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13 जनवरी, 2019

मालवीय चबूतरा रिसर्च और नॉलेज की सेल्फी: रामाज्ञा शशिधर

//मालवीय चबूतरा:रिसर्च और नॉलेज की सेल्फी://
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@रामाज्ञा शशिधर,संस्थापक,चबूतरा शिक्षक
😊
बहस जारी है...मेला गतिशील है...चिड़ियाँ परवाज पर हैं...पेड़ अपनी जगह तना है।बहस जारी है...
     अगर ज्ञान उधार का सुधार नहीं है;नकद की नीमकौड़ी है तो यह शोध पर भी लागू होगा।
     यूजीसी का नया नोटिफिकेशन ऑनलाइन कहता है...अच्छे शिक्षक और छात्र की कसौटी अच्छा शोधार्थी होना है।मौलिक और गुणवत्त्तापूर्ण शोध ही शिक्षक और छात्र का ज्ञान धर्म है। शोध की साहित्यिक चोरी बंद होनी चाहिए।
    शोध का अर्थ रेयर और अनछुआ विषय हो,नए नए और जरूरी सवाल हों,मूलगामी विचार(कॉग्निटिव आइडिया)हो,ताज़गी से भरे तथ्य स्रोत हों,वैचारिक यात्रा की सुलझी और भविष्यमुखी दिशा हो।
         यूजीसी की और शिक्षा संस्थानों की सेहत इन दिनों ज्यादा गड़बड़ है।शोध को हतोत्साहित करने वाले कारकों की
संख्या बढ़ती जा रही है।कट एन्ड पेस्ट की आंधी है।
     13 सालों के अध्यापन में 13 ऐसे शोधार्थी मेरे पास नहीं आए होंगे जिन्होंने रेयर शोध प्रारूप पर छह माह श्रम कर शोधार्थी होने और पंजीयन की इच्छा रखी हो।
      पांव लागी, आशीर्वाद चाहिए,जेआरएफ
खत्म हो रहा है,मैं  जेआरएफ हूँ इसलिए मेरा तो नामांकन पहले होना चाहिए,कृपा दृष्टि बनी रहे ये पॉपुलर शोध मुहावरे मिलते हैं।
     नौकरी दिलाने देने में कौन गुरु तेज है इसपर गहन शोध चलता रहता है।
        संकीर्ण सोच ने भारतीय शिक्षा संस्थानों में छात्रों का बड़ा नुकसान किया है।इस कारण अक्सर क्षमतावान शोधार्थी भी शोध की पटरी त्याग अर्थी
की पटरी पर चलने लगते हैं।
      आजकल दो तरह के शोधर्थियों की चर्चा चलती है-रेगुलरिया शोधकर्मी और पेंशनियाँ शोधकर्मी।जो  गाइड सेरेगुलर  जुड़े रहे वे रेगुलरिया और जो महीने में एक दिन फेलोशिप रजिस्टर पर कलम घुमाने का
कष्ट करें वे पेंशनियाँ।
       बातें और समस्याएं कई हैं जिनका समाधान बड़े अकेडमिक संवाद और श्रम के मुमकिन नहीं हैं।लेकिन यदि भारत को दुनिया के शिखर 200 विश्वविद्यालयों में शामिल
होना है तो केवल 'नेट/जेआरएफ फॉर असिस्टेंट प्रोफेसर'
जैसे दस्तावेजों से काम नहीं चलेगा।
      अंत मे!
...वे परेशान हैं...मनमाफिक सब कुछ नहीं हो पा रहा है...सिस्टम ढिलाई को कसना चाहता है...योग्य अध्यापक कड़ाई
से नीरक्षीर विवेक कर रहे हैं...
     वक्त आ गया है ज्ञान को मिशन और प्रोफेशन से जोड़ा जाए...क्लर्क और अकडेमिशियन, कटपेस्ट और गुणवत्तायुक्त,नकली और असली,साधो और साधक,साहित्य चोर और नीतिज्ञ के बीच लकीर खींची जाए।ज्ञान और शोध को समाज के लिए उपयोगी बनाया जाए।
       दीपक की लौ से सिर्फ रोशनी ही नहीं मिलती, सीलन भी सूखती है,कोने अतरे के अदृश्य सामान भी दिखते हैं,
और फतिंगे के पंख झड़ते हैं।

10 जनवरी, 2019

चबूतरे पर गिलहरी,शिशु और विमर्श का स्वागत है।

/मालवीय चबूतरा सत्रारंभ संवाद/
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☺️चबूतरे पर गिलहरी और शिशु का स्वागत है!😊
                        👍👍👍👍
धूप की तरह किलकते एक नन्हें शिशु ने साहस के साथ कहा-यहां क्या हो रहा है?
मैंने कहा-पढाई।
सवाल-पेड़ के नीचे पढाई?
जवाब-यहां धूप,ऑक्सीजन,आज़ादी और छाया सबकुछ मिलता है इसीलिए।
सवाल-सनडे को भी पढाई?
जवाब-बड़े बच्चे को सनडे को भी पढ़ना चाहिए।
सवाल-क्या फीस भी लगती है?
जवाब-बिल्कुल नहीं।हर रोज पैसे लेकर क्लास में पढ़ाता हूँ।यहां फ्री क्लास होती है।
जवाब-मैं तो खेलने आया हूँ।ग्राउंड खोज रहा हूँ।
सवाल-क्या आप भी पढ़ने आओगे?
जवाब-कभी कभी।
--और मैंने देखा,एक गिलहरी सुबह की खिली धूप में दोनों हाथों से कुछ कुतर रही थी।अचानक सरसराती हुई पेड़ में खो गई।
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अब शुरू होगी कक्षा!!!
#शोध का सबसे बड़ा वैरी कटपेस्ट धंधा है।#
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"-शोध तथ्य की पुनर्खोज और आइडिया का आविष्कार होने के कारण एक गम्भीर मौलिक कार्य है।
-चेतना और अस्तित्व के सरोकारी द्वंद्व के बिना ,सेल्फ और अन्य के द्वंद्व के बिना कोई बड़ा और महान शोध असंभव है।
-शोध को ग़ैरमौलिक और रद्दी प्रचार करने वाली चेतना वस्तुतः ज्ञानकाण्ड में खोखली और लूट झूठकांड में फरहर होती है।
-शोध की मौलिकता के अभाव का बड़ा कारण हमारे शिक्षक छात्र और विश्वविद्यालय की गैरजिम्मेदार भूमिका है वहीं शिक्षा का अनावश्यक राजनीतीकरण भी है।

-शोध की मौलिकता सतत आइडिया ऑब्जेक्ट सम्बन्ध और उसपर चिंतन है।
-आजकल पिछली खिड़की की छलांग से शोधकर्मी होने की कर्महीन उथल पुथल है जिसका परिणाम है कि चेतना विकसित होने के बदले कटपेस्ट मास्टर हो जाती है।
-आलोचना के ह्रास का एक बड़ा कारण शोध में घटती रुचि भी है।
- ज्ञान मंच के किसी स्तर पर मौलिकता और गुणवत्ता को उत्साह और मदद नहीं मिलने से जनता के टैक्स की बड़ी राशि रोजगार पेंशन भत्ता की शक्ल में बदल रही है।
-ज्ञान की बुनियादी निर्मिति मौलिक विचार से जुड़ी होने के कारण शोध एक मौलिक उद्यम है।
-जो शिक्षक छात्र शिक्षक मानवता  सेवा के इस जरूरी कर्म को ग़ैरमौलिक और गैरजरूरी बनाने की कोशिश करते हैं वे गर्दभ की तरह हैं जो पीठ पर लदी चन्दन की लकड़ी का केवल भार ढोते हैं लेकिन उसके गुण से महरूम रह जाते हैं।"
@वक्तव्य:रामाज्ञा शशिधर