'इतिहास खुद को दोहराता चलता है' इस तथ्य की पुनरावृति इन दिनों कबीर,तुलसी,प्रेमचंद,प्रसाद,रामचंद्र शुक्ल,हज़ारी प्रसाद द्विवेदी,नामवर सिंह आदि के नगर में विचित्र काकटेल कल्चर के नवोत्थान के साथ चल रही है. समकालीन हिंदी कविता के कुख्यात एंटी हीरो विष्णु खरे द्वारा अगस्त २०१० में लिखे गए एक विवादित लेख के कुछ टुकड़े मणिकर्णिका के अकालमृत मुर्दे की तरह प्रेत बनकर बनारस में मंडरा रहे हैं.
09 जनवरी, 2014
शुक्ल के घर में हिंदी के हुडुकलुलु
Labels:
विवाद,
शुक्ल के घर में हिंदी के हुडुकलुलु
08 जनवरी, 2014
यह हिन्दी आलोचना का हड़ताल युग है
यह टिपण्णी परिकथा के युवा आलोचना विशेषांक के परिचर्चा स्तम्भ में भी छपी है.रामाज्ञा शशिधर
1. मैं पिछल्ो दो दशक की युवा हिन्दी आलोचना को हिन्दी आलोचना का हड़ताल युग मानता हूँ। जहाँ रचना समय के गति और द्वन्द्व को पकड़ने की कोशिश करती हुई लगातार सक्रिय है, आलोचना समय और रचना से जरूरी मांगों के कारण नहीं अपनी ऐतिहासिक पस्ती और वैचारिक समझौतापरस्ती के कारण कर्म का मैदान छोड़कर हड़ताली मुद्रा में दिख रही है। मैं नब्बे के दशक से पूर्व की आलोचना को पड़ताली आलोचना मानता हूँ। इस मध्य आलोचना की एक नई प्रवृत्ति भी विकसित हुई है जिसे करताली आलोचना कहा जा सकता है।
Labels:
आलोचना,
यह हिन्दी आलोचना का हड़ताल युग है
सदस्यता लें
संदेश (Atom)