाइल नं.9868380797,9871856053, ई-मेल: antika56@gmail.com

06 अगस्त, 2012

चिंतन दिशा : नए रचाव की समर्थ कविता

मेरा यह आलेख मुंबई से प्रकाशित लघु पत्रिका चिंतन दिशा के नए अंक में छपा है1 यहाँ उन पाठकों के लिए उपलब्ध है जो बुरे समय में नींद को नए कोण से देखने की इच्छा रखते हैंa- jkeizdk”k dq”kokgk            
       jkekKk “kf”k/kj dk l|% izdkf”kr dkO; laxzg ^^cqjs le; esa uhan* dh dforkvksa dks i<+uk ,d fojy ,oa fof”k’V dkO; vuqHko ls xqtjuk gS A xgu laosnukRed thoukuqHkoksa vkSj Le`fr;ksa ds l?ku fcEc/kehZ ekSfyd jpko dh mudh dfork,a ledkyhu dfork vkSj dfo;ksa ds izfr xgu vkSj ltx jpukRed vlUrks’k dh mit gSaA

05 मार्च, 2012

कविता की दुनिया में एक नई आवाज़ : नामवर सिंह


दूरदर्शन और द पब्लिक एजेंडा (१-१५ मार्च २०१२)से साभार 

रामाज्ञा शशिधर हमारे जेएनयू की उपज हैं। पहली बार मैंने इसी रूप में इनको जाना था। आजकल तो काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं। अब चूंकि ये रहनेवाले सिमरिया घाट के हैं। बनारस में इनको नौकरी मिली, और बनारस में जहां वे रहते हैं, रामनगर के ठीक सामने गंगा किनारे सामने घाट है। तो सिमरिया घाट से सामने घाट तक ये पहुंचे हैं। यानी घाट घाट का पानी पीकर।

01 अक्टूबर, 2011

कविता से पहले कवियों को दीमक के हवाले कर देना चाहिए


हमारा समय और आज की हिंदी कविता' पर राष्ट्रीय बहस बीएचयू के राधाकृष्णन सभागार में 24 सितम्बर 2011 को सात घंटे तक चलती रही.हिंदी कविता की दिशा,दशा और भविष्य को लेकर हुई .गोष्ठी से अनेक जरूरी सूत्र निकले हैं जो आज की कविता के गतिरोध,खूबी और ताकत को शिद्दत से रेखांकित करते हैं.रस्मी और फर्जी गोष्ठियों से अलग कविता से गंभीरता से प्यार करने वालों के बीच हुए वाद विवाद संवाद के सम्पादित अंश को आज की कविता के घोषणा पत्र के तौर पर श्रोताओं ने लेने की अपील की है..हम आपसे चाहते हैं कि इस बहस को आगे बढ़ाएं ताकि हिंदी में असली और नकली कविता,जनधर्मी और जनविरोधी कविता का नया पैमाना विकसित हो सके-माडरेटर 

15 जून, 2011

समयांतर,जून ,२०११: अनुज लुगुन की पाण्डुलिपि में पलाश

यह लेख जून ,२०११ के समयांतर में  छप  चुका है .मुझे अनुज ने अपनी 7-8 रचनाओं  की पाण्डुलिपि तब दी थी जब वे हमारे छात्र  थे और मैंने  उनकी  कविता पर लिखना जरूरी समझा.अनुज  लुगुन की कविता 'यह पलाश फूलने का समय है' भी साथ में छपी है. यहाँ साभार  पुन: प्रकाशित  किया जा रहा है.भारत  भूषण  अग्रवाल  पुरस्कार  मिलने पर  अस्सी चौराहा परिवार  एवं  हिंदी  विभाग ,बी.एच.यू. की और से प्रिय  कवि  एवं छात्र  अनुज लुगुन को बधाई!-रामाज्ञा शशिधर


सिमडेगा में जलडेगा है। देश के अन्य हिस्सों की तरह सिमडेगा और जलडेगा में उलगुलान जारी है। उलगुलान यानी राज्य और देश के बीच युद्ध। सत्ता और जनता के बीच संघर्ष। यह उलगुलान लगभग डेढ़ सौ सालों से चल रहा है। लेकिन शायद सभ्यता के इतिहास में इस बार अस्मिता और अस्तित्व दोनों पूर्णतः सर्वनाश के कगार पर हैं।
जलडेगा का एक युवतर आदिवासी कवि है अनुज लुगुन। मुण्डारी भाषा का यह नागरिक देश की बड़ी और ताकतवर भाषा का भी नागरिक होना चाहता है। इसलिए वह हिन्दी पढ़ता है और हिन्दी में कविताएं लिखता है। वह अपनी जनता का दुभाषिया है, अपनी जनता के दुख, सुख, संघर्ष, संस्कृति, स्वतन्त्रता, इच्छा, यातना का दुभाषिया है। वह अपनी कविता के माध्यम से अपनी नदी, अपने जंगल, अपने पहाड़, अपने खेत, अपने पशु-पक्षी की यातना, स्वप्न और संघर्ष का अविकल अनुवाद भारतीय राज्य और राष्ट्र को सुनाना चाहता है।
तरुण कवि अनुज लुगुन अपनी कविता के द्वारा बीसवीं सदी के सबसे बड़े भारतीय जनकवि बाबा नागार्जुन के अधूरे एजेंडे को पूरा करना चाहता है। चर्चा है कि नागार्जुन का काव्य पात्र फूल बाबू आज भी सलाखों के पीछे कैद है। नागार्जुन की 1973 में लिखी एक कविता है शालवनों के निविड़ टापू में। नागार्जुन दंतेवाड़ा से पचपन किलोमीटर आगे हलबी और हिन्दी के दुभाषिए से फूल बाबू का जवाब जानना चाहते हैं कि जब फूल बाबू साठ के दशक में आदिवासी लोकनृत्य वाली पार्टी के साथ दिल्ली पहुंचा था तब देश का राजा कौन था। दियासलाई के साथ फूलबाबू बिना जवाब दिए शालवनों की पगडंडी में खो गया। जेल में बंद फूल बाबू का हालचाल लेना अब हिन्दी कविता की आदत नहीं है। शायद इसलिए भी यह आदिवासी कवि हिन्दी को संबोधित करना चाहता है।
मेरे सामने तीन पांडुलिपियाँ मौजूद हैं। पहली पाण्डुलिपि सलावा जुडुम और ग्रीन हांट के नायक छत्तीसगढ़ के पुलिस मुखिया की तीस रूपये कीमत वाली है जिसके चार सौ पचास पृष्ठों में मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ के सारे पात्र अपनी पूरी रवानी के साथ मार्शल लॉ का बैंडबाजा बजा रहे हैं। इसमें कवि हैं लेखक हैं, आलोचक हैं, पत्रकार हैं, शिक्षक हैं और डोमाजी उस्ताद भी। मैं अभी इस पाण्डुलिपि पर बात करना नहीं चाहता।
दूसरी पाण्डुलिपि के तौर पर हमारे समय के अतिमहत्वपूर्ण लोकधर्मी कवि एवं पाण्डुलिपि के संरक्षक केदारनाथ सिंह की छपित कवित ‘पाण्डुलिपियाँ’ है। उसकी कुछ पंक्तियों पर गैर फरमाइए-पाण्डुलिपियाँ/कहीं आज भी पड़ी हैं/किसी पेड़ की छाल/किसी नदी के कंठ/किसी जेल की दीवार/या किसी पत्थर की स्मृति में। मेरे सामने मौजूद तीसरी पांडुलिपि की कविताएं केदारनाथ सिंह के काव्य स्वप्न का वास्तविक विस्फोट हैं। यहाँ पेड़ की छाल को खरोंचने, छीलने, चूसने, जलाने और बेचने वाली कथित बर्बर आधुनिकता की शिनाख्त है; नदी के पानी को बोतलों में बंदकर रेत को रक्त में डुबो देने वाली कारपोरेट पूंजी के बड़े नाखूनवाले पंजों की पहचान है; अपने ही घर और देश में दुश्मन, द्रोही और पराए बना दिए गए लाखों फूल बाबुओं की जेल जैसी जिन्दगी की दीवारों की दरकन है और है पत्थर के नीचे से करोड़ों साल में निर्मित चीजों की लूट का जरूरी प्रतिरोध। भारतीय समाज और हिन्दी कविता का भविष्य तीसरी पाण्डुलिपि की पगडंडी से तय होगा। इसलिए तीसरी पांडुलिपि की छानबीन और पड़ताल जरूरी है।



अनुज लुगुन की एक कविता है- अघोषित उलगुलान। अर्थात अघोषित आंदोलन। औपनिवेशिक आधुनिकता पूंजी के रथ पर सवार होकर जिस तरह हाशिए का विनाश कर रही है, यह कविता उसकी सूक्ष्म जांच करती है। यह प्रकृति के राजनीतीकरण का दौर है। तरंगों पर सवार आधुनिकता मुट्ठी भर समाज के लिए शेष पृथ्वी को निचोड़ने का अभियान चला रही है। कविता इस राजनीति का पोल खोलती है- अघोषित उलगुलान में/लड़ रहे हैं जंगल/लड़ रहे हैं ये/ नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ। कविता को मालूम है कि आदिवासी किसानों के नाम पर सियासत की गलियों में आरक्षण और धर्मांतरण की बहस चल रही है लेकिन वहाँ कटते हुए पेड़ों की चीख, बिकती हुई नदियों की तड़प, बारूद से ध्वस्त होती हुई झरनों की झंकृति, गोश्त में बदलते चिड़ियों और जानवरों का हाहाकार और प्रकृति के समुद्र में जी रही आदिम मानव मछलियों सेे रत्तीभर रहमदिली नहीं है। कविता के सामने सवाल विकास और लोकतंत्र का नहीं, सम्पूर्ण मानवीय अस्तित्व का है।
एक कविता है लालगढ़। कवि कहता है- कुछ तो है जरूर साहब/जो वातानुकूलित कमरे में/रहते हुए महसूते नहीं/कुछ तो जरूर है साहब/जो रोबड़ा सोरेन/पिछले कई सालों से/ नाम बदलकर घूमता है/वरना कोई गढ़/यूं ही लाल नहीं होता। कविता राज्य की संरचनात्मक हिंसा और विषमता पर आधारित दमन कानून का प्रतिरोध करती है। नागार्जुन और गोरख पांडेय की परम्परा में वह राज्य हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा की वकालत करती है। वह युद्ध और गृहयुद्ध के वास्तविक कारणों की खोज करती है जिसकी जड़ें जनता में नहीं राज्यसत्ता में हैं।
अनुज लुगुन की कविता का एक ‘देश’ है। यह ‘देश’ ग्लोबल के खिलाफ लोकल, देशद्रोह के खिलाफ देशभक्ति राजपरस्ती के खिलाफ जनपरस्ती, मध्यवर्गीय बहुरूपियेपन के बरक्स निम्नवर्गीय वैचारिक ठोसपन का समर्थन करते हुए सत्ता के इस दर्शन को ध्वस्त कर देता है कि राज्यभक्ति ही देशभक्ति है। देश, देशभक्ति और देशान्तरण नामक तीन खण्डों में बंटी ‘गंगाराम कलुण्डिया’ कविता आदिवासी जनता के देशद्रोही होने के मिथ को ध्वस्त कर देती है। कहना न होगा कि 1857 से पहले संथाल विद्रोह और बाद में बिरसा मुंडा, ताना भगत, गोविन्द गिरि, प्रेमचन्द भील जैसे सैकड़ों आदिवासी नायक औपनिवेशिक और सामंती सत्ता के सामने अपनी कुर्बानियों का इतिहास रच चुके हैं। गंगाराम कलुण्डिया एक ऐतिहासिक व्यक्ति और घटना है। 1972 के भारत-पाक युद्ध में लड़ाई लड़ने के कारण राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से सम्मानित गंगाराम सेवानिवृत्ति के बाद जब ईचा बाँध से विस्थापित आदिवासियों के आन्दोलन का नेतृत्व करता है तब उसके ही देश की पुलिस 3 अप्रैल 1982 को उसकी हत्या कर देती है। कविता देश को कटघरे में खड़ा कर देती है- गंगाराम/तुम देश के लिए हो या/देश तुम्हारे लिए है/संसदीय बहसों और/अदालती फैसलों में नहीं हुआ है निर्णय/जबकि तुमने तय कर लिया था/तुम लड़ोगे अपने देश के लिए। समय के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश जनता से बनता है या जनता देश बनती है। यह ऐसा वक्त है जिसमें देशभक्ति भी अन्य चीजों की तरह बाजार का एक खूबसूरत बिकाऊ उत्पाद है अथवा फासीवाद की हिंसक कार्रवाई है, वहाँ आदिवासी मासूम संवेदना गंगाराम के लिए एक मार्मिक इच्छा रखती है- तुम्हारे मरने पर/नहीं झुकाया गया तिरंगा/नहीं हुए सरकारी अवकाश और न ही बजाई गई/शोक गीत की धुन। ऐसे दौर में जब नवसाम्राज्य ने देश और राष्ट्र की अवधारणा ही खत्म कर दी है, आदिवासी कविता में देशभक्ति की यह मिसाल सत्ता और उपभोक्ता वर्ग के सामने शर्मसार करने वाला आईना रखती है।
हिन्दी कविता में मिथक का जनतंत्रीकरण बहुत हुआ है। एकलव्य से संवाद एक लम्बी कविता है जो एक ओर अब तक प्रचलित एकलव्य की धारणा को ध्वस्त कर देती है वहीं गुरू द्रोण के बहाने पूरी मध्यवर्गीय बौद्धिकता को प्रश्नांकित करती है। कवि का कथन है- ‘रगों में संचरित कला किसी दुर्घटना के बाद एकबारगी समाप्त नहीं हो जाती।’ कवि उड़ीसा के सीमावर्ती झारखण्ड के सिमडेगा जिले के मुण्डा आदिवासी समाज से आता है जहाँ अंगूठे का प्रयोग किये बिना तर्जनी और मध्यमा अंगुली के बीच तीर को कमान में फंसाकर तीरंदाजी करने की परम्परा है। कवि अनुज लुगुन स्वयं इसका प्रमाण है। इस अग्निधर्मी और आख्यानमूलक कविता में कवि सत्ता से अनैतिक और फायदे का संबंध रखने वाली छद्म हिन्दी बौद्धिकता पर सन्देहनिशानी करते हुए आदिवासी किसानों को सचेत करती है कि उनका गुरू बाघ, शेर, हिरन, वृक्ष की छाल तो हो सकते हैं लेकिन भाषायी छद्म से लदी वर्चस्वशाली बौद्धिकता नहीं। वस्तुतः व अंगूठे के विरूद्ध मध्यमा और तर्जनी की खोज वैकल्पिक व्यवस्था की खोज है।
कवि को पता है कि अब हत्यारा भी कविता लिख सकता है। कवि हैरान है कि यह कैसा खतरनाक समय है जब शिकारी का शिकार हो रहा है। जिस शिकारी के तीर से बाघ थर्रा उठता था और परम्परा शाबाशी देती थी- जोवार सिकारी बोंगा जोवार अर्थात शिकारी युवा तुम बहुत खूबसूरत हो- उसका हाँका लग रहा है। आदिवासी एक ऐसी चिड़िया की तरह है जिसे शिकारी दायीं अंगुलियों से गोली मारता है और बायीं अंगुलियों से कविता लिखता है। तड़पती हुई चिड़िया और हड़िया से मस्ती लेने के लिए बौद्धिक मेहमान विचार कोलाहल करते है, भोज सम्मान के बाद पुरस्कार, वातानुकूलित यात्रा भत्ता और ढेर सारे सुमनाक्षर समर्पित किए जाते हैं। हिन्दी की ऐसी द्रोणमार्गी बौद्धिकता के पास स्टैण्ड के नाम पर यदि केवल इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर स्टैण्ड ही शेष है तो कोई हैरानी की बात नहीं है। कवि को जब पता है कि भारतीय कविता का जन्म आदिकवि द्वारा सुनी घायल चिड़िया की चीख से हुआ था तब उसका अविश्वास उन बौद्धिकों पर लाजिमी है जो चिड़िया का पंख मोंच कर उसके आर्तनाद को शब्द में बाँधना चाहते हैं। कवि कहता है- एकलव्य/अब जब भी तुम आना/तीर धनुष के साथ ही आना/हाँ किसी द्रोण को अपना गुरु न मानना/ वह सिर्फ छल करता है।
लुगुन की कविता सत्ता विमर्श की नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की कविता है। वह राजनीतिक चेतना से सम्पन्न ऐसी कविता है जिसे संसदीय वामपंथ के सिलसिलेवार पाखण्ड, सत्तापरस्ती, समझौता परस्ती, अप्रांसगिकता, और निरर्थकता का गहरा बोध है। लिंकन का भूत कविता पूंजीवादी जनतंत्र और संसदीय वामपंथ के बहरूपिएपन का शिनाख्त करते हुए उससे उबरने की राह खोजती है। कविता शुरू होती है- लिंकन की परिभाषा सुनकर/मैं शहर से दूर भागा/जंगलों में छुपने के लिए/मुझे डर था कि/ वे लोग मेरा शिकार करंेगे। एकालाप और आत्मालाप से ग्रस्त हिन्दी कविता के बीच यह संवादधर्मी कविता बातचीत की शैली में रचित है जिसमें सखुआ की ओट लिए बैठे आदमखोर अभिजात की बारीक पहचान है। विदर्भ, नन्दीग्राम, सिंगूर, ददरी, बलिया, भट्ठा पारसौल जैसे देश के सैकड़ों इलाकों की धरती बहुराष्ट्रीय बुलडोजर और बाडे़ की गिरफ्त में लगातार आ रही है, मिदनापुर से लेकर दंतेवाड़ा तक के जल, जंगल, जमीन कारपोरेटी दाँतों में फंस चुके हैं और यह सारा कारोबार लिंकन के भूत के हाथों सम्पन्न हो रहा है। तब कवि शिकारी से बचने के लिए ठिकाने खोजता है- मैं रोज भागता हूँ/कभी शहर तो कभी गांव/कभी वियतनाम भागता हूूं तो कभी नक्सलबाड़ी/कभी इराक भागता हूँ/तो कभी दाँतेवाड़ा/मेरे साथ हमेशा/लिंकन का भूत भागता है।
शमशेर की कविता ‘ओ युग आ’ की पंक्तियां हैं- ओ युग आ/मुझे और लिए चल/जरा और/शक्ति और प्रेम की गर्वभरी बांहों में/और उस सादगी के सीने पे/जो छोटी-छोटी दैनिक/बातों में होती है/कि लोक/गुनगुनाने लगे/शान्त सरल आनंद में। समानता स्वतंत्रता और बंधुत्व का शमशेरी आदिम लोक यही आदिवासी समाज है जिसके सीने में सरलता, सहजता, शक्ति, शान्ति, प्रेम, उमंग, संगीत, सम्मोहन आनंद, कर्म जैसे मनुष्यता के सारे अवयव मौजूद हैं। वे अवयव लुगुन की कविता यह पलाश के फूलने का समय है में भरपूर मात्रा में उपस्थित हैं। वहाँ साखू, केन्दू, सागौन पर कोयल की कूक है, गिलहरियों की घमाचौकड़ी है, जवान औरतों की मर्दों के साथ उन्मुक्त प्रेमलीलाएं हैं। लेकिन इस कविता का दूसरा पहलू दिल हिला देने वाला है।
सभ्यता और आधुनिकता के नाम पर चली पूंजी की प्रचण्ड आंधी चारों ओर से इस सरल समाज को घेर चुकी है- गुफाओं को खबर है/खदानों में वेदान्ता का विज्ञापन टंगा है/साखू के सागर/सारण्डा की लहरों में/बिछ गई है बारूदी सुरंगे/हर दस्तक का रंग यहां लाल है। कविता को पता है जंगल खत्म होने वाला है, नदी खत्म होने वाली है, चिड़िया खत्म होने वाली है, खनिज खत्म होने वाले है, बादल खत्म होने वाला है, ऑक्सीजन खत्म होने वाली है, संगीत खत्म होने वाला हैं, त्योहार खत्म होने वाले हैं, परम्परा खत्म होने वाली है, संस्कृति खत्म होने वाली है, तीर धनुष खत्म होने वाले हैं। यानी सादगी और समानता की आदिम सभ्यता बारूद के ढेर पर रख दी गई है और इसका नाम रखा गया है विकास, लोकतंत्र, आधुनिकीकरण, मुख्यधारा आदि।
कविता का आखिरी पहलू सौन्दर्य की महिमा का एक नया अनूठा संसार रचता है दूर-दूर तक/जंगल का हर कोना पलाश है/साखू पलाश है/सागवान पलाश है/पलाश आग है/आग पलाश है। यह क्रान्ति का सौन्दर्य, यह प्रकृति के सुलगने का सौन्दर्य है। जो पलाश प्रेमिकाओं के जूड़े में गुंथकर प्रेमियों को ललचाने का काम करता है, सूरज की आँखों में आँखें डाल रोशनी को कोमल बनाने का काम करता है, जो धरती के जिस्म पर लाल परिधान पहनाने का काम करता है, जो वासना की आँखों, होठों और लहरों को और रक्तिम बना देता है, वह आज आग ही तरह जल रहा है। जाहिर है कविता कभी नहीं चाहती कि पलाश आग की तरह दहके। वह हमेशा पलाश को पलाश की तरह और आग को आग की तरह देखना चाहती है। कविता के लिए यह कितना कठिन समय है कि पलाश के फूलने के मौसम में पूरा जंगल जल रहा है।
लुगुन की कविता एक ऐसी सौन्दर्य महिमा, शब्द भंगिमा, राजनीतिक चेतना, ज्ञान और संवेदना से भरे युवतर कवि की अनूठी धमक है जो हिन्दी कविता के एकालापी, आत्मालापी भाषाई कौशल, गद्यात्मक खिलवाड़, जनविरोधी रूपात्मकता के विरूद्ध क्रांतिकारी परम्परा की अगली कड़ी है। हिन्दी कविता को इस कवि से बड़ी उम्मीद है। अनुज लुगुन अपनी कविता और जीवन में गंगाराम कलुण्डिया के साथ है। यदि अभी शताब्दी कवि नागार्जुन होते तो वे किसके हाथ होते? सलवा जुडूम के या फूल बाबू के?
सवाल इसलिए भी जरूरी है कि दंतेवाड़ा के मोरपल्ली, ताइमेताला और तिम्मपुरम गांवों को मार्च के पलाशी मौसम में सलवा जुडुम के एसपीओ और केन्द्रीय सेना द्वारा जलाकर खाककर दिया जाता है। महिलाओं के साथ बलात्कार होता है। सामंत एवं फासीवादी मुख्यमंत्री रमन सिंह तथा केन्द्रीय खाद्य सुरक्षा सलाहकार हर्षमंदर के हेलीकाप्टर के उड़ान भरते ही इन्हीं ताकतों द्वारा राहत की खाद्य सामग्री लूट ली जाती है, कपड़े लूट लिये जाते हैं, कई बच्चे भूख से तड़प कर मर जाते हैं। गांवों के लोग सरकार द्वारा उठाकर ले गये दुभाषि परिजन नुपा मुत्ता और माडवी सुल्ला का अता-पता न मिलने से भयभीत हैं। झोपड़ियों की छतें उतार दी गई हैं। मांएं कोमल बच्चों को धूप में लिये खड़ी हैं। क्यों? इसलिए कि जंगल में सरकारी आग दौड़ रही है, सुलग रही है, धधक रही है और उनका कहना है कि पलाश फूल रहा है।



कविता घाट:यह पलाश के फूलने का समय है



अब हत्यारा भी कविता लिख सकता है। कवि हैरान है कि यह कैसा खतरनाक समय है जब शिकारी का शिकार हो रहा है। जिस शिकारी के तीर से बाघ थर्रा उठता था और परम्परा शाबाशी देती थी- जोवार सिकारी बोंगा जोवार अर्थात शिकारी युवा तुम बहुत खूबसूरत हो- उसका हाँका लग रहा है। आदिवासी एक ऐसी चिड़िया की तरह है जिसे शिकारी दायीं अंगुलियों से गोली मारता है और बायीं अंगुलियों से कविता लिखता है। तड़पती हुई चिड़िया और हड़िया से मस्ती लेने के लिए बौद्धिक मेहमान विचार कोलाहल करते है, भोज सम्मान के बाद पुरस्कार, वातानुकूलित यात्रा भत्ता और ढेर सारे सुमनाक्षर समर्पित किए जाते हैं।


अनुज लुगुन
जंगल में कोयल कूक रही है
जाम की डालियों पर
पपीहे छुआ-छुई खेल रहे हैं
गिलहरियों की धमाचौकड़ी
पंडुकों की नींद तोड़ रही है
यह पलाश के फूलने का समय है।

यह पलाश के फूलने का समय है
उनके जूड़े में खोंसी हुई है
सखुए की टहनी
कानों में सरहुल की बाली
अखाड़े में इतराती हुई वे
किसी भी जवान मर्द से कह सकती हैं
अपने लिए एक दोना
हड़ियाँ का रस बचाए रखने के लिए
यह पलाश के फूलने का समय है।

यह पलाश के फूलने का समय है
उछलती हुईं वे
गोबर लीप रही हैं
उनका मन सिर पर ढोए
चुएँ के पानी की तरह छलक रहा है
सरना में पूजा के लिए
साखू के पत्ते परबांस के तिनके नचा रही हैं
यह पलाश के फूलने का समय है।
(2)
यह पलाश के फूलने का समय है
रेत पर बने बच्चों के घरौन्दों से
उठ रहा है धुआँ
हवाओं में घुल रही है बारूद
चट्टानों से रिसते पानी पर
सूरज की चमक लाल है और
जंगल की पगडंडियों में दिखाई पड़ता है दाँतेवाड़ा
यह पलाश के फूलने का समय है।

यह पलाश के फूलने का समय है
नियमागिरि से निकले नदी के तट पर
केन्दू पक कर लाल है
हट चुकी है मकड़े की जाली
गुफाओं को खबर है
खदानों में वेदान्ता का विज्ञापन टँगा है
साखू के सागर
सारण्डा की लहरों में
बिछ गई हैं बारूदी सुरंगें
हर दस्तक का रंग यहाँ लाल है
यह पलाश के फूलने का रामय है।

दूर-दूर तक
जंगल का हर कोना पलाश है
साखू पलाश है
केन्दू पलाश है
सागवान पलाश है
पलाश आग है
आग पलाश है
जंगल में पलाश के फूल को देख
आप भ्रमित हो सकते हैं कि
जंगल जल रहा है
जंगल में जलते आग को देख
आप कतई न समझें पलाश फूल रहा है
यह पलाश के फूलने का समय है और
जंगल जल रहा है।

10 सितंबर, 2010

पीपली लाइव : भारतीय किसान का डेड लाइव

पीपली लाव  किसान विरोधी प्रोपेगंडा  है 


  फिल्म : पीपली लाइव
निर्देशक : अनुषा रिजवी 
निर्माता : आमिर खान 
    गीत : संजीव शर्मा,गंगाराम स्वानंद, किरकिरे 
  संगीत : इंडियन ओशन 
कलाकार : ओमकार दास मानिकपुरी,रघुवीर यादव,  नसीरुद्दीन शाह,
              मलाइका शिनॉय,शालिनी वत्स,फारुख जफ़र,नवाजुद्दीन शिद्दिकी,   
              विशाल आदि 

अवधि : 107 मिनट 

टीवी पत्रकार अनुषा रिजवी को  किसान आत्महत्या और सरकारी मुआवजे  की खबर
से पीपली लाइव निर्माण की प्रेरणा मिली. पीपली लाइव अनुषा रिजवी की पहली और
आमिर खान की लगान के बाद दूसरी फिल्म है जिसका केन्द्रीय प्रश्न किसान है. समसामयिक
व लोकलुभावन लोक रागों और फ्रेंच संगीत निर्देशक माथिलास डुव्लेसी के पार्श्व  संगीत  से
आच्छादित १०७ मिनट की फिल्म का आरम्भ बहुत ही कल्पनाशील और रचनात्मक है.
             फिल्म का यथार्थमूलक और रचनात्मक पहलू यह भी है कि इसमें अधिकांश कलाकारों का
काम मौलिक और प्रभावशाली है. पीपली का नत्था किसान हबीब तनवीर क़ी नाट्य मंडली
 नया थियेटर का लोक कलाकार ओमकार दास मानिकपुरी सर्वाधिक शक्तिशाली किरदार है.
रघुवीर यादव हो या मलाईका शिनॉय ,नसीरुद्दीन शाह हो या फारूख जफ़र ,सृजनशील सम्भावना
का सिने-शिल्प सराहनीय है. फिल्म ऐसी नयी कला विधा है जिसमे कला के अनेक  नए पुराने रूपों
का खूबसूरत रसायन खप सकता है. यहाँ भी वह सब आमिरी अंदाज में है.
           लेकिन किसी फिल्म क़ी सराहना केवल कलाकारों क़ी शक्तिशाली भूमिका, समय के
 जलते हुए कथानक का चुनाव ,गीत गान , नामी गिरामी निर्माता, घिसे पिटे मुम्बइया फ़िल्मी
 लटके झटके से थोडा हटके से नहीं क़ी जा सकती. एक प्रतिनिधि फिल्म से कला प्रशंसकों क़ी
 एक ओर कला  के प्रभाव से उपजने वाले सौन्दर्य मूल्य  क़ी खोज रहती है वहीँ उससे पैदा होने
 वाले जीवन मूल्य क़ी जरूरत होती है.
             आमिर खान की नई फिल्म पीपली लाइव के कई घाट हैं. हर घाट पर कोई न कोई
जादू घटता है. एक घाट मीडिया का है. एक घाट राजनीति का है. एक घाट गांव
और शहर  के बढ़ते हुए फर्क का है. लेकिन फिल्म के आइडिया और थीम का सबसे
बड़ा  घाट भारतीय किसान जीवन की त्रासदी का  है. किसानों की बदकिस्मती से
सबसे ज्यादा राजनीतिक  हमला इसी घाट पर हुआ है. बालीवुड रंगरेज  है
बाबू,घाट घाट यहाँ घटता जादू.
             जिस तरह से इस फिल्म का आम चेतना और सत्ता की चेतना पर
प्रभाव पड़ा है ,यहाँ पी.साईनाथ जैसे एक्टिविस्ट पत्रकार का काम नकली और
हाशिये पर फेंका हुआ दीखता है.कला की वर्गीय बारीक राजनीति की जाँच इसलिए
भी जरूरी है क़ि पिछले दो दशकों में भारतीय कला  का सबसे केन्द्रीय
मुद्दा भूमंडलीकरण  है  तथा भारतीय यथार्थ का साम्राज्य-शक्ति बनाम
किसान.
           यह फिल्म राजनीति का सिनेमाई इस्तेमाल करते हुए भारतीय
यथार्थ के मुख्य मुद्दे के साथ वैसा ही बर्ताव करती है जैसा साम्राज्य
समर्थक संसदीय राजनीति. इस अर्थ में यह किसान विरोधी सिनेमाई प्रोपेगंडा
है और संसदीय राजनीति व साम्राज्यवाद की पैरोकार. यह अनायास नहीं
 है कि पीपली लाइव के दीवाने एलपीजी(उदारीकरण,निजीकरण,भूमंडलीकरण )
 माडल के कार्नवालिस मनमोहन सिंह हो जाते हैं और विस्तारक आडवानी.
 और फिल्म डाइरेक्टर अनुषा रिजवी फिल्म प्रमोशन पर बात करते करते
 कह उठती है कि ''राहुल जिस अंदाज में आम लोगों
संग गहरे अंदाज़ में जुड़ रहे हैं यह काबिलेतारीफ है.'' वह राहुल की
तारीफ़ करते हुए यह भूल जाती है कि नत्था जैसों के लिए जो गाँधी( मंनरेगा
 ),जवाहर(जवाहर रोजगार योजना ), लालबहादुर(फिल्म में बिना जल का कल ),
इंदिरा(इंदिरा आवास योजना) आजादी के इतने सालों में मर्ज का मरहम नहीं बन
सके उनके लिए राहुल रामवाण किस तरह बनेंगे. आमिर खान पहले फिल्म से पूरी
तरह असम्बद्ध  किसानों पर आधारित लोक गीत बेचकर बाजार में  प्रमोशन का
वातावरण बनाते हैं, बाद में सत्ता,मीडिया और बुद्धिजीवी के सामने कला
यथार्थ को झूठलाने का प्रोपेगंडा रचते हैं.
          कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि पीपली लाईव  देश और विश्व मंच
पर किसान और हाशिये की तबाही,हिंसा और ह्त्या की राजनीति करने वाली
भूमंडलीकरण की सत्ता द्वारा आमिर की फिल्मों में सर्वाधिक पुरस्कार
बटोरे. आस्कर मिलना भी नामुमकिन नहीं. पुरस्कार  की बढती संख्या का मतलब
होगा भारतीय किसान की तबाही के यथार्थ के विचलन की प्रशंसा ,जनद्रोही
वर्त्तमान संसदीय राजनीति के किसान विरोधी अभियान का समर्थन, मध्यवर्ग की
हाशिया  विरोधी लालचपूर्ण चेतना की तुष्टि, बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय
सेवा पूँजी के फैलाव की राह सफाई तथा नव साम्राज्य की नीतियों का आह्वान.
           किसी कला की जाँच तीन कला औजारों से होनी चाहिए- कला का जन्म
किन हालातों की देन है, कला की आतंरिक ताकत क्या है, कला का जन जीवन पर
प्रभाव क्या है.
             पीपली  लाइव का जन्म भूमंडलीकरण की देन है.दो दशकों में
कार्पोरेट विकास की आंधी से इंडिया और भारत के बीच की खाई बहुत बड़ी हो
गयी है. भारत में किसान, आदिवासी, श्रमशील, स्त्री और दलित का जीवन
हाहाकार कर रहा है. दो लाख किसानों की आत्महत्या, देश के सैकड़ों जिलों
की जनता का राज्य दमन के खिलाफ सशस्त्र विरोध में खड़ा होना और
नंदीग्राम,सिंगूर,विदर्भ,वारंगल,तेलंगाना, बस्तर,दंतेवाडा जैसी घटनाएँ इस
बात के बाहरी संकेत हैं कि  जमीन,खनिज,जंगल,जल और श्रम की लूट व
कारपोरेटीकरण किस सीमा तक पहुँच गयी है.यह नयी किस्म की कार्पोरेट
जमींदारी है जिसमे खेत -अपहरण के लिए उसे अलाभकर बनाना  और किसानों की
ह्त्या-आत्महत्या जरूरी प्रक्रिया है. इसलिए भारतीय कला में किसान
त्रासदी का मुद्दा मीडिया, संसदीय चुनाव और दूसरे  सवालों के सामने
केन्द्रीय राजनीतिक मुद्दा है. इन हालातों की देन है पीपली लाइव. लेकिन
कला इन हालातों का विकृत,यथार्थ विरोधी और सत्ता समर्थक रूप पेश करती है.
कैसे?
             कला का  सिने रूप यह है कि नत्था किसान द्वारा  बैंक से एक
लाख ठगने की साजिश से फिल्म शुरू होती है. इस हड़प अभियान में सहयोगी की
भूमिका में नत्था का भाई,पत्नी, जमींदार-महाजन- जनपदीय नेता,अखबार,चैनल,
योजनाकार ,सत्ता सभी शामिल हैं.  फिल्म में  जो सरकार बैंक के माध्यम से
सूदखोरी करती है ,जमीन छीनती है वही किसानों द्वारा  आत्महत्या करने के
हालात देखकर  कर्ज माफ़ी का एलान भी करती है. यह है सरकार का
बहुरूपियापन.
           इसका मतलब यह है कि भारतीय समाज में  दो लाख किसानों की
आत्महत्या का सम्बन्ध भूमडलीकरण के हालात से न होकर सरकार की ठगी करने से
है. दूसरी बात,किसान का परिवार ऐसा क्रूर ,स्वार्थी और जटिल धूर्त है जो
अपने सदस्य को आत्महत्या के लिए उकसाता है. पी साईनाथ की सुनिये,''यह
आपदा वैश्विक,राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नीतियों से संचालित होती है.खाद्य
उत्पादन खतरनाक रूप से ठहराव की स्थिति में है.राहत पेकेज एक अफसरशाही
छद्म है. लोगों के जीवन के बदले में राहत पेकेज पूर्ण रूप से कितना
अप्रासंगिक है. लाखों परिवारों ने आत्महत्या का सामना नहीं किया है
,लेकिन समान विपत्तियों का सामना किया है.इसीलिए यह जानना महत्वपूर्ण है
कि कृषि सम्बन्धी समस्याएँ आत्महत्या की समस्याओं से काफी बड़ी है.''
          नत्था का परिवार पर्यटक की आँखों से देखा परिवार है जिसके लिए
जान से ज्यादा एक लाख रूचि का विषय है. पी साईनाथ का विदर्भ के अध्ययन पर
आयी रिपोर्ट का  कहना है कि भारतीय  किसान समाज में " ऐसी जवान विधवाएं
रही हैं जिन्होंने अपनी कन्या शिशुओं के साथ स्वयं को मार डाला क्योंकि
वे उन्हें देह व्यापार करने वालों के बीच छोड़ना नहीं चाहती थीं.'' बनारस
में  मैं स्वयं ऐसी घटनाओं का साक्षी रहा हूँ. इस फिल्म में किसान जीवन
के समाजशात्र और मनोविज्ञान का आभाव है. यही कारण  है कि नत्था दर्शकों
के लिए करोड़ों किसानो का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हें हास्य मजाक में
बदल देता है और हमारे समाज की  सर्वाधिक त्रासद परिघटना उपहास की वस्तु
बन जाती है.
                      सचाई यही है कि करोड़ों नत्था किसान देश की
सत्ता,मीडिया, बाजार, पूंजीपति वर्ग और मध्य वर्ग के लिए मजे और मजाक की
चीज हैं. इसलिए उनकी  ताकत का फायदा लेने की रणनीति पर बनी पीपली लाइव के
लिए भी नत्था मजाक का पात्र है.
                       फिल्म में मीडिया की टीआरपी कथा का सुन्दर
फिल्मांकन है . लेकिन गौरतलब है कि इसकी बुनावट यथार्थपरक है कि
नहीं.किसान आत्महत्या कभी मीडिया का टीआरपी एजेंडा नहीं रहा है. पी
साईनाथ का शोध है कि'' विदर्भ में जून यात्रा पहली यात्रा थी.इससे पहले न
तो कृषिमंत्री और न ही मुख्यमंत्री किसी के घर गए और न किसी ने गांव
वालों के साथ बैठकर यह जानने की कोशिश की कि क्या हो रहा है.जब बाम्बे
में फैशन वीक चल रहा था तो पांच सौ  से अधिक मान्यता प्राप्त पत्रकारों
ने 'फैशन वीक' को कवर किया था. उसी समय विदर्भ में बाहर के छः से कम
पत्रकार थे. फैशन माडल्स रैम्प पर सूती वस्त्रों  का प्रदर्शन कर रहे थे.
वहां से एक उड़ान की दूरी पर सूत उगाने वाले लोग आत्महत्या कर रहे थे.''
वस्तुतः  मीडिया कार्पोरेट पूंजीवाद के विस्तार का अश्वमेध  घोड़ा
है,फ्रंट लाइन ट्रूप्स है.
                पीपली लाइव मीडिया को थीम में बड़ी जगह देकर एक साथ तीन
काम करती है. एक तरफ वह किसान यथार्थ की भयानक त्रासदी को शामिल करने से
बच जाती है, दूसरी तरफ सत्ता की आलोचना करने से छूटकारा पा लेती है वहीँ
मीडिया को काल्पनिक यथार्थ का श्रेय देकर टीआरपी युद्ध के सहारे अपनी
टीआरपी बढ़ा लेती है. इसका प्रमाण वे गीत भी हैं जिनका इस पटकथा से कोई
रिश्ता नहीं बनता है और जो इस फिल्म की टीआरपी का  महत्वपूर्ण  करण है.
कहना न होगा कि मीडिया  के छद्म युद्ध में सेक्स है, अंधविश्ववास है,
बाजार है,सिनेमा उद्योग है,धर्म और साम्प्रदायिकता  है, पुराण है लेकिन
किसान कहीं नहीं है.
             यह कितना दुखद है कि 'पांच अंधे  और हाथी कथा' की तरह
पीपली लाइव की समीक्षा में कोई किसान आत्महत्या की बात कर रहा है, कोई
मीडिया अंतर्कथा का किस्सा सुना रहा है, कोई गांव  और शहर की बढती हुई
दूरी पर चिंता जता रहा है. जरूरत है पूरे हाथी की जटिल संरचना को समझने
की और उसके हमलावर रूप को फिल्म द्वारा विकृत करने की कलात्मकता की
पड़ताल करने की . वह हाथी जो इतना मदांध, हिंसक और दमनकारी है कि हरी
फसलों  के साथ  भारतीय  किसान का जीवन और सपने चर रहा  है , खेतों का
पानी  सूंड से चूसकर बोतलों में हमें ही बेच रहा है, हमारे ही घर में
युद्ध वाहक बन रहा है, हमारी ही हार के  मातम में हमारे  घर के मोखे पर
अपना  जीत जुलूस घुमा रहा है .

विदर्भ भारतीय किसान का यथार्थ है ,पीपली और नत्था नहीं