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04 जून, 2012

अँधेरी कोठरी में अक्षर का ताना बाना

रामाज्ञा शशिधर 
उनका ताना बाना जगह बेजगह टूट चुका  है।अँधेरी कोठरी इस मुल्क की तरह।गर्दन तक लटके हुए जाले  फंदे की तरह।टंगा हुआ जकात अतीत के साये की तरह।सामने तनी पगिया जंजीर की तरह।कमर तक गड्ढे में धंसे हुए दोनों सूखे पांव कब्र की तरह।ताने को रेशम के बाने से भरती  हुई ढरकी  भविष्य की तरह।
                    
बनारस में बुनकर 
       

05 मार्च, 2012

कविता की दुनिया में एक नई आवाज़ : नामवर सिंह


दूरदर्शन और द पब्लिक एजेंडा (१-१५ मार्च २०१२)से साभार 

रामाज्ञा शशिधर हमारे जेएनयू की उपज हैं। पहली बार मैंने इसी रूप में इनको जाना था। आजकल तो काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं। अब चूंकि ये रहनेवाले सिमरिया घाट के हैं। बनारस में इनको नौकरी मिली, और बनारस में जहां वे रहते हैं, रामनगर के ठीक सामने गंगा किनारे सामने घाट है। तो सिमरिया घाट से सामने घाट तक ये पहुंचे हैं। यानी घाट घाट का पानी पीकर।