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04 अगस्त, 2011

साक्षात्कार:आदिवासी समाज को खत्म करने की गहरी साजिश चल रही है

गुरू चेले चार यार:नीलेश,अनुज लुगुन,रामाज्ञा शशिधर,रविशंकर उपाध्याय 


भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार-२०११ दिए जाने की घोषणा के बाद आदिवासी हिंदी कवि अनुज लुगुन से उनके कवि  साथी रविशंकर उपाध्याय और समीक्षक नीलेश कुमार की बातचीत =


** भारतभूषण अग्रवाल सम्मान मिलने पर आपको ढेर सारी बधाइयाँ!
लुगुन: धन्यवाद!


**आप अपने परिवेश के बारे में बताएँ।
अ.लुगुन: मैं झारखण्ड के सिमडेगा जिले के जलडेगा गाँव से आता हूँ। मेरा गाँव सारण्डा जंगल के बीच है जो कि मुण्डा बहुल आदिवासी क्षेत्र है। वैसे तो मेरा परिवेश वही है जो ‘अघोषित उलगुलान’ में ‘दाण्डू’ का परिवेश है।

**आप पिछले 5 वर्षों से बनारस में रह रहे हैं, यहाँ के बारे में आप क्या सोचते हैं?
अ.लुगुन : बनारस की जमीन साहित्य के लिए उर्वर जमीन है। मेरे भीतर के काव्य-बीज को अंकुरित और पल्लवित होने में इस जमीन की महत्वपूर्ण भूमिका है। मैं बीएचयू, हिन्दी विभाग के अध्यापक, छात्र और शहर के बुद्धिजीवियों, लेखकों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे बार-बार प्रोत्साहित कर मेरा उत्साहवर्द्धन किया है। वर्तमान समय में जो साहित्यिक वातावरण निर्मित हुआ है वह किसी भी नये रचनाकार के निर्माण में बेहतर आधार भूमि देने में सक्षम है।

** आदिवासी समाज की कौन-सी चीज आपको सबसे ज्यादा परेशान करती है?
अ.लुगुन:आदिवासी सी समाज को खत्म करने की जो गहरी साजिश चल रही है, वह मुझे बहुत परेशान करती है। उन्हें अपनी सांस्कृतिक चेतना से काटने का उपक्रम किया जा रहा है। यह आदिवासियों के विकास के नाम पर छद्म रचने जैसा है।

** आदिवासी आँख से आप राष्ट्र राज्य, आधुनिकता और विकास को किस रूप में देखते हैं?
अ.लुगुन: अभी तक राज्य द्वारा भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में इस समाज को उपेक्षा के नजरिए से देखा गया है। यह समाज हमेशा हाशिए पर रहा है और यह प्रक्रिया लगातार जारी है।

** सलवा जुडूम को आप किस रूप में देखते हैं?
लुगुन:यह जनविरोधी कार्य है। यह फासीवादी शक्तियों के द्वारा आदिवासी समाज को आपस में बाँटने और उनके संघर्षों की धार को कुंद करने की एक साजिश है।

**हिन्दी लेखकों, बुद्धिजीवियों का आदिवासी समाज के प्रति जो रवैया रहा है, उसके बारे में आपकी क्या राय है?
अ.लुगुन: हिन्दी के लेखकों, बुद्धिजीवियों ने कभी भी इस समाज को गौर से नहीं देखा है। हाशिए के समाज को हाशिए के रूप में देखे जाने का प्रचलन है। लेकिन मुझे लग रहा है कि इस और अब लोगों का ध्यान आकृष्ट होना प्रारम्भ हो गया है।

**आज की हिन्दी कविता में कितनी धाराएं दिखाई पड़ रही है?
अ.लुगुन: मुझे लगता है कि आज की कविता दो धाराएँ है। एक सत्ता विमर्श की और दूसरी व्यवस्था परिवर्तन की। पहली धारा में भाषाई कौशल और मध्यवर्गीय जीवन की कुण्ठा है तो दूसरी धारा वृहत्तर जन समुदाय के दुःखों और संघर्षों को अभिव्यक्ति दे रही है। हमें इसे दूसरी धारा को और सशक्त करने की जरूरत है।

**क्या हिन्दी कविता और समाज में शब्द और कर्म का फाँक है?
अ.लुगुन: हाँ! शब्द और कर्म में फाँक है। यदि ये नहीं होता तो, पूरे भारत में किसानों, मजदूरों, दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों के द्वारा जो संघर्ष चलाए जा रहे हैं, उस संघर्ष की सार्थक परिणति हमें देखने को जरूर मिलती।

**आपकी नजर में हिन्दी कविता का भविष्य क्या है?
अ.लुगुन:हिन्दी कविता का भविष्य अच्छा है। गहरी वैचारिकी और जनपक्षधरता हिन्दी कविता के केन्द्र में सदा से रहा है। पूँजीवाद के गहरे दबाव के कारण थोड़े-बहुत परिवर्तन देखने को आ रहे हैं लेकिन मुझे लगता है कि हिन्दी कविता की मुख्यधारा अपनी मूल भावना के अनुरूप प्रतिरोध की चेतना को बनाये रखेगी।

6 टिप्‍पणियां:

प्रभात ने कहा…

आज अनुज को सुनना अच्छा लगा .नव औपनिवेशिक साजिशों के खिलाफ आदिवासी समाज का दर्द बयां करती हुई उनकी कवितायेँ प्रशंसनीय है ... आशा है वे वर्तमान साहित्य की गुटबाजी और राजनीति से बचते हुए अपनी यात्रा जारी रखेंगे .

ashubakaiti ने कहा…

इन कवि साथी रवि शंकर की कविता कहीं दिखाई नहीं दी।

ashubakaiti ने कहा…

इन कवि मित्र रवि शंकर की कोई कविता दिखाई नहीं दी कहीं आज तक।

रंगनाथ सिंह ने कहा…

अनुज फ़िलहाल बर्थडे बॉय हैं सो उनके विचार पढकर भला लगा.

लेकिन कुछ बातें समझ में नहीं आए जैसी कि फोटो का कैप्सन "गुरु चेले चार यार"

ऐसे कैप्सन में जो ध्वनि है वह अच्छी तो नहीं है...और हाँ,गुरु चेलों की ऐसी यारी का अंदाजा मुझे खूब है (जन्मजात बनारसी हूँ भाईयों,आयातित नहीं!)

और यह नही समझ आया कि पूरे साक्षत्कार में अनुज के उपनाम को ही क्यूँ बरता गया है ! क्या यह नई परंपरा है या बाल-क्रीडा है ?

Rangnath Singh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.
ritesh vidyarthi ने कहा…

anuj lugun ko keval adivasi samaj ke hi nahi balki hindustan ke samast shoshit,utpidit avam ke kavi ke roop me dekha jana chahiye.unaki kavita bharat me chal rahe un krantikari sangharso ke sath khadi hai jisase bharat ki samast utpidit samudai mukti ki ummid lagaye baithi hai.iss baat ko kinare na lagaya jai aisa mera budhijiviyo se apill hai.