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16 दिसंबर, 2025

50 वर्ष बाद शोले फ़िल्म : चंबल की किसान कथा


राश की कलम से
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                   ||थिएटर से लौटकर||


    कला समीक्षा में भोथड़े दिमाग कम नहीं। उसकी एक मिसाल फ़िल्म शोले को लेकर 50 वर्षों से होती रही किसिम किसिम की कुचर्चा है। यह सही है कि वह एक मसाला पॉपुलरिटी से क्राफ्टेड मूवी है लेकिन शोले को मारधार, दोस्ती, रोमांस,कॉमेडी,ट्रेजडी, गीत संगीत,संपादन,निर्देशन,संवाद,पटकथा तक सीमित रखना भारतीय सिनेमा की उस जमीनी दृष्टि को खारिज करना है जो यहां के मूल सामाजिक राजनीतिक प्रश्न रहे हैं।
           मैं जब कल बनारस के आईपी थियेटर में 4k dolby saund के साथ अपनी गोल्डन जुबली मना रही फिल्म शोले के फाइनल अनकट को शोले दर्शन की यात्रा में 11वीं बार देख रहा था तब मुझे पहली बार उसकी
दृष्टिसंपन्न पटकथा पर ध्यान गया जिसकी मूल समस्या चंबल इलाके के रामगढ़ गांव की किसान समस्या है। भारतीय हिंदी सिनेमा ने किसान प्रश्न को आरम्भ से मुख्य या गौण रूप में किसी न किसी तरह से जरूर उठाया है।मदर इंडिया से पिपली लाइव तक किसान
प्रश्न के अनेक सूत्र विन्यस्त दिखते हैं।
       शोले की पटकथा के केंद्र में डाकू गिरोह के सरदार गब्बर सिंह द्वारा रामगढ़ गांव के किसानों से अनाज वसूली है। ठाकुर बलदेव सिंह बड़े किसान का
पुलिस पुत्र है जबकि छोटे बड़े किसान पात्रों से यह गांव जीवंत बना रहता है। दो निम्न मध्यवर्गीय शहरी शातिर चोरों धर्मेंद्र और अमिताभ को किसानों का नायक बनाए जाने की कहानी रामगढ़ के किसानों की
रक्षा की कहानी है।
        सलीम जावेद की प्रगतिशील किसान मजूर और कौमी एकता की कलादृष्टि का कमाल है कि पटकथा
के संवादों में सीधे खेती से लगाव और ग्राम प्रेम के इंकलाबी डायलॉग रचे गए हैं। संजीव कुमार जिस तरह से कहते हैं कि किसान अपने हंसिए की दरांतियों से लोगों का जीवन पालते हैं या अब इस गांव से एक मुट्ठी अनाज
भी डाकुओं को नहीं मिलेगा तब यह उस दौर के चंबल की त्रासदी का ही नहीं बल्कि उत्तर भारतीय किसान के संघर्ष का प्रतिबिंब है। जय और वीरू गांव में खेती
बारी करने का स्वप्न देखने लगते हैं। एके हंगल का अपने कई बेटों को किसानों और गांव के लिए शहीद
करने की इच्छा किसान एकता की बुनियाद बनती है।प्रेम और पर्व किसानी भाषा,टोन, लय से विन्यस्त हैं।
              मुझे लगता है कि सलीम जावेद की पटकथा में  यह भारतीय किसानों के गल्प और हास्य व्यंग्यशिल्प का भी खूबसूरत इस्तेमाल है जिसमें कथा कथन से पटकथा में बार बार हुक पाइंट निर्मित होता है और त्रासदी व हिंसा की यात्रा को सहज बनाए रखने
का प्रयास जारी रहता है।
        अमजद खान द्वारा गब्बर की भूमिका भारतीय
सिनेमा के खलनायकत्व की अदा की ऊंचाई है। मैं 
एके हंगल से इप्टा के बिहार सम्मेलन में मिला था। इप्टा स्वर्ण जयंती के झंडा गीत के लिए  मेरा गीत 'वे सारे हमारी कतारों में शामिल ' के कोरस गायन के वक्त एके हंगल और ओमपुरी जैसे वैकल्पिक सिने कलाकार शामिल हुए। तब शोले का डायलॉग बोलकर एके हंगल इप्टा का महत्व बताते रहे।मैं उनसे धीरे धीरे प्रभावित हुआ। इस फ़िल्म में आए अमजद खान उर्फ  गब्बर के डायलॉग को क्लास 8 से बीए तक जन्मभूमि सिमरिया के अपने
टोल में घूम घूमकर बोलता था।तब मैं गब्बर ही हो
गया था।मेरा गांव किसानों और रंगबाजों की ज़ंग से
लाल बना रहता था।
        अब भारतीय सिनेमा ने ग्रैंड बनाना लगभग बंद
कर दिया है तब इस फ़िल्म को हर पीढ़ी द्वारा देखना
  चाहिए। संस्कृति से फ़िल्म पैदा होती है ,फिर वह फ़िल्म एक सामाजिक संस्कृति बना सकती है।शोले
ऐसी ही फ़िल्म है।

01 अक्टूबर, 2025

अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस का बाजारशास्त्र क्या है

रामाज्ञा शशिधर 
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आज अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस है। 
2014 से अंतर्राष्ट्रीय कॉफी संगठन ने अनेक देशों में अलग अलग तिथियों पर मनाए जाने वाले  राष्ट्रीय कॉफी डे से अलग एक अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस शुरू किया। इस दिन कॉफी कम्पनियां कॉफी किसानों,रोस्टरों, बरिस्ता और ग्राहकों में कॉफी कल्चर और एग्रीकल्चर  के प्रति तरह तरह की जागरूकता के लिए आयोजन करती हैं। बीन किसानों की ज़िंदगी में सुधार करने के वायदे भी करती हैं।
               चाय 19वीं सदी से ही अंग्रेजीराज द्वारा भारत और अमेरिका जैसे देशों में उपनिवेशन और शोषण का औजार थी। वह 2014 से गली गली,मीडिया,सभा,टपरी पर किसिम किसिम के विभाजन का हथियार हो गई।
          दूसरी ओर कई सदियों से बकरी, चरवाहे, मोंक, यायावर, फ्रांसीसी क्रांति से होती हुई, दुनिया भर में बदलाव,विद्रोह और जोश की प्रतीक बनती हुई, कॉफी आजकल 'थर्ड प्लेस' की 'सरप्लस कोमोडिटी सेवा' में तेज गति से शामिल है।
       ' थर्ड स्पेस' तो चाय अड्डे भी रहे हैं और कॉफी हाउस भी लेकिन दोनों के मिजाज,चरित्र, बहस, दिशा और विचार उत्पादन में बहुत अंतर रहा है।यह अलग से अध्ययन का विषय है।
              बहरहाल दुनिया की सबसे बड़ी कॉफी कंपनी स्टारबक्स बनारस जैसे देहाती नगर के दक्षिणी
कोने पर हाथ आजमा रही है वहीं कैफे कॉफी डे जैसी
भारतीय कंपनी भी बनारस में दो स्टोर के साथ पहले से जमी हुई है। 
          यह दुर्भाग्य है कि आईआईटी बीएचयू 
के सीसीडी आउटलेट का क्रमिक विनाश यहां के प्रशासन और शिक्षा की अर्थी चलाने वालों ने कर दिया है। दुनिया भर के उच्च शिक्षण संस्थानों में कैफे ज्ञान शोध उत्पादन के विमर्श स्पेस रहे हैं जबकि हमारा हाल सामने है।भारत के विवि क्यों नवाचार और ज्ञान विमर्श  में पिछड़ते गए इसका एक जरूरी कारण इनकी शिक्षा प्रणाली में 'रचनात्मक कैफे संस्कृति' के थर्ड स्पेस' निर्माण का महत्व नहीं देना है जहां से नई पीढ़ी भारत और दुनिया को अपनी ऊर्जा,सोच,विमर्श, नवाचारी ज्ञान उत्पादन से बड़ी ऊंचाई दे सकती थी।भारत चूक गया है। 
    और उधर हाय! विकट चाय चौपालों ने 'नया चीकट लम्पट हिंसक गिरोह' पैदा कर दिया है जो
लोकतंत्र विरोधी आंदोलन चला रहा है। बंगाल के चाय अड्डे और काशी की अड़ी अब इतिहास के फॉसिल हैं।
        नेसकैफे जैसी कारपोरेट कम्पनी बीएचयू में कई आउटलेट्स से वर्षों से कॉफी का तमाशा कर रही है।अभी हेजलनेट जैसी नई कम्पनी लंका पर कूद आई है।
    लंका से राजघाट तक सौ से अधिक देशी विदेशी कैफे हैं जो पारंपरिक चाय अड्डों को चुनौती दे रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से कुछ ही जगहें थर्ड स्पेस के लायक हैं बाकी होर्डिंग, पोस्टर, मैगी बर्गर, स्मोकिंग गैस चैंबर और डोपामाइन फायर प्लेस ही दिखाई देते हैं।

        कॉफी संस्कृति का काशी जैसे स्थान पर इतना आतंक है कि मजबूरन पप्पू अड़ी नेस कॉफी, पोई अड़ी चाफी, बंगाली दादा अड़ी कुल्हड़ कॉफी बेच रही है। हालांकि चाय और कॉफी दोनों प्योर फॉर्म से अलग डेयरी कल्चर की एनिमल क्रूरता और सेहतविरोधी क्रीम पर टिकी हुई हैं।
       बनारस में कॉफी वार साइलेंटली शुरू है। अभी थर्ड वेव, ब्लू टोकाय जैसी देशी कंपनियाँ उतरने 
के मूड में हैं।
              बनारस जैसे देहात का यह हाल है तब बंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों की बात छोड़िए। वे बड़ी जगहें दुनिया और देश की छोटी बड़ी कॉफी कम्पनियों के युद्ध स्थल हैं।
हमारी कल्पना से परे कॉफी पेय में प्रयोग चल रहे हैं।
यह अतिरिक्त कैफ़ीन से अतिरिक्त आनंद द्वारा अतिरिक्त मुनाफा कमाने का ग्लोबल बाजार है। दूसरी ओर नई पीढ़ी में 'थर्ड प्लेस' खोज की बैचेनी का प्रॉफिट प्लेस है।
            जैसे बनारसी हलवाई मिठाई में तरह तरह के प्रयोग करते रहते हैं, ठीक वैसे ही प्रशिक्षित बरिस्ता कॉफी में रोज रोज न्यू फ़्लेवर और टेक्सचर जोड़ रहे हैं।
       चाय की तरह  कॉफी भी एक विचारधारा है और विचार उत्पादन का अड्डा भी। कॉफी के विचार युग से अलग उपभोक्ता युग में  कॉफी हाउस में 'थर्ड स्पेस' बहुत कम बन रहा है और अलगाव का तनाव बढ़ता जा रहा है।
              कॉफी की खेती, किसान की हालत, बीन मार्केटिंग, रोस्टिंग, और उपभोग आउटलेट्स के बाजारशास्त्र में मेरी दिलचस्पी इसलिए बढ़ी है क्योंकि
किसान और खेत पर खतरे बढ़ते जा रहे हैं।
    केंद्रीकृत टेक्नो पूंजी द्वारा शोषण बढ़ने वाला है।ऐसे में किसान बीन की तरह फ्रेंच प्रेस की तली में घुलकर खत्म होते जाएंगे और मुनाफा स्विस लॉकर से गतिविधि  बढ़ाता जाएगा।
      तब अंतरराष्ट्रीय कॉफी दिवस पर हमें कैफीन
की उत्तेजना और ताजगी के साथ बीन पैदा करने वाले लैटिन अमेरिका,अफ्रीका और एशिया के मेहनतकश किसानों की ज़िंदगी के जीवन में झांकना होगा, कि कहीं आग में उनका जीवन तो नहीं रोस्ट हो रहा, कहीं मशीन में लमहा तो नहीं पिस और घुल रहा है!
       
      ब्लैक कॉफी तन के लिए फायदेमंद है लेकिन
  मन के लिए उससे ज्यादा असरदार हो सकता है। मन के खेत में कॉफी बीन से वास्तविक खेत में ठोस कॉफी बीन की तरह नए नए उत्तेजक विचार पैदा किया जाना चाहिए। 
      वाल्टर बेंजामिन की एक स्थापना है कि लेखक भी उत्पादक होता है। बात सही है, किसान की तरह बौद्धिक भी उत्पादक होता है।एक अन्न उपजाता है,दूसरा शब्द। दोनों को गहरे जुड़ना चाहिए।इसलिए कि तमाम रिपोर्टें बताती हैं कि कॉफी किसानों का जीवन कॉफी की तरह सेहतमंद और स्वादिष्ट नहीं है।
समझ के लिए वाद विवाद संवाद जारी रखना है।

14 अगस्त, 2025

समानता के बिना स्वतंत्रता घोड़े की लीद है

"सच्ची स्वतंत्रता अमेज़ॉन या फ्लिपकार्ट या जिओ आउटलेट पर दो पैसे में नहीं मिलती है। उसके लिए अपने अस्तित्व और अस्मिता को दांव पर लगाना पड़ता है। स्वतंत्रता देह और आत्मा की वह अवस्था है जहां स्व पर अन्य का सारा दबाव हट जाता है। जागरण और स्वप्न में दमन व बंधन का प्रभाव नहीं महसूस होता है।
      यह दमन,दबाव और अलगाव का चरम युग है। मानस, देह,समाज और प्रकृति पर निगरानी रखी जा रही है। ऐसे में स्वतंत्रता पर पुनर्विचार जरूरी है।
       समानताविहीन स्वतंत्रता घोड़े की लीद से भी बेकार चीज़ है।
      आनंद गुलामी से भी मिलता है और स्वतंत्रता से भी।यह समता से मुक्त गुलामी के आनंद की खरीद बिक्री का दौर है। इसलिए स्वतंत्रता से बराबरी और लोकतंत्र का तत्व लापता है। स्वतंत्रता संकेतों और प्रतीकों के खोखले रैपर की तरह दिखने लगी है। वह किसी अन्य उत्पाद की तरह व्यवहार कर रही है।
      दरअसल स्वतंत्रता भाववाचक संज्ञा है।इसलिए भीतरी भावना और बाह्य ठोस के द्वंद्व के बिना वह 'इवेंट', 'फेस्टिवल', 'दिखावा', 'विज्ञापन', 'विलास' 'छद्म अहसास' होकर रह जाती है। स्वतंत्रता के साथ 'दिवस' और 'कर्मकांड' जैसा व्यवहार एक मनुष्य और राष्ट्र दोनों के लिए आत्मघाती कदम है।
      स्वतंत्रता घटना नहीं,प्रवाह है;तालाब नहीं, नदी है; बाहर नहीं,भीतर है; मेगा शो का पाखण्ड नहीं, सड़क से संसद तक दिल से दिल और हाथ से हाथ का अमृत स्पर्श है।
    
        स्वतंत्रता आसमान में उड़ान भरता हुआ प्रेम और आनंद का 'सर्वशक्तिशाली पंछी' है जिसके एक पंख पर 'समता का क्षितिज' है और दूसरे पर 'सहअस्तित्व का क्षितिज'।
        मैं स्वतंत्रता के लिए खुद को तबाह करने के लिए तैयार हूँ। मैंने लोहा लिया है। मैं आत्मा के गीत की गूंज के लिए बहुत कुछ खोने को तैयार हूँ। यह भाव और स्थिति ही मेरे लिए स्वतंत्रता का सुख है। वह मेरे पास है।उम्मीद है आपके पास भी होगा।"
{राश की डायरी}

31 जुलाई, 2025

प्रेमचंद के बैल आज के नागरिकों से बेहतर हैं



रामाज्ञा शशिधर
लेखक/अध्यापक
हिंदी विभाग, बीएचयू
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दो बैलों की कथा : स्वाधीनता संग्राम का रूपक

आलोचकों के बीच प्रेमचंद की अनेक कहानियों को लेकर अनेक तरह के पूर्वाग्रह हैं। अधिकांश पाठक 'दो बैलों की कथा' को बाल कहानी या पशु कहानी के रूप में देखते हैं। यह इस कहानी को देखने का सही नजरिया नहीं है।
'दो बैलों की कथा' कहानी का रचनाकाल 1931 है। यह उसी वर्ष 'हंस पत्रिका' के अक्टूबर महीने में छपी थी। उस दौर में प्रेमचंद की अनेक कहानियां सामने आयी। 1931 में 'दो बैलों की कथा' कहानी के इर्द-गिर्द ही उनकी आधा दर्जन से अधिक कहानियां आयी। एक तरह से यह प्रेमचंद की कहानियों के नए ढंग से विस्फोट का समय है।
यहां प्रेमचंद की उन कहानियों का जिक्र आवश्यक है जिन्हें वे 'दो बैलों की कथा' कहानी के आस-पास लिख रहे थे। उन कहानियों को ध्यान से देखने पर एक दिलचस्प तथ्य निकल कर सामने आता है। 1931 की जनवरी में प्रेमचंद की 'उन्माद' कहानी छपी, फरवरी में 'जेल' कहानी, मार्च मे 'डपोरसंख', अप्रैल में 'डिमांस्ट्रेशन,' जून में 'प्रेम का उदय' अगस्त में 'आखिरी तोहफा' और सितंबर में 'तावान' कहानी। यह बात गौर करने वाली है कि 'तावान' कहानी को प्रेमचंद छिपी हुई डकैती कहते हैं। इसी क्रम में अक्टूबर महीने में एक तरफ 'सद्गति' कहानी छपी और दूसरी तरफ 'दो बैलों की कथा' कहानी छपी जो हिंदी कथा साहित्य के लिए बड़ी घटना साबित हुई।
प्रेमचंद की इन कहानियों के शीर्षक और अतंर्वस्तु को देखने से यह स्पष्ट होता है कि लखनऊ में रहते हुए वे कहानियों के माध्यम से उस दौर में उपनिवेशवाद के खिलाफ चल रही आजादी की लड़ाई का एक क्रिटिक रच रहे थे। यह क्रिटिक वे कहानी के भीतर रच रहे थे।
'दो बैलों की कथा' कहानी की रूपात्मकता अद्भुत है। यह सिर्फ बाल कहानी या पशु कहानी नहीं है बल्कि यह संघर्षशील और गहरे राजनीतिक उद्देश्य की कहानी है। 1928 से लेकर 1931 के बीच जब यह कहानी लिखी जा रही थी उस समय देश के भीतर ब्रिटिश शासन और उसके देशी आधार के खिलाफ अनेक तरह के संघर्ष दिखाई पड़ते हैं।
1929 में गरम दल का नेतृत्व भगत सिंह करते हैं। सान्डर्स की हत्या होती है। 1930 के मार्च में महात्मा गांधी नमक सत्याग्रह आरंभ करते हैं और‌ नमक बनाने के लिए साबरमती से दांडी तक की पैदल यात्रा होती है। यह कहानी हिन्दुस्तान के गांवों तक पहुंच जाती है। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और हिंसा के अनेक रूपों से जुड़ जाती है। 1930 की जनवरी में लाहौर में पूर्णस्वराज का नारा दिया जाता है। 1931 में भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दी जाती है। 1931 में ही कांग्रेस अपने संघर्ष में किसानों और मजदूरों के संघर्ष को जोड़ती है। यह बहुत ही हलचल का समय है।
प्रेमचंद की तत्कालीन कहानियों और उनके आस-पास घटित हो रही राजनीतिक-सामाजिक अंतर्वस्तु के बीच गहरा संबंध है। अगर 'दो बैलों की कथा' कहानी को उत्तर औपनिवेशिक विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो यह राष्ट्रीय रुपक लगती है। फ्रेडरिक जॉनसन ने ठीक ही कहा है कि तीसरी दुनिया की कहानी या गल्प वहां का राष्ट्रीय रुपक ही नहीं विडंबनामूलक भी होता है। 
'दो बैलों की कथा' राष्ट्रीय रुपक है। यह भले एक गांव की कहानी है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर चल रही राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व भी करती है। यह राष्ट्र के किसान वर्ग की इच्छाओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति है। इस कहानी को सिर्फ किसान-ज़मींदार और किसान-ब्रिटिश संघर्ष के रूप में नहीं देखना चाहिए बल्कि गुलाम और मालिक के बीच के तनावों के रूप में भी देखना चाहिए जो तीसरी दुनिया के गुलाम देशों की कड़ी सच्चाई है।
पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के दौर में वर्ग के दो रूप शोषक और शोषित ही नहीं बनते हैं बल्कि मालिक और गुलाम भी बनते हैं। पूंजीपति, श्रमिक, जमींदार और किसान के सामान्य रूप से यह रूप भिन्न होता है, गहरा होता है और सांस्कृतिक रूप से ज़्यादा घातक होता है।
कहानी के पहले खंड में गुलामी और विद्रोह का द्वंद्व दिखाया गया है। कहानी की शुरुआत हीरा और मोती नामक दो बैलों से होती है जो झूरी काछी के घर रहते हैं। एक दिन झूरी उन्हें अपने साले गया के यहां भेज देता है। यह बात दोनों बैलों के दिलों में चुभती है। उन्हें परायापन और निर्वासन का बोध होता है। झूरी से उनकी आत्मीयता का अलगाव होता है जिस कारण वे दोनों बगावत करते हैं। वे पगहा तोड़ते हैं और गया के घर से भागकर झूरी के घर चले आते हैं। यह उन दोनों का पहला विद्रोह है।
दूसरे खंड, में गया फिर से उन दोनों को झूरी के घर से अपने घर लाता है। उनका दमन करने के इरादे से वह उन्हें रास्ते भर बैलगाड़ी में जोतकर लाता है। घर पर उन्हें खाने के लिए सिर्फ सूखा भूसा देता है। अगले दिन उन्हें खेत में जोतने की कोशिश करता है। लेकिन वह दोनों खेत में खटने से इंकार कर देते हैं। वे खेत में चलते ही नहीं हैं जिस कारण गया उनकी खूब पिटाई करता है। घर पर भी उनका तरह तरह से शोषण करता है। उन्हें पीटता है। ठीक से चारा नहीं देता है। उनकी उपेक्षा करता है। अपमानित करता है। दोनों बैल यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। फिर भी वे दोनों गहरी सजा के उस ढांचे में आगे बढ़ते रहते हैं। एक दिन गया की बेटी उन दोनों बैलों को वहां से भागने के लिए मुक्त कर देती है। वे दोनों वहां से भाग जाते हैं। यहां भी ग़ुलामी से मुक्ति का संकेत है।
तीसरे खंड में, रास्ते में उन दोनों की मुलाक़ात एक सांड से होती है। सांड से बैल कभी जीतते नहीं हैं लेकिन इस कहानी में वे दोनों बैल योजनाबद्ध तरीके से संघर्ष करते है और उस सांड को हरा देते हैं। 
चौथे खंड में, वे दोनों एक खेत में मटर खाते हुए पकड़े जाते हैं और कांजी हाउस पहुंचा  दिए जाते हैं। वहां वे गुलाम जानवरों को दीवार तोड़कर आजाद करते हैं। हीरा की रस्सी नहीं खुलती है इसलिए मोती भी वहां से नहीं भागता है। दोनों फिर से पकड़े जाते हैं। यहां गुलामी के वक्त गरम और नरम विचारों में प्रेम और मित्रता की गहराई को दिखाया गया है। इसके बाद उन्हें वहां बिना खाना पानी के एक सप्ताह रखा जाता है जिससे दोनों का शरीर गल जाता है। वे ठठरियों में बदल जाते हैं।
किसान झूरी के यहां हीरा और मोती को प्रेम मिला, आत्मीयता मिली और जीवन का रस मिला। गया के घर उन्हें श्रम और गुलामी के साथ उपेक्षा और अनादर मिला लेकिन कांजी हाउस में उनके साथ की गई क्रूरता चरम पर थी। उन्हें खाना नहीं दिया गया, पानी नहीं दिया गया और जब शरीर गल गया तब अंत में उन्हें एक कसाई के हाथ बेच दिया गया।
अंतिम खंड, में कसाई उन्हें जिस रास्ते से ले जाता है, वह उन दोनों का पहचाना हुआ रास्ता है। उन्हें अपने घर का रास्ता याद आ जाता है और वे दोनों विद्रोह कर अपने घर पहुंच जाते हैं। किसान झूरी देशज साथी को देखकर प्रसन्न होता है और उन्हें गले से लगा लेता है। कसाई उन्हें लेने के लिए उनके पीछे झूरी के घर पहुंच जाता है और उन पर अपना कब्जा जमाने की कोशिश करता है। लेकिन मोती उसे गांव के बाहर तक खदेड़कर आता है और अपनी जिंदगी की रक्षा करता। यहां किसान और कसाई के बीच संघर्ष दिखाया गया है।
कहानी के अर्थ विमर्श को गहराई से देखने पर कई संस्तर दिखाई पड़ते हैं। इसका कथाशिल्प प्रेमचंद की अन्य कहानियों से ज्यादा सघन है। प्रेमचंद की कहानियों में नाटकीयता, घटना, अनुभव, चरित्र निर्माण और भाषा ये पांचों तत्व रूप के तौर पर उपनिवेशवाद से आते हैं। अपने समय का यथार्थ ही किसी भी रचना का रूप और अंतर्वस्तु का निर्माण करता है। एक साहित्यिक रचना की समझ और बोध के लिए रुप से अंतर्वस्तु की तरफ चलना चाहिए। इसलिए पहले इस कहानी के रूप को देखते हैं।
उपनिवेशवाद एवं जमींदार वर्ग दोनों की चक्की में उस दौर का भारत पिस रहा था। खासकर किसान भारत पिस रहा था। 1857 से लेकर 1931 के बीच अनेक तरह के घटनात्मक और नाटकीय मोड़ भारत में आए। प्रेमचंद की कहानियों के कथानक में नाटकीयता एक शक्तिशाली डिवाइस की तरह है। 'दो बैलों की कथा' पांच खंडों में है और इन पांच खंडों में पांच नाटकीय मोड़ आए हैं। नाटकीयता का संबंध गहरे रूप से घटना से होता है। इस कहानी में घटनाएं लगातार बदलती रहती हैं।
 कहानी में पूरे किसान जीवन का अनुभव है। किसान के बैलों से और अपने खेतों से संबंध को गहरे रूप से यहां दिखाया गया है। प्रेमचंद केवल किसानों, मजदूरों और स्त्रियों के चरित्र निर्माण में माहिर कलाकार नहीं हैं बल्कि वे पशुओं को भी चरित्र के रूप में ढालने और उन्हें मनुष्य के रूप में पेश करने में माहिर हैं।
कहानी के दोनों बैल हीरा और मोती दो विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनका स्वाधीनता संग्राम से गहरा संबंध है। हीरा अहिंसावादी है। नरम स्वभाव का है और नरम दल की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है जबकि मोती उग्र, आक्रोशी और क्रांतिकारी है। वह  गरम दल की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। इस तरह दोनों राष्ट्रीय रुपक में बदल जाते हैं।
उपनिवेशवाद अपनी औपनिवेशिक वासना, आकांक्षा और अनंत क्रूरता के साथ भारत में रहा इसलिए प्रेमचंद की कहानियों में विउपनिवेशन की प्रक्रिया हर जगह दिखाई देती है। उस समय शोषण के दो रुप थे। पहला बाह्य शोषण था जो ब्रिटिशर्स करते थे और दूसरा आंतरिक शोषण था जो उनके देशी आधार जमींदार करते थे।
भारत में औपनिवेशिक शासन किसानों की लूट और शोषण पर आधारित था। किसानों के शोषण का सबसे बड़ा औजार 'लगान' था। भारतीय किसानों से ज्यादा से ज्यादा लगान लेने के लिए अंग्रेजों ने भारत की पुरानी कृषि सभ्यता को नष्ट कर यहां इंग्लैंड की जमींदारी व्यवस्था लागू कर दी थी जिससे फ़सल की आधे से ज्यादा हिस्सा जमींदारों और अंग्रेजों के पास लगान के रूप में चला जाता था। परिणामतः किसानों को भुखमरी से भरी जिंदगी बितानी पड़ती थी।
इस कहानी में तीन स्तरीय उपनिवेशन है। पहला ब्रिटिशर्स द्वारा किसानों का उपनिवेशन  है। दूसरा देशी जमींदार और महाजन द्वारा किसानों, बैलों और पूरे श्रमिक ढांचे का उपनिवेशन है। यह बात ध्यान देने वाली है कि उपनिवेश में शोषण का शिकार सिर्फ मनुष्य ही नहीं होता है बल्कि पशु भी होता है और प्रेमचंद उस पशु के शोषण और संवेदना तक पहुंचकर लिखने वाले लेखक हैं। तीसरा किसान द्वारा जानवर का उपनिवेशन है जिसका संबंध केवल औपनिवेशिक प्रक्रिया तक नहीं हैं बल्कि 21वीं सदी तक है। इस सदी में मनुष्य पर्यावरणीय मार्क्सवाद और पर्यावरणीय समाजवाद की बात कर रहा है; मनुष्य केंद्रित सभ्यता को पारितंत्र और प्रकृति केंद्रित सभ्यता की ओर ले जाने के लिए नए नए विचार खोज रहा है तब इस कहानी की सार्थकता और बढ़ जाती है।
पशु के प्रति मनुष्य की क्रूरता कृषि क्रांति के बीच से आयी है। मनुष्य जिसे कृषि के क्षेत्र में क्रांति मानता है दरअसल इन दिनों इतिहास का एक चिंतन उसे मानव सभ्यता में मानव द्वारा मानव और पशुओं को धोखे से गुलाम बनाने का दौर मानता है। यह सत्य है कि बीस हजार सालों की कृषि सभ्यता मनुष्यता की निर्मिति की सभ्यता रही है लेकिन उससे ज्यादा यह मनुष्यता पर तरह तरह की क्रूरता और बंधनों की सभ्यता रही है क्योंकि इसी दौर में प्रकृति, मनुष्य और जानवर गुलाम हुए हैं। पूंजीवाद मनुष्य और प्रकृति की क्रूरता, गुलामी, दमन और शोषण का चरम विकास है।
कहानी में पहले स्तर पर दो जानवरों का उपनिवेशन है जिसके उपनिवेशक क्रमिक रूप से अंग्रेजी सत्ता है। अंग्रेजों को भारतीय किसानों से हर हाल में लगान चाहिए होता था, जिसके लिए वे किसानों को तरह तरह से सताते थें। उनके डर से ज्यादा फ़सल उगाने के लिए किसान अपने पशुओं का शोषण करते थे। फसल से प्राप्त लगान जमींदारों के माध्यम से अंग्रेजी सत्ता हड़प लेती थी। उपनिवेश के लोग सभी तरह की सुख-सुविधाओं से भर जाते हैं और विलासिता का जीवन जीते हैं। दोनों बैल हीरा और मोती इस शोषण का विरोध करते हैं और खेतों में चलने से मना कर देते हैं।
उपनिवेशवाद में 'लैप्स ऑफ लैंग्वेज' यानी भाषा का गायब होना ग़ुलामों की एक विचित्र विशेषता है। इसमें जनता मूक हो जाती है। उसको अपने हक के लिए बोलने की आजादी नहीं होती है। तात्कालीन दौर में भारतीय जनता भी मूक हो गई थी। प्रेमचंद इस कहानी के जानवरों के माध्यम से उपनिवेशित गुलाम की गायब हुई भाषा को वापस लाने की कोशिश करते हैं।
'दो बैलों की कथा' शीर्षक को देखने से पता चलता है कि प्रेमचंद यहां कथा की बात कर रहे हैं, कहानी की नहीं। कथा और कहानी में फर्क है। कहानी आधुनिकता और साम्राज्यावाद के साथ आयी है। वह प्रिंटिंग मशीन की देन है जबकि कथा वाचिक परंपरा से आयी है। दुनिया में कथा की परंपरा कहानी से पुरानी है और भारत में भी। यहां दो बैलों की कथा है, कहानी नहीं।
प्रेमचंद भारतीय कथा परम्परा और उसकी वाचिकता से पूर्णतः परिचित थे इसलिए इस कहानी में उन्होंने भारतीय कथा परंपरा से ही रूपक लिया है। इस तरह प्रेमचंद 'दो बैलों की कथा' कहानी के रूप और संरचना के माध्यम से पाठक को भारतीय कथा परंपरा में आने वाले पशु-पक्षियों और उनकी वाचिकता से रूबरू करवाते हैं।
कहानी का परिवेश ग्रामीण है जो बच्चे, जानवर, खेत, किसान और पारिवारिक जीवन हर जगह दिखाई देता है। कहानी में जब हीरा और मोती गया के घर से पगहा तोड़कर अपने मालिक झूरी के घर वापस आ जाते हैं तब उन्हें देख बच्चे उत्सव मनाने लगते हैं। उनमें से एक बच्चा कहता है कि "बैल नहीं हैं वे उस जनम के आदमी हैं।" इससे पता चलता है की  इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद एक तरफ औपनिवेशिक शोषित किसानों का क्रिटिक रच रहे थे तो दूसरी तरफ पशु और मनुष्य के बीच के संबंधों पर भी क्रिटिक रच रहे थे। इस तरह यह कहानी दोनों स्तरों पर एक साथ चलती है।
प्रेमचंद श्रम और अधूरी इच्छा के बीच के मनोविज्ञान को इस कहानी में रचते हैं। बैल श्रम का प्रतीक है जो आजीवन बिना किसी विरोध के किसानों के लिए श्रम करता है। उसकी अपनी कोई विचारधारा नहीं होती है। किसान उससे इतना अधिक काम लेता है कि उसे अपने दिमाग़ को चलाने का समय ही नहीं मिलता है। इस कहानी के दोनों बैलों की तरह ही गुलाम भारत के किसानों की स्थिति थी। वे किसान भी इन्हीं की ही तरह जी तोड़ मेहनत करते थे लेकिन अपने लिए नहीं, जमींदारों और अंग्रेजों के लिए करते थें। इनसे जितना काम लिया जाता था उतना खाने को नहीं दिया जाता था जिससे इनके सोचने समझने की क्षमता वैसे ही खत्म होती चली गई। पूरा का पूरा ब्रिटिश उपनिवेशवाद किसानों के इसी श्रम के शोषण पर टिका था।
प्रेमचंद उपनिवेशवाद में राजनीति और अर्थनीति के समांतर सांस्कृतिक इच्छा और आकांक्षा की सामूहिक एवं वैयक्तिक अभिव्यक्ति के भी लेखक हैं। इस कसौटी पर यह कहानी केवल बैलों और किसानों के आर्थिक संघर्ष की कहानी नहीं है बल्कि सांस्कृतिक इच्छाओं की पूर्णता की भी कहानी है।
यह कहानी गहरे अर्थों में इतिहासबोध और स्मृति की वापसी की कहानी है जिसको वापस लौटाया नहीं जा सकता है। आज मनुष्य सभ्यता के जिस मोड़ पर खड़ा है वहां नई टेक्नोलॉजी ने बैलों की उपयोगिता को खत्म कर दिया है। इसलिए बैलों की संख्या बहुत कम हो गई है। वृद्ध पूंजीवादी सभ्यता से बैल गायब होते जा रहे हैं। 
पाठ में एक तरफ श्रम के समानंतर बैलों की इच्छा और आकांक्षा का कथन है तो दूसरी तरफ किसानों की आर्थिक विषमता के समानंतर सांस्कृतिक इच्छा की पूर्ति का आख्यान भी। भारत के किसानों के हाथों में धान है तो कंठ में गान भी है। इसी इच्छा को व्यक्त करती हुई उपकार फिल्म में यह गाना गाया गया है कि मेरे देश कि धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। जबकि आज भी भारत में किसानों को सिर्फ आर्थिक इकाई के रूप में ही देखा जाता है, सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में नहीं।
उपनिवेशवाद हिंसा पर आधारित व्यवस्था है हसलिए इस कहानी में हीरा और मोती पर हिंसा के कई रूप दिखाई पड़ते हैं। गया द्वारा की गयी हिंसा, कांजी हाउस के लोगों द्वारा की गयी हिंसा और सांड द्वारा की गयी हिंसा। अंत में कसाई के हाथों की हिंसा।
 दोनों बैल हिंसा के खिलाफ प्रतिहिंसा करते हैं। इस कहानी में मोती हमेशा से गरम दल का होने के कारण प्रतिरोध करता है और हीरा नरम दल का होने के कारण त्याग, तपस्या,सत्य और अहिंसा द्वारा असहयोग को एक उग्र संघर्ष में बदलने की कोशिश करता है। मोती हिंसा का जवाब हमेशा प्रतिहिंसा से देता है और हीरा अहिंसा के सहारे उसका सहयोग करता है। इस तरह मोती की अगुआई में हीरा की जीत होती है। 1930 में प्रेमचंद जानवरों के माध्यम से मनुष्य की मुक्ति का आख्यान रच रहे थें।
कहानी की शुरुआत में प्रेमचंद गाय, कुत्ता और गधा तीन जानवरों का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि ये तीनों समय समय पर हिंसक होते हैं। गाय भी सींग मारती है। जिस समय वह बियाती है वह अपने बच्चों की रक्षा के लिए सिंहनी की तरह लड़ती दिखाई पड़ती है। कुत्ता भी कभी कभी क्रोध में आता है। गधे के विषय में उनका मानना है कि गधा केवल बैशाख में कुलेल करता है। वह वैशाख नंदन है। इस कहानी में जब हीरा-मोती दीवार तोड़ सभी जानवरों को कांजी हाउस से बाहर भगा देते हैं तब सिर्फ गधे ही बाहर नहीं जाते हैं। उन्हें डर रहता है कि अगर वे फिर से पकड़े गये तो उन्हें बहुत मार खानी पड़ेगी।
प्रेमचंद के अनुसार सीधापन संसार के लिए उययुक्त नहीं है। भारत वासियों की अफ्रीका में इसीलिए दुर्दशा हुई थी और अमेरिका में उन्हें घुसने नहीं दिया गया था क्योंकि वे सीधे थे। अगर उन्होंने भी पत्थर चलाना सीख लिया होता तो वे भी सभ्य कहलाते। अफ्रीका और अमेरिका में हुए मुक्ति संग्राम का इस कहानी पर विशेष प्रभाव है। भारत के किसानों, गांवों  और पशुओं पर शोषण का जो चक्र चला उस पर प्रेमचंद केवल राष्ट्रीय विचारधाराओं की छाप नहीं लेते हैं बल्कि अंतरर्राष्ट्रीय संघर्षों, घटनाओं और मुक्ति आंदोलनों से भी प्रेरणा लेते हैं।
प्रेमचन्द के सामने कहानी मनोरंजन की वस्तु नहीं है बल्कि वह मनुष्य की मुक्ति की वस्तु है। कृषि संस्कृति से बैल का बहुत गहरा संबंध है। प्रेमचन्द कहते हैं कि बैल का गुनाह यह है कि वह सीधा और श्रमजीवी है। बैल के शोषण के चार बिन्दु विचारणीय हैं। पहला, जब वह पैदा होता है तो उसे दूध से दूर रखा जाता है। दूसरा, बैल स्वयं बैल नहीं होता है। वह सांड़ की प्रजाति का है। लेकिन किसानों ने बधियाकरण का तरीका अपनाकर उसकी सेक्स ग्रंथि को महरूम कर दिया जो सभ्यता के इतिहास में बहुत बड़ी क्रूरता थी । आनंद और सृजन का अधिकार केवल मनुष्य का नहीं है बल्कि सभी जीव जन्तुओं और प्राणियों का है। तीसरी क्रूरता, बैल का श्रम से संबंध जोड़ा गया। खूंटे की गुलामी और श्रम उससे पूछकर उसपर नहीं लादी गयी है। चौथी यह कि कसाई खाना का रास्ता शेर को नहीं दिखाया गया। लोमड़ी को कसाई खाना नहीं भेजा गया लेकिन बैल को भेजा गया है । 
प्रेमचंद के कथा साहित्य में पात्रों के जो नाम लिए जाते हैं वह गहरी व्यंजकता से आते हैं। इस कहानी में बैलों के नाम हीरा-मोती हैं जो समृद्धि के प्रतीक हैं। भारत सोने की चिड़िया रहा है। हीरा और मोती सचमुच यहां के खेतों में अनाज के रूप में उपजते रहे हैं। इस समृद्ध देश को हर तरह से उपनिवेशवाद ने लूटा है। यहां के धन का अपनी औद्योगिक क्रान्ति में उपयोग किया है। इसलिए ब्रिटेन जो कुछ बना वह भारत की लूट से बना है ।
1960 के दशक में बैल सिनेमा में आते थे और कृषि सभ्यता का जो पारंपरिक रूप था उसकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति करते थे। इस कहानी में प्रेमचन्द दरअसल हीरा और मोती को श्रम का श्रेय प्रदान करते हैं और किसान से आगे बढ़कर श्रेय देते हैं। अगर बैल ना हो तो खेती नहीं हो सकती है। जो लगान ज़मींदार को मिलता है वह बैल और किसानों के संयुक्त श्रम का उत्पादन है। यहां गुलामी दो स्तरों पर है। पशु के स्तर पर यह पूरी कृषि क्रांति के दौर में सांड से बैल बनाने की प्रक्रिया में है लेकिन औपनिवेशिक दौर में एक किसान की गुलामी है; भारतीय जनता की गुलामी है। पगहा गुलामी का प्रतीक है जिसे हीरा और मोती तीस के दशक में तोड़ते हैं।
दूसरे खण्ड में, हीरा और मोती गया का खेत जोतने से इंकार कर देते हैं क्योंकि यहां प्रतिरोधी चेतना है। लगातार दोनों का शोषण होता है तथा पिटाई होती है। स्वतंत्रता संग्राम से इसका गहरा सम्बन्ध है। कहानी में हीरा और मोती गया के यहां भोजन करने से इंकार कर देते हैं। अनशन, उपवास, असहयोग ये तीनों बैलों के भीतर की कार्यवाही में मौजूद है।
तीसरे खंड में, सांड एवं बैल का युद्ध होता है। सांड़ को कृषि संबंधी कार्यों से आजादी प्राप्त है। वह यहां स्वायत्तता और स्वच्छंदता का प्रतीक है। सांड़ झुंड में नहीं होता है।
दिनकर ने कहा है- भैंसें और सांड का अपना इलाका होता है और वही इलाका विकसित होकर मनुष्य में राष्ट्रवाद का रूप ले लेता है। सांड अकेला आ रहा है और उससे दोनों बैल तकनीक के तहत युद्ध लड़तें हैं जिसमें स्वाधीनता संग्राम के संघर्ष की तकनीक शामिल है। गरम दल और नरम दल दोनों बैल तकनीक अपनाते हैं और भाईचारा, एकता और अपनी संघर्ष चेतना के सहारे आगे बढ़ाते हैं। वे शान से लड़ते हैं और सांड़ को हराकर खदेड़ देते हैं।
दोनों बैलों के संवाद के रुप में एक जगह प्रेमचंद लिखते हैं कि "जब दोहरी मार पड़ेगी तो अपने आप यह भागेंगे।" यह साधारण मार नहीं है। ये स्वाधीनता संग्राम की हिंसा और अहिंसा की दोहरी मार है। नरम दल और गरम दल की दोहरी मार।
कहानी में सांड ज़मींदार का प्रतीक है जिसे वासनात्मक आनंद की आजादी है। हिंसा और आक्रामकता की आजादी है। घूमने फिरने की आजादी है। पहचान और अस्मिता की आजादी है। दूसरी तरफ एक बड़ी आबादी है जिसकी चेतना और सोच का बधियाकरण हो चुका है। कहानी में कांजी हाउस जेलखाने का प्रतीक है। हीरा और मोती के कांजी हाउस की दीवार तोड़ने का जो रूपक है वह गुलामी से भारतीय जनता को मुक्त करने का रूपक है । 
चौथे खंड में, वे हीरा और मोती सारे जानवरों को आजाद करते हैं। गधे जाना नहीं चाहते हैं। लेकिन बड़ी कोशिश के बाद हीरा गधे को भी अपनी सींग के माध्यम से आजाद करता है और उसे समझाता है कि यहां से भाग जाओ। जिस कांजी हाउस को तुम अपना आजादखाना समझते हो, वह तुम्हारा गुलामखाना है।
पांचवें खंड में, डुग्गी बजती है, हजारों लोग जुटते हैं और दोनों जानवरों को भूखा रखा जाता है। हीरा पगहा नहीं तोड़ पाता है। वह सत्याग्रही है। नरम दल का है और गांधीवाद का प्रतीक है। वहां पर मोती भारतीयता का रिश्ता निभाता है। वह कहता है कि दोनों मिलकर रहेंगे। एकता स्वाधीनता संग्राम की बुनियादी विचारधारा थी जिसे तोड़ने के लिए उपनिवेशवाद और उसके देशी आधार ने तमाम कोशिशें की थीं। 
प्रेमचन्द भारतीय सभ्यता मनुष्य और प्रकृति के सहअस्तित्व के लेखक हैं। इस कहानी में हीरा मोती झूरी के थान तक पहुंच जाते हैं। कसाई उन्हें झूरी से हथियाने की तमाम कोशिश करता है। उस पर पत्थर फेंकता है। लड़ाई करता है। यहां किसान और कसाई का संघर्ष दिखाया गया है।
कहानी में दढ़ियल कसाई पूंजीवाद और उपनिवेशवाद का प्रतीक है जिसको मोती  खदेड़कर गांव के सिवान तक ले जाता है और कहानी यहां खत्म होती है। उपनिवेशवाद का समाधान उपनिवेश से सम्पूर्ण मुक्ति में है। हीरा अंत में कहता है कि तुम उस कसाई पर हमला कर रहे हो अगर वह गोली मार दे तो मोती जवाब देता है " मर जाऊँगा पर उसके काम तो ना आऊँगा " यह गुलामी से मुक्ति की रुपक कथा है। 'दो बैलों की कथा’ प्राकृतिक, मानवीय और राष्ट्रीय मुक्ति की कथा है जिसका अपने इतिहास से गहरा संबंध है।

19 जनवरी, 2025

काशी की रेत पर 'दिव्य निपटान'

√राश की डायरी
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रामचंद्र शुक्ल ने नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित 'शब्द सागर' में 'निबटान' के साथ 'निपटान' शब्द को  भी लिया। 'निपटान' शब्द की महत्ता काशी की परंपरा में बहुत ज्यादा है। काशी के फक्कड़ रहवासियों ने गंगा पार रेत पर 'मल त्याग' की क्रिया को 'मोक्ष प्राप्ति के स्तर तक' उठाने के लिए  पवर्ग के तृतीय वर्ण 'ब' की जगह प्रथम वर्ण 'प' को उच्च स्थान दिया और उसके विशेषण के रूप में 'दिव्य' शब्द को जोड़ा।  पश्चिम में निपटान को एक कामुक क्रिया या ऑर्गज्म के रूप में फ्रायड ने अभी अभी देखा है। काशी ने सदियों पूर्व निपटान में दिव्य लगाकर प्लेजर से आगे उदात्तता और मोक्ष तक पहुंचा दिया।
       काशी ने मुक्तिदायक ' दिव्य निपटान' के लिए स्थल गंगा पार 'रेत' को चुना। रेत राग और संभावना से मुक्त उदासीन अखाड़ा है जहां निपटान करने वाला स्वयं से दंगल करता है। 'निपटान' ऐसी क्रिया है जिसमें बाह्य सहयोग से फायदा नहीं मिलता। रेत पर निपटने के बाद अन्य क्रियाओं में सहयोग की जरूरत पड़ती है। जैसे लंगोट गमछा सुखाई,अग्नि सुलगाई,भंग घोटाई, तरावट घोलन कार्य, बाटी चोखा सिझाई आदि। और दिव्य तो स्वर्गीय,अलौकिक होता है। काशी के लिए यह सब अब स्मृति है। तो बच गए इनके कुछ पर्याय जो यहां हैं-
(क) दिव्य
स्वर्ग से संबंध रखनेवाला । स्वर्गीय । २. आकाश से संबंध रखनेवाला । अलौकिक । ३. प्रकाशमान । चमकीला । ४. बहुत बढ़िया या अच्छा । जो देखने में बहुत ही सुंदर या भला मालूम हो । खूब साफ या सुंदर । जैसे,—(क) उन्होंने एक बहुत दिव्य भवन बनवाया था । (ख) आज हमने बहुत दिव्य भोजन किया है । ४. लोक से परे । लोकातीत (को॰) ।

(ख) निपटान
१. पूरा करना । समाप्त करना । खतम करना । करने को बाकी न छोड़ना जैसे, काम निबटाना । २. भुगताना । चुकाना । बेवाक करना । जैसे, कर्जा निबटाना । ३. तै करना । निर्णित करना । झंझट न रखना । जैसे, झगड़ा निबटाना ।
      आप इस दिव्य शब्द के सामान्य अर्थ से मजा लीजिए। सारे पर्याय बताते हैं कि यह संभावना और उपलब्धि से मुक्त शब्द है। इसलिए 'रेत' तत्व से बना 'शिल्प' जैसे क्षणभंगुर है और तुरत नष्ट हो जाता है  वैसे ही 'रेत' शब्द से बनी रचना भी किरकिरी हो सकती है रसपगी नहीं। 'रेत' दिव्य निपटान के लिए ही है,कबीर समझ गए थे।इसलिए वे गली,घाट,गंगा को रचने के बाद सीधे मगहर की मिट्टी में मिल गए। आजकल काशीवासियों ने रेत को त्याग दिया और आर्थिक-सांस्कृतिक माफिया उसपर 'दिव्य निपटान' कर रहे हैं।आखिर मसला समाजमुक्त 
चरम सुख का जो है।
【विशेष जानकारी : अब काशी आकर 'शब्द सागर' उर्फ 'रेत का तेल' खरीदने की जरूरत नहीं है। मुस्टंग दुष्ट अमरीका की एक यूनिवर्सिटी ने पूरे ग्लोब के लिए अनूठी धरोहर का ऑनलाइन 'निपटान' कर दिया है। दूसरी ओर विशेषण 'दिव्य' बनारसियों के लिए छोड़ दिया है। आजकल वह भारत के प्रधानमंत्री  के पहले लगता है।】

31 दिसंबर, 2024

अस्सी ने पूछा कि काशीनाथ और ज्ञानेंद्रपति एक ही दिन क्यों पैदा हुए!


@रामाज्ञा शशिधर की कलम से
【बनारस में काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति का जन्मदिन】
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दोस्तो!
 यह अनोखा संयोग है कि काशीनाथ और ज्ञानेन्द्रपति दोनों बनारसी तरावट के लेखक हैं और दोनों का  जन्मदिन नववर्ष के दिन ही है।यानी दोनों का जन्मदिन
'गरीबों का गोआ' बन चुके बनारसी घाटों की भीड़ की भेंट है।
        आज बनारस का गली कूचा सब सड़क पर है,घाट पर है,बोट पर है,रेत पर है।नगर के घर खाली और गंगा घाट छाली ताली।
       मैं घुमक्कड़ी और फक्कड़ी करता हुआ अस्सी पर हूँ।बाएं में दायां ऐसा घुसा है कि नगर का चक्का जाम।भीड़ से घबड़ाकर पोई की अड़ी पहुंचा।पोई की तनी छाती और फैली बांहें अड़ी के खोहनुमा दरबे के काफी भीतर दबी दबी सी हैं।काशीनाथ के सुपात्र और अड़ीवीर प्रो गया सिंह गायब हैं।पता चला इनदिनों में अर्धरात्रि में अपने मांद से हवाखोरी के लिए निकलते हैं जिन्हें सिर्फ पागल,नशेड़ी और बाबा ही देख पाते।
     चौराहे के जाम के धुएं से पीपल हांफ रहे हैं।
       पप्पू की अड़ी पर भी रंग तरंग का सांध्य मजमा है।घिसे पिटे गदरची और ढिंढोरची से मुक्त।
     नींबू की चाय की चुस्की लेते ही,अपने पुराने छात्र जो अब टीवी पत्रकार हैं,पर नजर पड़ी।हालचाल हुआ।
    तभी उधर से एक मद्धिम आवाज़ आई-आज 'काशी का अस्सी' के लेखक काशीनाथ का जन्मदिन है।चूरा मटर पोई के यहां होता था।
      दूसरी आवाज़ ने पहली को काटा-यह वर्षों पहले होता था जब काशीनाथ अस्सी के नागरिक थे।वे अब विदेश में रहते हैं बेटे के साथ।
          बहस शुरू हुई जिसका सारांश है कि 1ली जनवरी को जन्मदिन का चलन बहुत पहले से है।जिसके जन्मदिन का पता नहीं रहता वह 1ली जनवरी में ईस्वी
लगाकर रखवा लेता है।अधिकारी बर्थ सर्टिफिकेट,आधार कार्ड,वोटर कार्ड और प्रिंसिपल स्कूल में पहली तिथि आंख मूंदकर डालता है।यह माँ बाप और समाज के लिए सहूलियत भरा दिन है।देश की एक तिहाई आबादी फाइलों में पहली जनवरी को ही पैदा होती है। काशीनाथ के साथ हुए हादसे का पता बाबू गया सिंह को लग गया हो इसलिए पोस्टपोन कर दिया।
           मुझे राहत हुई कि ज्ञानेन्द्रपति ने अस्सी पर किसी को भले ही जन्मदिन नहीं बताया और सेलिब्रेट नहीं किया वरना ये संसदिए हमारे गंभीर और सत्याग्रही कवि पर जब धुआंधार शब्द फुहार फेंकते तो उनकी तरोताज़ा कल्पना वेबजह सीलन फील करती।
             दोनों लेखक मेरे अज़ीज हैं।दोनों के कारण बनारस में मुझे अपने होने का कारण दिखता है।
       दोनों को नगर ने अपनी तरह से ढाला है और दोनों ने नगर को अपनी तरह से रचा है।दोनों बनारस में चाहे जहां रहते हों जनगणमन  ने दोनों के लिविंग पॉइंट्स फिक्स कर दिए हैं।
       काशीनाथ डेढ़ दशक पूर्व अस्सी भदैनी से मंडुआडीह की ओर चले गए लेकिन वे आज भी पाठकों के लिए अस्सी की अड़ी पर हैं।
     ज्ञानेन्द्रपति अब कम ही केंट रेलवे  के 9 नम्बर प्लेटफॉर्म पुल पर खड़े रहते हैं लेकिन पाठक उन्हें पुल पर किसी का इंतज़ार करनेवाला लेखक ही महसूसते हैं।
      दोनों के सपने थे-नगर कबीर की मौज में चले।दोनों में कोई नहीं चाहता था कि नगर फौज में चले।
         हर हर मोदी ,घर घर मोदी और हर हर बुलडोजर,घर घर बुलडोजर के विकास अभियान में दोनों लेखक अदृश्य होते गए।बनारस की पुरानी गलियों और  डोंगियों की तरह।
        मैं दोनों फक्कड़ लेखकों के द्वारा उड़ाई गई भाषा की धूल में अपनी यादों और सपनों के निशान खोज रहा हूँ।
      दोनों मुझमें शामिल हो गए हैं और मैं दोनों की रूहों का पांव पैदल नगर होना चाहता हूँ।
        कितना इत्तिफाक है कि मेरे दोनों अज़ीज लेखक का जन्मदिन जिन कारणों से 1ली जनवरी है,उन्हीं कारणों का शिकार मेरा बर्थ डेट 2री जनवरी है।
    मतलब वे दोनों एक को जन्म लेकर एक नम्बरी हैं और मैं 2 को जन्म लेकर दो नम्बरी।
    यह मैं नहीं कहता हूँ,अस्सी के हाइपर बोलिक ढिंढोरची कहते हैं।
         नगर में किसको पता है कि काशीनाथ बीमार हुए तो ठीक भी हुए ।परिजन की बहार और दोस्त चौथीराम यादव जी के प्यार के मरहम से।
   ज्ञानेन्द्रपति के पास न कोई परिवार है और न कोई चौथीराम यादव।ज्ञानेंद्रपति के लिए यह नगर ही चौथीराम यादव है।वे इस्पाती मनुष्य हैं।सौ साल लोहा रहें।
           दोनों को जन्मदिन की अशेष शुभकानाएं!

16 सितंबर, 2024

भाषा की संकेत श्रृंखला की रचनात्मक अभव्यक्ति है साहित्य : चबूतरा शिक्षक

मालवीय चबूतरा रपट, रविवार, 15 सितम्बर,2024
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बीएचयू परिसर में 'मालवीय चबूतरा ज्ञान संवाद' आज भी प्राचीन गुरुकुल ज्ञान परंपरा को बचाए हुए है। यह चबूतरा संवाद प्रत्येक रविवार को सुबह 8-10 के बीच संपन्न होता है, जिसमेें परिसर के  छात्र - छात्राएं एवं शोधार्थी सम्मिलित होते हैं और पूर्व निर्धारित विषय पर अपने विचार रखते हैं । इसके संस्थापक डॉ रामाज्ञा शशिधर हैं जिन्होंने वाद विवाद संवाद की नालंदा  ज्ञान परंपरा  को बचाए रखने के लिए इसकी शुुरुआत 2017 में की।चबूतरे का एक उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी किताबी ज्ञान की सीमा से निकल व्यावहारिक‌ ज्ञान के महत्व को भी समझ सके। 
आज हिंदी सप्ताह के अंतर्गत  'भाषा और साहित्य' विषय पर चबूतरा छात्रों ने वाद विवाद संवाद के माध्यम से अपने विचार रखे। प्राचीन भारतीय भाषा चिंतक पाणिनी,पतंजलि,भर्तृहरि  से लेकर आधुनिक पश्चिमी भाषा चिंतक सस्यूर व नॉम चोमस्की  तक के भाषा सम्बन्धी विचारों पर प्रकाश डाला गया।भामह से लेकर  रामचन्द्र शुक्ल तक साहित्य की दी गयी परिभाषा पर भरपूर बहस हुई।

          विषय पर अपनी बात रखते हुए चबूतरा शिक्षक रामाज्ञा शशिधर ने कहा कि भाषा शब्दार्थ संबंध में नहीं बल्कि संकेतक संकेतित संबंध में विन्यस्त होती है।भाषा संकेत की ऐसी व्यवस्था है जो अर्थ ग्रहण, चिंतन और अभिव्यक्ति तीनों क्षेत्रों में कार्य करती है। भाषा मनुष्य की संज्ञानात्मक शक्ति का परिणाम है। संसार की समस्त भाषाओं के विन्यास लगभग एक जैसे होते हैं इसलिए संसार के सारे मनुष्यों की समता,स्वतंत्रता और एकता भाषा के माध्यम से संभव है।भाषा के शब्द सीखे जाते हैं जबकि उसका सार्वभौमिक और उत्पादन मूलक विन्यास मानवीय संज्ञान की बुनियादी विशेषता है।
भाषा का प्रथम रूप वाचिक है, लिखित उसका दोयम रूप है। वाचिकता को बचाए रखने की जरूरत है। भाषा का मरना समाज का मरना है। 
       चबूतरा गुरु रामाज्ञा शशिधर ने कहा कि साहित्य भाषा के रचनात्मक और सूक्ष्म रूपों का इस्तेमाल करता है। साहित्य शब्दार्थ का खेल है जो प्रथमतः और अंततः भाषा की संरचना पर निर्भर रहता है। साहित्य के बिना भाषा संभव है जबकि भाषा के बिना साहित्य असंभव है। साहित्य सिर्फ जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब नहीं है बल्कि उसमें जनता और लेखक दोनों के संयुक्त चित्त का प्रतिबिंब होता है। साहित्य में प्रतिबिंब का अर्थ भाषिक चित्रण और ध्वन्यात्मक गूंज से है ना कि सिर्फ दर्पणमूलक चित्र से। रामचंद्र शुक्ल की यह परिभाषा अधूरी है। साहित्य को संस्कृत काव्यशास्त्र से लेकर अब तक शब्दार्थ के रूप में तरह-तरह से परिभाषित किया गया है जिसका मतलब यह होता है कि साहित्य का संपूर्ण अस्तित्व भाषा की उत्पादक और सार्वभौमिक संरचना पर निर्भर करता है। साथ ही साहित्य भाषा में राजनीतिक अवचेतन की तरह ही विन्यस्त होता है । साहित्य को पाठ के रूप में पढ़त के लिए प्राथमिक तौर पर भाषा और भाषा विज्ञान की सूक्ष्म समझ की प्राथमिक जरूरत है।


 चबूतरा सदस्य और सहायक प्रोफेसर डॉ अरमान आनंद ने अपनी बात रखते हुए कहा कि साहित्य तभी बचा रह सकता है जब उसमें नई बात कही जाए या पुरानी बात को  नए तरीके से कहा जाए। लिखित और वाचिक भाषा के साथ आंगिक भाषा भी मनुष्य के अर्थ को अभिव्यक्त करती है।

      चबूतरा छात्र अभिषेक ने भाषा को प्रतीकों और चिह्नों का समूह बताया।

     छात्रा आंचल ने भाषा में व्याकरण को महत्वपूर्ण बताया और साहित्य में विचार को।
छात्र नीतिश ने कहा कि भावात्मक भाषा ही साहित्य है।

    छात्रा नेहा ने कहा कि साहित्य मन का विचार है।

    छात्र रवि ने कहा कि भाषा वह है जिसमें हम अपने विचारों का दूसरों के साथ आदान प्रदान करते हैं । 

   छात्रा आयुशी ने कहा कि भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। साहित्य का लक्ष्य मनुष्य का निर्माण करना है।

   छात्र अनमोल ने कहा कि भाषा और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं। साहित्य लोक कल्याणकारी है। 

     छात्र जितेन्द्र, इंदु , राशोमान, राहुल, मंगलेश और छात्रा शिवानी ने विषय पर अपने विचार रखे।
  चबूतरा विमर्श का संचालन छात्र हिमांशु ने किया।
★★★
प्रस्तुति - रूमा

30 मई, 2024

दिल्ली के प्रतिरोध में काशी का ऐलान!

दिल्ली के प्रतिरोध में काशी का ऐलान
तू मेट्रो की उड़नपरी मैं पैदल की शान

ढाय फुटी पैदल गली पांच फुटी है कार
दिल्ली तेरी नीतियां  काशी में बेकार

रिक्शा तांगा बाद में मोटर चले पछाँह
 काशी चाल सनातनी पैदल तानाशाह

साँढ़ सड़क पागुर करे हूटर करे सलाम
बाएं में दायां घुसे काशी चक्का जाम

भारतेंदु की गली में पिज़्ज़े का व्यापार
नई चाल में ढल रहा हिंदी का बाजार

चेला चइला बन खड़ा लेटा गुरुआ लाश
इक दूजे को जलाकर बांटे जगत सुवास

चल जिह्वा झट कूद जा बाटी चोखा भोज
मेगी बर्गर ब्रेड खा ऊब गया मन रोज

काशी पृथ्वी से अलग रुकी घड़ी का नाम
महाकाल की देह पर करे सदा विश्राम

धरती पर चूल्हा जले अंबर जले मसान
धुआं धुआं सब एक है काशी की पहचान

काशी आकर देखिए साँढ़ चरावे शेर
मुर्दा मुख गंगा बसे डमरू फलते पेड़
                                 

चलती चाकी देखकर  कबिरा मारे तान
चूना से कत्था मिले रंग बदल दे पान
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 सड़क के कवि रामाज्ञा शशिधर के दोहे

03 दिसंबर, 2023

ठलुओं का अस्सी फिर फिर जवान

 {राश की डायरी}
     घलुए की चाय, हलुए का पान
     ठलुए का अस्सी फिर से जवान


अस्सी उवाच: 
आप भी सुनिए!

   " काशीनाथ सिंह को भरम हो गया। वे माया महाठगिनी के शिकार हो गए। कलियुग माथे पर सवार होना ही था! इसीलिए तो सुंदर मुहल्ला अस्सी छोड़कर सुंदरपुर चले गए!"

     " आजकल ' रेहन पर रग्घू' हैं।"
     
      "कौन चूतिया कहता है कि अस्सी मर गया! अस्सी प्रसव से गुजर रहा है! उसका पुनर्जन्म हो रहा है!

     आप पूछेंगे, कैसे!"
        
      "अव्वल तू हौआ के ? पूछै वाला!"
        
       " पूछे तो सुन ही लीजिए!"
     
      "ये हैं बदरी विशाल!"
       "बरसना है बदरी का-
  " अस्सी पर गालियों का प्रथम रिसर्चर हूँ मैं। सिर्फ मैं बता सकता हूँ कि पृथ्वी की प्रथम गाली और  प्रथम पंडिताई का जन्म यहां से हुआ है! मैं चालीस साल कवि सम्मेलन में कविता में गाली  बांचता रहा। कवि सम्मेलन में मंदी आ गई तो गंगा आरती पकड़ ली। गंगा आरती में आजकल वेद मंत्र बांचता हूँ। दोनों को ज़माना दिल थाम कर सुनता है!"
    " है कोई दूसरा माई का लाल जो एक साथ गाली और मंत्र को साध ले! और जिसे ज़माना स्वीकार ले!"
        ...
     यह तो सिर्फ 14 सेकंड की रील है। 
          ... 
        यह है ज़िंदा अस्सी! किलकारी मारता हुआ
      नव शिशु!
      
           बीकानेर से आए मेरे लेखक साथी नवनीत पांडेय  और उनके सहयात्री अवाक! 
        
         बीकानेरी कथन का स्वाद फेल हुआ या काशीनाथ का काशी का अस्सी, यह दूरबीन से नहीं खुर्दबीन से खोजना होगा।!
    
       माइक्रोस्कोप से पकड़ने के लिए पहले पान का बीड़ा बनिए या नाली का कीड़ा! 
         
           बकैती या फकैती में अस्सी आपका गुरु था, है और रहेगा!
  
     V लॉग से पकड़ में जो नहीं आए वह है काशी और उसका अस्सी!
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रामाज्ञा शशिधर
    जारी...
                  

14 अगस्त, 2022

मक्खलि गोसाल कौन थे


©प्रेमकुमार मणि
लेखक,विचारक

 मक्खलि गोसाल के जन्म और जीवन -यापन के बारे में जैन ग्रंथ भगवती -सूत्र में कुछ जानकारी है , जिसके अनुसार उनके पिता का नाम मंखलि और माता का भद्दा ( भद्रा ) था . मंख से क्या तात्पर्य है ,इस पर विद्वानों में कई तरह के विचार हैं . इतिहासकार बाशम इसे भाट के अर्थ में  लेते हैं , जिनके अनुसार गोसाल के पिता एक ऐसे कवि-गायक  थे , जो घूमते रहते थे . भाट लोग प्रायः ऐसा करते रहे हैं . इन्हे घुमन्तु गायक भी कह सकते हैं . हालांकि बी .एम. बरुआ ने अपनी किताब में मक्खलि को मस्करीन या मस्कारा कहा है , जिसका अर्थ पाणिनि के अनुसार बाँस ढोने वाला है . संस्कृत ग्रन्थ 'दिव्यावदान ' में मक्खलि को गोसाल मस्करीपुत्र कहा गया है .  हालांकि भगवती -सूत्र में ऐसी कोई बात नहीं है . इसके अनुसार गोसाल के माता -पिता सावत्थी ( श्रावस्ती ) के थे और जैसा कि बताया गया है ,वे घुमन्तु थे . इस क्रम में वे सरवन नामक एक बस्ती में आये . यह बस्ती सरकंडों के झुरमुट से भरा था . उन दिनों मकान बनाने  में सरकंडों की बहुत जरुरत होती थी ,इसलिए संभव है बाँस की जगह वे कभी -कभार सरकंडों को बैल -गाडी से ढोने का काम करते हों . लेकिन किसी भी तरह हों ,वह घुमन्तु तो थे ही . भगवती -सूत्र के अनुसार मंखलि ने अपनी गर्भवती पत्नी भद्दा को गोबहुल नामक एक पशुपालक के यहाँ उसके गोसाले में रख छोड़ा था . इसी गोशाले में मक्खलि गोसाल का जन्म हुआ . मक्खलि या मंखलि पिता से लिया हुआ नाम हुआ और गोशाला में जन्म लेने के कारण गोसाल हो गया . बुद्धघोष  ,जो ' सामञ्जफल  सुत्त ' के व्याख्याकार हैं, के अनुसार मक्खलि का जन्म एक दास परिवार में हुआ था ,जो किसी तेल व्यापारी का तेल ढोया करता था . एक रोज असावधानी से मक्खलि ने तेल भरा मटका गिरा दिया . इससे क्रुद्ध हो उसके मालिक ने उसे पकड़ना चाहा और शायद दण्ड पाने के भय से मक्खलि ने भागना चाहा . मक्खलि का वस्त्र उसके मालिक की पकड़ में आ गया और उसके खिंच जाने से वह नंगा हो गया . अब इसी नग्न अवस्था में उसे भागना पड़ा . बुद्धघोष के अनुसार  इसी के बाद वह दिगम्बर साधु हो गया . 
ऊपर के दोनों विवरणों से एक ही बात सामने आती है कि मक्खलि एक साधारण परिवार से आता था . पिता भी ऐसे ही थे ,जिनका कोई पक्का पेशा नहीं था . आर्थिक स्थिति ऐसी ही थी कि दूसरे के गोशाले में गर्भवती पत्नी को रखे . बहुत संभव है गोसाल के पिता गाड़ीवान रहे हों और साथ में लोक गायक भी हों . ऐसे गायकों की लापरवाह जिंदगी  को लोग गंभीरता से नहीं लेते और आम तौर पर उसके प्रति कृपालु होते हैं . उसकी इसी धज पर तरस अनुभव कर  किसान गोबहुल ने  अपना गोशाला अस्थायी वास के लिए दे दिया होगा .बेचारा गायक पिता ! उसकी दयनीयता और परेशानी को समझा जा सकता है . बुद्धघोष की कथा भी विरोधाभासी नहीं है ,बल्कि एक तरह से भगवती -सूत्र की कथा का दूसरा भाग है . अब गोसाल का अपना जीवन है और इसकी जरूरतों को पूरा करने केलिए वह किसी व्यापारी के यहां चाकर है . निश्चित ही कवि मन का यह युवा दार्शनिक काम के दौरान भी कुछ न कुछ सोचता रहता होगा . ऐसे में काम का प्रभावित होना लाज़िम था . तेल का मटका गिर जाने पर मालिक का रंज होना भी स्वाभाविक था . उस कथा में केवल एक स्वाभाविक प्रसंग  ही तो है कि वह भाग रहा है और उसका कपडा मालिक द्वारा पकड़ लिया गया, जिसके फलस्वरूप वह नंगा हो गया . वह रुका नहीं . क्योंकि रुकना उसके लिए खतरनाक था . कितने  जनों के बीच से होकर इस अवस्था में वह गुजरा होगा ,इसकी कल्पना कर के तो देखिये ! एक दफा इस नग्न अवस्था में घूम आने पर उस युवा दार्शनिक के मन पर कुछ तो प्रतिक्रिया हुई ही होगी . शायद कपड़ों की निस्सारता और उससे आज़ादी का मूल्य भी उस ने जाना होगा . जनता के बीच यह आकर्षण का भी एक कारण हो सकता है ,यह बात भी उसके दिमाग में आई होगी . और फिर यह दिगम्बरता यदि उसका स्वाभाविक धर्म बन गया तो क्या आश्चर्य ! . इस पूरी कथा -यात्रा में कोई अस्वाभाविकता नजर नहीं आती . आधुनिक ज़माने में आर्कमिडीज ने नहाते वक़्त उत्प्लावन की थियरी जानी थी और कहते हैं वह राजा के पास नंगा ही दौड़ गया था  . 

मक्खलि के विचारों की थोड़ी समीक्षा बाद में करूँगा . फिलवक्त मेरी कोशिश उन परिस्थितियों को देखना है ,जिसमे एक युवा स्वप्नदर्शी ,जिसे  जीवन और जगत के जटिल सवाल निरंतर परेशान कर रहे हैं ,  किस तरह स्वयं के जीवन से जूझ रहा है . मटका गिर जाने पर उसका मालिक उसे खदेड़ता है . गनीमत हुई कि वह नहीं , उसका कपडा पकड़ में आया . यदि वह पकड़ में आ जाता तो मालिक उसकी पूजा नहीं करता ,ताड़ना ही देता . रोजमर्रे के जीवन में मक्खलि इन चीजों को देख रहा होगा . यह नियति ही तो थी कि वह नहीं पकड़ में आ सका . इसमें कर्मफल कहाँ था . कर्म तो वह कर रहा था . असावधानी तो स्वयं में एक नियति है . लेकिन लोग कर्म नहीं ,परिणाम देखते हैं . और परिणाम कर्म नहीं ,नियति तय कर रहे थे . इस पर भी यह ' सर्वहारा ' कवि -दार्शनिक नियतिवादी न हो ,तो यह आश्चर्य ही होगा . उसने अपने दर्शन की धुरी ही रखी - ' नत्थि पुरिसकारे ' मनुष्य के किये -दिए में कुछ नहीं है ,जो होना होगा ,वह होगा . इसे कोई रोक नहीं सकेगा . नियंता है ,तो नियति भी है . नियति प्रबल है . 

 मैं आजीवक -दर्शन की कोई प्रशंसा नहीं,व्याख्या  कर रहा हूँ ,मैं मक्खलि पर बात कर रहा हूँ .और उन परिस्थितियों अथवा कारणों को देखना -समझना चाहता हूँ ,जिस से होकर मक्खलि को गुजरना पड़ा . वह इतना साधारण नहीं है कि हम उसकी उपेक्षा करें . भारतीय चिंतन परंपरा का वह एक अध्याय है .  ' भगवती -सूत्र ' और ' सामज्ज फल सुत्त ' यदि उसकी इतनी विवेचना कर रहे हैं और मौर्य राजाओं ने भी आजीवकों के लिए कहते हैं वर्तमान जहानाबाद  जिले के बराबर नामक जगह में कुछ गुफाएं बनाई थीं ,तब शायद  इसीलिए कि उन्हें नकारा नहीं जा सकता था . आज भी उन्हें कोई नकार नहीं सकता . बाशम और बरुआ ने उन पर यूँ ही इतने परिश्रम से काम नहीं किया है . अभी कुछ दिनों पूर्व हमारे मित्र अश्विनीकुमार पंकज ने मक्खलि गोसाल को लेकर मगही जुबान में एक उपन्यास लिखा है -' खांटी किकटिया ' अर्थात विशुद्ध कीकट वाला . यह सब ज्ञान के एक नए और जरूरी आयाम की तलाश है .
 
बुद्ध और महावीर दोनों से मक्खलि उम्र में बड़े थे .( बाशम के अनुसार  उनकी मृत्यु 484 ईसापूर्व में हुई थी  .) महावीर तो उनके सानिध्य में कुछ वर्षों तक रहे थे .प्रामाणिक तौर पर  बुद्ध की उनसे कोई मुलाकात नहीं हुई ,लेकिन गोसाल के जीवन दर्शन से वह पूरी तरह परिचित थे . शायद गोसाल को छलाँगते हुए उस समाज में दर्शन की बात करना संभव ही नहीं था . बुद्ध और महावीर से मक्खलि कहाँ  जुड़े हैं और कहाँ अलग हैं ? यह यक्ष -प्रश्न है . लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि बुद्ध और महावीर के विचारों की दुदुम्भी बज रही है ,लेकिन मक्खलि के विचार विलुप्त क्यों और कैसे हो गए . इसका जवाब सहज भी है और मुश्किल भी . सहज इन अर्थों में कि हमें और कुछ नहीं ,केवल इस पर विमर्श करना चाहिए कि बौद्ध धर्म की भारत से विदाई क्यों हो गयी थी ? चीजें दो कारणों से ख़त्म होती हैं . पहला तो यह कि नए ज़माने की जरूरतों के अनुसार वह अनुपयोगी हो जाती है और दूसरा कि किसी कारणवश उसे बलपूर्वक बाहर  कर दिया जाता है . समाज के वर्चस्व-प्राप्त तबकों को जो चीज अपने अनुकूल लगती है ,केवल उसे ही सहेज कर रखते हैं . जो चीज उनके विरुद्ध होती है उसे वह  खदेड़ देते हैं ,वहिष्कृत कर देते हैं . बौद्ध -धर्म वर्चस्वप्राप्त तबके केलिए जब प्रतिकूल हुआ ,उसे वहिष्कृत कर दिया गया . आजीवकों के साथ भी कुछ यही हुआ . लेकिन उनकी कथा कुछ अधिक पेचीदा है . लेकिन इन्हे समझा जाना चाहिए . बुद्ध  और महावीर राज -कुलों से थे , सर्वहारा परिवारों से नहीं . उनके सामने शीश झुकाने में न बिम्बिसार को झिझक होती ,न प्रसेनजित  को ,और न ही वैशाली के लिच्छवियों को . यह बुद्ध का बड़प्पन था कि वह सामान्य से सामान्य लोगों के भी संपर्क में रहे . यदि वह प्रसेनजित के जेतवन में रहे ,तो चुन्द लुहार के यहां भी . केवट -कुम्हारों और बढ़ई- नाइयों के यहां रहने -खाने को उन्होंने प्राथमिकता दी . लेकिन राजाओं के शीश झुकाने से उन्हें जो प्रतिष्ठा मिली ,उसका अपना ही प्रभाव था . क्या यह प्रतिष्ठा मक्खलि गोसाल को मिल सकी ? उत्तर होगा ,नहीं . क्या वह  प्रतिष्ठा जो बुद्ध ,महावीर को मिली ,उन्हें  मिल सकती थी ? मेरा फिर उत्तर होगा ,नहीं . 

और क्यों नहीं ? इसलिए नहीं कि बुद्ध और महावीर का दर्शन मक्खलि से अधिक उपयोगी और श्रेष्ठ था ,बल्कि इसलिए  कि मक्खलि कुलीन और राज परिवार से नहीं आते थे . महावीर उनसे सीख ले सकते थे ,सान्निध्य में भी रह सकते थे ,लेकिन उन्हें तो इस तत्व -ज्ञान से अपने उस धर्म -दर्शन को संवारना था ,जो व्यवसायियों-पणियों को आध्यात्मिक -सुरक्षा देता था . ये व्यवसायी ही उन्हें तीर्थंकर बना सकते थे . बुद्ध को ऐसे धर्म -दर्शन की व्याख्या करनी थी ,जो बिम्बिसार ,अजातशत्रु ,प्रसेनजित से लेकर अंबपाली तक को आध्यात्मिक संबल देने वाली थी . कालांतर में अपने युग के सब से बड़े हत्यारे अशोक केलिए आध्यात्मिक कवच मुहैय्या करने वाली थी . ऐसे में किसी गाड़ीवान के गरीब बेटे के विचारों पर विचार करने की फुर्सत किसी को कैसे और क्यों मिल सकती थी . 
 
मक्खलि केवल तर्क तराशने वाले दार्शनिक नहीं थे . उनकी कमजोरी या विशेषता थी कि उन्होंने अपनी उस जनता का हमेशा ख्याल रखा , जिसके बीच से वह आये थे . उनके जीवन के अध्ययनकर्ताओं ने बतलाया है कि वह हलाहल नामक एक महिला के यहां रहते थे ,जो कुम्हारगिरि करती थीं अथवा कुम्हार परिवार से थीं . निश्चय ही उनके काम में हिस्सेदारी भी करते होंगे ,क्योंकि इसके बिना पर भोजन मिलना दुष्कर था . वह बुद्ध नहीं थे कि उनके स्वागत में अंबपाली पलक -पांवड़े बिछाए हों और बड़े -बड़े राजाओं के राजप्रासाद और व्यापारियों के आरामदायक विहार उनकी प्रतीक्षा कर रहे हों . उन्हें तो अपनी कमाई का खाना था . सच्चे अर्थों में वे श्रमण थे . घूम कर भिक्षाटन करना उनकी दृष्टि में श्रम नहीं ,उसका मजाक था .इसीलिए अंततः महावीर उनके पास से भाग निकले .  राजकुमार सब कर सकता था ,लेकिन शारीरिक मिहनत कैसे कर सकता था . इन अंतर्विरोध -पूर्ण स्थितियों के बीच ही हमें बुद्ध ,महावीर और मक्खलि का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए . 

मक्खलि के जीवन और विचार हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचाते हैं कि वह अत्यधिक संवेदनशील अथवा भावनाजीवी थे . नियतिवादी होने का दंश यह भी था यथार्थ को उसके अंतर्विरोधों के साथ वह नहीं देखना - समझना चाहते थे . समय तेजी से बदल रहा था और उन्हें भरोसा था कि प्रकृति अपनी सुरक्षा केलिए स्वयं ही कुछ करेगी . यह कहाँ होने वाला था ! उनके समक्ष जनजातीय जीवन और उसके तमाम व्याकरण एक -एक कर ध्वस्त हों रहे थे . नृत्य ,गीत , पेय सब बदल रहे थे . सब कुछ राजमहलों और राजधानियों में सिमट रहा था .वह जीवन -पद्धति जिससे श्रमशील जनता ने एक लय -राग बना लिया था, हर स्तर पर कमजोर हों रही थीं . उसकी कड़ियाँ एक -एक कर टूट -बिखर रही थीं . उनके सामने   जनसत्तात्मक जनपदीय व्यवस्थाएं विनष्ट हों रही थीं और राजतंत्र लगातार मजबूत होते जा रहे थे . कुछ ही समय पहले अंगदेश की स्वाधीनता और वहां की गणतंत्रात्मक व्यवस्था विनष्ट हुई थीं  और देखते -देखते वज्जि -वैशाली भी विनष्ट किया जा चुका था . यह सब अतिभावुक, एक दार्शनिक -कवि के लिए ऐसा था कि कि वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या करना चाहिए . नयी दुनिया  के व्याकरण उसकी समझ के बाहर थे . उससे तालमेल बैठना उसके लिए मुश्किल था . उसकी जो वैचारिकता थी ,उसमे विभ्रम गढ़ने की बहुत गुंजायश नहीं थी . मोक्ष ,निर्वाण और पुनर्जन्म का विभ्रम गढ़ना उसके लिए अधिक मुश्किल था . ऐसी स्थिति में उसने अपना मानसिक संतुलन खो दिया . वह अपनी प्रिया-पत्नी हलाहल के घर में ही सिमट गए . एक हाथ में प्याला लिए हुए उन्होने निरंतर गान आरम्भ कर दिया . यह पीना और नाचना उनके लिए ही नहीं उनकी समस्त जनता केलिए शायद आखिरी था . कहते हैं , इस बीच उनके एक शिष्य -मित्र आयमपुल ने उनसे जब कुछ पूछना चाहा ,तब उन्होंने इतना ही कहा - " हे प्रिय ,वीणा बजाओ ,वीणा बजाओ ." शायद यही उनकी आखिरी दास्तान थी .  नृत्य करते हुए ही उनकी मृत्यु हुई . गाते -गाते वह लुढ़क गए . यही उनकी नियति थीं . 
भगवती -सूत्र के अनुसार अपने आखिरी समय में सूत्र रूप में ही उनने एक संक्षिप्त -सा घोषणापत्र जारी किया ,जिसके आठ बिंदु थे . हालांकि ये विक्षिप्तावस्था के ही उद्घोष हैं ,फिर भी इस पर गौर किया जाना चाहिए ,क्योंकि इससे  तत्कालीन सामाजिक -राजनैतिक स्थितियों और उस पर एक बुद्धिजीवी,  जो विक्षिप्त हो चुका है , की  चिंता और मनोदशा की जानकारी मिलती है . ये आठ सूत्र इस प्रकार हैं - 
1 . चरिमे पाने ( अंतिम पेय ) 
2 . चरिमे गेये  ( अंतिम गीत ) 
3 . चरिमे नत्ते ( अंतिम नृत्य ) 
4 . चरिमे अंजलिकम्मे  (अंतिम अभिनन्दन ) 
5 . चरिमे पक्खाल  -समवाते महामेहे  ( अंतिम प्रलयंकारी महामेघ )
6 . चरिमे सेयने गंध -हस्ती ( सुगंध का हाथियों द्वारा अंतिम छिड़काव ) 
7 . चरिमे महाशिलाकार्त संगामे (बड़े पत्थरो का अंतिम युद्ध )
8 . चरिमे तीर्थंकर (अंतिम तीर्थंकर )

व्यथा में डूबे गोसाल कहते हैं - हमारा सब कुछ अंतिम या आखिरी  है . आखिरी पीना ,आखिरी गीत , आखिरी नृत्य , आखिरी मिलना -जुलना -अभिनंदन . उनका पागलपन बढ़ जाता है . क्रम टूटता है और वह उस सर्वनाश को देखने लगते हैं ,जो उनके ख्यालों में उभर रहा है . पांचवीं  कड़ी में उस प्रलयंकारी महामेघ को देखते हैं ,जो चारों तरफ से बढ़ता आ रहा है . छठी कड़ी में राजमहलों में हाथियों द्वारा अपने सूंढ़ों से सुगंध के छिड़काव की विलासिता भी देखते हैं और फिर सातवें पायदान पर पत्थरों से लड़े जाने वाले आखिरी युद्ध (महाशिलाकाते संगामे ) को भी . फिर अपनी कुंठा भी बलबला कर बाहर आती है . वह स्वयं को चरिमे अर्थात अंतिम तीर्थंकर घोषित कर जाते हैं . 

बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग  की तरह गोसाल के ये अष्टांगिक उद्गार आज हमारे ज़माने में भी एक महाप्रश्न की तरह हमसे मुखातिब है . दुनिया हमेशा बदलती है . लेकिन जब महासंक्रमण होता है ,बड़े बदलाव होते हैं ,तो कुछ लोग इसे न समझ पाते हैं ,न ही इसे सम्भाल पाते हैं . अपेक्षाकृत ये ईमानदार और प्रतिबद्ध लोग होते हैं . इन्हे जिद्दी नहीं कहा जा सकता . आधुनिक -काल में औद्योगिक दुनिया के उत्कर्ष पर अनेक बुद्धिजीवी परेशां हो रहे थे . ऐसा प्रतीत हुआ नयी दुनिया में न मनुष्यता बचेगी ,न जीवन . अनेक दार्शनिकों ने अपनी तरह से इस पर विचार किया .  मार्क्स ने बदलती परिस्थितियों की एक सुसंगत वैज्ञानिक समीक्षा की ,जो कम से कम डेढ़ सौ वर्षों तक प्रासंगिक बनी रही . गोसाल अपने समय की समीक्षा करने में विफल रहे . लेकिन उनकी चिंताएं जायज थीं . बुद्ध ने उन स्थितियों की  व्याख्या अपनी तरह से की . कहा जाना चाहिए कि गोसाल की विफलताएं ही बुद्ध की सफलताएं हैं . लेकिन सच यह भी है कि गोसाल अधिक ईमानदार हैं . देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की गोसाल पर की गयी  टिप्पणी से मैं कुछ सहमत हूँ ,इसलिए सीधे -सीधे उन्हें ही उद्धृत करना बेहतर समझता हूँ - 
" गोसाल मात्र एक भाट या चरण कवि नहीं था . वह एक भविष्यद्रष्टा और दार्शनिक भी था .वह विश्व के सम्बन्ध में कोई दृष्टिकोण बनाना चाहता था ,अर्थात वह संसार को समझना चाहता था ,जिसमे वह रह रहा था .यही परिस्थितियां थीं जो गोसाल केलिए घातक बंधन बन रही थीं और यही अनुभव बुद्ध ने भी किया .जनजातियों का ह्रास होते जाना या नवोदित राजसत्ताओं की भीषण शक्ति के हाथों इनका विनाश होना ऐसे विकट सामाजिक परिवर्तन थे जिनका औचित्य उस युग के महानतम चिंतक की समझ से भी बाहर था .इसलिए बुद्ध समझ गए कि इन घटनाओं के कारणों के संबंध में कोई प्रश्न उठाने के बजाए  लोगों के तप्त ह्रदय को शांति दिलाना अच्छा होगा . यथार्थ से जूझने की  बजाए किसी समुचित भ्रम का आश्रय लेना होगा . यही बात हमें बुद्ध की सफलता और गोसाल की विफलता को समझने में सहायक होती है . बुद्ध अपने युग का सर्वाधिक सुसंगत व्यामोह उतपन्न करने के कार्य में लग गए . जबकि गोसाल यथार्थ से जूझने और ऐतिहासिक बंधनों को तोड़ने के प्रयास करते रहे . वह अपने युग के सबसे बड़े ऐतिहासिक परिवर्तन अर्थात जनजातीय व्यवस्था के पतन और राजसत्ता द्वारा प्रदत्त नए मूल्यों के उदय को समझना चाहते थे . और वह इस कार्य में विफल हो गए . उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो संसार का सञ्चालन कोई बहुत बड़ी ,प्रचंड ,अथाह और अज्ञात शक्ति कर रही है जिसे हम नहीं जानते .यह शक्ति थी भाग्य . यही उनका नियति -दर्शन था . "

17 मई, 2022

बनारस में लोकविद्या आंदोलन


        √रामाज्ञा शशिधर
बात काशी की है!अस्सी घाट की है।घाट दर घाट की है।
      बात शास्त्र की नहीं,लोक की है।शास्त्रार्थ की नहीं,लोकार्थ की है।वाक की नहीं,जर्नी की है।सेल्फी की नहीं, सेल्फ की है।सीढ़ी की नहीं,साधना की है।गोबर पुजैया की नहीं,ज्ञान उपासना की है।
      बात दर्शन अखाड़े की है।ज्ञान पंचायत की है।लोक विद्या आंदोलन की है यानी बात सतह, धूल और गाद के नीचे छुपे हुए मानव के श्रम रस की है, बनारस के ज्ञान रस की है।
      बात अपनी है और उनकी है।बात जितनी पुरानी है उससे ज्यादा नई है।जितनी नई है उससे भी आगे चली गई है।बात वाद की है,विवाद की है तथा सबसे ज्यादा संवाद की है।
      तो कुछ देर के लिए प्रिंटेड पोथी से मुंह मोड़िए।जैसे आधुनिकता से पूर्व और उत्तर दोनों वक्तों ने उसे अंगूठे पर रखा है,आप भी कुछ देर तर्जनी पर रखिए।लोक में घरिए।डिजीलोक में उतरिए।
      लोक लोग से होता है।लोग जीवित ध्वनि और दृश्य से बनते हैं।तरंगों पर सवार ध्वनियों के संकेतक और दृश्यों के चलचित्र ही लोक के आधार थे,हैं और रहेंगे।वाचिक लोक से उत्तर वाचिक डिजिलोक तक।बीच में प्रिंट का पमपुआ घाट आया था,अब उसका सत्य हरिश्चंद हो गया है।लोक से उत्तर लोक तक सब वाचिक ही वाचिक है।मनु से आंबेडकर तक प्रिंट के मकड़जाल हैं।
      लोक विद्या आंदोलन ढाई दशक से बुद्ध की जमीन से चल रहा है।वहां पोथी की हैसियत न्यून है;प्रिंट रुतबा हाशिए पर है; शासकीय ज्ञान के केंद्र का नाभिक लिजलिजा है;लाइब्रेरी,अनुसंधान, उपदेश,डिग्री और लिखा पढ़ी के तर्क लोक पर हुकूमत के सनातन पाखंड माने जाते हैं।
      लोक विद्या आंदोलन में ज्ञान का सारांश लोकज्ञान है।लोकज्ञान ही मूल,तर्कशील और अनुभवजन्य ज्ञान है।वही समाज की गति का आधार है।
       लोकज्ञान के ज्ञाता किसान हैं,शिल्पी हैं,कारीगर हैं,स्त्रियां हैं,आदिवासी हैं,लघु रोजगारी हैं।वे सब लोकज्ञान के तर्कशील वैज्ञानिक हैं,दार्शनिक हैं,रूपांतरकारी सामाजिक हैं,कलाविद हैं,शिल्प शिक्षक हैं।
        लोकज्ञानी जानते हैं कि घाट उत्तर आधुनिक घुड़दौड़ के मैदान नहीं,सदा से स्थिर साधना के शांति स्थल रहे हैं।लोकज्ञानी जानते हैं कि शांति के घाट अब शोर के घाट हो रहे हैं;भाव के घाट अब दांव के घाट हो रहे हैं;विचार के घाट अब प्रचार प्रसार के घाट हो रहे हैं;मोक्ष घाट अब बाजार के गलघोंट घाट हो रहे हैं।
  
   लोकविद्या आंदोलन का लोक संवाद बनारस  के घाटों पर बनारसी साड़ी की तरह फैल रहा है।अस्सी घाट पर ज्ञान पंचायत चल रही है।राजघाट पर दर्शन अखाड़े की आजमाइश है।बीच के घाटों पर कबीर के अनहद ज्ञान हैं,रैदास के बेगमी गान हैं, कीनाराम के अघोर तान हैं।हर ओर ज्ञान और तर्क की तरल लहरी है।
      1 मई को अस्सी घाट की ज्ञान पंचायत इसकी गवाह है।नगर भर से लोकविद्यामार्गी की जमघट लगी।ओझल गंगा और अपहरित असि के संगम पर।दिवस था मजूर का।याद थी भदैनी वाले नामवर सिंह की।एक प्रिंट का इलाज होना था-दूसरी परंपरा की खोज।
      सुनिए!ज्ञान पंचायत में इस अघोर का अछोर क्या है!


नए बुद्ध के लिए नए सिद्धार्थ की जरूरत है

   √रामाज्ञा शशिधर
       【हरमन हेस के 'सिद्धार्थ' को पढ़ते हुए】
    

आज बुद्ध का लोकमान्य जन्मदिन है।मानव और मानवेतर अस्तित्व के अनुभव और कर्म का खास दिवस।प्रेम,करुणा,अहिंसा और विवेक के बोधिचित्त का संयुक्त जन्मोत्सव। मेरे लिए यह खास दिन है।
       मेरी दृष्टि से बुद्ध होना कठिन है लेकिन सिद्धार्थ होना कठिनतर है।
     बुद्ध कम ही होते हैं क्योंकि उनमें सिद्धार्थ होने की पात्रता नहीं होती या साधना नहीं होती।
         आज सिद्धार्थ उपन्यास से एक बार फिर गुजर गया।बोधिचित्त की  खोज में।
        बात जर्मन उपन्यास 'सिद्धार्थ' की कर रहा हूँ।जेनुइन लेखक हरमन हेस द्वारा सिद्धार्थ 1922 में रचा गया।यह  सिद्धार्थ उपन्यास के जन्म का सौंवा साल है।अब यह दुनिया की अनेक भाषाओं में उपलब्ध है।हर जगह मिलता है।इसपर मूवी भी बन चुकी है।
       उत्कृष्ट लेखक  हरमन हेस का उपन्यास सिद्धार्थ
दुनिया के अनेक पाठकों को जीवन जीने,समझने और करुणामयी होने की कला सिखाता रहता है।
     उपन्यास सिद्धार्थ बुद्ध के समकालीन भारतीय समय को केंद्र में रखकर नए सिद्धार्थ की निर्मिति की समानांतर कथा है।यह उपन्यास हमें बताता है कि बुद्ध बुद्ध रटने से नहीं,सिद्धार्थ होने से स्वयं को और समाज को जीया,समझा और बदला जा सकता है।
      इस उपन्यास का नायक सिद्धार्थ ऐसा नाविक है जो मानव जाति को दूसरे तट तक पहुंचाता है,पार उतारता है। आज जब  घाट,नदी और नाव जलेबीदार पिकनिक स्पॉट हैं न कि मुक्ति,शांति,विपश्यना और पार उतराई के माध्यम तब सिद्धार्थ होने की जरूरत और बढ़ जाती है।
         बुद्ध की मान्यता है कि नाव पार उतारने के लिए होती है,न कि रेत पर खींचने के लिए।आज बोट वोट है, बाजार है,धंधा है,विज्ञापन है और तटशोभा है।
       आज भारतीय समाज में युवा पीढ़ी चौराहे पर किंकर्तव्य विमूढ़ है।सत्ता,बाजार और समाज तीनों ने उसे भटका दिया है।
वह सर्वध्वंश,आत्मसंशय,चित्त विघटन और स्वप्नहीनता की शिकार है।तब उसके लिए एक ही रास्ता है कि सिद्धार्थ की
तरह विपस्सना (विशेष ढंग से देखना)से उस नव मार्ग की खोज करे जो स्वचेतस और सृष्टि चेतस दोनों के लिए आशा का दीप बने।
        मैं सिद्धार्थ से कुछ उद्धरण दे रहा हूँ।साथ ही जिज्ञासा,प्रश्न और ऊर्जा से भरी युवा पीढ़ी से अपील करता हूँ अगर जीवन निर्माण के लिए एक ही किताब पढ़नी हो तो सिद्धार्थ पढ़िए।     
        आप नए भारत का सिद्धार्थ बनिए।बुद्धत्व अपने आप मिल जाएगा।
         बुद्ध ने कहा था-इस जगत में अंधकार ही अंधकार है।मैं ज्ञान की आग के कुछ टुकड़े फेंक रहा हूँ।जितनी दूर तक रोशनी फैले।
          
      आत्ममुग्ध सेल्फीप्रकाश के समांतर आत्मबोधि सेल्फप्रकाश के कुछ टुकड़े आपके लिए है।शायद आपके चित्त में कुछ सूर्यकण स्फोट ले और  अंधेरे से संघर्ष करना शुरू कर दे। 

●वह कोई साधारण ब्राह्मण ,पूजा - पाठ करने वाला कोई आलसी पुरोहित नहीं बनेगा ; न चमत्कारी करिश्मे दिखाने वाला कोई लालची व्यापारी ; न कोई खोखला , गाल बजाने वाला वक्ता ; न कोई छुद्र , धूर्त पुरोहित ; और न ही भेड़ों के झुण्ड की कोई भली - सी , मूढ़ भेड़ भी । 

●उसको जितना मांझी सिखा सका उससे कहीं अधिक उसने नदी से सीखा । वह उससे लगातार सीखता रहा । सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु जो उसने उससे सीखी वह थी सुनना , शांत चित्त से एकाग्र होकर , प्रतीक्षा करते हुए , खुले मन से , बिना किसी आवेग के , बिना किसी इच्छा के , किसी तरह का निर्णय दिये बिना , बिना कोई धारणा बनाये । 

●बहुत कोमल ध्वनि कर रही थी नदी , कई - कई स्वरों में गाती हुई । सिद्धार्थ ने पानी में झाँककर देखा , और बहते हुए जल में उसके सामने छवियाँ प्रकट हुईं : उसके पिता दिखायी दिये , अकेले , अपने पुत्र के लिए शोक करते हुए ; स्वयं वह दिखायी दिया , अकेला , वह अपने दूर जा चुके पुत्र की लालसा के बन्धन में बँधा जा रहा था ; उसका बेटा दिखायी दिया , वह भी अकेला था , बच्चा , अपनी युवा इच्छाओं के दहकते हुए मार्ग पर लालच से भागता हुआ , हरेक अपने लक्ष्य की ओर भाग रहा था , हरेक अपने लक्ष्य के प्रति आसक्त था , हरेक दुःख झेल रहा था । नदी दुःख भरे स्वर में गा रही थी , चाहत से भरकर वह गा रही थी , चाहत से भरकर वह अपने लक्ष्य की दिशा में बहे जा रही थी , शोकाकुल स्वर में वह गाये जा रही थी । 

●प्रेम सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु प्रतीत होती है । संसार को आमूलचूल समझना , उसकी व्याख्या करना , उससे घृणा करना , यह महान चिन्तकों का काम हो सकता है । लेकिन मेरी रुचि तो केवल संसार को प्रेम करने योग्य बनने में है , उससे घृणा करने में नहीं है , उससे और स्वयं से दूर भागने में नहीं है , उसको और स्वयं को और समस्त सत्ताओं को अनुराग , सराहना और भरपूर सम्मान के भाव से देखने योग्य बनने में है ।
                           ★★

18 मार्च, 2022

राष्ट्रकवि के गांव में रंगमंच के कलागुरु ज्ञानदेव

*रामाज्ञा शशिधर

💐ग्रामीण कलाकार को श्रद्धांजलि💐
{ज्ञानदेव नहीं,कलादेव कहिए!}
~~~~~~~~~~~~~~~~~
वे अपनी काया और माया में ठेठ व देशज कलाकार थे।वे पारसी और ग्रामीण रंगमंच के मंजे हुए अदाकार थे।वे आजीवन श्रमिक,किसान,गरीब,पिता,ग्रामीण,आम आदमी आदि की करुण भूमिका में मंच से सामाजिक व मानवीय करुणा पैदा करते रहे।
     मैंने उनके बेबस किरदार की दर्दीली आवाज़ पर सैकड़ों सिमरिया वासियों को रोते देखा है।मैं अक्सर उनकी किरदारी पर भावुक हो उठता था।
    जब मैं सिमरिया या बेगूसराय में था,जब दिल्ली प्रवास में रहा और जब बनारस में हूँ,जिन कुछ ग्रामीणों से मेरी दिली डोर डायरेक्ट जुड़ी रही उनमें ज्ञानदेव शर्मा अव्वल रहे।
    अक्सर गांव जाने पर भगवती स्थान या प्रकाश की चाय अड़ी पर उनसे घण्टों संवाद होता था।विषय चाय की राजनीति के उलट-सिर्फ नाटक,कला,सिमरिया का कला इतिहास,बॉलीवुड के स्वप्न।
   वे दिनकर पुस्तकालय के आरंभिक सीरियस पाठक थे।1990 के दौर में मुझसे वे पॉपुलर नावेल पर चर्चा करते तथा पुस्तकालय से लेकर पढ़ते।
   उनके अत्यंत प्रिय नाट्यकर्मी मित्र श्रीनिवास सिंह रहे।दोनों दिली रहे,नाटक में,कारखानों की नौकरी में,ज़िंदगी में।
      वे नुक्कड़ नाटक की सड़क से चलकर फिल्मकार प्रकाश झा की सोहबत तक पहुंचे थे।उन्हें कसक रही कि उनकी गरीबी ने उनकी फिल्मी यात्रा को कांटों से घेर दिया।
   सिमरिया को विभूति पैदा करने आता,सहेजने नहीं आता है।दिनकर पुस्तकालय में  अलग से सिमरिया कला साहित्य रत्न सेक्शन होना चाहिए।जो समाज अपने रत्नों के दस्तावेज को जीवित बनाकर रखता,वही जीवित समाज होता है।

     बनारस में लोग आज मसानी होली खेलते हैं।ज़िंदगी के परमसत्य का उत्सव मनाते हैं।'मसाने में खेले होली दिगम्बर!'सिमरिया कलास्थान भी है और महामसान भी।
ज्ञानदेव शर्मा जीवन भर कलास्थान के कलाकार रहे,अब महामसान के महामसानी हो गए हैं।शवमय नहीं,शिवमय!!ज्ञानदेव नहीं,कलादेव!!
    सिर्फ चोला बदल गया है।वे राग,आग और राख में हमेशा बने रहेंगे।
मिट्टी के छंद से मिट्टी का सम्मान है--
💐
जब कलाकार मर गया, चांद रोने आया,
चांदनी मचलने लगी, कफन बन जाने को।
मलयानिल ने शव को कंधों पर उठा लिया,
वन ने भेजे चंदन श्री-खंड जलाने को।

सूरज बोला, वह बड़ा रोशनीवाला था
मैं भी ना जिसे भर सका कभी उजियाली से,
रंग दिया आदमी के भीतर की दुनिया को, 
कलाकार ने निज नाटक की लाली से।
     
                   

22 फ़रवरी, 2022

मातृभाषा,संवेदना और कविता का भविष्य क्या है

बहस के लिए
 ★रामाज्ञा शशिधर के कीबोर्ड से*
   वह अचानक मेरे कमरे में नई भाषा के झोंके की तरह आया।
    हाथ में लकड़ी और पटसन के ताने बाने से बने स्मृति चिह्न भेंट करने के लिए।वह चिह्न एक प्रतीक था-बांग्ला देश की मातृभाषा का।आज भी हिंदी विभाग के मेरे कमरे में सलामत है।वह हिंदी एमए का छात्र था जो ढाका से काशी हिंदी साहित्य का मर्मी व कर्मी होने आया था।
    वह उस दिन बांग्ला के बादल से मुझे हिंदी में भिंगा गया।
    भाषा की उन बूंदों में पानी था,पसीना था,खून था,मांस के टुकड़े थे,चीखें थीं,नारे थे,सत्याग्रह थे,गोलियां थीं,सेना के बलात्कारी हमले थे,इतिहास के घाव थे। उन बूंदों में अँगूठी में घुस जाने वाला मलमल का थान था,कटे हुए अंगूठे थे,टूटे हुए करघे थे,घण्टियाँ थीं,बाढ़ की हिलसा थी।उन बूंदों में बाउल था,चंडी थे,विद्यापति थे,नजरूल थे,रविन्द्र थे,तस्लीमा थी,सलाम आज़ाद थे।उन बूंदों में दुनिया का अकेला एक राष्ट्र था जो लंबी लड़ाई और कुर्बानी के बाद मातृभाषा की कोख से पैदा हुआ था।
      यह दुनिया जड़ों से कट गई है।लोकल और ग्लोबल के हाइब्रिड दायरे में कॉकटेल गिलास की तरह सज गई है।स्थानिक मातृभाषाओं की अस्मिता की रक्षा व्यक्तिवादी इच्छाओं और लालसाओं को सामुदायिक अचेतन की इच्छाओं में बदल कर ही की जा सकती है।

       


क्या दुनिया में मातृभाषा बनी रहेगी?
       मेरा जवाब है-हां।
       आप पूछेंगे,क्यों?
       इसलिए कि---
     जब तक सेक्स और सृजन का आधार स्त्री है तब तक  कोख की गतिविधि बनी रहेगी।शिशु के मशीनी उत्पादन से पहले तक।
      शिशु सृजन व मातृत्व ही वह चित्त और वृत्त  है जो परिवेश में लोकल भाषिक स्वरूप का गठन करेगा।

      यहां दो बातें गौरतलब हैं-
     एक,शिशु की चित्र से भाषा की यात्रा ही उसके बचपन की चेतना और व्यक्तित्व का गठन है।शिशु चेतना और शिशु व्यक्तित्व ही मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन का बीज है।इसलिए संवेदना के कारोबार के लिए
मातृभाषा का  वजूद रहेगा।
   दूसरी बात,चेतना की निर्मिति की यात्रा चित्र से भाषा की ओर है।यह नियम सीमित परिवार और व्यापक सभ्यता दोनों पर लागू होता है।चूंकि बुनियादी व स्थायी इमेज परिवार से अंकुरित होते हैं,इसलिए भाषा के केंद्र में मातृत्वमूलक परिवेश केंद्रीय भूमिका में है,रहेगा।
     दुनिया में संवेदना की उम्र उतनी ही है,जितनी मातृभाषा की उम्र है।
     मूलगामी संवेदना का गठन यौवन की सीखी भाषा या मशीनी लैंग्वेज से असम्भव है।
    कृत्रिम बौद्धिकता वाली मशीन और सेरोगेसी से क्षणिक सम्बन्ध संवेदना के विरुद्ध है,इसलिए यह संवेदना की भाषा के विरुद्ध है।
     मेरा मानना है कि मातृत्व और शिशु के नव सामुदायिक परिवेश की देशजता मातृभाषा में बड़ा बदलाव करेगी।इस तरह संवेदना के रूप बदलेंगे और क्षरित भी होंगे।क्षरण का कारण जितना कृत्रिम बौद्धिकता आश्रित रोबोटीकरण होगा,उतना ही पारिवारिक मातृत्व परिवेश का  विघटन।
    इस संदर्भ में मातृभाषा के सघन प्रायोगिक स्वरूप और संरचना के मद्देनजर कविता पर दो चार बातें कर लूं।
    यह मार्क्स का कम डिकोड किया हुआ कथन है कि कविता मनुष्यता की मातृभाषा है।आचार्य रामचन्द्र  शुक्ल के कथन को बार बार डिकोड किया जाए कि क्यों कविता वाणी का विधान है।
  1.इस सवाल का सही जवाब अक्सर चलताऊ होता है कि कविता मातृभाषा में ही सम्भव है।आखिर मातृभाषा में ही क्यों सम्भव है?इसका व्यापक उत्तर हिंदी में इसलिए नहीं है क्योंकि यहां भाषा विज्ञान मर्चरी का लावारिश चिंगुरा हुआ मुर्दा है तथा मनोविश्लेषण भाषा के लिए एपेंडिक्स।
   2.वस्तुतः मनुष्यता मनुष्य के  चित्त का गहनतम भाव है। चित्त के अचेतन का निर्माण मातृत्व परिवेश से होता है,वह वाचिक यानी वाणी से हो सकता है।शिशु के मन का वाचिक संवेदनात्मक गठन ही उसके बाद के सृजन का बीज होता है।यही कारण है कि कविता में स्मृति के तत्व तरल रूप से विरचित होते हैं।
   3.कविता में मौजूद वासना और स्वप्न के तत्व भी शिशु संवेदना के बीज से बने वृक्ष,टहनी,पत्ती,फूल,पराग,फल और नए बीज हैं।मुझे लगता है कि सूर के उपहार वात्सल्य रस के नए सिरे से अध्ययन की जरूरत है।
   4.दुनिया की समस्त भाषाओं का आंतरिक ढांचा समरूप होता है। भाषा मानस की संज्ञानात्मक व्यवस्था है।चूंकि मातृभाषा भी भाषा है,इसलिए वह सार्वभौमिक स्तर पर समझी जाने वाली इकाई है।यही कारण है मातृभाषा में व्यक्त कविता सार्वभौमिक मनुष्यता की भाषा भी होती है।
5 जब तक मातृभाषा रहेगी,तबतक संवेदना रहेगी। संवेदना की उम्र के बराबर ही कविता की उम्र होगी।न केवल रचने की बल्कि समझने की उम्र भी एक जैसी होगी।
       आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर आत्माराम सनातन कॉलेज,दिल्ली विश्वविद्यालय में  मातृभाषाओं के कवियों के बीच मैं हिंदी कवि का प्रतिनिधि था।
     सोचता हूँ कि खड़ी बोली नहीं,खड़ी वाली हिंदी की कविता क्या मातृभाषा की कविता है?मैं अपनी अनेक भाषिक व राग रूपों वाली कविताओं के पाठ से इस निष्कर्ष पर हूँ कि जितनी उनमें मातृत्व की भाषिक संवेदना घुली है वे उतनी ही मनुष्यता के करीब की कला हैं।
     मुझे भरोसा है कि मातृभाषा,संवेदना और कविता तीनों सभ्यता के कठोर दमन से गुजरते हुए अपने अवशेष में जिंदा रहेंगी।
                   ■      ◆       ■

27 अक्टूबर, 2021

बनारस ने दी मारे गए किसानों को श्रद्धांजलि


【शहीद किसानों को अस्सी पर श्रद्धांजलि!】
किसान विरोधी तीन कानूनों के खिलाफ देश और प्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन को कुचलने वाले हत्यारों के विरुद्ध बनारस की कल्लू की चाय अड़ी पर जन बुद्धिजीवियों ने गहरा शोक व्यक्त किया।
      काशी के जन बुद्धिजीवियों ने देश के अन्नदाताओं के आंदोलन के समर्थन में देश की जनता से आह्वान किया कि वे अन्नदाता की मांगों को साथ दें ।
    उन्होंने कहा कि गुलाम भारत में किसानों पर तरह तरह के अत्याचार होते थे,आज़ाद भारत में भी वही हाल है।गांधी के देश में सरकार और उसके लोग ही जब किसानों को कुचलने लगेंगे तब भारत का भविष्य अंधकारमय है।
       उन्होंने मांग की कि तीनों कानून जल्द वापस लिये जाएं।
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किसान भारत का दूसरा पक्ष
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     【बधाई हो इंडिया!】
ग्लोबल भुखमरी इंडेक्स में भारत  पीछे से 15वें स्थान पर आ गया है।इससे ज्यादा भूखे देश अब सर्फ बदनसीब अफ्रीका महादेश के कुछ देश हैं।यह है 7 वर्षों में सबका साथ,सबका विकास।80 करोड़ आधार नम्बरों वाला भारत दाढ़ीवाला झोले में  बुलडोज किसानों के खून पसीने से उपजाए 5 केजी अन्न लेकर नई संसद बनने की प्रतीक्षा कर रहा है।यह है स्टार्ट अप इंडिया,स्टैंड अप इंडिया,रन अप इंडिया,न्यू इंडिया,स्किल इंडिया,स्वच्छ इंडिया,करप्शन फ्री इंडिया,आत्मनिर्भर इंडिया।दूसरे शब्दों में न्यू आइडिया ऑफ ओल्डेस्ट इंडिया।यहां हर कोई एक ही गीत गा रहा है-
थाली उतनी की उतनी है
रोटी हो गई छोटी
कहती बूढ़ी काकी
मेरे गांव की!

23 अक्टूबर, 2021

अब्दुल रज़ाक गुरनाह को मिले नोबेल में विस्थापितों का दर्द है

©रामाज्ञा शशिधर के की बोर्ड से
【कभी कभी जेनुइन पुरस्कार!】

बहुत अर्से बाद पुरस्कार की पृथ्वी घूम रही है।अनेक बार सजा पाने के बाद कभी कभी धरती के अभागों को भी सम्मान मिलता है।साहित्य के नोबेल की घोषणा हुई है। 
      यह तीसरी दुनिया के इतिहास और भविष्य पर ध्यान देने के लिए समुचित नुक्ता है कि उत्तर औपनिवेशिक साहित्य के प्रोफेसर और कथाकार अब्दुल रज़ाक़ गुरनाह को नोबेल पुरस्कार मिला है।

       फ्रांसीसी कॉलोनी द्वारा तबाह कर दिये गये अफ्रीका उपमहाद्वीप की शरणार्थी संस्कृति पुरस्कार के सर्चलाइट से केंद्र में आई है।यह पुरस्कार शरणार्थी नागरिक जीवन के सांस्कृतिक फोबिया से गढ़े गये आख्यान को मिला है।
     सांस्कृतिक संकरण की यह नई लहर है।
          
       अब्दुल रज़ाक गुरनाह तंजानिया में 1948 में पैदा हुए और जंजीबार विद्रोह से बचने के लिए वे इंग्लैंड चले गए। युनिवर्सिटी ऑफ केंट (इंग्लैंड) में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे और उसी भाषा में लिखते रहे। अब्दुल रज़ाक के  दस उपन्यास प्रकाशित हैं। उनके उपन्यासों के केंद्र में अफ्रीका का समुद्री किनारा है तथा उखड़े,तनहा, तबाह,विखंडित शरणार्थी जीवन की यात्रा भी।गुरनाह का लेखन अफ्रीका के उन बदनसीबों की कथा है जो मूल से टूट गए हैं,नई दुनिया से विच्छिन्न हैं,क्रोध,घृणा,अपराधबोध और अजनबियत की यातना से अपना यूटोपिया गढ़ रहे हैं।ये वे अभागे हैं जिनके लिए ग्राम,विश्वग्राम और इंस्टाग्राम में 'घर' का एहसास एक दुःस्वप्न है।
      आज शरणार्थी जीवन विश्व का सबसे बड़ा ट्रामा है।दुनिया का नया यथार्थ शरणार्थी उपाघात से बन रहा है।गुरनाह का कथा  साहित्य शरणार्थी जीवन पर हो रही बर्बरता, विवाद और विरोध का गहन लेखाजोखा है।
      1994 में अब्दुल गुरनाह का पैराडाइज उपन्यास बुकर पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्टेड हुआ था।उनके उपन्यास मेमोरी ऑफ डिपार्चर,पिलग्रिम्स वे,द लास्ट गिफ्ट,ग्रेभ हार्ट,बाय द सी आदि शरणार्थी जीवन के आंसुओं के जहाज हैं जिनपर पृथ्वी के बदनसीब सवार अनिश्चित विश्व की ओर बढ़ रहे हैं।
       यह पुरस्कार अफ्रीका और यूरोप के लिए मिरर स्टेज है। कुचल दी गई अस्मिताओं और आकांक्षाओं पर फेंकी गई नई रोशनी।एक सम्मान जो सिर्फ कसक की याद दिलाता है।

      ब्रिटेन और अमरीका जब चौथा बूस्टर से सेफ हो रहा है तब अफ्रीका के शोषित दमित जनों की सिर्फ 3 फीसदी आबादी को कोविड वैक्सीन मिल पायी है।यह नई दुनिया है जिसकी किस्मत यूरोप ने  200 सालों में तय किया है।हमें गुरनाह के कथा साहित्य से तीसरी दुनिया पर नई बहस शुरू करनी चाहिए।
           

15 सितंबर, 2021

हिंदी की दार्शनिक आलोचना और मैनेजर पांडेय


√रामाज्ञा शशिधर के की बोर्ड से
{'दार्शनिक आलोचक' पर द्विदिवसीय विमर्श}
【80 के मैनेजर पांडेय पर अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद】
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 √ कड़क आवाज़ और व्यंजक अंदाज़।नारियल की तरह बाहर से ठोस और अंदर से तरल।मैं भूल जाता हूँ तो उनका ही दूरभाष आ जाता-कैसे हो रामाज्ञा?हाल चाल तो ले लिया करो।
         देश भर के मंचों पर अपनी जन व विटी शैली से दहाड़ने वाले आलोचक का बुढापा  कोविड काल में भीषण तन्हाई का शिकार रहा।कहते हैं कि भाषा मनुष्य की जीवनी शक्ति है।मैनेजर पांडेय के लिए यह प्राणवायु है।
      प्रो देवेंद्र चौबे सहित शिष्य व मित्र मंडल का यह निर्णय स्वागत योग्य है कि ज्ञान व दर्शन विरोधी वैश्विक समय में मैनेजर पांडेय के बहाने हिंदी आलोचना के विचारक-दार्शनिक स्वरूप पर बहस चलायी जाए।
       दो दिनों के लंबे परिसंवाद में प्रिय आलोचक को चाहने व हिस्सेदारी लेने वालों की पंक्ति भी बहुत लंबी है।
      पश्चिम में आलोचना और दर्शन का सम्बन्ध प्लेटो-अरस्तू से देरिदा-फ्रेडरिक जेमेसन तक सघन,मूलगामी और नवाचारमूलक है।पूरब में दर्शन से काव्य शास्त्र का आत्यंतिक,सघन और जीवंत सम्बन्ध अपेक्षाकृत कम मिलता है।संस्कृत और पालि में जहां दर्शन की समृद्ध परंपरा है वहीं संस्कृत काव्यशास्त्र के छह सिद्धांत ज्यादातर रचना के रूप पक्ष में ही उलझे हुए दिखते हैं।अंतर्वस्तु और विचारधारा के क्षेत्र में यहां सघन संघर्ष नहीं है।
         हिंदी कविता के हजार साल में  पूर्व औपनिवेशिक युग तक देसी कविता का कोई काव्यशास्त्र बनता ही नहीं है।संस्कृत के उधार के काव्यशास्त्र से आजतक विश्वविद्यालयी अध्यापक व आलोचक हिंदी की काव्य संरचना का कृत्रिम व अप्रासंगिक विश्लेषण विवेचन करते हैं।यह एक गहन वैचारिक आलोचकीय संकट रहा है।बौद्ध,जैन,शंकर,रामानुजाचार्य,रामानंद,बल्लभाचार्य,सूफीवाद आदि से निर्मित दर्शन धर्म-मिथक केंद्रित ज्यादा हैं वस्तुसत्ता को कम आधार प्रदान करते हैं।साथ ही इन दर्शन सरणियों का व्यवस्थित काव्यशास्त्रीय सिद्धांत नहीं बन पाया।
          आधुनिक साहित्य काल जिसे मैं औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक समय कहना ज्यादा उचित समझता हूँ,हिंदी आलोचना का प्रथम गठन व निर्माण काल है।प्रथम आलोचक बालकृष्ण भट्ट से मैनेजर पांडेय तक की आलोचना यात्रा पर ध्यान दीजिए तो मुझे दो ही सघन व गहरे दार्शनिक आलोचक दिखते हैं जो भाषा,वस्तु और विचारधारा तीनों स्तरों पर आलोचना को दर्शन की बुनियाद पर सिरजते हैं।प्रथम आलोचक रामचन्द्र शुक्ल और दूसरे मैनेजर पांडेय।बीच में हजारी प्रसाद द्विवेदी,रामविलास शर्मा आदि आलोचना को दर्शन में बदलने का वैसा सघन आत्मसंघर्ष नहीं करते।हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा संस्कृति और समाज के तथ्यों व विन्यासों के आलोचक हैं।अलबत्ता रचनाकार आलोचकों में यह दार्शनिक विन्यास और संरचना का संघर्ष विचारणीय है।अज्ञेय,मुक्तिबोध,मलयज के साथ नामवर सिंह,विजयदेव नारायण शाही और नन्दकिशोर आचार्य जैसे आलोचक दर्शन की गहराई में उतरते हैं।इन आलोचकों का साहित्य सिद्धांत एक हद तक दार्शनिक आलोचना का निर्माण करता है जो हमारा पाथेय है।
        मैनेजर पांडेय समाज और वस्तुसत्ता की ज़मीन पर पश्चिम और पूरब से दर्शन के सूत्र लेते हैं तथा रामचन्द्र शुक्ल की तरह सामाजिक-तथ्यात्मक डिटेल्स को रिड्यूस करते हुए रचना सत्य के सिद्धांत का सूत्रात्मक निर्माण करते हैं।वे इसके लिए हेगेल-मार्क्स तक ही नहीं रुकते बल्कि उत्तर मार्क्सवादी दर्शन व आलोचना सरणियों व रूपों का व्यापक अध्ययन मनन कर उसे हिंदी व भारतीय चित्त के अनुरूप ढालते हैं।वे पूर्ववर्ती भारतीय व हिंदी आलोचना के सार को भी अपनी आलोचना पद्धति में शामिल करते हैं।इस प्रक्रिया में वे 'सार सार को गहि लई थोथा देइ उड़ाय' की प्रक्रिया व रणनीति का उपयोग करते हैं।
      एक बार मैंने नामवर सिंह से दिल्ली की एक गोष्ठी में सुना था कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य के इतिहास को इसलिए सिरहाने में रखता हूँ और हर रोज एक पृष्ठ पढ़ता हूँ ताकि मेरी आलोचना की भाषा उससे प्रेरणा ले सके।मुझे लगता है कि बीएचयू हिंदी स्कूल के छात्र मैनेजर पांडेय लगातार आचार्य शुक्ल की आलोचना पद्धति  के अनुसरणकर्ता रहे।उनका शुक्ल की आलोचना के दार्शनिक आधार पर मौजूद आलेख इसका प्रमाण है।
         गुरु के दर्शन प्रेम का एक संस्मरण सुनाना चाहता हूँ।
उन्हें मैंने एक आयोजन में बीएचयू बुलाया था।अस्सी की प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पुस्तक शॉप हार्मोनी दिखाने की इच्छा हुई।वे वहां गए और दर्शन की अनेक पुस्तकें खरीदीं।देरिदा की एक पुस्तक ली।मैंने भी देरिदा एक पुस्तक खरीद ली-स्पेक्टर्स ऑफ मार्क्स।उन्होंने गेस्ट हाउस में जब देखा तो खुश हुए और बोले-देरिदा की मेरी पुस्तक बदल लो।इसलिए कि इसमें मार्क्सवादियों की आलोचना है।मुझे भी पहली बार ज्ञान कांड का सुअवसर मिला।मैंने कहा कि मुझे यही पसंद है।दस बार दबाव बनाकर वह किताब उन्होंने ले ही ली।यह है उनकी दर्शन पिपासा।
      नामवर सिंह की एक वाचिक पुस्तक में देरिदा पर लंबा व्याख्यान है।वहां प्रूफरीडर व सम्पादक ने उस किताब का नाम शोधित कर लिख दिया है-इंस्पेक्टर ऑफ मार्क्स।यूरोप से हिंदी में आकर मार्क्स भी इंस्पेक्टर हो जाए तो अनहोनी नहीं।मैनेजर पांडेय इस वाग्जाल व कूपमण्डूकता को तोड़ते हैं।
          80 के होने पर उन्हें स्वस्थ्य व सृजन के लिए शुभकामनाएं!वे सौ साल तक सक्रिय रहें।