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28 मई, 2021

मदन कश्यप पूरावक्ती प्रतिबद्ध कवि हैं।


[आज 29 मई को मदन कश्यप के 67वें जन्मदिन पर विशेष]
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"वे जब भी मिलते हैं,पूर्णचन्द्र की शीतल और विकसित
मुस्कान के साथ मिलते हैं।वे जब भी कहते हैं भादो की गहरी नदी के निचले तल से आती हुई आवाज़ से कहते हैं।वे जब भी सुनते हैं तो हिरन की तरह चौकन्ने होकर सत्ता से आती हुई खड़क को सुनते हैं।वे जब भी होते हैं तो हरेक के साथ पूरे होते हैं।हां, कई बार वे जैसा दिखते उससे  ज्यादा अदृश्य होते हैं।"
                 मदन कश्यप मेरे लिए इतने निजी हैं कि बहुत कुछ कहना सुनना लंबा चल सकता है।उन्हें सुनकर पढ़कर बड़ा हुआ हूँ।वे
जितने बिहारी हैं,उतने ही बनारसी और उतने ही डेहलाइट।वे जितने इंकलाबी हैं उतने ही पारिवारिक।अब तो उनका एक घर बनारस भी है।
              मदन जी इतने संवेदनशील इंसान हैं कि कोविड काल में अपने खोए हुए लेखक साथियों,बौद्धिकों,लोगों से हिल गए हैं।भीतर से टूट गए हैं।बाजार,व्यापार और सरकार को कामधेनु समझने वाली,दूहने वाली और गटकनेवाली बौद्धिकता से वे बहुत अलग हैं।लेकिन वे घिरे हुए भी हैं।यह एक प्रतिबद्ध कवि की मुश्किल है।
          मदन कश्यप जीवन भर लिखते रहे।उनसे ज्यादा उनकी बात बोलती रही।कभी कविता में,कभी पत्रकारिता में,कभी संगठनों में,कभी डैश पोडियम पर,कभी चौराहों पर।इंकलाब आए न आए मुट्ठी तनी रही।लेखक के लिए सरकारी नौकरी छोड़ना बिहारियों का साहस है।तीन नाम तुरत याद आ रहे हैं-ज्ञानेन्द्रपति,मदन कश्यप और अरुण प्रकाश।नख कटाकर शहीद होने वाले बड़बोले लेखकों के बीच यह सच्चे जोखिम की हिम्मत है।
      लगभग आधा दर्जन काव्य संकलन है।गद्य इतना लिखा है कि कई संग्रह हो।भाषणों,रपटों,साक्षत्कारों के अनेक संकलन हो सकते हैं।नामवर जी के साथ दूरदर्शन पर 
चलाए पुस्तक विवेचन अभियान की सामग्री भी काफी होगी।मदन कश्यप शर्मीले,धीमे और चूजी हैं।आमिर खान की तरह परफेक्टनिष्ट!
           मदन जी  साहित्य प्रकाशन जगत के ऐसे रणनीतिकार हैं जिनके कारण हिंदी में कई प्रकाशक लेखक जम गए।यह सच है कि मिशन और स्पर्धा की राह पर चलते हुए कई बार वे जेनुइन के साथ कूड़े कचरे के भी ब्रांड एंबेसडर बन जाते हैं।यह युगीन संकट है।
            मदन जी से बड़ा सहज और मिलनसार व्यक्ति हिंदी में कम ही दिखता है।बीएचयू परिसर में दिनकर लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर,वाराणसी का उद्घाटन उनके हाथों हुआ है।पेड़ के नीचे बैठकर वे समारोह में मुख्य वक्तव्य देने की
मार्क्सीय जनतांत्रिकता रखते हैं!
          हिंदी साहित्य के ऐसे पीढ़ी निर्माता योद्धा लेखक को जन्मदिन पर सौ साल बोधिवृक्ष बने रहने की शुभकामनाएं!
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मदन कश्यप की कविता:रीढ़ की हड्डियां

रीढ़ की हड्डियाँ
मानकों की तरह होती हैं
टुकड़ों-टुकड़ों में बँटी फिर भी जुड़ी हुई
ताकि हम तन और झुक सकें

यह तो दिमाग को तय करना होता है
कि कहाँ तनना है कहाँ झुकना है

मैं एक बच्चे के सामने झुकना चाहता हूँ
कि प्यार की ऊँचाई नाप सकूँ
और तानाशाह के आगे तनना चाहता हूँ
ताकि ऊँचाई के बौनेपन को महसूस कर सकूँ !
 ©रामाज्ञा शशिधर,बनारस

27 मई, 2021

नेहरू की भारत माता यहां कैद हैं

{निधन दिवस,27 मई}
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 ©रामाज्ञा शशिधर,बनारस
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     आज भारतीय गणतंत्र के सर्वश्रेष्ठ शिल्पकार जवाहरलाल नेहरू की निधन तिथि है।
     स्वाधीनता संग्राम के सच्चे लड़ाकों की 'विविधवर्णी कल्पनाशीलता' से भारतीय गणतंत्र और जनतंत्र की नींव रखनेवाले नेहरू ने 1947 से 1964 के बीच जिस 'आइडिया ऑफ इंडिया' की स्थापना की,आज उसके स्तम्भों को क्रोनी पूंजी के कट्टर दीमक या तो खोखला कर रहे हैं या बाजार में कौड़ी के मोल बेच रहे हैं।
       अंग्रेजी की सामग्री से अलग राष्ट्रकवि दिनकर की पुस्तक 'लोकदेव नेहरू' और आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल की संपादित पुस्तक 'भारत माता कौन हैं' हर युवा को पढ़नी चाहिए।
       दिनकर लाइब्रेरी रिसर्च सेंटर,वाराणसी से भी बनारस के युवा इन पुस्तकों को हासिल कर पढ़ सकते हैं।
       बात बात पर जेपी को 'लोकनायक' कहने वाले भूल जाते हैं कि विनोबा भावे ने जयप्रकाश नारायण को दिए संबोधन से पहले नेहरू को सोच समझकर 'लोकदेव' कहा था।
        आजकल कट्टर,क्रूर और पाखंडी शासक को 'परलोक देव' बनाने की संघी मुहिम के समांतर नेहरू के 'लोक देव' वाली छवि पर नई बहस की जरूरत है।
        कहना न होगा कि दिनकर ने सत्ता,समाज,इतिहास और राजनीति के कड़े आलोचक होते हुए नेहरू की निर्मम समीक्षा की है।उसके बावजूद वे उनकी नजर में  लोकतांत्रिक भारत के ठोस निर्माता थे।
        एक दशक से हवाट्सप यूनिवर्सिटी के माध्यम से 'गोबरग्रस्त सामूहिक दिमाग' निर्माण के लिए एकसूत्री कुतर्क व चरित्रहनन अभियान चल रहा है जिसमें नेहरू खानदान की जितनी खुदाई हुई है उतनी खुदाई अगर कट्टर व कुतर्क सेवक हिन्दू सभ्यता की कर लेते तो उसका सचमुच उद्धार हो गया होता।
      सबसे ज्यादा वैचारिक धुंध भारतीय गणतंत्र को मटियामेट करने के लिए फैलाया गया है।
      आज भारत माता कौन है -का उत्तर नई पीढ़ी के पास मुश्किल से मिल सकता है।
     झंडों,डंडों,नारों,गलियों,तालियों,हत्याओं,दंगों,चुनावों,
ट्रोलों,अम्बानियों,नादानियों,युद्धों,हथियारों में भारतीय राष्ट्र की खोज करने वाले दिमाग 'गोदी मीडिया' के दिग्भर्मित व स्मृतिविहीन क्राफ्ट हैं जिन्हें अपने निकट अतीत से काटकर सुदूर पुराण युग में फेंक दिया गया है।
      ऐसे समय में नेहरू और उनकी भारत माता की खोज से हम ज्ञान की उस दुनिया में प्रवेश कर सकते हैं जहां गणतंत्र के ढहते अवशेष को बचाया जा सके।इतना ही नहीं,अब तो नए सिरे से कोशिश करनी होगी कि बिखरते हुए जनतंत्र का ठोस नवनिर्माण कैसे हो।
         आधुनिक भारत के सच्चे निर्माता,भारतीय आत्मा के इतिहासकार,स्वाधीनता सेनानी और विख्यात स्कॉलर को 135 करोड़ जन की ओर से निधन तिथि पर राष्ट्रीय श्रद्धाजंलि!